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सूरज ढलने से पहले अस्त होना और रो लेना आंखें सूखने से पहले, बादलों से पहले बरस जाना, बह जाना हवा के आगे आगे.. बीजों सा बिखर जाना और उग आना पहले पौधों से, मरने से पहले जी लेना और मर जाना जीने से पहले .. जीवन की किसी दुपहरी में बड़ के नीचे बड़े बाबा ने इक कमबख्त को यह सीख दी थी. जो बाद वक्त किसी सर्च इंजिन में इसके मायने नहीं खोज पाया तो जोगी हो गया.

कहते हैं कि उस जोगी के कमंडल में कागज के पुर्जों पर लिखे और भी कई सवाल भरे थे. जैसे कि भौतिकी, स्टीफन हाकिंग के भविष्यवाणी के अनुसार खत्म क्यूं नहीं हो गई और भौतिकवाद, एक नये उपभोक्तावाद के रूप में सारे आदर्शों को रौंधता हुआ हमारे सामने आकर खड़ा क्यों हो गया है? कि बारिशें फागण चैत के महीनों में क्यों आती हैं जबकि खेत की गलियां जवान फसलों से लकदक हुई जाती हैं.

और तो और उस जोगी के शरीर पर जमी भभूत स्मार्टफोन से उड़े आते इन सवालों को छुपा नहीं पाती कि क्या क्रांतियां लोगों को ठगने/भ्रमाने का जरिया हो गई हैं? कि एक क्रांतिकारी, दूसरे क्रांतिकारी के पैरों के नीचे के जमीन खींचकर अपना कौनसा धरातल मजबूत कर रहा है. कि यह सारा भ्रम ही है जो हमेशा किसी अवतार के इंतजार में रहे इक समाज के सामने रचा जा रहा है. सब मिथ्या है, सुबह शाम लगने वाली भूख के सिवा?

बताते हैं कि इस जोगी ने दुनिया की किसी बड़ी अदालत में सारे सर्च इंजिनों के खिलाफ मामला दर्ज कराया कि उन्हें बंद कर दिया जाना चाहिए क्योंकि ऐसे जमीनी सवालों की खोज करने पर उनमें ‘इन्फोरमेशन नाट फाउंड’ का संदेश आता है. बल्कि ये सर्च इंजिन सुझाव देते हैं कि आप ‘दुनिया के दस श्रेष्ठ क्रांतिकारी’ या ‘साल 2014 के सबसे शक्तिशाली क्रांतिकारी’ पर सर्च करें. जोगी के अनुसार यह मूल प्रश्नों से भटकाने की बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चाल है क्योंकि सारे सर्च इंजिनों पर उन्हीं का कब्जा है.

इस जोगी को दिल्ली के रामलीला मैदान और कभी जंतर मंतर पर दायें वाली स्टालों पर अजीब से सवाल करते भी देखा गया. बताते हैं कि इस जोगी के कमंडल से एक बार कागज का एक पुर्जा निकलकर गिर गया जिस पर लाल स्याही में लिखा था-

हम लू, आंधी और सूखे के लिए बने,
कि बारिशें
हमारी किताबों के हाशिए पर नुक्तों की तरह दर्ज हैं.

Posted by: prithvi | 17/01/2015

चंबल की धारियां

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अपने समय से चार घंटे देरी से चलती ताज एक्सप्रेस आगरा से निकले के बाद ही एक्सप्रेस जैसी चलने लगी है. कुहरे के बंधन कमजोर हो रहे हैं और दूर आसमान में सूरज टंगा दिखता है. शायद धुंध का राज खत्म हो रहा है. जमीन से ऐसी नाड़ बंधी है कि पेड़ पौधे व झाड़ियां, जमीन, लोग देखकर ही अपनी माटी की खुशबू आ जाती है. लगा कि अपना देस है और धौलपुर के इलाके वाला बोर्ड लगा दिख गया. 
 
तो, अपनी अल्हड़ता से बहती चंबल के उपर से गुजर रहे हैं. पुल से चंबल कितनी सुंदर, प्यारी दिखती है. यह देश की सबसे निर्मल नदियों में से एक है. यानी मानवीय व औद्योगिक प्रदूषण से बची हुई. इसे देखकर हम अपने देश की नदियों पर संतोष व गर्व कर सकते हैं. कि यह किसी भी महानगर को छूती हुई नहीं निकलती. इसी पुल के खत्म होते ही चंबल की विश्व विख्यात घाटियां हैं. चंबल के दस्युओं की कहानियों में वर्णित और फिल्मों में दिखी तस्वीरों से कहीं अधिक सुंदर और लुभावनी. थार के धोरों यानी रेत के टीलों व अरावली की पहाड़ियों जितनी ही मनमोहक. किसी गिलहरी के शरीर पर लहराती धारियों सी. बांयी ओर की खिड़की से देखते हुए उर्वी कहती है— वॉव, क्या हम यहां घूम नहीं सकते. मैंने कहा क्यूं नहीं. दिन के उजाले में एक सीमा तक तो जा ही सकते हैं. 
 
शायद कभी चंबल की घाटियों की सफारी हो. आखिर पता तो चले कि 18 लाख हेक्टेयर में फैली यह प्रकृति की लीला अपने भीतर कितने रहस्य समेटे हैं. कितनी सुंदरता इनकी खंदकों में छुपी हुई है. ऐसा होगा यह निश्चित नहीं क्योंकि ग्वालियर में एक अंग्रेजी अखबार की खबर बताती है कि प्रदेश सरकार ने इन घाटियों को एकसार कर खेती करनी चाही है. सरकार उद्योगों के लिए इन मनोहारी घाटियों के ए​क हिस्से को समतल करने का काम पहले ही शुरू कर चुकी है. कितने देशों में इस तरह का विशिष्‍ट प्राकृतिक सौंदर्य है? जिन विविधिताओं को सहेजा जाना चाहिए हम सबसे पहले उन्‍हीं को निशाना बनाते हैं; पता नहीं विकास की कीमत हमेशा प्रकृति को ही क्यों चुकानी पड़ती है? 
 
शहर लौटता हूं तो हवाओं में नारे और दीवारों पर क्रांति के चमचमाते पोस्टर हैं. शहर में इन दिनों इतिहास की बुनियाद पर नया भविष्य बनाने वाले मिस्त्री करंडी, सूतली लेकर आए हुए हैं. वे खुद को स्वयंसिद्ध बताते हैं तो नए दिनों का दावा करने वालों के झोले में कुछ दिनों की कथित उपलब्धियों से भरे आधे अधूरे सर्टिफिकेट हैं. बड़े बुजुर्गों ने हमें तपती दुपहरियों व ढलती रातों में जिन चौराहों से बचने की सलाह दी थी जिंदगी की सड़क हमें वहीं पर ले आती है. कल तक जिन हाथों में देश के झंडे थे आज वही साफ सपाट डंडे लिए खड़े हैं. जिन्हें क्रांति का अगुवा कहा गया था वे जमीनी युद्ध मैदानों के भगौड़े साबित हुए. मीडिया हमारे चारों ओर अफवाहों और अर्धसत्यों का चक्रव्यूह रच रहा है और सयाने कह गए हैं कि आधा सच, झूठ से भी अधिक खतरनाक होता है. 
 
साबिर का शे’र है-
सूखी रेत समझ के राही डूब गए,
बाढ का पानी कैसी दलदल छोड़ गया.
*****
Posted by: prithvi | 05/11/2014

बर्फ कुछ भी नहीं

PGS

रोमानिया में जन्में माइकल क्रेतु ने एनिग्मा के गाने ‘बियांड द इनविजिबल’ को ब्रिटेन के एक जंगल में फिल्माया जहां आइस रिंक की बर्फ को जमाने में सात दिन लगे. इस गाने में लातवियन और जार्जियन गीतों के बोल हैं और इसका वीडियो फिनलैंड के एक आइस डांस युगल पर फिल्माया गया है. काले धन को लेकर जारी उबाऊ जुबानी जमाखर्च से उकताकर जब बालकनी में आया तो हवाओं के सिस्टम पर यह प्ले हो रहा था. कि अदृश्य की सीमाओं से परे किसी को कुछ छुपाना नहीं होता. कुछ भावों की वास्तविकता बंद आंखों से ही महसूस की जा सकती है.

सामने मानीटर के ठीक नीचे रखे पूजा गर्ग सिंह के कविता संग्रह को देखते हुए क्रेतु और उनके इस गाने का दर्शन बरबस याद आ जाता है. पन्नों पर की गई नोटिंग को पढता हूं तो लगता है कि क्रेतु और उनका दर्शन कितना मेल खाता है. क्योंकि ​कविता केवल शब्दों को विषय की किसी एक लड़ी में पिरो देना ही नहीं होता बल्कि वह कवि के दर्शन और सोच को लेकर भी आगे बढ़ती है. पूजा गर्ग सिंह की कविताएं कुछ ऐसी ही हैं. वे विषय की गहराइयों, उंचाइयों व विस्तार की कसौटी पर खरी उतरती हैं कि उनकी कविताओं में गिरती हुई बर्फ, उगता हुआ सूरज और ढलती हुई रातें हैं. वे मचलती लहरों व जलते हुए खेतों की बात करती हैं. उनकी कविताओं में दुनिया जहान का वह समसा‍मयिक विषय है जो एक कवि का विचलित करता है.

पूजा गर्ग सिंह अपने हिस्से की सर्दियों और हमारे गर्मी के मौसमों की बात करते हुए  अपनी हर व्यक्तिगत खुशी और दुख को इस व्यापक प्रकृति से जोड़कर देखती हैं. यही उनकी कविताओं को विशिष्ट बनाता है.

उनके शब्दों में कहूं तो तुम्हारे आसमान पर टंगा चांद मेरा वह सिक्का है जो मैं हर शुक्ल पक्ष में अंधेरों की बावड़ी में फेंकता हूं और जो फिर नहीं मिलता. या कि मेरे लिए रात का मतलब तुम्हारा घर आना है और मेरी रात कई दिनों से नहीं हुई है. कि बर्फ कुछ भी नहीं तुम्हारी यादों पर बिछी झूठ की सफेद मोटी चादर के सिवा. उनकी कविताओं में मुहब्बत किसी सुनसान राह पर झर गए पीले पत्‍तों सी है जिन्हें वक्त अल सुबह बुहारता है.

कि पूजा की कविताएं सिर्फ शब्दों का ताना बना नहीं है बल्कि अपने आप में एक दर्शन है. वे यूं ही छोटी छोटी बातों में बड़े सवाल उठा देती हैं कि क्यूं कुछ नदियों की मंजिल इक दरिया में जाकर खत्म हो जाती है और सीख देती हैं कि सभी दूरियों को नापने के लिए अंतरिक्ष के पैमानों की जरूरत नहीं होती. वे कहती हैं…

And let moments fall in my lap

like a poet’s  words

So full of themselves

And yet so empty!


 

[अमेरिका में रह रहीं पूजा गर्ग सिंह का कविता संग्रह ‘एवरीडे एंड सम अदर डेज’ आथर्सप्रेस ने प्रकाशित किया है. आनलाइन आर्डर यहां किया जा सकता है.]

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नानू काका चले गए. उनके बाद घोटकी चाची भी चल बसीं. चाची का असली नाम कभी जाना नहीं, न ही किसी से सुना. उनके डील डौल और हंसमुख प्रकृति के कारण ही शायद उनका नाम घोटकी पड़ा. सात भाई व एक बहन वाली एक लंबी चौड़ी गुवाड़ तो पहले ही बिखर गई थी अब उस लंबे चौड़े परिवार से दो जी और चले गए. डेढ महीने भर में. क्या बदला है? उमस भरी रात ठंडी होने लगी है और ढाणी के पास जो क्यारियां ग्वार से भरी थीं, अब वे खाली हैं. ग्वार बिक चुका है और पास की अनूपगढ़—गंगानगर रोड पर पराळी से भरी ट्रालियां दिखती हैं. बाकी दुनिया ठीक वैसे ही चल रही है जैसे कुछ हफ्ते भर पहले थी. सुबह की शुरुआती बस पकड़ने के लिए जल्द ही बस अड्डे पर आ जाता हूं. टेल पर पहुंची जीबी माइनर में पानी है.

सत्संगी साज समेट कर अगले घर जा चुके हैं. एक रात जो कबीर, रैदास व बन्नानाथ जैसे संतों की भजन बाणी ​सुन जागृत हुई जा रही थी फिर नींद के आगोश में जाने को व्याकुल है. दिन की चमक में उसकी आंखें चकाचौंध हैं. यही तो रात भर सत्संगी कहते रहे कि हम जिस बाजार में होते हैं उसी के अनुसार बोली लगाते हैं. उसी की मुद्रा में कारोबार करते हैं. वहां हमारी सोच के सिक्के नहीं चलते. हमारा कोई क्रेडिट/डेबिट कार्ड, चैक या रुक्का वहां नहीं चलता. उस बाजार में हमारी हैसियत सिर्फ और सिर्फ एक ग्राहक की है. बाजार, वहां के बणिए,उनके कारिंदे हमें ऐसा कोई कदम नहीं उठाने देते जिससे उनका बना बनाया बाजार खराब हो. या उसका उल्लंघन हो.

इसीलिए रात को दिन उगते उगते सो जाना है. यही इस बाजार का नियम है. जब रात जागृत हो, दिन से पंजा लड़ाएगी तब ही असली क्रांति घटित होगी. वरना तो सब पाखंड है. इक बाजार है. हम उस बाजार से कुछ आग खरीदने के लिए पत्थर झोले में भर घूम रहे हैं. हम पत्थरों के बदले आग खरीदने की बचकानी हरकतों पर उतरे नादान हैं. बाजार में हमारी नादानी पर हंसने वाले कारिंदे तो हैं पर यह बताने वाला कोई नहीं कि भले मानस आग तो उन पत्थरों में भी छिपी है जो तुम उठाए घूम रहे हो. जला लो. यह सलाह तो कोई कबीर, रैदास ही दे सकता है.

खैर, अगली सुबह इक ऐसे शहर में होनी है जहां हमारे करियर की नाड़ बंधी है. जहां संतरी कलस्टर बस की दायीं ओर की सीट पर बैठे हुए यह सोचना बेवजह है कि संसद मार्ग पर नीम की जगह मैपल के पेड़ होते तो चमकती दुपहरियों में कैसे दिखते या कि इंडिया गेट इन अकेली दुपहरियों में किन यादों के साथ वक्त काटता होगा. लेकिन यह चिंता जरूर की जा सकती है कि संयुक्त परिवारों की टूटन के किरचों को समेटे हमारे दरवाजे पर चली आईं इन नकचढी सुबहों का जवाब देने के लिए हमारे पास क्या है?

  • एक शे’र सुनिए
    यूं ही खफा नहीं हूं तेरे हसीं मौसमों से,
    मैंने अपने खेतों में गिरते ओले देखे हैं.
Posted by: prithvi | 14/09/2014

नीर नजर नहीं आवे

जिंदगी हमें हजार रास्ते नहीं देती कि हम सैकड़ों मंजिलें तय कर लें. जिंदगी के हमारे तरकश में गिने चुने तीर हैं इसलिए हमारे लक्ष्य भी कम ही होने चाहिए.

फिरोजपुर जाने वाली ट्रेन से बठिंडा में ही उतरना होगा. आगे का रास्ता बस से तय करना ​है. गिदड़बाहा, मलोट, अबोहर, बल्लुआना, श्रीगंगानगर और आगे. भादो की बारिश में भीगी पंजाब की धरती पानी से पगी है. घरों व सड़कों को छोड़ दें तो हर कहीं पानी भरा है. खेतों से लेकर खलिहानों, खाली पड़े अहातों तक हर जगह. धान के खेत तो इसे झेल भी लेंगे, नरमा कपास का क्या होगा. मोठ, ग्वार, ज्वार की फसल मुरझाने लगी है. मौसमी और अमरूद के बागों में पानी भरा है. लेकिन वास्तविकता की जमीन की यह सेम दलदल हम तक आने वाले समाचारों से गायब है. हर दु:ख दर्द को बहा, धो देने की ताकत रखने वाला पानी हमारी चिंता का बड़ा सबब बन गया है और हमारा किया धरा मानों जमीन पर उग आया है. यही जमीन की फितरत है. वह अपने पास कुछ नहीं रखती. सबकुछ उगाकर हमारे सामने रख देती है.

रेत और रेगिस्तान में रहने वाले हम तो बारिशों के लिए बने ही नहीं. हम तो अकाल, आंधी और सूखे के लिए बने हैं. बारिशें हमारी जिंदगी के पन्नों के हाशिए पर नुक्तों की तरह दर्ज हैं. लेकिन पंजाब, हरियाणा के नखलिस्तान को क्या हो गया कि जमीन ‘ये लो तुम्हारी हरित क्रांति, ये लो तुम्हारा जलवायु परिवर्तन’ कह कह कर दलदल हुई जाती है. रही सही कसर शायद हर खाली पड़ी जमीन पर कब्जा करने की हमारी भूख ने पूरी कर दी है. पानी के बारे में सोचता हूं-

सुना कि पानी मर गया है
तभी तो वह तेरे शहर में भर गया है.
जिंदा होता तो ​बह जाता नदी नालों में
वह क्यूं बेनूर मेरे खेतों को कर गया है.

केर के लाल और कीकर के खिलते पीले फूलों के बीच देखता हूं कि राजस्थान की ‘कपास पट्टी’ कही जाने वाली जमीन ग्वार की फसल से भरी है. जो काम सरकारें सोच नहीं सकीं या कर नहीं पाईं वह बाजार ने एक झटके से कर दिया. पर्याप्त पानी की कमी और अच्छे भाव न मिलने से परेशान किसानों को कम मेहनत में अधिक मुनाफे का विकल्प ग्वार में मिल गया है. अबोहर से आगे खासकर श्रीगंगानगर से लेकर सूरतगढ, पदमपुर, रायसिंहनगर, अनूपगढ, रावला, खाजूवाला तक ग्वार ही बोया जा रहा है. एशिया की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजना इंदिरा गांधी नहर से सिंचित यह इलाका कुछ दिन पहले तक सिंचाई पानी के बड़े संकट से दो चार था. अब भी यहां कि अधिकांश नहरें सूखी हैं तो पीछे पंजाब हरियाणा पानी में डूब रहा है.

भादों की अगली रात अनूपगढ़ के पास एक ढाणी में सत्संग सुनने में बीती. वहां सुने एक भजन का यही भाव था कि- 
ये जग अथाह जल सागर,
नीर नजर नहीं आवे.

Posted by: prithvi | 16/08/2014

हारी हुई बाजियां

एक प्यारी सी लड़की थी जिसने पता नहीं कितने सपनों को अपने शरीर पर गोदनों के रूप में गुदवा लिया. जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया और दुनिया को ठेंगे पर रखा. अपने अंतिम दिनों में डायरियों के पुराने पन्नों में खो चुके दोस्तों को ढूंढा और उनसे सालों साल बाद बात की. और ऐसे ही सावन में एक दिन अपनी जिंदगी का मोबाइल स्विच आफ कर दिया. राबिन विलियम्स का जाना एमी जैसे कितने प्यारे लोगों की याद दिला देता है जिन्होंने अपने हिस्से के आसमान की लड़ाई में जमीन से नाता तोड़ लिया.

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एमी, इक हारी हुई बाजी 

सावन में इतने स्‍तब्‍ध करने वाले समाचार नहीं आते, नहीं आने चाहिए. एमी वाइनहाऊस के चले जाने की खबर, कुछ ऐसा ही समाचार था. भले ही इन कुछ वर्षों में एमी ने कोई याद रखने वाला नया तराना नहीं गाया लेकिन अपनी शुरुआत से उसने उम्‍मीदों के जो क्षितिज बुने थे वहां सुरों की सतरंगी सफल कहानियां थी, अच्‍छे संगीत के सपने थे,इक भरोसा था कि वह फिर किसी दिन अपने बिंदास रूप में चौंकाने वाले गानों के साथ स्टेज पर होगी. पर एमी अपनी मौत से इन सब आशाओं पर हताश करने वाला तारकोल पोत कर चली गई. 27 साल की उम्र में, चंद यादगार नग्‍में हमारी झोली में डालकर.

एमी के टैक्सी चालक पिता को जैज से बहुत लगाव रहा और वे गाहे बगाहे कुछ गुनगुनाते रहते थे. शायद पिता का संगीत से प्रेम एमी की नसों में लहू बनकर दौड़ने लगा और उसकी नाड़ संगीत से बंध गई. दस साल की थी तो अपने दोस्त  के साथ मिलकर रैप ग्रुप ‘स्वीट एन सोर’ बनाया. जैज से प्रभावित पहले एलबम फ्रेंक के साथ संगीत में औपचारिक रूप से उतरी. इसके गानों के लिए उसे इवोर नोवेलो गीतकार अवार्ड मिला, ब्रिट अवार्ड में नामांकन हुआ तथा इस एलबम को मर्करी म्यूजिक प्राइज के लिए भी छांट लिया गया. 2006 में बेक टु ब्लैक आया और धूम मच गई. ब्रिटेन से लेकर अमेरिका तक में. पांच ग्रेमी अवार्ड मिले और स्टारडम, शौहरत उसके कदमों में लोटने लगी.

बस इतनी सी बात है मित्रो, बाकी तो कहानियां किस्से हैं एक जन्मजात संगी‍त प्रतिभा के तबाह होने की. प्रेम में टूटती, टूटते रिश्तों से बिखरती एक युवती जो अपने हिस्से के आसमान की लड़ाई में जमीन से नाता तोड़ देती है. एमी ने शुरू में एक बार कहा था कि वह शौहरत पाने के लिए नहीं आई है, वह तो बस एक संगीतकार है. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. शौहरत और व्यक्तिगत जीवन के किस्सों में उसका संगीत बहुत पीछे छूट गया और उसकी प्रतिभा भी. प्रेम के नशे का तोड़ उसने मरिजुआना, क्रेक में ढूंढना चाहा. ग्लानि में खुद के शरीर को चोटें पहुंचाईं और बीमारियों को दावत दी. अपनी कमजोरियों से लड़ती, सड़कों पर अर्द्धनग्न बदहवास घूमती एमी की तस्‍वीरें बाद के समय की दीवारों पर चस्पां होती रहीं.

इस तरह नशे, ड्रग्स  के कारण तबाह होने वाली एमी कोई पहली प्रतिभा नहीं है. संगीत से ही कई प्रतिभाशाली, संभावनाशील नाम इस सूची में हैं. जिम्मी हेंडरिक्स, जेनिस जोपलिन, कुर्त कोबेन तथा जिम मोरिसन को कैसे भूला जा सकता है. संभावनाओं के पौधों का इस तरह मुरझा जाना, अंदर से कुछ दरकाता है क्योंकि इन्हीं  छोटी छोटी प्रतिभाओं से बेहतर समय समाज की उम्मीदें निकलती हैं. तो एमी संगीत की हो या किसी और क्षेत्र की, एमी ब्रिटेन की हो या किसी और देश की, उसका यूं खुद को तबाह करना सालने वाला है.

लंदन की एक घटना याद आती है. मर्करी प्राइज समारोह हो रहा था और एमी को आना था लेकिन किसी को भरोसा नहीं था कि वह आएगी भी. अचानक किसी कोने से एमी दबे पांव स्टेनज पर आती है और पूरे हॉल में सन्नाटा पसर जाता है.. एमी के दिल में पता नहीं क्या होता है कि वह ‘प्यार इक हारी बाजी है’ (लव इज ए लूजिंग गेम) गाना शुरू करती है. सिर्फ एक अकूस्टिक गिटार के साथ. सुनने वाले बताते हैं कि एमी के गले से सुर नहीं मानों दर्द, पीड़ा की गहरी नदियां बह रहीं थीं. गाना पूरा हुआ तो एमी काफी देर तक संभलने की कोशिश करती रही और शुक्रिया जैसा कुछ बोलकर मंच से नीचे उतर गई. कितने कलाकार ऐसा समां बांध पाते हैं. एमी ने कर दिखाया क्योंकि दर्द और संगीत से उसका गहरा नाता रहा. उसकी आवाज में जो ताजगी, गहराई थी वह हर गले को नहीं मिलती. जैज, सॉल व आरएंडबी की यह प्यारी सी गायिका थी जिसने पता नहीं कितने सपनों को अपने शरीर पर गोदनों के रूप में गुदवा लिया. जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया और दुनिया को ठेंगे पर रखा. जो दिल में आया बोला, जो दिल में आया किया. अपने अंतिम दिनों में डायरियों के पुराने पन्नों में खो चुके दोस्तों को ढूंढा और उनसे सालों साल बाद बात की. और ऐसे ही एक दिन अपनी जिंदगी का मोबाइल स्विच आफ कर दिया.

अपने सिस्टम से इन दिनों उसका प्यार इक हारी बाजी सुनता हूं तो शब्द गडमगड होकर एमी एक हारी बाजी जैसे कुछ हो जाते हैं.

[एमी (1983—2011) को याद करते हुए यह आलेख कुछ साल पहले एक सावन में लिखा था.]

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Posted by: prithvi | 21/06/2014

ब्राजील की बेटी

बाहर से आती चिड़ी की चहचहाट और रोशनी के बीच शरीर कहता है कि अब सो जाना चाहिए. सुबह के पांचेक बज रहे हैं. दिन निकल आया और रात सोने चली गई है. होंडूरस व इक्वाडोर का मैच चल रहा है जबकि कोस्टा रिका ने इटली को हराकर इंग्लैंड की इस प्रतियोगिता से रवानगी पक्की कर दी है. ग्रुप डी में से अगले दौर की 16 टीमों में स्थान बनाने वाली कोस्टा रिका पहली टीम है. इस ग्रुप की बाकी तीन टीमें, कभी न कभी विश्व कप विजेता रह चुकी हैं. पिछली बार के विश्व चैंपियन स्पेन की विदाई से तय हो गया है कि इस बार विजेता नया होगा. हालैंड और क्रोएशिया धमक से जीतकर आगे आए हैं. स्टीफन हाकिंग ने कहा है कि उनका दिल इंग्लैंड के साथ है पर वे बाजी ब्राजील पर लगाना चाहेंगे.

आखिर क्यों नहीं ब्राजील ही तो है जिसका नाम फुटबाल के नाम के बाद आता है. उसका पर्यायवाची है. फुटबाल मतलब ब्राजील, ब्राजील मतलब फुटबाल.

कहते हैं कि बेटियां जब घर आती हैं तो दीवारें मुस्कराने और दरवाजे गाने लगते हैं. साओ पाउलो से लेकर नेताल और रीयो डी जेनेरियो से लेकर सल्वाडोर तक ब्राजील की हर गली इन दिनों नाच रही है क्योंकि उसकी बेटी घर आई है. फुटबाल ब्राजील की बेटी है. उसकी लाडकंवर है. वह यहां की गलियों, नुक्कड़ों में खेल खेल कर बड़ी हुई है. संवरी है. माओं ने इसे अपने बेटों से ज्यादा लाड से पाला पोसा तो पिताओं ने तमाम वर्जनाओं को ताक पर रखकर इसे फलने फूलने का मौका दिया है. तभी तो दुनिया भर में जिसकी अपनी टीम नहीं होती वह ब्राजील के लिए हूटिंग करता है. पेले की महान विरासत को संजोए यह देश रोमारियो, रोनाल्डो, काका से लेकर नेमार और आस्कर की अल्ट्रा माडर्न पीढी तक आ गया लेकिन फुटबाल के लिए उसका लाड अब भी कम नहीं हुआ है. मैच किसी का भी हो स्टेडियम भरे रहतेे हैं. यूं ही नहीं ब्राजील को दुनिया का फुटबाल देश कहा जाता है और उसके 10000 से अधिक खिलाड़ी हर समय दुनिया के किसी न किसी कोने में फुटबाल खेल रहे होते हैं.

सयानों ने कहा है कि हमें धीरे धीरे चीजों की आदत जो जाती है. हम युद्ध के भी आदी हो जाते हैं. लेकिन ब्राजील ने फुटबाल की आदत डाली. उसने जमीनी स्तर पर फुटबाल खेलने, इसे बढाने के मानक गढे और देखते ही देखते वह उस खेल का सिरमौर बन गया जो उसे एक स्काटिश नागरिक ने सिखाया था. ब्राजील में बच्चे फुटबाल सीखते नहीं हैं यह तो उनके खून में, संस्कारों में प्रीलोडेड होती है. अब तक हुए उन्नीस में से पांच विश्व कप ब्राजील ने जीते हैं. उसने अब तक हुए हर विश्व कप के लिए क्वालीफाइ किया है. ऐसी उपलब्धि हासिल करने वाला वह दुनिया का एक मात्र देश है.

निसंदेह फुटबाल खेल नहीं एक भावना है. यह दुनिया का ब्राजील को दिया गया सबसे नायाब तोहफा है. जिसे उतने ही आदर सहेज संजोकर रखा है. यूं ही फुटबाल  हमारी इस दुनिया को कसकर साथ में बांधने वाली एक मजबूत डोर नहीं है. याद है ना साल 1970 की वह बात जब पेले ने नाइजीरिया में प्रदर्शनी मैच खेलने की हामी भरी. नाइजीरिया, जो उस समय गृहयु़द्ध से जूझ रहा था. पेले और फुटबाल के प्रति दीवानगी देखिए कि सैनिक और विद्रोही, दोनों पक्ष दो दिन के लिए युद्धविराम पर राजी हो गए ताकि सैनिक आराम से पेले को अपनी सरजमीं पर खेलते हुए देख सकें. जिन लड़ाइयों को तमाम कूटनीतियां और चालबाजियां नहीं रोक पाईं उसे इस खेल ने कर दिखाया. कितने और खेलों में इस तरह का दम है?

ओशो ने खेलों की एक खास खूबसूरती की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया था. कि खेल हमें सिखाते हैं कि हार या जीत मायने नहीं रखती. मायने रखता है बढिया खेलना, समग्रता से खेलना और अपनी सारी उर्जा से खेलना. दूसरे भी जीतेंगे लेकिन इसमें कुढने की जरूरत नहीं हम उन्हें भी बधाई दे सकते हैं और उनकी जीत का उत्सव मना सकते हैं. फुटबाल ऐसा ही उत्सव है. यह खेल प्रेमियों का उत्सव और ब्राजील की बेटी है. ***

 

ओह स्पेन: हालेंड ने चार साल पहले जोहानिसबर्ग की हार के भूत को सल्वाडोर में अपने पहले ही मैच में एक के बदले पांच गोल, जमीन के नीचे दबा दिया. गत विश्व विजेता स्पेन की बुढाती टीम अब तक की इस सबसे करारी पराजय की टीस से नहीं उबर पाई दूसरी हार के साथ खिताबी दौड़ से बाहर हो गयी. खैर, दो बार के यूरो और एक बार के इस विश्व चैंपियन ने एक पीढी को फुटबाल के साथ जीने के सपने दिए और शायद यह साल उसके युग के अवसान का है. बाकी, तय रहा कि इस बार चैंपियन नया होगा. ***

[photo curtsy internet]

Posted by: prithvi | 16/06/2014

संगरिया का अमलतास

तपते जेठ में जब हवाएं अपना घर लू को संभलवाकर बारिशों को लेने चली गई हों और सूरज ने मौसमों की सारी नमी पीकर डकार ली हो, उस समय उमस रात के सिर पर चढ़कर सांबा करती है. गोया सावन से हमारी मुहब्बत उसे सौतिया डाह बन डसती है. सात घंटे देर से चल रही हमारी ट्रेन उस स्टेशन पर चढते दिन के साथ पहुंचती है जिसे उसे रात के अंधेरों में ही लांघ जाना था. बाहर निकल कर देखता हूं कि संगरिया है.

amaltas

गाड़ी हनुमानगढ़ की ओर बढ़ रही है. बायीं ओर कस्बा बसा है. आबादी और पटरियों के बीच एक सड़क है और उसी सड़क पर ग्रामोत्थान विदयापीठ का दरवाजा है. विद्यापीठ की चारदीवारी के पास एक अमलतास झक पीले रंग के फूलों के सा​थ मुस्कुराकर मानों गाड़ी से कह रहा था—अपनी लेटलतीफी से बाज नहीं आओगी! खैर, इस विद्यापीठ से अपनी पुरानी नाड़ बंधी है. बाबा की पढाई यहीं हुई थी. उनके दस्तावेजों, बातों में कई बार इसे जीते हुए देखा है. दरअसल यह कोई छोटा मोटा आम स्कूल नहीं यह एक शिक्षा आंदोनल का एक प्रमुख केंद्र है जिसकी धमक उत्तरी पश्चिम राजस्थान, उससे चिपते हरियाणा व पंजाब तक सुनाई दी गई थी. वह आंदोलन खड़ा किया था किशोरावस्था में ही अनाथ हो गए तथा आर्य अनाथालय में पले पढे एक युवक ने जो बाद में स्वामी केशवानंद के रूप श्रद्धेय हुआ.

हद दर्जे तक खुदखर्ज होते जा रहे इस जमाने में यह यह जानना ही कितना सुकून देता है कि पारिवारिक और आर्थिक संकट के कारण औपचारिक शिक्षा तक नहीं ले पाए एक व्‍यक्ति (साधु) ने देश का अपनी तरह का सबसे बड़ा शिक्षा आंदोलन खड़ा कर दिया. उन्‍होंने जन सहयोग से सैंकड़ो स्‍कूल, छात्रावास और पुस्‍तकालय खोले जो आज भी अपनी साख को बनाए रखते हुए काम कर रहे हैं.राजस्‍थान के इस कस्‍बे संगरिया की पहचान आज भी ग्रामोत्‍थान विद्यापीठ से है तो इसमें गलत क्‍या है. थार की तपती लू और उम्‍मीदों को उड़ा देने वाली आंधियों में अपने मां बाप को खो चुका एक किशोर आगे चलकर संत स्‍वामी केश्‍ावानंद के नाम से जाना पहचाना गया. एक ऐसा समाज जिसे राजे रजवाड़ों की बंदिशों की आदत हो गई थी, जहां वंचितों में भी वंचितों व पिछड़ों को और दबाए रखने के सारे प्रयास किए जाते थे वहां के घने अंधेरों और जड़ताओं के खिलाफ स्‍वामी केशवानंद ने  शिक्षा की मशाल को अपना अचूक हथियार बनाया. जात पूछकर पानी पिलाने वाले दौर में उन्‍होंने लिंग,जाति का भेदभाव किए बिना सभी के लिए समान अवसर वाले शिक्षा अवसर वाले शिक्षण संस्‍थान खोले.

इस इलाके ही नहीं देश भर में भी शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह का अनूठा योगदान करने वाले कितने हैं?

किसी सयाने ने कहा था कि अगर हम एक विद्यालय खोलते हैं तो सौ कैदखानों की राह बंद कर देते हैं. इस कसौटी पर स्वामी केशवानंद के काम के फलक का विस्तार आंकना आसान नहीं होगा. अपनी ईएमआई और छोटी छोटी जरूरतों में फंसे हम बस कल्पना ही कर सकते हैं. कई मित्र इस कस्बे में रहते हैं सोचता हूं अगली बार इसी स्टेशन पर उतर जाउंगा कुछ दिनों के लिए.आखिर थार के कितने गांवों में यूं अमलतास​ खिलता है, ज्यूं वह संगरिया में इन दिनों खिला है?

घर की लीपी दीवारों को छूकर खुश हो जाते हैं
मां के अरमानों को यूं समझते हैं गांव के बच्चे.

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स्वामी केशवानंद चैरिटेबल स्मृति ट्रस्ट, अमलतास का फोटो साभार राजेश एकनाथ

एक शहर में लोग तालों के इतने शौकीन थे कि उन्होंने अपनी आवाज से लेकर उम्मीदों तक के दरवाजों पर ताले जड़ दिए. इसके बाद उन्होंने अक्ल पर पर्दे डाल लिए हालांकि इससे वे संतुष्ट नहीं थे और कुछ और ताले इन तालों व पर्दों पर भी लगाना चाहते थे. लेकिन इसी दौरान हुआ यह कि एक ही काम से उकताए शहर के तालागर (कारीगर) अपने भविष्य पर लगे तालों की चाबी खोजने गये और चाबियों के जंगल में खो गए. वहीं सरकार ने चाबियों के इन जंगल को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ठेके पर दे दिया. ये कंपनियां इन चाबियों को गलाकर ऐसे आटोमेटिक लॉक बनाती हैं जिन्हें  बंद करने के लिए चाबी की जरूरत नहीं होती. ऐसे ही समय खबरें आईं कि एक शहर अपने लोगों के कारण नहीं, तालों के लिए जाना जाता है.

बताया जाता है कि इस कहानी की शुरुआत की लाइन पत्रकार रिशार्द केपूसिंस्की ने सन पचहत्तर में अंगोला की तत्कालीन राजधानी लुआंडा के लिए लिखी थी जब बारिश में भीगा एक देश कतिपय आजादी से पहले होच पोच हुआ जा रहा था. और इसका आज की दिल्ली या भारत देश से कोई लेना देना नहीं था. ना है?

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कि भारत में तालों की अवधारणा ही बहुत बाद आई थी.  ताले का सबसे प्राचीन अवशेष हजारों मील दूर असीरिया में मिला. औद्योगिक क्रांति आई तो न जाने कौन कौन सी जगह  के लिए किस किस तरह  के ताले बनने लगे. लेकिन यहीं कहीं चूक हो गई. जो ताले भौतिक सामान की रक्षा आदि के लिए बने थे उसे यहां हमने अलग अर्थ में लेकर पहले ज्ञान पर जड़ा फिर अक्‍ल पर. तभी तो अनजान ने मजाक मजाक में ‘खाइके पान बनारस वाला खुल जाए बंद अक्‍ल का ताला लिख दिया.’ वरना इसका तो भारतीय समाज से कोई लेना देना नहीं था? हां, सयाने लोग कह गए कि अक्‍ल के तालों को खोलने की एक मात्र चाबी स्‍कूलों में मिलती है और अच्‍छी शिक्षा के घन से घड़ी जाती है.

खैर, ग्रीन टी के बड़े मग को मिस करते हुए देखता हूं कि धूप सर पे चढ़ आई है. यह भौतिकी का कोई नियम नहीं लेकिन सच है कि छुट्टी वाले दिन बच्चे जल्दी उठ जाते हैं. जबकि स्कूल जाने वाले आम दिनों में उन्हें कुछ सपने दिखा दिखाकर उठाना पड़ता है. कि देगची में उफनती हुई खुशबू की जगह जब आपके हिस्से में डेयरी से आया थैली वाला दूध लिखा हो तो कौन कमबख्त अलसुबह उठना चाहेगा?

दरअसल बाहर जो धूप खड़ी है ना, उसने अपनी खूबसूरती का राज केवल उस दोपहर को बताया था जो खेत वाले रास्ते  में बड़े बरगद के नीचे बैठती थी. वक्तय की नयी पीढियों ने जब बरगद का सौदा आरे वालों से कर लिया तो वह चमचमाती दोपहर भी कहीं चली गई. वैशाख की इस ढलती शाम के पास उस दोपहर की कुछ धुंधली यादें हैं और हम मृगतृष्णा में फंसे हिरण. इसे आपके रोजानमचे में बयान के रूप में दर्ज किया जाए.

चलिए, मौसम की नगरवधू के लिए ग्यारह महीने पति​ के और एक महीना जेठ का होता है. वही जेठ (ज्येष्ठ) शुरू हो रहा है. और गर्मियां आपकी गली के नुक्कड़ वाले पार्क में सो रही हैं, अमलतास के पीले चटक फूल ओढकर.

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[painting by Bonnie Auten curtsy internet]

तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति के साथ रिश्‍ते की खनक और खुद उन्‍हें उजागर कर अंधेरी चमक में आई मोनिका लेविंस्‍की ने अपनी चुप्‍पी तोड़ने के लिए अंग्रेजी में 4300 शब्‍द लिखे हैं. वेनिटी फेयर में साढे छह पेज में उसने बीते डेढ दशक को समेटने की कोशिश की है जो कि व्‍हाइट हाउस में लगभग अट्ठारह महीनों के कारण दुनियावी चटखारों और व्‍यक्तिगत चुप्पियों का सबब बन गए. सारे घटनाक्रम के डेढ दशक बाद मोनिका ने क्लिंटन के साथ अपने रिश्‍तों पर खेद जताते उन्‍हें ‘सहम​ति से बने संबंध’ बताया है. लेकिन उस समय यह ऐसा भूचाल था जिसने अमेरिकी समाज के दोहरे चरित्र को देखने का अवसर तो दिया ही था. यादों की दराज में एक लेख है जो शायद साल 1998 में लिखा था.

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हथियार, विश्व कूटनीति व जीने के तौर तरीकों में अपने मनमर्जी के सूत्र लागू करने वाली सफलतम सभ्यता के नायक (तत्कालीन) राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पर महाभियोग की तलवार लटका देने वाली मोनिका लेविंस्की पहले यौनाकृष्ट यु​वती थी जिसने बाद में मोहित प्रेमिका हो क्लिंटन की पत्नी बनने के खवाब पाल लिए. हालांकि एक समय वह क्लिंटन के ठंडे रवैये से इतना निराश हुयी कि उनकी ही पोल खोलने की धमकी दे डाली. उनकी, जो दुनिया की सफलतम महाशक्ति का राष्ट्रपति होने का दंभ भरते थे. यानी विलियम जेफरसन क्लिंटन उर्फ बिल क्लिंटन.

दरअसल क्लिंटन-मोनिका प्रकरण की जांच करने वाले स्वतंत्र ​अधिवक्ता कैनेथ डब्ल्यू स्टार ने अपनी 485 पृष्ठों की रपट में यह स​ब खुलासे किए थे. इसके अनुसार जुलाई 1995 में मोनिका जब व्हाइट हाउस पहुंचती है तो पांच फीट से ज्यादा लंबे कद की, गोरी चिट्टी और बला की खूबसूरत इस युवती के पास रुपये—पैसे की कोई कमी नहीं थी. वस्तुत: वह उस चमकीले समाज की ऐसी युवती थी जो देश की सबसे शक्तिशाली हस्ती के साथ लीला मात्र से विजयोन्मत्त हो जाता है. राष्ट्रपति भवन यानी व्हाइट हाउस में पहुंचते ही वह क्लिंटन की आंखों में अपने लिए आकर्षण देखती महसूस करती है. फिर वह उन्हें रिझाने के लिए अपनी पीठ से शर्ट हटा अपने अंड​रवियर के चमड़े के पट्टे को उन्हें दिखाने तक ‘टीनएजर’ हो जाती है.

बतौर प्रशिक्षु व्हाइट हाउस पहुंची मोनिका व राष्ट्रपति क्लिंटन की यह लीला विभिन्न उतार चढावों के बीच अट्ठारह महीने चली. मोनिका से संबंध बनने के बाद राष्ट्रपति ने उससे इस बारे में किसी को नहीं बताने को कहा. मोनिका, क्लिंटन को तो निश्चिंत रहने को कहती रही लेकिन पर खुद हजम नहीं कर पाई और एक नहीं, ग्यारह लोगों से इसकी चर्चा की. सिर्फ तुम्हें बता रही हूं, आगे मत बताना, की तर्ज पर. हुआ यूं कि क्लिंटन से कई बार ‘संबंध’ बनाने व फोन … के बाद उनकी घटती रुचि से मोनिका बेचैन थी. वह सोचने लगी कि इन संबंधों का कुछ भविष्य भी है या वह क्लिंटन के हाथों का खिलौना भर है. वह राष्ट्रपति की अन्य गर्लफ्रेंड के बारे में सोच कर सोतिया डाह से भी परेशान थी.

स्टार के रपट में इन दोनों की छवि बिलकुल युवा उम्र के उन दो प्रेमियों से उभरती है जो बस एक दूसरे पर फिदा हैं. दोनों ने न केवल प्रेम पत्रों का आदान प्रदान किया बल्कि एक दूसरे को उपहार भी दिए. नवंबर 1995में शुरू हुए ये संबंध 24 मई 1997 को समाप्त हो गए. 

रोचक तो यह है कि कैनेथ की अध्यक्षता वाली ग्रेंड ज्यूरी का मोनिका लेविंस्की प्रकरण से कोई लेना देना नहीं था. वह तो पाउला जोंस बना बिल क्लिंटन मामले की जांच कर रही थी. इसमें मोनिका एक गवाह के रूप में पेश हुई और उसने मामले को नया ही रंग दे दिया. जांच रपट में इस रंग में ऐसे राष्ट्रपति की कहानी है जो अपने से आधी उम्र की लड़की पर आसक्त है. यह चेहरा एक कामुक राष्ट्रपति का था, रपट कहती है. ग्रेंड ज्यूरी के समक्ष मोनिका राष्ट्रपति के साथ अपने संबंधों की परतें सिर्फ इसलिए उघाड़े क्योंकि यह न करने पर वह शपथ लेकर झूठ बोलने के आरोप में फंस सकती थी. और ज्यूरी ने उसे माफ करने का वादा किया था. 

रपट में मोनिका ने राष्ट्रपति के साथ अपने संबंधों की इतनी खुलकर चर्चा की कि कभी कभी तो वह फुटपाथों पर बिकने वाली कामुक किताब लगती है.

इस रपट का जो हिंदी रूपांतरण ‘मैं शर्मिंदा हूं’ प्रका​शित हुआ उसके आमुख में यशवंत व्यास ने​ लिखा: झूठ की एक कीमत होती है. वह किसी ने किसी को चुकानी ही पड़ती है. लेकिन ऐसा लगता है कि अपनी विशिष्टताओं के लिए विख्यात अमेरिकी समाज के इस तत्कालीन नवनायक बिल क्लिंटन ने झूठ की कीमत वसूलने की कोशिश की. 

सारे घटनाक्रम के डेढ दशक बाद मोनिका ने क्लिंटन के साथ अपने रिश्‍तों पर खेद जताते उन्‍हें ‘सहम​ति से बने संबंध’ बताया है. लेकिन उस समय यह ऐसा भूचाल था जिसने अमेरिकी समाज के दोहरे चरित्र को देखने का अवसर दिया. इस प्रकरण में एक पन्‍ने पर फैसले के रूप में दर्ज है कि क्लिंटन पर महाभियोग सफल नहीं हुआ और उन्‍होंने अपना कार्यकाल पूरा किया. वहीं दूसरे पन्‍ने पर मोनिका के खाते में आत्‍मघाती हो जाने वाला एकांत, थोथी चमक और जिंदगी को फिर से सामान्‍य बनाने की उनकी सालों साल की जद्दोजहद है. मोनिका का हिस्‍सा बताता है कि हमारे चारों ओर मीडिया, शौहरत, चकाचौंध आदि आदि के नाम पर रचा गया यह जलसाघर हमें जितना देता है उसे हजार गुणा ब्‍याज के साथ्‍ा वसूल लेता है.

[क्लिंटन—मोनिका प्रकरण की जांच करने वाले स्वतंत्र अधिवक्ता कैनेथ डब्ल्यू स्टार की 485 पन्नों की रपट का हिंदी रूपांतरण राधाकृष्णन प्रकाशन ने किया था. ‘मैं शर्मिंदा हूं’ शीर्षक वाली 112 पृष्ठों की इस किताब में यशवंत व्यास की तीखी टिप्पणियों वाली क्लिंटन कथा के अलावा स्टार रपट का संक्षिप्त रूपांतरण है. इसमें मोनिका के व्हाइट हाउस पहुंचने, क्लिंटन पर आरोप, महाभियोग की चर्चा व स्टार—क्लिंटन में बुनियादी दलीलों का वर्णन है.यहां यह भी बताते चलें कि मोनिका ने यह चुप्‍पी ऐसे समय में तोड़ी है जबकि अमेरिका 2016 के राष्‍ट्रपति चुनाव की तैयारी कर रहा है जहां बिल क्लिंटन की पत्‍नी हिलेरी क्लिंटन भी दौड़ में होंगी.]

 

 

तुम इन बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहो
तुम इन नजारों के अंधे तमाशबीन नहीं.

अंधेरा कितना भी घना हो उसका कोई मोल नहीं होता और रोशनी कितनी भी कम हो, अनमोल रहती है. कहानी की शुरुआत कुछ यूं है कि एक समाज कई दशकों से अंधेरा ढोने को अभिशप्त था और इस पंक्ति के साथ खत्म हो जाती है कि वह समाज कई और दशकों के बाद भी उसी अंधेरे को ढोने के लिए अभिशप्त रहा. इसलिए वहां रोशनियों का कारोबार नहीं चला. इस कहानी के बीच में, नुक्तों में, क्षेपकों और टिप्पणियों में सिर्फ और सिर्फ अंधेरा है. बस कहानी का शीर्षक ‘उजालों की तलाश’ है.

असल में एक गांव के बाहर वाले बास में एक लंबरदार अपने परिवार के साथ एक बड़े से घर में रहता है. यह महीने के उस पखवाड़े की बात है जब रातों को चांदनी की फसलें खिली होती है. यानी शुक्ल या चानण पक्ष की एक रात लंबरदार का परिवार बाहर वाले कमरे, बैठक में किसी गंभीर पारिवारिक मुद्दे पर चर्चा कर रहा था कि अचानक रोशनी चुक गई. मामले को गोपनीय बनाये रखने के लिए सभी नौकर, बांदियों को पहले ही छुट्टी दे दी गई थी और चौधरी के परिवार में किसी को रोशनी करनी आती नहीं थी. बैठक में घुप्प अंधेरा जबकि बाहर गली चांदनी से चमक रही थी. किसी को नहीं सूझा कि क्या किया जाए? इसी दौरान परिवार के एक सदस्य ने सुझाव दिया कि क्यों न मिलकर अंधेरे को बाहर ढो दिया जाए ताकि रोशनी अंदर भर सके. बस फिर क्या था परिवार के सभी लोग बट्ठल बाल्टी लेकर शुरू हो गए. वे अंदर से अंधेरा भरकर लाते और बाहर उलीच देते. उन्हें लगता अंदर अंधेरा कम और बाहर घना हो रहा है. वास्तविकता कुछ और थी. दिन चढने की आहट के साथ बाहर रोशनी की कोंपल फूटने लगी. तड़के तड़के जंगल जाने को निकले एक बुजुर्ग ने इस परिवार की हरकत देखी तो उसने पूछा कि भाई तुम लोग क्या कर रहे हो. परिवार वालों ने बात बताई और कहा कि वह तो अंधेरा बाहर ढो रहे हैं. उसने पूछा अंधेरा कहां है? जवाब मिला-भीतर (हालांकि उनका आशय अंदर यानी कमरे में था). बुजुर्ग मुस्कुराकर आगे बढ गया.

नहीं, यह मूल कहानी नहीं है. यह तो एक बात है जो मूल कहानी के पहले पन्ने पर फुटनोट के रूप में डाली गई है ताकि यह समझने में आसानी रहे कि अंधेरा ढोने का मतलब क्या है और हमारे आसपास के लोग या हम ही रोशनी की तलाश में क्या ढो रहे हैं. दरअसल इस कहानी के क्षेपक में दर्ज है कि अंधेरों का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता. वे तो प्रकाश यानी रोशनी के इलाके में अतिक्रमण भर हैं. प्रकाश की अनुपस्थिति है. विज्ञान के हवाले से कहानी में बताया गया है कि प्रकाश का वेग तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकंड है और वेग के लिहाज से कोई भी उसके पासंग नहीं है. ध्वनि भी नहीं. लेकिन विज्ञान यह नहीं बताता कि अंधेरा किस गति से हमारे भीतर पैठ कर जाता है.

लेखक ने सवाल उठाया है कि अगर एक कवि ‘आज की कविता, अंधेरे की व्यथा है’ कह सकता है तो एक कहानीकार अंधेरे की किस्सागोई क्यों नहीं कर सकता?

अंधेरे के पक्ष में लेखक के अपने तर्क और तीर हैं. जैसे सयाने कहते हैं कि अंधेरा मानव स्वभाव है. प्रकृति का मूल है. मिथकों के अनुसार सृजन के समय हमारी धरती आग नहीं अंधेरे का गोला था. काले कुट अंधेरे से भरी हुई. सृजक को सारा मामला बड़ा विचित्र लगा तो उसने ‘लेट देयर बी लाईट’ कहा और हमारी दुनिया रोशन हो गई. एक पतली लकीर से बंटा आधा हिस्सा रोशन हो गया. अंधेरा समझ में आने लगा. तो कहानी यह बताती हुई चलती है कि अंधेरा हमारे सिस्टम में इनबिल्ट है, प्रीलोडेड है. बस वह सुशुप्त या इनएक्टिव बैठा रहता है मौके की तलाश में. कि अंधेरा हमारा मूल है और रोशनी हमारा मोक्ष. हालांकि नाम से लेखक उतना गुणी ज्ञानी नहीं दिखता लेकिन उसने अपने इस तर्क में महात्मा बुद्ध की इस सीख का हवाला दिया है—अप्प दीपो भव. कि खुद प्रकाश बनो. रोशनी अंदर से आती है.

चूंकि इस कहानी में कहानीकार के सारे तर्क अंधेरे के पक्ष में हैं तो आप कह सकते हैं कि अंधेरों की यूं बात करना लेखक की निराशा को दिखाता है. यह निराशावाद है. अंधेरों का षड़यंत्र है. आरोप तो यह भी है कि अंधेरों का जनसंपर्क (पीआर) का काम देखने वालों ने यह कहानी प्रायोजित की है. इस बारे में लेखक ने एक लाइन का जो पूर्व स्पष्टीकरण लगाया है उसके अनुसार- अंधेरों का दर्द या सच्चाई जाने बिना हम रोशनी की कद्र नहीं कर सकते. बल्कि उसने सवाल उठाया है कि अगर एक कवि ‘आज की कविता, अंधेरे की व्यथा है’ कह सकता है तो एक कहानीकार अंधेरे की किस्सागोई क्यों नहीं कर सकता?

[शुरुआती पंक्तियां दुष्यंत कुमार]

Posted by: prithvi | 20/04/2014

पानी रंग मुहब्बत

मुहब्‍बत कहां मांगती है
चांदी का वर्क और सोने की बालियां
तुम्‍हारे बाजार की अफवाहें हैं ये सब.

सरकंडों से सपनों के महल
और नीम की तीलियों से कान सजा लेती है
वह तो,
पानी रंग मुहब्बत.

हाथों में रेत हो तो आंखों में पानी आ ही जाता है. बाबा ने कहा था कि हम जिस देस के हैं वहां हवाएं आंधियों की नाम पर रेत का कारोबार करती हैं. शायद इसीलिए हमारे यहां के सिक्के समंदर वाले देशों के बाजार में नहीं चलते. नहीं तो क्‍या हमारी आंखों से आंसुओं की ग्रंथियां ज्‍यादा जुड़ी हैं? बात इतनी सही है कि अपने यहां यादों की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती. जिंदगी के उन बचे खुचे कोनों या अंधेरों में जहां हम अकेले होना चाहते हैं, किसी की यादों की खुशूब सांसों में भरी रहती है या उनकी यादों का उजाला आंखों को रौशन किए रखता है.

ये आक का बीज अपने सफेद रोंयेदार पंखों के साथ कैसे चौथी मंजिल के हमारे कमरे में आ गया? तो (बेटी के साथ) हम दोनों ने बाद के कुछ मिनट उस बीज को पकड़ने, मुट्ठी में पकड़े रखने और फिर छोड़कर उसे उड़ते हुए देखने में बिताए. बचपन में, गांव में गर्मी की छुट्टियों में अपना एक पसंदीदा शगल होता था… आक के उड़ते हुए बीजों के पीछे भागना और कीकर की फली (पातड़ी) को सूल (शूल) में टांगकर पंखा चलाना. जीवन के खेतों में कुछ पौधों को खेती नहीं होती. वे हवा के साथ ही उड़कर कहीं से कहीं चले जाते हैं और उग आते हैं. सबके किए धरे पर. आक भी उनमें से एक है. 

मौसम कहीं बाहर थोड़े ही होता है. वह तो हमारे भीतर होता है; हमारे साथ ही जागता और सोता हुआ. आक के बीज को देखकर याद आता है कि साल के कैलेंडर से वैशाख झांक रहा है और इन्‍हीं दिनों जी गेंहू से भरे खेतों की महक के बाद हर मदभरी खुशबू को भूल जाता है. कि दिन मोटी बेडौल रोटी पर रखी गुड़ की डली हो गए हैं और चित इस मौसम की खूबसूरती से ही नहीं भरता. जाती हुई बारिशें शायद शुक्रिया कहने के लिए ढलती रात बालकनी में आती हैं. कि मुहब्बत पायताने पर रखा खेस है जो सिमटती रजाइयों को कहता है—गर्मी मुबारक!

या कि दिन मेरी गली में गर्मी के मटके बेचता है तो दुपहरियों के झोले में लाल सुर्ख मतीरे हैं. शामें खरबूजों से महकती हैं और रातों की बर्फ बस एक सपने भर में पिघल जाती है. तपते मौसम से अपनी इस मोहब्बत को जेठ, आषाढ की सारी आंधियों के बरक्स रखता हूं तो थार का तपता सहरा पगथलियों को समंदर बनकर छूने लगता है. कि मुहब्बत बालकनी में सुबह सवेरे चहचहाने वाली वह चिड़िया है जो कहती है- गर्मी मुबारक!

मेरे देस में बारिशें कई महीनों की लू और आंधियों को लांघकर आती हैं. तब तक तुम शायद अगले मौसमों का सामान बांध चुके होगे. इसलिए मैं इन यादगार मौसमों के लिए, यह शुक्रिया यहीं कहना चाहता हूं कि मेरे यहां बेर मीठे और तरबूज ठंडे हो रहे हैं.

लोकतंत्र की सफलता की पहली शर्त यह है कि ज्यादातर लोग ईमानदार हों.

शराब के ठेके पर इस पोस्टर पर लिखा है-आपका वोट कीमती है उसे शराब के बदले ना बेचें.

शराब के ठेके पर इस पोस्टर पर लिखा है-आपका वोट कीमती है उसे शराब के बदले ना बेचें.

बामसेफ से एक राजनीतिक तूफान में बदली बसपा के सुप्रीमो काशीराम उन दिनों सामाजिक क्रांति के झंडाबरदार थे और वाजपेयी जी बड़े स्टाइल में ‘दिल्ली की किल्ली घुमाने’ की बात करते थे. एक दोस्त पायल टाकीज रोड पर कैसेटों में गाने भरा करता था जिससे ‘स्‍पाइस गर्ल’ के गाने भरवाने के बाद यारों को हर रविवार लगने वाले लंगर का बेसब्री से इंतजार रहता. कि क्रांतियों का इतिहास, भूख से खड़ा होता है. कहते हैं कि पायल टाकीज के उस मकान को तोड़कर दुकानें बना दी गई हैं जहां कुछ सिरफिरे देर रात डैक में फुल वोल्यूम पर ‘ला बोशे’ बजाया करते थे.

यादों की पुरानी गलियों में होली खेलकर निकली हवा कुछ ज्यादा ही खुल गई है शायद. नीम के पत्ते झर रहे हैं तो पीपल भी उदास है. सुबह-सुबह सड़कें नीम व पीपल के पीले पतों से भरी मिलती हैं. दुनिया के नक्शे पर नये देशों के जन्म का समय… जब कहीं मातम हुआ तो कहीं थाल बजे. साउथ सूडान के नामकरण में बैंड बाजों के साथ शामिल हुए देश क्रीमिया को रूस की अवैध संतान बताकर खारिज कर देना चाहते हैं. शायद वे भूल गए कि एक खेत में फसल पकने से पहले ही दूसरी जगह कोई फसल बोई जा चुकी होती है. सुनने में आया है कि दुनिया के सिमटकर बच्चों के माउस में आ जाने के दावों के बीच एक भरे पूरे बोइंग जहाज को हवा निगल गई तथा हवाई यात्रा के और सुरक्षित होने का भरोसा सुदूर हिंद महासागर में 400 वर्ग किलोमीटर के इलाके में बिखर गया है.

हैरान कर देने वाली खबरों के बीच एफएम पर देश को बचाने की सौगंध खाई जा रही हैं तो पद प्रतिष्‍ठा को मोक्ष मानने वाले टिकट न मिलने पर निष्‍ठा और नैतिकता के सारे खूंटे तोड़कर भाग गए हैं. कुछ आस्‍थाएं यूं बदली हैं मानों सूरज ने धरती के चक्‍कर लगाने शुरू कर दिए हों. कुछ राजनीतिक दलों के नारों में तो कुछ के कर्म में व्‍यक्ति पूजा है.बाकी के एजेंडे में किसी न किसी तरह सत्ता में बने रहना है. उनकी सोच सत्ता में आने वाले दल के अनुसार ही बदल जाती हैं.खुद को बेहतर साबित न कर दूसरे को बदतर बताने की होड़ मची है. सच्‍चाई मौन है, झूठ चिल्‍ला रहा है और हम कहते हैं कि देश में लोकतंत्र का पर्व है! सच मौन है, झूठ चिल्ला रहा है और हम कहते हैं कि देश में लोकतंत्र का पर्व है! सच में तो यह झूठ का जलसा लगता है. अगर नहीं तो ऐसे पदलोभुओं, मुद्दों की बात के बजाय अगड़म बगड़म कर रहे लोगों व अच्‍छे ईमानदार दावेदारों को नकार देने वाले दलों को हार क्यूं नहीं जाना चाहिए?

रस्किन बांड ने देहरा गांव में रहते हुए एक रोचक वाकया लिखा था. एक कुबडे़ भिखारी गणपत का. गणपत ने अपने कुबड़े होने की जो नाटकीय कहानी बताई उससे अधिक रोचक उससे मिली शिक्षाएं है जैसे कि जनतंत्र की सफलता की पहली शर्त यह है कि ज्यादातर लोग ईमानदार हों. और कि आजादी वह चीज है जिसके लिए लगातार आग्रह करते रहना होता है. उन्हें पढते हुए दुष्यंत कुमार की यह गजल याद आती है—

यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा.
यहां तो सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
ख़ुदा जाने वहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा.

इस बार सीधी अंगुली का सही इस्तेमाल नहीं किया तो सच में पानी यहीं ठहर जाएगा.
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[फोटो साभार फेसबुक ]

सपनों का रंग गुलाबी हो तो आ ही जाते हैं बाजार के रंगरेज,
वरना मुहब्बत तो सांगरी की सब्जी है.

24 x 30 Rainy Romance a

हवा जब अपनी सारी सखी सहेलियों के साथ बसंत ओढे चली आ रही थी, उसने 18 कदम भरने चाहे उस खिड़की तक जहां से वह नज़र आता था. लेकिन जुदाई के अस्थमा में उसे ‘ओवर एक्साइट’ होने की मनाही थी और आक्सीजन की कमी उसकी सांसों पर भारी पड़ गई. कहते हैं कि हम सब एक पुरानी बिल्डिंग में रखे उस पियानो को ढूंढते हैं जिसकी सीक्रेट धुन से हमारी नाड़ बंधी है. सीक्रेट? ताइवान में बनी इस फिल्म का नाम तो पियानो होना चाहिए था.

इसी फिल्म को देखने के बाद याद आता है कि एक दोस्त ने मुहब्बत पर कुछ लिखकर देने को कहा है. सिस्टम में मुहब्बत से जुड़े कितने गाने भरे हैं. इश्क, मुहब्बत और प्यार इन तीन शब्दों से सर्च करने पर 300 के करीब गाने सूची में आते हैं. इनमें कुछ गाने पार्टनर के पसंदीदा हैं जिन्हें वह यथाकदा हाइवोल्यूम में प्ले करती है. मेज के नीचे की रैक में इस बार पुस्तक मेले से लाई गई किताबें हैं. कविता संग्रहों को पलटता हूं तो अधिकांश कविताएं प्रेम पर हैं. गजब है, दोस्त लोग बुक्का फाड़ कर रोने वाले इस समय में भी कितने मनोयोग से प्रेम कविताएं लिख रहे हैं. छप रहे हैं, बिक रहे हैं. यह मुहब्बत आश्वस्त करती है?

जर्मन कवि रानिया माइनेर रिल्के का वह पत्र याद आता है जो उन्होंने मिलिटरी अकादमी में दीक्षारत एक युवक को लिखा था. इसमें उन्होंने सलाह दी— प्रेम कविताएं मत लिखो. उन सब कला रूपों से बचो जो सामान्य और सरल हैं. उन्हें साध पाना कठिनतम काम है. यह सब ​व्यक्तिगत विवरण जिनमें श्रेष्ठ और भव्य परंपराएं बहुलता से समाई हों, बहुत उंची और परिपक्व दर्ज की रचना क्षमता मांगती हैं, अत: अपने को इन सामान्य विषय वस्तुओं से बचाओ.

रिल्के ने कविताएं लिखने के इच्छुक एक युवा को यह राय क्यूं दीं? पाश याद आते हैं-
कि उस कविता में
महकते हुए धनिए का जिक्र होना था
ईख की सरसराहट का जिक्र होना था
उस कविता में वृक्षों से टपकती ओस
और बाल्टी में दुहे दूध पर गाती झाग का जिक्र होना था
और जो भी कुछ
मैंने तुम्हारे जिस्म में देखा
उस सब कुछ का जिक्र होना था.

खैर, वैलेंटाइंस डे गुजरा है. इनबाक्स में कुछ प्रोमोशनल मेल हैं जिनको चुन चुनकर स्पैम में डालता हूं. मुहब्बत की हरी-भरी कहानियां कब रुखी सूखी तारीखों को देखकर खिलीं? यह इतिहास में दर्ज है कि मोहब्बत की फसल औपचारिकताओं के बंजर मैदानों में नहीं होती वह तो रिश्तों की उस उपजाऊ जमीन पर फलती है जिसे सालों साल भरोसे से सींचा गया हो. आइंसटाइन के शब्दों में किसी की मुहब्बत में खिंचे चले जाने के लिए कोई गुरूत्वाकर्षण जिम्मेदार नहीं है. न ही यह किसी चुंबक का का चमत्कार है. यह तो अलग तरह का ही मसला है. भौतिकी और रसायन शास्त्र के सारे बंधे बंधाए नियमों से परे. इसे भींत पर टंगे कागजी कैलेंडर की तारीखों में कैसे बांधा जा सकता है. ठीक वैसे ही मुहब्बत मे पग जाना और उसे शब्दों का जामा पहनाना शायद हर किसी के बस की बात नहीं होता. यह तो पाश जैसा कोई क्रांतिकारी ही कर सकता है.

हफ्ते भर की बूंदाबांदी, बादलवाही के बाद सफेद बालों वाली धूप गेहूं की मेड़ पर उतरने लगी है. वक्त अपने घर के बाहर एक नोट छोड़ गया कि वैलेंटाइन के सपने देखने वाली एक पीढ़ी हमारे आंगन में बड़ी हो रही है और एक समाज है जो लिव इन रिलेशन के नफे नुकसान पर चर्चा कर रहा है. वर्जनाओं की विंडोज एक एक कर क्रप्ट होती जा रही हैं और नयी पीढी धड़ाधड़ सिस्टम को फारमेट करती है. मोबाइल, इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साइटों ने मुहब्बत का रूप व चेहरा तो बदल दिया लेकिन चरित्र कमोबेश वही है. शायद!

एक दोस्त के लिए लिखा था कि गोया, मुहब्बत सांगरी है. थार की लू और आंधियों के बावजूद जमीन से गहरे तक जुड़ी खेजड़ी की फळी जिसे अगले मौसमों के लिए सायास सहेजा गया हो. सांगरी, जिसमें बचपन की यादों का स्वाद हो, किसी के हाथों की खुशबू मसालों सी घुली हो. सांगरी, जिसे आप दोनों साथ बैठ मनभर खाएं और अगली रुतों के लिए भी ऐसी उम्मीद कर सकें. तो मुहब्बत सांगरी की सब्जी है क्योंकि एक दोस्त का कहना है कि वास्तव में प्रेम कुछ नहीं होता. प्रेम होता है दो घड़ी साथ सटकर बैठना.

[संदर्भ- रिल्के का फ्रांज जेवियर काप्पुस को पत्रोत्तर.  अवतार सिंह पाश की कविता अव विदा लेता हूं. चित्र कारेन टार्लटन का रैनी रोमांस, साभार नेट]

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कूदा तिरे घर में कोई यूं धम्म से न होगा
वो काम किया हमने कि रुस्तम से न होगा.

हाइवे पर इससे अच्छी टिप्पणी क्या होगी? दरअसल जिंदगी में सबसे अच्छी घटनाएं वे होती हैं जो यूं ही घटे. अनायास. बिना किसी प्लान, बिना सोच विचार के. फागुन की सर्द सी सुबह में अचानक देखा कि शहतूतिए लगने लगे हैं और घर लौटकर यूं ही बोलेरो क्लास पढने लगा जो पिछले साल के पुस्तक मेले में खरीदी थी. दोपहर में अनायास ही बेटी के साथ हाइवे देखी और पार्टनर ने शाम को फ्रूट कस्टर्ड बना लिया. ऐसे ही एक दोस्त ने इंतिजार हुसैन का यह शेयर मैसेज किया तो लगा कि हाइवे पर दो पंक्तियों में इससे अच्‍छा कुछ नहीं कहा जा सकता. 

हाइवे हिंदी​ दर्शकों के लिए अनायास घटित हुई सुखद घटना जैसी है. इसे इस साल देखी जाने वाली हिंदी​ फिल्‍मों की सूची में शामिल करने के कई कारण हैं. कि यह हमारे यानी हिंदी सिनेमा के चालू मुआवरों को तोड़ती है. कहानी, अभिनय, फोटोग्राफी जैसे मानकों से इतर हाइवे सिनेमा के समाज से संबंध तथा समाज में सिनेमा की प्रासंगिकता के सवालों पर नये सिरे से विचार का मौका देती है. हाइवे में निर्देशक इम्तियाज ने वह कठिन राह चुनी है जिसे आमतौर पर कुछ ही लोगों के लिए आरक्षित राजमार्ग माना जाता है. यह संभावनाओं की नयी खिड़की है. 

सिनेमा के समाज से संबंध की बात करते समय इस साल आस्कर की दो चर्चित फिल्में टवेल्व ईयर ए स्लेव तथा डलास बायर्स क्लब देखें. वे सिनेमा की प्रासं​गकिता व इसके होने का सबसे बड़ा उदाहरण है. दोनों ही फिल्में सत्य घटनाओं पर आधारित हैं. सिनेमा ऐसा ही होना चाहिए प्रासंगिक व सच के धरातल पर कल्पनाओं की उड़ान. इम्तियाज ने एक साक्षात्कार में कहा था कि कला को, सिनेमा को अप्रासंगिक (इर्रैलेवेंट) नहीं होना चाहिए. यानी ​मनोरंजन के बिना सिनेमा की कल्पना नहीं की जा सकती लेकिन मुझे लगता है कि समाज में प्रासंगिक हुए बिना मनोरंजन भी नहीं हो सकता. तो इम्तियाज के शब्दों में ही वे अपनी फिल्मों में यथार्थ में कल्पना का शौंक लगाते हैं और सच में झूठ को मिलाते चलते है. यही एक बेहतर वाणिज्यिक सिनेमा के लिए आदर्श स्थिति है.

जबकि प्रभात रंजन ने एक जगह लिखा है कि आदमी ऐसा प्राणी है जिसकी सोच सबसे ज्यादा बदलती है. और कि बाजार बनती इस दुनिया में हर कोई अपने हुनर को बाजार में बेच देने को बेचैन नजर आता है. ऐसे में कैसे विश्वास करेंगे कि इस दौर की सबसे वर्सटाइल आवाज की धनी दो बहनें [नूरां बहनें] कई साल से पंजाब के गांव में सूफियाना संगीत में रमी हुई हैं. अपनी कला पर ‘नॉट फोर सेल’ का टैग लगाए हुए. टुंग-टुंग के बाद उन्हें हाइवे में एक और सूफी कलाम में सुनना सुखद आश्चर्य है. इसलिए यह सवाल नहीं उठता कि यह किसकी फिल्म है. इम्तियाज की, रणदीप हुड्डा की या आलिया भट्ट की. नूरां बहनों की,  ए आर रहमान की या कि पूरी टीम की. निसंदेह पूरी टीम की. इम्तियाज को श्रेय इसलिए दिया जाना चाहिए कि उन्होंने अपनी टीम को बड़े सलीके और संजीदगी से चुना और टीम के सदस्यों को बड़प्पन इसमें है कि उन्होंने अपने अपने हिस्से को पूरी लगन से पूरा किया.

खोदा और ले भागे की अमेरिकी अवधारणा के पीछे दौड़ रही इस पीढी में कितने लोग हैं जो एक सपने को 15 साल तक सीने से चिपकाए बस एक मौके का इंतजार करते हैं. इम्तियाज ने हाइवे के लिए किया. एक आइडिए को फिल्म में बदलने के लिए इतना लंबा इंतजार कि जो आलिया उनसे बच्ची के रूप में मिली थी, एक षोड्षी के रूप में उनकी फिल्म की हीरोइन बन गई. हां, यहां थिन रेड लाइन के टेरेंस मेलिक याद आते हैं. मेलिक ने साल 1978 में डेज आफ हेवन बनाई. इसके बाद सार्वजनिक जीवन से एक तरह से गायब हो गए और 20 साल बाद थिन रेड लाइन का निर्देशन किया जो अब तक की सबसे बढिया वार मूवी में से एक है. मेलिक ने अपने चार दशक से अधिक लंबे करियर में केवल आधा दर्जन फिल्‍मों का निर्देशन किया है. खैर बात हाइवे की. ईरानी फिल्‍मकार अब्बास कियारोस्तमी ने एक बार कहा था कि अच्‍छा सिनेमा विश्‍वसनीय होता है, जिस पर हम विश्‍वास कर सकें और खराब सिनेमा अविश्‍वसनीय. जब वी मेट से लेकर हाइवे तक, इम्तियाज का सिनेमा भरोसा करने लायक है. हाइवे उसकी एक और मजबूत कड़ी है.

इम्तियाज के लिए सुरजीत पातर के शब्द-
युगां तों काफ़ले आए ने इस सच दा गवाह बणदे,
मैं राहां ते नहीं तुरदा, मैं तुरदा हां तां राह बणदे.
[सार कि मैं राहों पर नहीं चलता, मैं चलता हूं तो राहें बनती हैं.]

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बोलेरो क्‍लास, प्रभात रंजन का कहानी संग्रह है जो प्रतिलिपि प्रकाशन ने प्रकाशित किया.  फोटो इंटरनेट से साभार. 

Posted by: prithvi | 08/02/2014

ये धरती कमली है.

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विज्ञान को आज भी मालूम नहीं कि मरने से पहले आदमी किस तरह मर जाता है. किस तरह पूरे भीगे हुए आदमी को एक आंसू की गरमी महसूस हो जाती है. इसलिए उसे प्राणी शास्त्र के रिसालों में खास दिलचस्पी कभी नहीं रही. [कहानी-धूप के आईने में]

मैंने बाबा को कभी किसी पूजा पाठ में शामिल होते नहीं देखा. जिंदगी हमें साथ रहने का जितना मौका देती है उसमें शायद ऐसी किसी बात के लिए समय ही नहीं निकलता. हां, एक बार गेहूं से भरे खेत में उन्होंने कहा था कि बेटा भले किसी के भी आगे सर मत झुकाओ लेकिन इस माटी की कद्र जरूर करो. क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी सचाइयों में से एक सच यही है. किसान के लिए खेतीबाड़ी और आमो खास के लिए माटी! बाबा की इस सीख को आगे बढाते हुए ही शायद किशोर चौधरी ने लिखा है कि स्वर्ग नरक कुछ नहीं होता है. आदमी इस मिट्टी से जन्मता है और इसी में खत्म हो जाता है. ये धरती काल है. माया है. कुदरत की अनूठी कारीगरी है. ये धरती जीवन है. ये धरती कमली है.

क्रिस्टोफर नोलान की ‘अंडर द आई आफ द क्लॉक‘ पढ़नी शुरू ही थी कि बेटी पूछती है— शह​तूतिए गर्मियों में होते हैं या बारिश में?  शहतूतिया उसका फेवरेट है जो हम रेललाइन के पास वाले पार्क में यूं ही तोड़ कर खा सकते हैं. फ्री में! सोचने लगता हूं कि अभी तो शहतूतिया बसंत की अगवानी में नाई की दुकान से निकला रंगरूट हो रहा है. बिना पत्तों का. तो शहतूतिए तो गर्मियों के आसपास ही होंगे. इतने में ही कूरियर आ जाता है और ‘धूप के आईने में’ लेकर. किशोर चौधरी का नया कहानी संग्रह. अपनी माटी की खुशबू में चित्त ऐसा बंधा कि ​क्रिस्टोफर अगले कुछ दिनों के लिए टल जाते हैं.

कि इस दुनिया में असंख्य लोग खुशबुओं की चादरें सर पर उठाए हुए मुहब्बत की पुरानी मजारों की चौखटें चूमते रहते है. और मुहब्बत कहां हर किसी के साथ होती है. यह तो अद्भुत घटना है जो लाखों में से किसी एक साथ घटती है. यूं ही नहीं वक्त की अमृता अपनी अंगुलियों से इमरोज की पीठ पर साहिर के नाम लिखती रहती.

तो, इस सदी को भागे हुए लोगों की सदी कहकर अपने पहले कहानी संग्रह ‘चौराहे की सीढियों’ से चौंका देने वाले किशोर चौधरी का यह दूसरा कहानी संग्रह है. जिसमें में इस दौर की पीढ़ी के संकट को रेखांकित करते हुए कहते हैं— किस्मत को चमकाने वाले पत्थरों के रंग अंगुलियों में पहने पहने धुंधले हो जाते हैं. अफसोस जिंदगी में कुछ खास नहीं. एक लड़की से प्रेम है. उसके लिए कुछ लम्हे चाहिए. बात इतनी सी है कि हर चाय की अपनी औकात होती है. तीन उबाल के बाद वह अपनी औकात में आ ही जाती है.

इस किताब की अलमारी में पेज 9 से 118 तक में फैली छह कहानियां हैं.कुल जमा जिंदगी रेत का बिछावन है और लोकगीतों की खुशबू है. दूर थार के किसी सुनसान कोने में बैठा एक किशोर हमारी भाषा में दिल की छू लेने वाली पंक्तियां लिखता है. इस मुनाफाखोर समय में इससे बड़ा सुकून और क्या हो सकता है?

सिस्टम में वडाली बंधुओं की अगली पीढी की प्रतिभा लखविंदर वडाली को गाते हुए सुनता हूं. मास्टर सलीम ने उनकी प्रशंसा में कहा कि सुरों की समझना और समझकर गाना सबसे मुश्किल होता है.. लखविंदर में वह काबिलियत है. अगर कहानी के लिए यही बात कहनी होती तो किशोर चौधरी के लिए कही जाती. कि उनमें कहानी कहने का दम व सलीका है. उन्हीं के किरदार के शब्दों को चुराकर कहा जाए तो- पांव फैलाकर बैठिए. जब खुद को समझना हो तो किसी को कुछ मत समझिए.

….
[कमली, कमला का एक अपभ्रंश रूप है. किशोर चौधरी के कहानी संग्रह ‘धूप के आइन में’ को यहां खरीदा जा सकता है. इस बीच एक मित्र आशीष चौधरी के पहले उपन्यास ‘कुल्फी एंड कैपेचीनो’ की प्रीबुकिंग शुरू हो गई है जिसे यहां आर्डर किया जा सकता है.]

Posted by: prithvi | 31/01/2014

खोए हुए गुल

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दरअसल पुष्कर के एक स्वतंत्रता सेनानी ने हेमा मालिनी को बताया था कि हर महिला में एक एक्ट्रेस छुपी होती है और उन्होंने ही तत्कालीन प्रधानमंत्री ‘राजू’ को पत्र लिखकर मांग की थी कि क्रिकेट और समाज में गुगली के इस्ते्माल पर प्रतिबंध हो. एक लड़का जो बहुत देर तक सांस रोकने में माहिर था वह एक दिन हीलियम हो गया. जिंदगी जीना अगर राकेट साइंस होता तो हमारे स्कूलों में ई बराबर एमसीस्क्वेयर के भौतिकी नियम नहीं पढाए जाते और दुनिया का एक बड़ा हिस्सा राकेट की खेती कर रहा होता. कुहरे को कुहरा न कहकर जलवायु परिवर्तन के रूप में परिभाषित करने वाले इन दिनों में ओम दर बदर यह याद दिलाती है कि हमारे देश में बायोलाजी पढने वाले अब मेंढकी की तलाश में पुराने जोहड़ के किनारे नहीं मिलते. कि प्रयोगशालाओं के बड़े मर्तबानों में सुरक्षित रखे शरीरों का अपने चारों ओर फैले द्रव से इतना ही रिश्ता होता है कि वे दोनों कांच की ​एक ​मोटी दीवार में रहने को अभिशप्त हैं.
 
खैर,​ सर्दी की पहली बारिश में नहाया दिन बालकनी में बैठा है. ओस में भीगी रात सूखने डालकर दुपहरियां, सरसों से पीला रंग लेने चली गईं. माघ तो बचे तिलों और गजक के सहारे कट जाएगा.. फागुन के लिए रंग जो जमा करने हैं. एक शहर दिल्ली है जिसके बारे में ​टीवी पर दिखाया जा रहा है मानों वहां आग लगी हो. जबकि यहां तो मावठ की बारिश के बाद माघ की ठंडी हवा चल रही है. हमारे दफ्तर के पीछे वाली सड़क के पास केजरीवाल धरने पर बैठे हैं. टीवी पर हंगामा बरपा है तो घटनास्थल पर लोगों से ज्‍यादा टीवी वाले हैं, उनसे ज्‍यादा गाडियां हैं, उनसे भी ज्‍यादा पुलिस वाले हैं. चिल्‍लपौं है, बस होचपोच है! 
 
काल के इस खंड में अनाहूत आ गई क्रांति की बलाएं लेने वालों और कोसने वालों का जमावड़ा है. आधे सच की आग पर सिकी झूठ की रोटियां हैं. मीडिया के रचे जलसाघरों में, बरसते मेह में आग दिखाने और पढाने की कला यूं ही तो नहीं आ जाती!     
 
दोस्त संजय व्यास ने अपनी नयी और पहली किताब में लिखा है कि एक बस्‍ती के बाशिंदों के लिए हर तत्‍कालीन मौसम बुरा होता था और वे हर अगले मौसम की ही प्रतीक्षा करते रहते. सिर्फ मौसम ही नहीं बल्कि वे सुबह होती तो दुपहरी और दुपहरी में शाम का इंतजार करते. उनके जीवन के हर दिन का हर प्रहर प्रतीक्षा में ही लगा रहता था. शायद वे इसीलिए जीवन यात्रा में बने हुए थे कि उन्‍हें हर अगली बार में बेहतर होने उम्‍मीद थी. और इसी इंतजार में वे थोड़ा और जी जाते थे. हालांकि, संजय ने इस बस्ती का नाम नहीं लिखा है. न आपके गांव का, न मेरे शहर का.
 
अमेरिकी लोक गायन को नयी आवाज व पहचान देने वाले पीट सीगर नहीं रहे हैं. उनका एक गीत याद आ रहा है— Where Have All The Flowers Gone. खेत की डिग्गी में पूर्व की ओर खड़े शहतूत के सारे पत्ते पीले होकर गिर गए. बसंत आ रहा है!
संजय व्यास की पहली किताब 'टिम टिम रास्तों का अक्स' आई है.

संजय व्यास की पहली किताब ‘टिम टिम रास्तों का अक्स’ आई है.

[‘टिम टिम रास्तों का अक्स‘ के लिए यहां आर्डर किया जा सकता है. है. कमल स्वरूप के निर्देशन में फिल्म ओम दर बदर हाल ही में बड़े पर्दे रिलीज हुई.]

Posted by: prithvi | 12/01/2014

एक नंबर की ईंट

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धूप के साथ खिल जाती है.
हमारे आंगन की नरम बालू,
सुस्‍ताता मेमना और बच्‍चों का घरौंदा है
जिंदगी!

सरसों की क्यारियों में पनपी मुहब्बत की कहानियां गन्ने के खेतों में आकर खत्म नहीं होती. वक्त की लाल डायरी के 34वें पन्ने पर यह नोट लिखते वक्त उसके मन में संशय की कौनसी खरपतवार उग रही थी, पता नहीं. लेकिन मैं यह जरूर बताना चाहता हूं कि एडेले के एलबम ने डिजिटल बिक्री का नया रिकार्ड बनाया है. किस्सागो के रूप में मुहब्बत मेरे बस की बात होती तो मैं लिखता कि Sometimes it lasts in love but sometimes it hurts instead. 

खैर, मुहब्बत की मुहर बनाने वाले कारीगर, स्याही की तलाश में गए हैं. शायद इसलिए कुहरे से भरी समाचारों की दुनिया से दूर गांव में सरसों खिलखिला रही है और गेहूं ने अभी अभी कान निकाले हैं. गन्ने के मीठे खेत भले ही कम हो गए हों लेकिन लोगों के दिल में कसक तो है कि एक आध बीघा बीज लेते. सरसों के साग में डालने के लिए बथुआ, कढी के लिए कच्चा लहसुन व गूंदळी, सलाद में गाजर—मूली, मीठे में ताजा गुड़, फलों में किन्नू व मालटा.. कड़ाके की ठंड के बावजूद हमें इस मौसम में अपने घर गांव में क्यूं नहीं होना चाहिए, बताओ तो!  

ऐसे ही दिनों में जब धूप मूंगफली के छिलकों सी आंगन में बिखरी रहती है और आंगन में बाहर वाले चूल्हे पर हाथ तापती सर्दी आपको बताती है कि मावठ की बारिश नहीं हुई इसलिए ठंड सूखी है. छोटे भाई को राड़ (लड़ाई) से बाड़ अच्छी, की सीख देते हुए सच में लगता है कि मुहब्बत की फसलों को सर्दी की पहली बारिश का बेसब्री से इंतजार है. वक्त के सांचे में सारी ईंटें एक नंबर की नहीं होती, उसके भट्ठे से खोरे, तीन नंबर की ईंटे ही ज्यादा निकलती हैं. जिंदगी में उन्हीं से काम चलाने का हुनर आना चाहिए.

तो, लौटकर देखता हूं कि साल की दीवार का कैलेंडर बदल गया और एक नयी सरकार ने दिन गिनने शुरू किए हैं. विशेषज्ञ कहते हैं कि एक क्रांति करवट ले रही है. बेटी के टचस्क्रीन में फ्रूट नींजा डाउनलोड करते हुए हमारे सबसे बड़े विशेषज्ञ समय की रहस्यमयी चुप्पी के बारे में सोचता हूं! अमेरिका में जमी बर्फ पिघल जाएगी तब तक एक बात कहता हूं-

बिजलियां रोज गिरती नहीं बेवजह
इस चमन में  कोई तो गुनहगार होगा.
………
[हैप्पी न्यू ईयर, इस जनवरी में हमारी यह कांकड़ पांच साल की हो गई. चीयर्स एंड थैंक्स! इस बीच अपने दो प्यारे और दमदार लेखकों (किशोर चौधरीसंजय व्यास) की किताब की प्री बुकिंग भी शुरू हो गई है. लिंक यहां है, मेरी तरफ से नये साल का तोहफा मानकर बुक करिए, हमारे समय की भाषा, बोली और लेखनी पर गर्व तो हमें करना ही चाहिए! शे’र साभार]

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अब्बू कहते थे कि गणित दुनिया की कुंजी है. मैंने गणित पढ़ी. जब इंजीनियर हो गया तब मालूम हुआ कि दुनिया में इंजीनियरों के काम के लिए जगह ही नहीं बची. सारी दुनिया में इतना कुछ बनाया जा चुका है कि खाली जगह ही नहीं है. इसलिए मैंने आगे व्यापार पढ़ा. अब क्लाइंट पटाओ का कारोबार करता हूं. तुम्हारी तरह सिनेमा, कहानी, कविता, मोर्चा कुछ आता नहीं है…

एक दोस्त की कहानियों की पांडुलिपि पढ़ते हुए अचानक देखा कि उसने अपना छाता खुला छोड़ दिया है. रात घर घर खेलते हुए सो गई और छाता अब भी जाग रहा है. छोटा सा बहुरंगी छाता जिसमें चार पांच रंग तो हैं ही. लाल, पीला, नीला, हरा या तोतिया. तोतिया? अगर वह पास बैठी हो तो अकबकाकर कहेगी तोतिया? यह लाइट ग्रीन है. जब बच्चे आपको करेक्ट करने लगें तो बदलता समय आपके सामने खम ठोककर खड़ा हो जाता है. और मिसफिट होने का डर आंखों में लहराता है.

लाल, पीले व नीले जैसे मूल रंगों के अलावा संतरी, बैंगनी, मूंगिया, नसवारी, तोतिया, कत्‍थई और स्‍लेटी जैसे अंगुलियों पर गिने जा सकने वाले रंगों की हमारी दुनिया अब करोड़ों रंगों तक फैल चुकी है. सयाने लोगों का कहना है कि हम किसी प्रयोगशाला में एक ही स्थिति में लगभग एक करोड़ रंग देख सकते हैं. हमारा कंप्यूटर किसी एक फोटो को दिखाने के लिए डेढ़ करोड़ से ज्यादा रंगों का इस्तेमाल करता है. तो, फोटो में रंगों के जो चेहरे हमें दिखते हैं उनके पीछे हजारों रंगों के चेहरे होते हैं.

थार की रेत में बना रंगों का अपना हिसाब किताब पुराना हो गया है. डर यह नहीं कि अपने गेंहुए, जामुनी व सुरमई रंगों को किसी दूसरी भाषा में पहचाना जाने लगा है. दुनियादारी के हिसाब से रंगों की पहचान नहीं कर पाना चिंता की बात है. दादी कहा करती थी कि उधार के घी से चूरमा नहीं बनता! पर कुछ लोग उधार पर लिए चावों से जिंदगी में रंग भर लेते हैं. रेत के समंदर में पानी की नदियां नहीं होती फिर भी लोग छोटी छोटी बारिशों में जी भर कर नहा लेते हैं. खुद को दुनियादारी में फिट रखने की कोशिशें यूं ही चलती रहती हैं. दिसंबर चढ़ रहा है. एक ढलती शाम ने मुस्कुराकर पूछा- ये लंबी रातें तो इसी महीने भर की.. बाद के लंबे दिनों के लिए क्‍या प्‍लान है? 

प्लान? एक दोस्त ने बनाया है कि दोस्तों, अपरिचितों के यहां जाकर उनके घर के किसी कोने में रंग किया जाएगा. सिर्फ मूल रंगों को हमारे जीवन में वापस लाने की एक कोशिश के रूप में. यानी किसी भी रूप या भाषा या रूप में हों रंग हमारे जीवन में बने रहें क्योंकि (मधुकर उपाध्याय के शब्दों में) लकीरें खींचना, जिंदगी को आजमाने का पुराना तरीका हो गया है. जिंदगी में रंग बने रहें, साल दर साल इससे बड़ा प्लान क्या होगा? 

फातिमा हसन ने लिखा है-
बिखर रहे थे हर सम्त काएनात के रंग
मगर ये आंख कि जो ढूंढती थी जात के रंग
हवा चलेगी तो ख़ुशबू मिरी भी फैलेगी
मैं छोड़ आई हूं पेड़ों पे अपनी बात के रंग.

[पहला पैरा किशोर चौधरी की नयी कहानी से. अपने पहले कहानी संग्रह से चमत्कृत कर देने वाले किशोर का दूसरा कहानी संग्रह आ रहा है. सुशील झा के प्रोजेक्ट के बारे में यहां पढ़ें. फोटो साभार पूजा गर्ग सिंह]

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खुदाइयों के बाद घरों का इतिहास तो निकल आता है
पर टूटे हुए दिलों और खोए हुए रास्तों का नहीं.

विजय चौक की रेडलाइट की स्टापवाच के अनुसार वाहनों को अभी कुछ सेकंड और रुकना था. दायीं ओर के हरियाले पार्क में छाया सन्नाटा कहता है कि इंडिया गेट पर नाफिज कर्फ्यू को एक साल होने जा रहा है. रायसीना पहाडी की ओर से राष्ट्रपति भवन की मुंडेर झांक रही है और बोट क्लब के आस पास राजपथ के दोनों ओर हरियाली का राज है. बस में आगे से तीसरी सीट पर बैठी दो गुत (चोटी) वाली बच्ची ने अपना सीधा हाथ खिड़की से बाहर निकाल कर बूंदों को छुआ और मुस्कारने लगी. कुछ और मुस्कुराहटें आसपास खिल गईं.

काती (कार्तिक) के शुरुआती दिनों में कहां बारिश होती है. इस बार हो रही है. बताते हैं कि दसियों साल में पहली बार ऐसा हुआ है. सावन, काती तक बरस रहा है. हमारी सावणी (खरीफ) फसलों की सोचता हूं तो लगता है कि जमीन की यह नमी अगली हाड़ी (रबी) तक चल जाएगी. जमीन की यही खूबी है, या तो सब जज्ब कर लेती है या सबकुछ उगाकर सामने ला देती है. वक्त की दीवारों पर टंगे साइनबोर्डों के न्यूज अलर्ट बताते हैं कि हमारा समाज व सरकारी तंत्र जमीन में गड़े सोने के लिए कस्सी फावड़े लेकर निकल गया है.

फ्लैश बैक में बाबा लोगों की सुनाई एक कहानी है. एक किसान के चारों बेटे नालायक निकले. किसान को हमेशा यह चिंता सताती रही कि उसके बाद बेटों का क्या होगा. अपने अंतिम समय में उसने बेटों को पास बुलाया और रहस्यमयी ढंग से उन्हें बताया कि दूर वाले खेत में बहुत सारा सोना दबा है उसे निकालकर वे अपना जीवनयापन आराम से कर लें. किसान चला गया तो बेटों को तुरंत सोने का ध्यान आया. कस्सी फावड़े लेकर पूरा खेत खोद डाला. एक सिरे से दूसरे सिरे तक. एक क्यारी से दूसरा बीघा… सोना तो क्या लोहे का एक टुकड़ा न मिला. बेटे बहुत निराश हुए और अपने दिवंगत पिता को खूब कोसा. इस सारे घटनाक्रम को देख रहे पड़ोसी किसान ने बेटों को सलाह दी कि उन्होंने इतनी मेहनत कर खेत की खुदाई कर दी तो क्यों न थोड़े बीज भी छिड़क दें ताकि कम से कम खाने लायक दाने तो हों. बताते हैं कि उस साल जोरदार बारिश हुई और देखते ही देखते खेत फसल से भर भर गया. तब पड़ोसी किसान के जरिए बेटों ने समझा कि उनके पिता ने किस सोने की बात कही ​थी.

हमारा समाज व सरकारी तंत्र अब तक यह नहीं समझ पाया है कि इस देश में जमीन से सोना निकालने का काम सदियों से किसान—मजूर करते आए हैं न कि एएसआई वाले. और इसके लिए जमीन को खोदना नहीं पड़ता उसकी जुताई—बुवाई करनी होती है, सोना तो खुद ब खुद उग आता है.

कहते हैं कि वक्त अपने हर नालायक बेटे के कमीज की बांयी जेब में अच्छी फसलों, बेहतरी की उम्मीदों के कुछ बीज डालता है. जरूरत तो इन बीजों को अगली बारिशों से पहले उस जमीन में छिड़कने भर की है जिसे वे किसी सोने की तलाश में खोद देते हैं.

[खुदाइयों के बाद कविता साभार, फोटो साभार मृदुल वैभव]

Posted by: prithvi | 28/08/2013

ब से बांस

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उसने यह कायदा सीखा था कि क से कबूतर, च से चरखा, ठ से ठठेरा, फ से फल व ज से जल होता है और गाया कि मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है. आंखों के तल में उसी नमी को लेकर जब वह शहर आया तो बताया गया कि क से कमाई, ब से बाज़ार, म से मॉल, ड से डर होता है. यहां भ से भेड़ नहीं भेड़चाल और ब से बकरी नहीं बकरा होता है. और बकरे की मां ज्‍यादा दिन खैर नहीं मना सकती. उसने बकरियां चराने और बकरा बनने के विकल्‍प के रूप में जो चुना वह था बांस. ब से बांस! इस देश, समाज और भाषा के लिए अद्भुत शब्‍द है बांस, जिसे गाहे बगाहे किसी के भी किया जा सकता है.

बांस की महत्‍ता जानकर ही उसके ज्ञानचक्षु खुले कि कैसे अपने कायदे में ब से बकरी पढने वाली पीढियां जीवन की दौड़ में भेड़ें बनकर रह गईं. बाहर से लोग आए और उनके बांस पर बांस करते रहे. उसे लगा कि उन्‍हें जीवन के कायदे में ब से बांस और भ से भचीड़ (टक्‍कर) सिखाया गया होता तो आज शायद हमारे हालात अलग होते. जब उसने इस दिशा में शोध किया तो पाया कि बांस का एतिहासिक, राजनीतिक व धार्मिक महत्‍व किसी भी सीमा और काल से परे है. इसके जलवे बरेली (उल्‍टे बांस बरेली को) से लेकर रोम तक रहे हैं क्‍योंकि जब रोम जल रहा था तो नीरो ने जिसे बजाया वह किसी चैन वैन की बंसी नहीं बांस की ही छोटी बहन थी.

बंदे को शोध में पता लगा कि कुछ बात तो है तो वरना लोग यूं ही नहीं हरदम दूसरों के बांस किए रहते. बांस जैसा लंबा हमारा सदी का महानायक बंबू में तंबू लगा लेता है और काल सुकाल के बारे में मौसम विभाग से अच्‍छी भविष्‍यवाणी तो हमारे कनकूतक बांस के सफेद फूल देखकर कर देते हैं. बांस की फांस अगर नाखून और अंगुली के बीच  चली जाये तो नानी की नानी भी याद आ जाती है. गधे के सींग की तरह गायब हुए लोगों को ढूंढने के लिए कुओं में बांस डलवाये जाते हैं. हाल ही में खबरें आईं कि पंजाब के एक सांसद के गायब होने पर मतदाताओं ने उन्‍हें ढूंढने के लिए कुओं में बांस डलवा दिए. सांसद हैं कि हर शनिवार रविवार एक कामेडी शो में लोगों के बांस किए हंसते रहते हैं. गुरु, जहां बांस डूब जायें वहां पोरियों की क्‍या गिनती? ठोको ताली!

वह जब अपने इस मगजमारी में और गहराई में गया तो उसका वास्‍ता फच्‍चर व खपची जैसे बांस के उत्‍पादों या बाइप्राडक्‍ट से भी पड़ा. फच्‍चर तो फच्‍चर है जो काम बनाने से लेकर बिगाडने तक हर काम आती है. अगर चारपाई की सैटिंग सही नहीं हो तो खपची फंसाकर ठीक की जा सकती है. खपची का मामला कुछ कुछ स्‍टैपनी जैसा है. वहीं अगर चारपाई की सिमेटरी बिगाड़नी हो तो फच्‍चर निकाली जा सकती है.

वह बांस से मिला तो उन्‍होंने आरोप लगाया कि भारत जैसे विकासशील देशों में बांस के वनों की तबाही के पीछे बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों तथा सरकार का हाथ है. सरकार को पता है कि मात्रात्‍मक व गुणात्‍मक लिहाज से सबसे बढिया लाठी बांस की होती है. और जिसकी लाठी उसकी भैंस! तो यह लाठी यानी बांस अगर आम लोगों के हाथ में चला गया तो उसके पास न तो भैंस रहेगी और न ही व लोगों को बकरा बना सकेगी. तो उसने वन अधिकार कानून के जरिये बांस को माइनर फॉरेस्ट प्राडक्ट की श्रेणी में डाल दिया और राष्‍ट्रीय बांस मिशन का कोई नामलेवा नहीं बचा है. इस मामले में किसानों के सबसे अधिक बांस तो सरकार ने कर रखा है. वह अभी तक यही तय नहीं कर पाई कि बांस है क्‍या.. घास या लकड़ी? भारतीय वन अधिनियम बांस को लकड़ी मानता है, जिसके कारण इस पर वन विभाग का अधिकार है. यानी बांस को बांस की खेती करने वाले भी बिना इजाजत के नहीं काट सकते. उनका कहना है कि टांगें तोड़ने से लेकर टूटी हड्डियां जोड़ने तक बेंत और खपची के रूप में बांस काम आता है. फिर सब्‍जी से लेकर खूंटी और खूंटे से लेकर अर्थी तक.. जीवन के हर मोड़ पर साथ निभाने वाले बांस को राष्‍ट्रीय फल, फूल, घास या राष्‍ट्रीय हथियार जैसा क्‍यूं दर्जा क्‍यूं नहीं दिया गया इसकी जांच संयुक्‍त राष्‍ट्र जैसी किसी तटस्‍थ संस्‍था से कराई जानी चाहिए. काश राष्‍ट्रीय बांस म्‍यूजियम, राष्‍ट्रीय बांस सड़क हो. एक बांस संस्‍थान हो जहां लोगों को दूसरों के बांस करने की विधियां बताई सिखाई जाएं. बांस ओलंपिक हो. ऐसा कुछ हो जिससे लगे कि कुछ बांस किया जा रहा है. 

बाबा नागार्जुन ने बांस की दुर्दशा को अपनी कविता “सच न बोलना’  में व्‍यक्‍त किया था. लगता है कि यह बांस नहीं एक समाज की दुर्दशा की बयानी है जहां समान स्‍तर वाले एक दूसरे के तथा बाकी बचे खुचे हाशिए वालों के बांस किए हुए है. आप कविता पढिए..

मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को,
डंडपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को.
जंगल में जाकर देखा, नहीं एक भी बांस दिखा
सभी कट गए सुना, देश को पुलिस रही सबक सिखा.

वाया जुलाई की एक रात

इस साल अपने शहर में बारिश खामोश सी बरस रही है. गांव से आने वाले संदेशों में अब भी लू की तपन और आषाढ की उमस है. इधर आसपास तेजी से दड़बेनुमा मकान बन रहे हैं और लगता है कि हवा में घुटन लगातार बढ़ी है. बार्नबे जैक जुलाई के आखिरी हफ्ते में इस दुनिया से चला गया. एटीएम हैकर जैक हमारे जीवन में तेजी से जगह बनाते जा रहे पेसमेकर, आईसीड तथा इंसुलिन पंप जैसे उपकरणों के हैकिंग संबंधी खतरों के प्रति आगाह कर रहा था और अपने घर में मृत पाया गया. इंटरनेट की आजादी के लिए लड़ रहा आरोन स्‍वार्त्‍ज पिछले साल चला गया था. अपना मीडिया जब बाजार और सरकार की खबरों से चल रहा है वैकल्पिक समाज और व्‍यवस्‍था की हर खबर कहीं दब गई है.  आस्‍वाद और मत की भिन्‍नता को स्‍वीकारने वाली यह दुनिया कितनी तेजी से विकल्‍पहीन होती जा रही है?

दुष्‍यंत ने बड़ी सुंदरता से अपने वर्तमान का यथार्थ और समय का सच्‍चा इतिहास लिखा है.' - चंद्रप्रकाश द्विवेदी

दुष्‍यंत ने बड़ी सुंदरता से अपने वर्तमान का यथार्थ और समय का सच्‍चा इतिहास लिखा है. – चंद्रप्रकाश द्विवेदी

ग्रीनटी के अपने मग के साथ इन उदासियों को समेटे बालकनी से भीतर आ जाता हूं. भीतर से और भीतर जाने की कोशिश.. सफल नहीं होती. किसी सयाने कहा था कि लौटना कभी भी हमारी मर्जी से नहीं होता. हर चीज जन्‍म लेने से पहले पकती है. बिना पके जन्‍म नहीं. यही नियम है. इसी तरह खर्च होते दिनों और फिजूल होती रातों के बीच अपने लेखक भाई दुष्‍यंत का कहानी संग्रह ‘जुलाई की एक रात’ आया है. इसमें वे कहते हैं कि उदासियों की कोई रुत नहीं होती. वे तो थार की आंधियों की तरह हर मौसम में आती रहती हैं नाम बदल बदल कर. गर्मियों में लू तो सर्दियों में डांफर (तेज सर्द हवा) और बारिशों में झंखेड़े (तूफानी हवा) के रूप में!

दुष्‍यंत की कहानियां भी इन्‍हीं रुतों की बयानी है जिनमें व्‍यक्तिगत संघर्ष का ताप और उदासियों व बिछोड़े की नमी साथ साथ चलती है. उनकी तीन जोरदार कहानियों में गांव शिद्दत से है तो बाकी में शहरी विशेषकर युवा जीवन के तनाव, अंतरर्विरोध का ताना बाना. इधर के सालों में कुछ नामों ने कहा‍नी की सभी प्रचलित परिभाषाओं और फ्रेमों को तोड़कर लिखा है उनमें दुष्‍यंत भी आते हैं. कहानी की युवा लहर की दशा व दिशा क्‍या कहती है यह समझने के लिए इन कहानियों को पढा जाना चाहिए.

अपने इस समय के धुरंधर कथाकार उदयप्रकाश ने प्राक्‍कथन में लिखा है कि दुष्‍यंत की कहानियां जोखिम भरी निडरता के साथ हिंदी के समकालीन कथा लेखन के सामने अनुभव, स्‍थापत्‍य, भाषा और शैली की नयी खिडकियां खोलती हैं. ये कहानियां उत्‍तर आधुनिक वास्‍तविकताओं की किस्‍सागोई है. सच में! दुष्‍यंत छोटे छोटे क्षणों में बड़ी बातें रचते हैं और फिर किस्‍से के रूप में कहते चले जाते हैं. यह उनकी खासियत है और आधार भी. रिल्‍के ने एक बार कहा था कि कोई रचना तभी अच्‍छी होती है जबकि वह अनिवार्यता से उपजती हैं. दुष्‍यंत की कहानियां शायद उत्‍तर आधुनिक जीवन की उन्‍हीं अनिवार्य हो चुकी निराशाओं, वितृष्‍णाओं से निकली हैं. इन्‍हें दर्ज किया जाना चाहिए कि अभी दिलों में उदासियों के मेले हैं.

(जयपुर में रहने वाले पत्रकार लेखक दुष्‍यंत की हिंदी में यह तीसरी ‘किताब जुलाई की एक रात’ पेंगुइन ने प्रकाशित की है. इसे आनलाइन यहां खरीदा जा सकता है.)

गांव: गांधी, नेहरू व अंबेडकर

डॉ अंबेडकर ने गांधी के ग्राम स्‍वराज की अवधारणा को कुछ ज्‍यादा ही भावुकतापूर्ण बताया और अपने अनुयायियों से गांव छोड़ने, शिक्षित बनने तथा शहरों में जाने को कहा. अंबडेकर ने ग्राम स्‍वराज  को भारत की बर्बादी तक करार दिया था. उन्‍होंने कहा, ‘गांव क्‍या है... अज्ञानता, संकीर्णता व सांप्रदायिकता के गढ़’ उनकी सोच थी कि ग्राम्‍य जीवन की राय अस्‍पर्शयता, उत्‍पीड़न से होकर ही निकलती है.

डॉ अंबेडकर ने गांधी के ग्राम स्‍वराज की अवधारणा को कुछ ज्‍यादा ही भावुकतापूर्ण बताया और अपने अनुयायियों से गांव छोड़ने, शिक्षित बनने तथा शहरों में जाने को कहा. अंबडेकर ने ग्राम स्‍वराज को भारत की बर्बादी तक करार दिया था. उन्‍होंने कहा, ‘गांव क्‍या है… अज्ञानता, संकीर्णता व सांप्रदायिकता के गढ़’ उनकी सोच थी कि ग्राम्‍य जीवन की राय अस्‍पर्शयता, उत्‍पीड़न से होकर ही निकलती है.

गांव हमारी आंखों में भर गया नास्‍टलजिया का पानी है, खुश्‍बू भरे खेतों से गुजरती यादों की पगडंडियां हैं. शहर संभावनाओं के वनवे हाइवे हैं. गांव में शाम को लौट आने के सारे विकल्‍प रहते हैं और शहर में लौटकर भी लगता है कि इस सफर में हैं. बीच का कोई विकल्‍प नहीं है. आने वाले दिन शहरों के हैं जहां लोग गांवों की याद में तड़पेंगे. यह महज संयोग नहीं कि बीते साल दुनिया में सबस अधिक शहरी जनसंख्‍या के लिहाज से भारत दूसरे स्‍थान पर था और आने वाले दस 7-8 साल में यह उन देशों में शामिल होगा जहां शहरी जनसंख्‍या सबसे तेजी से बढेगी. तो शहर बरअक्‍स गांव की बहस फिर खड़ी हो गई है. आखिर गांवों में ऐसा क्‍या है जो हमें शहर नहीं दे पा रहे और गांव क्‍यूं शहरों से कदमताल नहीं कर पा रहे हैं?

 इतिहास पर निगाह डालें तो कार्ल मार्क्‍स ने भारतीय गांवों की कड़े शब्‍दों में आलोचना की थी. मार्क्‍स ने मानव विकास में नकारात्‍मक भूमिका के लिए ग्राम समुदायों की आलोचना करते हुए कहा कि ये सब जाति और किंकरता से दूषित हैं जहां मनुष्‍य को कूप मंडूक बना दिया जाता है. गांव के प्राकृतिक, सादगीपूर्ण, शुद्ध माहौल, जीवंत रिश्‍तों, स्‍पेस सब की बातें करने के साथ साथ हमें देखना होगा कि हमारे अपने नेताओं की इनके बारे में सोच क्‍या थी. वे क्‍या सोचते थे? यहां आधुनिक भारत की तीन बड़ी हस्तियों गांधी, नेहरू व अंबेडकर के गांव के बारे में सोच की चर्चा करना प्रासंगिक है. 

यह सही है कि अंबेडकर के अलावा इन दोनों बड़े नेताओं का गांव से वास्‍तविक नाता नहीं रहा. अंबेडकर का बचपन गांव में बीता और उन्‍हें वे सब दुश्‍वारियां झेलनी पड़ीं थीं जो लगभग अपने हर गांव में आम है. बाकी, तीनों ही विदेश में पढे और अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कहीं न कहीं बडे़ शहरों में की. शायद यही कारण है कि इन तीनों की गांवों के प्रति जो धारणा है वह प्रतिनिधि स्‍तर की नहीं कही जा सकती.

गांवों के सबसे बड़े पैरोकार महात्‍मा गांधी थे जिनका मानना था कि भारत गांवों में बसता है. उन्‍होंने ग्राम स्‍वराज की अवधारणा खड़ी की. महात्‍मा गांधी ने गांवों को वास्‍तविक या शुद्ध भारत करार दिया. इसके बरअक्‍स उन्‍होंने औपनिवेशक शासकों द्वारा बसाये जा रहे शहरों की आलोचना की. शहरों को उन्‍होंने पश्चिमी प्रभुत्‍व तथा औपनिवेशिक नियमों का गढ़ बताया. नेहरू ने जिस गांव का सपना देखा उसमें भू स्‍वामियों और भू स्‍वामित्‍व के लिए कोई जगह नहीं होनी थी. उन्‍होंने खेती बाड़ी से अधिक से अधिक लोगों को निकालकर उद्योग धंधों में लगाने की बात की. साथ ही वे हस्‍तशिल्‍प और कालीन उद्योग को नये सिरे से खड़े करने के पक्ष में थे.

गांव की जमीनी हकीकत से अधिक वाकिफ रहे डॉ (भीमराव) अंबेडकर ने गांधी के ग्राम स्‍वराज की अवधारणा को कुछ ज्‍यादा ही भावुकतापूर्ण बताया और अपने अनुयायियों से गांवों को छोड़ने, शिक्षित बनने तथा शहरी केंद्रों की ओर जाने को कहा. अंबडेकर ने ग्राम स्‍वराज (विलेज रिपब्लिक) को भारत की बर्बादी तक करार दिया था. उन्‍होंने कहा, ‘गांव क्‍या है… अज्ञानता, संकीर्णता व सांप्रदायिकता के गढ़’ उनकी सोच थी कि ग्राम्‍य जीवन की राय अस्‍पर्शयता, उत्‍पीड़न से होकर ही निकलती है.

फिर भी ये तीनों नेता कुल मिलाकर मानते थे कि गांवों के मौजूदा हालात रहने लायक नहीं हैं और वहां बदलाव की गुंजाइश नहीं बल्कि महत्‍ती जरूरत है. गांधी चाहते थे कि बाहर के स्‍वयंसेवक गांवों में जायें और ग्राम स्‍वराज तथा ऐसी दूसरी अवधारणों को अमली जामा पहनाएं. नेहरू की राय में किसानों को खेती बाड़ी का अपना तरीका बदलना ही होगा. नेहरू चाहते थे कि हमारे गांव बदलें, आधुनिकी प्रौद्योगिकी का इस्‍तेमाल गांव के सामाजिक व आर्थिक ढांचे को बदलने में हो. अंबेडकर कहते रहे कि दलितों का भविष्‍य कम से कम अज्ञानता के इन अड्डों में तो नहीं है. 

बीते साल यानी 2012 में दुनिया में सबस अधिक शहरी जनसंख्‍या के लिहाज से भारत दूसरे स्‍थान पर था और आने वाले दस 7-8 साल में यह उन देशों में शामिल होगा जहां शहरी जनसंख्‍या सबसे तेजी से बढेगी. (राष्‍ट्रीय सांख्यिकी)

बीते साल यानी 2012 में दुनिया में सबस अधिक शहरी जनसंख्‍या के लिहाज से भारत दूसरे स्‍थान पर था और आने वाले दस 7-8 साल में यह उन देशों में शामिल होगा जहां शहरी जनसंख्‍या सबसे तेजी से बढेगी. (राष्‍ट्रीय सांख्यिकी)

तो ग्राम्‍य समाज में स्थिरता तथा सतत सामाजिक सुरक्षा महत्‍वपूर्ण रहा और प्रगति के लिए कोई जगह नहीं थी. वह मायने ही नहीं रखती थी. लेखक, कार्यकर्ता अरूंधति राय ने एक साक्षात्‍कार में कहा कि भारत अपने गांवों में अब नहीं बसता, वह शहरों में बसता है. भारत गांवों में मरता है-अपमानित होता है. इसी दुनिया के प्रमुख शहर लंदन के मेयर बोरिस जॉनसन ने गांधी के गांव के प्रति मोह को खारिज करते हुए हाल ही में कहा कि 1948 में जब गांधी ने यह कहा कि भारत का भविष्‍य गांवों में है तो वे गलत थे. जॉनसन के अनुसार, ‘ यह अनरोमांटिक लेकिन सच है कि दुनिया का भविष्‍य शहरों में है. हां गांधी की यह बात स‍ही थी कि लोग गांव की याद में तड़पेंगे.’ इतिहास से इतर इस दौर का सबसे बड़ा संकट यह है हम पगडंडी और हाइवे तथा गांव व शहर के बीच का कोई रास्‍ता नहीं निकाल पाये हैं.


(कुरजां में प्रकाशित आलेख से साभार)

Posted by: prithvi | 06/07/2013

इल्‍म से शायरी

ओशो कहते हैं कि मनरूपी कचरे के साथ होकर भी उससे अलग होना ध्याकन है. यानी मन से कोई तादात्मूय ही नहीं रखना है बस. कृष्णामूर्ति ने कहा कि ध्या न सचेतन नहीं है, अभ्यािसित नहीं है, सोचा समझा नहीं है तो मुझे लगता है कि वह वही बात कहते हैं. अनायास घटित होने की. खुली हथेलियों पर अचानक गिरती बूंदों की. उन्हेंु महसूस करने की.

ओशो कहते हैं कि मनरूपी कचरे के साथ होकर भी उससे अलग होना ध्याकन है. यानी मन से कोई तादात्मूय ही नहीं रखना है बस. कृष्णामूर्ति ने कहा कि ध्यान सचेतन नहीं है, अभ्यासित नहीं है, सोचा समझा नहीं है तो मुझे लगता है कि वह वही बात कहते हैं. अनायास घटित होने की. खुली हथेलियों पर अचानक गिरती बूंदों की. उन्हें महसूस करने की.

बेंगलूर के पास पंचगिरि की पहाडियों में हम पश्चिम की ओर मुंह करके ध्‍यान के लिए बैठे हैं और पूर्वाई चल रही है. यानी हवा पीठ की ओर से आती है. पीठ की ओर से, पूरे बदन को सहलाती हुई कानों के पास से सर सर बहती है. थार (रेगिस्‍तान) का आदमी जहां भी जाता है अपनी धूल भरी आंधियां ढूंढता है और जब सुबह सवेरे की नरम हवाएं उससे इस शिद्दत से लिपटती हैं तो वह यूं ही खो जाता है. यही हाल कमोबेश हमारा है. सुबह की शीतल हवाओं को जीने के इन दिनों बायीं ओर से मोटी मोटी बूंदें कब आसमान की ओर खुली हथेलियों पर गिरने लगीं, पता ही नहीं चलता.

जे कृष्‍णमूर्ति, ओशो रजनीश से लेकर गुरू रविशंकर तक को पढने, सुनने के बाद अपनी समझ में मोटा माटी यही आया कि ध्‍यान खुद के साथ होना है और खुद के साथ होकर भी अलग होना है. खुद को कहीं बिठाकर ‘लांग ड्राइव’ पर निकल जाना है. अगर हम अपने पास बहती हवा को सुन पायें, हथेलियों पर गिरती बूंदों को महसूस कर पायें यह देख पायें कि दक्षिण भारत में निमोळी हमारे उत्‍तर भारत से कितनी मोटी होती है तो बस यही ध्‍यान है! ओशो कहते हैं कि मनरूपी कचरे के साथ होकर भी उससे अलग होना ध्‍यान है. यानी मन से कोई तादात्‍मय ही नहीं रखना है बस! कृष्‍णमूर्ति ने कहा कि ध्‍यान सचेतन नहीं है, अभ्‍यासित नहीं है, सोचा समझा नहीं है तो मुझे लगता है कि वह वही बात कहते हैं. अनायास घटित होने की. खुली हथेलियों पर अचानक गिरती बूंदों की.

ध्‍यान की अपनी इसी विशिष्‍ट परिभाषा के साथ देखा कि कर्नाटक व अन्‍य दक्षिण भारतीय राज्‍यों में सफेद फूल कहीं अधिक होते हैं. हर आयोजन में सफेद फूलों की अधिकता रहती है. अपने थार में महिलाओं के कपड़ों में लाल चटक रंग अधिक होता है, ज्‍यों ज्‍यों हम नीचे दक्षिण की ओर जाते हैं यह रंग मैहरून होता जाता है. हमारे यहां महिलाएं चांदी के कड़े, पजेब, नथ पहनती हैं तो दक्षिण में सोना अधिक पहना जाता है. नीम की नीमोळी हो, पपीता या नारियल सब थोड़े भरवां (हेल्‍दी) होते हैं. नीम के पत्‍ते कितने हरे भरे होते हैं और नीमोळी तो हमारे यहां के बेर जितनी बड़ी. वहां माटी में लाली अधिक होती है तो हमारे यहां क्रीमी सी. शायद कहीं कहीं काली माटी भी होती होगी.

 ध्‍यान शिविर से बाहर आता हूं बादलों के झुंड आसमान में डेरा जमाए हैं. हाथ पकड़े पहाड़ी से उतरते हुए उसने पूछा इन बादलों को भी कोई नहलाता है क्‍या? कहीं पढा था कि मेहनत से मद भरी मौज और कोई नहीं होती. मेहनत करके खाने वाले ध्‍यान नहीं करते! हमें अभी कुछ दिन इन पहाड़ों में ध्‍यान करते हुए बिताने हैं, जहां की लाल चींटी के काटने पर तेज जलन होती है.

कुछ बातें दिल की हैं जैसा किसी ने कहा था-
इश्‍क को दो दिल में जगह
इल्‍म से शायरी नहीं आती.

आसमान से कुछ यूं दिखते हैं बादल के खेत.

आसमान से कुछ यूं दिखते हैं बादल के खेत.

टैक्‍सी, विमान, रेल, कार, बस व बाइक… कई साधनों पर कुल मिलाकर ढाई हजार किलोमीटर से ज्‍यादा का सफ़र दो तीन दिन में पूरा कर थार के उस सिरे पर आ पहुंचा हूं जहां एक देश की सीमा बाहें समेट रही है तो दूसरे देश का बार्डर शुरू होता है. कनार्टक की पंचगिरि पहाडियों से अपने राजस्‍थान यानी थार तक की बालू की इस यात्रा में तापमान से लेकर जीवन जीने के ढंग और मुआवरे सब बदल चुके हैं.

जेठ आषाढ में अपने देस नहीं आने की तमाम कोशिशों के बावजूद यहां हूं तो शायद इसी कारण कि अपनी नाड़ इसी में कहीं दबी है. कि जेठ का आखिरी और आषाढ का पहला दिन थार में बीता है. सुबह धूल भरी आंधियां लपेटे आती हैं तो दुपहरियों में लू के तीखे थपेड़े हैं. शामें तो नहीं हां, उतरती रातों के पास राहत के कुछ खेस दरी जरूर होते हैं.

तो, खेतों के लिहाज से सुस्‍ताता समाज नये मकान बनाने में लगा है. पक्‍के मकान. अपने दस में से सात परिवार वाले नये मकान बना रहे हैं. हर कहीं काम चल रहा है. तोड़ फोड़ या निर्माण की गूंज सुनाई देती है. जो खाली हैं उन्‍होंने भी प्‍लाट ले लिए हैं. किसने, कहां प्‍लाट लिया या बेचा तथा कौन नया मकान बना रहा है, हर ओर यही बात है. टूटते घरों में इस तरह से मकान बनते हुए देखता हूं तो अपने घर की दो साल पहले गिर चुकी दीवार भी याद आ जाती है.

इस नये निर्माण की नींव की कुछ ईंटें एक नयी फसल ग्‍वार से भी आई हैं. जो इलाका कुछ साल पहले अकाल की मार झेल रहा था वह अचानक ही इतना खर्च करने वाला हो गया तो इस फसल के कारण भी. नरमे कपास तथा किसी भी अन्‍य नकदी फसल की तुलना में कम लागत, मेहनत से तैयार होने वाली ग्‍वार की फसल तुरता लाभ देती है. भाव भी ठीक ठाक हैं. सारे समीकरणों का निचोड़ यही कि अगर किसान को उसकी फसल की सही कीमत मिले तो वह खुदमुख्‍तयार हो सकता है. नरेगा पर अरबों खरबों के खर्च को जायज बताने वाले नौकरशाहों और भाड़े के कलमकारों को इस तथ्‍य पर गौर करना चाहिए. वे सोचें की नरेगा अच्‍छे उद्देश्‍य के साथ शुरू की गई गलत योजना कैसे साबित हो गई? अपने भाई बंदों ने इसे और भी गलत ढंग से लिया.. मुफ्त के पैसे की योजना के रूप में. मेहनत की कमाई की बरकत को समझने वाले देश समाज में इस योजना के मनोवैज्ञानिक दुष्‍प्रभावों को समझना होगा. किसान और खेती बाड़ी का भला सही मेहनताने और सही कीमत से ही हो सकता है. इस लिहाज से अपना वोट नरेगा के खिलाफ है. इसने एक तरह से खेती बाड़ी को नुकसान पहुंचाया है.

खैर, अपने ही शहर के जिस अच्‍छे खासे गेस्‍ट रूप में ठहरना पड़ा उसकी रिसेप्‍शन के पास बड़ा सा एक्‍वेरियम रखा है. रंग बिरंगी मछलियों वाला. जब भी एक्‍वेरियम को देखता हूं तो यही सवाल उठता है कि ये खाती अघाती मछलियां भी कभी बड़ी होती हैं क्‍या? इतनी बड़ी कि दुनिया का कोई भी एक्‍वेरियम उनके लिए छोटा पड़ जाये और उन्‍हें समंदरों में छोड़ने के अलावा कोई विकल्‍प नहीं बचे. थार के इस सिरे में समंदर की परियों को इन सजावटी एक्‍वेरियम में देखता हूं तो अंदर से कुछ घुटता है. लेकिन कुछ कहता नहीं क्‍योंकि यह गेस्‍ट अपने दोस्‍त का है और अपने कई यार आजकल एक्‍वेरियम जैसा कमाऊ धंधा करते हैं!

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