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आक्रांताओं विशेषकर मुगल साम्राज्‍य की आंखों की किरकिरी रहे चित्‍तौड़ के एतिहासिक दुर्ग के लिए सूरज आज भी पूरब में उगता है और पश्चिम में अस्‍त हो जाता है। किले के पिछले दरवाजे से आने वाले पर्यटकों के लिए एतिहासिक आख्‍यानों का सिलसिला विजय स्‍तंभ से शुरू होकर स्‍थानीय आदिवासियों द्वारा शरीफे (सीताफल) से बनाई गयी विशेष रजाइयों व दूसरे उत्‍पादों पर खत्‍म हो जाता है।

स्‍थानीय गाइडों के पास पीढ़ी दर पीढ़ी सुने इतिहास का रोचक वृतांत है। इसमें शासकों की शौर्य गाथाएं, एतिहासिक लड़ाइयां व जीते हैं। वे बताते हैं कि किस तरह दो दर्जन से अधिक हमलों को अपने सीने पर सफलतापूर्वक झेलने वाला यह किला केवल तीन, केवल तीन हारों में खंडहर में बदल गया।

चित्‍तौड़ में देखने के लिए खंडहर, सुनने के लिए गौरवशाली इतिहास, खाने के लिए शरीफा और ले जाने के लिए (जौहर की) माटी है।“ गाइडों का यह तकिया कलाम दिन में कई बार सुनने को मिल जाता है।

कई एकड़ में फैले देश के इस सबसे बड़े किले के एक बड़े हिस्‍से में अब शरीफे की खेती होती है। किले के सामने वाले दरवाजे सूरजपोल से नीचे भी शरीफे के पेड़ों का जंगल दिखता है। घोड़ों की टापों और तलवारों की टंकारों से गुंजायमान रहने वाली चित्‍तौड़ की एतिहासिक रणभूमि में इन दिनों शरीफे के पेड़ हैं। या गेहूं के खेत लहलहा रहे हैं। एक राजमार्ग है जो इस युद्धभूमि को मानों तलवार की तरह काटता हुआ निकल जाता है। उसके पार सोए हुए इंसान की आकृति का एक पहाड़ है। उसके बाद एक कतार में पहाडियां सर झुकाएं बैठी लगती हैं।

उधर किले के भीतर विजय स्‍तंभ के पास एक पार्कनुमा जौहर क्षेत्र है। इन दिनों पर्यटकों व गाइडों में इसकी चर्चा है। किले के भीतर सबसे बड़ा स्‍मारक विजय स्‍तंभ है जो विशाल खंडहरों व बड़े से बड़े विवादों से उंचा अडिग खड़ा नजर आता है।

विवादों के पत्‍थर से टूटे इतिहास के कांच के कुछ किरचे एक कमरे में बिखरे हैं जिसकी तीन खिड़कियां तलाब में बने रानी महल की ओर खुलती हैं। बस विवादों का यह बोझ परकोटे के भीतर ही अधिक महसूस होता है। परकोटे से दूर होने के साथ ही यह हल्का होता जाता है। किले से नीचे जो शहर चित्‍तौड़ है उसके रोजानमचे में तो ‘वही मैदान-वही घोड़े’ दर्ज हैं।
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सोशल मीडिया प्रभाव

‘हफिंगटन पोस्‍ट’ की सीईओ एरियाना हफिंगटन ने इस साल के शुरू में अपनी भारत यात्रा से पहले एक खुला खत लिखा। इसमें उन्‍होंने प्रौद्योगिकी विशेषकर स्‍मार्टफोन जैसे उपकरणों के पीछे भारतीयों के पागलपन को रेखांकित करते हुए इससे जुड़े खतरों के प्रति आगाह किया है। एरियाना का यह खत जिस दिन छपा उसी दिन एक और खबर यह थी कि 31 दिसंबर की रात 12 बजे के आसपास भारतीयों ने व्‍हाट्सएप पर इतने संदेश भेजे कि यह एप ही आधे घंटे तक ठप रहा। समझ नहीं आया कि ऐसी कौनसी आग लगी थी कि लोगों ने उन विशेष (अगर वे थे) क्षणों का आनंद उठाने के बजाय उन्‍हें चमकती मोबाइल स्‍क्रीनों के अंधेरे में  जाया किया।

यह हाल तो तब है जबकि सवा अरब की जनसंख्‍या वाले भारत में अधिकतर लोगों की स्‍मार्टफोन, इंटरनेट व सोशल मीडिया तक पहुंच ही नहीं है। अगर समूची जनता के पास यह सुविधा हो तो? इस तो का जवाब शायद हमारी कल्‍पनाओं के घोड़े जहां थककर थम जाएंगे वहां से शुरू होगा।

इसमें कोई संदेश नहीं कि व्‍हाट्सएप हो, फेसबुक, टिवटर या हाइक या कोई और मंच, निसंदेह संपर्क संवाद यानी कनेक्टिविटी का इससे सस्‍ता व तेज साधन अब तक विकसित नहीं हुआ। सूचनाओं का इससे बड़ा तथा लोकतांत्रिक मंच आज तक हमें नहीं मिला। लेकिन जैसे हर क्रांति का दूसरा पहलू होता है वैसे ही इस सोशल मीडिया इस क्रांति का एक खतरनाक दूसरा पहलू है जिसकी अनदेखी करने का जोखिम भारत जैसा उदीयमान देश और प्रगतिशील समाज नहीं उठा सकता। लगभग मुफ्त का इंटरनेट और किस्‍तों में मिल रहे स्‍मार्टफोन एक समूची पीढ़ी की कल्‍पनाओं को बांधने व बींधने का काम तो नहीं कर रहे हैं यह सवाल बड़ा हो गया है। कहीं यह हमारी रचनाधर्मिता और समाज की उत्‍सवधर्मिता, खबरों की विश्‍वसनीयता के लिए संकट तो नहीं बन रहा? भारत- एक बाजार जिसमें हर महीने तीन करोड़ स्मार्टफोन बिक रहे हैं और जो हर महीने 150 करोड़ जीबी मोबाइल डेटा पीकर दुनिया में पहले नंबर पर है, उसके लिए इस संकट पर गंभीरता से चर्चा करने की जरूरत है।

संकट के संकेत
दरअसल खाते पीते, चलते फिरते, सोते जागते चार-छह ईंच की चमकती स्‍क्रीन को लेकर हमारे युवाओं का ‘पागलपन’ निराश करने वाला है। गौर करिए कि मोबाइल फोन को लेकर ‘पागलपन’ या एडिक्‍शन जैसी नयी बीमारी से पीडित भारतीय युवाओं की संख्‍या साल भर में 100 फीसद तक बढ़ी है। तनाव, कुंठा और निराशा, अध्‍ययन बताते हैं कि मोबाइल फोन से चिपके रहने वाले युवाओं में 65 प्रतिशत युवाओं में हताशा है। कोई हैरानी नहीं है कि देश के राष्‍ट्रपति मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य की समस्‍याओं को महामारी करार दे चुके हैं। प्रधानमंत्री ने अपने रेडियो कार्यक्रम में इस संकट का जिक्र किया। एरियाना का कहना है कि युवाओं में तनाव व मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य से जुड़ी इन सारी दिक्‍कतों के केंद्र में है प्रौद्योगिकी के साथ हमारा रिश्‍ता। इस रिश्‍ते में गड़बड़ता संतुलन खतरनाक होता जा रहा है।

सोशल मी‍डिया का ककहरा
इन हालात में यह बहुत जरूरी हो गया है कि सोशल मीडिया, इसके विभिन्‍न पहलुओं, उपयोगिता व खतरों के बारे में विस्‍तार से बात की जाए। चर्चा हो। खाते पीते सोते जागते आनलाइन व लाइव रहने वाले दीवानों के लिए यही सलाह है कि वह जितनी जल्‍दी हो सके इस भ्रम से निकल जाएं। यह आभासी दुनिया उनके काम की नहीं है। गुड मार्निंग-गुड इवनिंग के संदेश, दूसरों के कथनों व मुहावरों पर गढें गए वाक्‍य या उट पटांग से वीडियो फारवर्ड कर वे किसी क्रांति में भागीदारी नहीं कर रहे। बल्क‍ि यह आंकड़ों की बाजीगरी पर बाजार का रचा ऐसा जलसाघर है जो उनकी रचनात्‍मकता व उर्जा पर कुंडली मारकर बैठ गया है। इस सारे जलसाघर को समझने के लिए तीन प्रमुख बिंदुओं पर बात की जा सकती है।

पहला बिंदु :  बाजार के बाजीगर सोशल मीडिया आलेख
फेसबुक हो या टिवटर, हर प्रमुख सोशल मीडिया कंपनी अपने ऐसे ‘लाईट’ संस्‍करण ला रही है जो कि भारत में कम इंटरनेट स्‍पीड में भी बेहतर काम करें। क्‍यों भई? दरअसल हमारे यहां सोशल मीडिया में जो तीन प्रमुख एप लोकप्रिय हैं वे हैं फेसबुक, व्‍हाट्सएप व टिवटर। भारत में करीब 24 करोड़ फेसबुकिया हैं जो उसका नियमित रूप से इस्‍तेमाल करते हैं। इस संख्‍या के हिसाब से अमेरिका के बाद भारत उसका दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। व्‍हाट्सएप की बात करें तो दुनिया भर में उसके 120 करोड़ सक्रिय उपयोक्‍ताओं में से 20 करोड़ से अधिक भारत में हैं। भारत उसका भी सबसे प्रमुख बाजार है। भारत में लगभग सवा दो करोड़ लोग टि्वटर पर हैं। यह तो शुरुआत भर है। सवा अरब वाले इस देश में जहां आबादी का एक बड़ा हिस्‍सा युवा है, खुद को व्‍यक्‍त करने के लिए मरा जा रहा है, जहां स्‍मार्टफोन लगातार सस्‍ते हो रहे हैं… भारत कितना बड़ा बाजार है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। यही कारण है कि हर बड़ी कंपनी यहां बाजी लगाने को तैयार है।

दूसरा बिंदु: फालोवर का खेल
टिवटर पर किसी हस्ती को फालो करने का मतलब है कि हम उसके अनुयायी हो रहे हैं। वह हस्ती अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर जो कुछ भी लिखेगी लिखेगा तो उसकी सूचना हम तक मिलेगी। बात इतनी सी भी है और नहीं भी। इतनी सी इसलिए क्योंकि हम अमुक हस्ती के फालोअर बन गए उनसे हमारी रिश्तेदारी नहीं हो गई। उदाहरण के लिए विराट कोहली के टिवटर एकाउंट को लगभग सवा दो करोड़ लोग फॉलो करते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि कोहली उन सभी सवा दो करोड़ लोगों को जानते, पहचानते हैं या उनके लिखे मैसेज का जवाब देते हैं। ऐसा नहीं है कि हम कोहली को टैग करते हुए उन्हें बधाई दें और उनका जवाब आए – हां भाई थैंक्यू, अगली बार भोपाल आया तो मिलूंगा। ऐसा कुछ नहीं होता न ही होने जा रहा है। विराट कोहली टिवटर पर केवल 51 लोगों को फालो करते हैं यानी इनकी गतिविधियों पर निगाह रखते हैं। इसलिए अगर हम विराट कोहली, अनुष्का शर्मा , फलांना धिंकाना को फॉलो कर रहे हैं तो कोई तीर नहीं मार रहे बस उनके द्वारा परोसी गई सूचनाओं के लक्षित ‘आडियंस’ भर बन रहे हैं।

दूसरा पहलू बाजार का है। विराट कोहली का ही उदाहरण लें। विराट के इंस्टाग्राम पर करीब 1.5 करोड़, ट्विटर पर सवा दो करोड़ और फेसबुक पर 3.6 करोड़ फॉलोवर हैं। यह उनकी ब्रांड वैल्यू बढाने वाला है। फोर्ब्स पत्रिका के अनुसार विराट कोहली सबसे महंगे एथलीट हैं जिनके एक इंस्टाग्राम पोस्ट की कीमत करीब 3.2 करोड़ रुपये है। ऐसा लगभग हर चर्चित हस्ती के साथ है। जितने ज्यादा फालोअर उतनी अधिक ब्रांड वैल्यू और वैसे ही कमाई। तो भाई लोगों हम, एक तरह से बाजार में कमाई का जरिया बन गए हैं। लोग हमारे जरिए कमाई कर रहे हैं।

तीसरा बिंदु: ब्रेकिंग जैसा कुछ नहीं
सोशल मीडिया पर ‘ब्रेकिंग ..ब्रेकिंग’ कर उल्टे सीधे समाचार डालने वालों को भी इसे समझना चाहिए। शाहरुख खान ने अपनी नयी फिल्म का पोस्टर जारी किया। यह खबर सुबह से लेकर शाम तक अलग अलग मीडिया माध्यमों में ब्रेकिंग के रूप में आती रहती है। वास्तव में क्या होता है। उदाहरण के लिए शाहरुख अपनी फिल्म का पोस्टर टिवटर पर डालते हैं। सबसे पहले यह सोशल मीडिया पर उनके फालोवरों तक पहुंचती है। यहीं से कोई मीडिया हाउस उसे उठाकर खबर बनाता है। यह खबर मीडिया से अन्य मीडिया घरानों या कंपनियों के मंच पर आती है और वहां ब्रेकिंग बनकर चलती है। इसके बाद यह कहीं व्हाट्सएप जैसे माध्यमों में ब्रेकिंग बनकर आती है। यानी इस दौरान खबर खुद कई बार टूट बन चुकी होती है। उसके लेकर हम जैसे आम लोगों का पागल हो जाना किसी काम का नहीं। पहली बात तो यह कि जिन लोगों की शाहरुख और उनकी फिल्मों में रुचि है उन तक वह पहले ही पहुंच चुकी होगी। जिन लोगों तक नहीं पहुंची उनके लिए शायद इससे जरूरी और काम होंगे और उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि शाहरुख की नयी फिल्म आई या नहीं। हमें यह समझना होगा जिस ब्रेकिंग न्यूज को लेकर हम सोशल मीडिया मंचों पर बावले हो जाते हैं वह एक बहुत बड़े धोखे और भ्रम से अधिक कुछ नहीं।

झूठ का कारोबार
हमें इस सचाई को बिना हिचक स्‍वीकार कर लेना चाहिए कि सोशल मीडिया झूठ और आधे सच पर आधारित सूचनाएं फैलाने का सबसे बड़ा माध्यम बन गए हैं। खुद फेसबुक से लेकर गूगल तक इससे परेशान हैं। ‘फेक न्यूज’ पिछले साल इस तरह की कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चिंताओं में से एक रही । कंपनियों ने अपने मंचों के जरिए फैलाए जा रहे झूठ पर चिंता जताई है। सोशल मीडिया के जरिए फैलाए जा रहे इस झूठ में भी उपयोक्ता के रूप में कहीं न कहीं भागीदारी करते हैं। बिना तथ्यों के सत्यापन के ही उल जुलूल संदेशों को फारवर्ड व शेयर करना इसकी सबसे बड़ी वजह है। ऐसा कर हम भी कहीं न कहीं झूठ फैलाने के ‘पाप’ के भागीदार बनते हैं।

मजे की बात है कि जो प्रौद्योगिकी व्‍यक्तिगत व सामाजिक उन्‍नति में मददगार होनी थी उसका उपयोग भाई लोग ब्राह्मण महासभा और जाट जिंदाबाद जैसे ग्रुप बनाकर कर रहे हैं। एक साथ काम कर रहे दो लोग सोशल मीडिया पर किसी अलग जाति, धर्म, वर्ग समूह के ग्रुप में जुबानी जंग लड़ रहे होते हैं। वह भी बिना बात की। हाल ही में अनेक घटनाओं में सोशल मीडिया की भूमिका पर बड़ा सवाल उठा है।

सार्थकता का सवाल
बीते कुछ साल में दूरदराज के गांव में रहने वाले मेरे कई दोस्त व्हाट्सएप, फेसबुक व टिवटर जैसे सोशल मीडिया पर नमूदार हुए हैं। यह संख्या लगातार बढ़ी है। यह अच्छा संकेत है और खुशी की बात भी कि त्वरित संवाद का नया माध्यम आया है। लेकिन इस संवाद की सार्थकता की बात की जाए तो निराशा ही होगी। व्हाट्सएप पर फारवर्ड किए गलत सलत संदेशों, वीडियो, फोटो की भरमार रहती है। फेसबुक पर आपका चेहरा किस हीरो हीरोइन से मिलता है जैसे फर्जी एप से निकले फोटो भरी रहती हैं। टिवटर तो लोगों ने साल भर में खोलकर भी शायद देखा हो। फिर भी देखा भाई लोग लगे रहते हैं। अब समझ में नहीं आता कि मलकीसर के पास किसी ढाणी में रहने वाले किसान दोस्त के लिए यह इस तरह का सोशल मीडिया किस काम का है। यह कड़वा सच है कि हमारे यहां सोशल मीडिया पर दो ही तरह के लोग अति सक्रिय हैं- जिनका धंधा है, या जिनका एजेंडा है।

सार
सीधी सी बात है कि कोई भी प्रौद्योगिकी हमारे लिए तभी काम की है जबकि या तो वह हमारे व्यक्तिगत उन्नयन के काम आए यानी वह हमारी सोच, समझ का दायरा विस्तृत करे। हम उससे कुछ न कुछ सीखें। दूसरा वह हमारे कामधंधे के विस्तार में काम आए। हमारी आय/कारोबार बढ़ाने वाली हो। या तीसरा वह किसी न किसी रूप में हमारे जीवन को और सुगम बनाए। अगर कोई प्रौद्योगिकी इन तीनों मानकों पर खरी नहीं उतरती तो हमें उसे बिना हिचक छोड़ देना चाहिए। वह हमारे किसी काम की नहीं।

बात यही है कि जैसे हर पेशे का एक सलीका होता है, हर प्रौद्योगिकी का एक लिहाज व संस्कार होता है जिसके अनुसार ही उसका इस्तेमाल होना चाहिए। चीन में कहा जाता है कि पुल अपने आप में बहुत अच्छी चीज है। हम बड़ी से बड़ी और गहरी से गहरी नदियों को पुलों के जरिए पार कर सकते हैं। लेकिन पुल पर घर नहीं बनाया जा सकता। यही बात सोशल मीडिया मंचों पर लागू होती है। यह बहुत अच्छा माध्यम, बहुत क्रांतिकारी खोज है लेकिन हम सबकुछ भूलकर यहां लट्ठ गाड़कर नहीं बैठ सकते । इसके इस्तेमाल का संयम और सलीका अगर हममें नहीं है तो बेहतर यही है कि हम इस आभासी दुनिया से विदा ले लें। कल नहीं यह काम आज ही कर लें।

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संदर्भ:
https://timesofindia.indiatimes.com/india/an-open-letter-to-india-on-our-relationship-with-technology/articleshow/62332076.cms

https://thewire.in/210115/2017s-top-fake-news-stories-circulated-by-the-indian-media/
https://hindi.news18.com/news/tech/virat-get-paid-3-2-crore-for-per-instagram-post-1162675.html

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बाहर वाले कमरे में दरवाजे के नीचे से खिसकाए गए अखबारों को ढेर लगा है। हर बार की तरह। कई दिन के बाद घर में घुसते ही पहला काम होता है इन अखबारों को समेट कर रास्ता बनाना। अखबार समेटते समेटते ही एक खबर आंखों में अटक गई। सिंगापुर डब्ल्यूटीए के युगल में हार के साथ ही मार्तिना हिंगिस ने टेनिस को अलविदा कहा। ओह! कार्तिक उतर रहा है और सिर्फ टेनिस खेलने के लिए ही जन्मी, इस दौर की सबसे ‘इंटेलीजेंट’ टेनिस खिलाड़ी रैकेट खूंटी पर टांग रही है। मार्तिना हिंगिस के नहीं होने से टेनिस कोर्टों की चमक या चौंध पर कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन तमाम वर्जनाओं को रौंधने की उसकी जीवटता को हमेशा याद रखा जाएगा। भले ही वह टेनिस के महानतम खिलाड़ियों की सूची में शामिल होने से एक दो कदम चूक गई हो।
 

हमारे लिए मार्तिना एकमात्र ऐसी एथलीट रही जिसके जन्म लेने से पहले ही तय हो गया था कि वह टेनिस खेलेगी। मार्तिना हिंगिस की मां और टेनिस खिलाड़ी मेलेनी, दिग्गज मार्तिना नवरातो​लिवा की धुर प्रशंसक थी। मार्तिना हिंगिस जब गर्भ में थी तभी उसका मार्तिना नाम व खेल टेनिस तय हो गया। ​शायद इसी तैयारी और मां के सपनों ने मार्तिना का प्रारब्ध लिख दिया। उसे टेनिस में होना था, वह टेनिस में हुई .. टेनिसमय हुई। उसमें न तो अन्ना कोरनिकोवा जैसे ग्लैमर था न ही वह सेरेना और वीनस विलियम्स जैसी ताकत वाली थी। अपनी पांच फुट सात ईंच के कद व साधारण काठी के बावजूद मार्तिना ने टेनिस में अपनी सफलता के झंडे ही नहीं गाड़े 15-16 साल की साल में तो वह इस खेल की राजकुमारी हो गई।

बाइस साल की उम्र में, ऐसी उम्र में जबकि ज्यादातर खिलाड़ी रैकेट के भार को आंकना शुरू करते हैं मार्तिना ने चार ग्रेंड स्लेम जीत के साथ पहली बार मैदान से हटने की घोषणा की। अपने रिटायरमेंट से खेल जगत को सकते में डाल दिया। तब ऐसा लगा कि यूरोप के खेले खाये समाज की, जीत-जीत कर अघा गई नवयुवती अपनी मां की आकांक्षाओं व खेल की अपेक्षाओं का बोझ उतार फेंकना चाहती है। जीतना जैसे उसके बांये हाथ का खेल हो गया था। वह चाहती थी कि अपने गांव लौट जाए, घुड़सवारी करे और पढ़ाई पूरी करे। लेकिन उसकी नाड़ तो टेनिस से बंधी थी इसलिए उसे लौटना तो यहीं था। रिश्तों में आई कड़वड़ाहट को पीती, टू​टी यारियों के जख्मों को ढंकती मार्तिना कोर्ट पर लौट आई और अगले 11-12 साल टेनिस को जीती, जीतती चली गई। बीच में एक रिटायरमेंट के साथ वह पांच साल तक टेनिस मैदान से दूर रही। लेकिन जब भी लौटी और अधिक परिपक्वता व प्रतिबद्धता के साथ।

 

मार्तिना के करियर को याद करते हुए मोनिका सेलेस, मेरी पियर्स, जस्टिन हेनिन हार्डिन, लिंडसे डेवनपोर्ट व जेनिफर केप्रियाती जैसी अनेक दिग्गज टेनिस खिलाड़ी के नाम आते हैं। लेकिन मार्तिना इन सबमें किसी न किसी रूप अलग रही। कदकाठी या शारीरिक सौष्टव में भले ही वह अपनी समकक्ष खिलाड़ियों से 19 रही लेकिन टेनिस की बारीकियों, खेलते समय टाइमिंग में उसका कोई सानी नहीं रहा। होता भी कैसे टेनिस उसके डीएनए में जो समाया था जो उसे कोर्ट पर खींच कर लाता रहा। आलोचकों ने जब जब उसे खारिज करने की कोशिश की वह कहीं मजबूत होकर कोर्ट पर लौटी। 
 
मेरे लिए मार्तिना ऐसी एथलीट रही जिसने जीत कर हार की कद्र की, हर हार को मुस्कराते हुए गले लगाया और टेनिस और अपने प्रशसंकों को शुक्रिया कहा। शायद यही कारण है कि सोलह साल की उम्र में तीन ग्रेंड स्लैम जीतने वाली मार्तिना आज 37 साल की उम्र में युगल में दुनिया में नंबर वन होते हुए रिटायर हो रही है। एक बार बिना किसी शिकवे शिकायत के, टेनिस को शुक्रिया कहते हुए। टेनिस के चाहने वालों की ओर से एक शुक्रिया तो हमारा भी बनता है मार्तिना। ये खेल तुम्हें मिस करेगा!
(Photo Curtsy net)

कांकड़

जेठ आषाढ़ के महीनों में धूल जब हवाओं से लिपट बावली हो जाती है तो खेतों में बवंडर उठते हैं। थार में हम इसे भतू‍ळिया कहते हैं। वही जिसके लिए आपके शब्दकोष में बवंडर या वर्लविंड लिखा गया है। ये भतूळिए अपने दायरे में आने वाली हर चीज को झंझोड़ते हुए निकलते हैं। हम बच्चों को कहा जाता था कि भतूळिओं से दूर रहाे क्योंकि इनमें भूतों का वास होता है। कुछ बच्‍चों को यह कहकर दूर रखा जाता था कि भतूळिए वे आत्माएं हैं जो तपते थार में भटकती हैं। ये खतरनाक होती हैं। बहुत बाद में ​पता चला कि भतूळिए का सारा खेल गर्म और ठंडी हवाओं के तेजी से घूमने का है। उसके रंग में बेलौस नाचती बालू का है।

चढ़ते फागुन के साथ आसमान की उंचाइयों को छूने की कोशिश कर रहे बादल बूंदों के रूप में जमीन गिरने लगे हैं। बारिश हो रही है। बर्फबारी हो रही है। दिल्ली से लेकर जोधपुर और कश्मीर से लेकर हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ों तक। बाहर देश को निकली सर्दियां, एक बार फिर विदा कहने मौसमों की दहलीज पर लौट आईं हैं।

कि मेरे देश में चने जवान होकर ‘होळे’ होने लगे हैं। बाजार की रे​हड़ी पर बीस रुपए किलो के भाव से ​बिकते हरे चनों के गुच्छों में अपनी माटी की खुशबू तो नहीं, हां यादों की महक तो है। तभी तो गर्म होती दुप​हरियों में भूने गए हरे छोले चनों का स्वाद मुहं में भर आता है।

चढ़ता हुआ फागुन, खेतों के सबसे खूबसूरत मौसमों में से एक। जब सरसों, चने और गेहूं के खेत हाथों में हाथ डाल जवान हो रहे हैं। सिस्टम पर नुसरत साहब का मेरे रश्के कमर प्ले कर बालकनी में आ जाता हूं। छत पर सूखने डाल दी गई रजाइयों ने पूछा है- समंदर जहां खत्म होता है वहां जमीन की बही के पांचवें पन्ने पर किसकी खातेदारी है? देखकर बताइएगा!

Posted by: prithvi | 26/02/2017

माल रोड इंडिया

माल

दार्जिलिंग का जो विख्यात चौरस्ता है वहां नेपाल के आदि कवि भानुभक्त की आदमकद प्रतिमा लगी है। पहाड़ी की सबसे उंची जगह पर यह चौरस्ता अपने आप में एक छोटा सा स्टेडियम है जहां एक ओपन थिएटर है और चारों और गोल घेरे में बैंच लगी हैं। ओपन थियेटर के पास बड़ी स्क्रीन है जिस पर फुटबाल के मैच चलते हैं और लोग धूप सेंकते हुए पहाड़ों से उतरी ठंड को देखते हैं। भानुभक्त की प्रतिमा के बायीं ओर जो रैलिंग है वहां खंबे पर एक पोस्टर लगा है। ममता बनर्जी का। यह पोस्टर अपने आप में एक राजनीतिक बयान है। गोरखालैंड आंदोलन का केंद्र रहे दार्जिलिंग में इस तरह के पोस्टर नहीं दिखते। न ही लोग लगाते हैं और न ही लगाने दिए जाते हैं। सामने की बैंच पर औसत सी चाय पीते हुए राय साहब इस पोस्टर की ओर इशारा करते हुए कहते हैं- हवा बदल रही है।

खैर इसी पोस्टर वाली रैलिंग के साथ एक सड़क नीचे जाती है जो यहां की माल रोड है। यह माल रोड ठीक वैसी है जैसे दिल्ली का जनपथ या सरोजनी मार्केट या शिमला, मनाली, कानपुर, दिल्ली, लुधियाना, डजहौजी, आगरा व नैनीताल.. की माल रोड। जहां एक जैसी ही ब्रांडेड दिखने वाली सस्ती चीजें मिलती हैं। इनमें से ज्यादातर कपड़े या बाकी आइटम कहां से आते हैं, कैसे बनते हैं हम सभी जानते हैं लेकिन फिर भी भीड़ उमड़ी रहती है। आपत्ति न तो सस्ते आइटमों पर है न इनकी सहज सरल उपलब्धता पर, चिंता आस्वाद की उस भिन्नता की है जो इस देश को रंग देता है। ये रंग किसी देश के भारी उत्पादन वाले कारखानों में सस्ते लेबर ने नहीं सहेजे बल्कि उन रंगरेजों की पीढ़ियों की मेहनत व हुनर का परिणाम है जिनके कड़ाहों की बोली लगाने बाजार के कबाड़ी हमारे दरवाजे तक आ पहुंचे हैं।

एक हिलटॉप पर अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा ऊन परखने में बिताने वाले जंपा तेनजिन कहते हैं कि ऊन की परख उसके रंग और चमक से नहीं की जा सकती इसके लिए उसे चखना पड़ता है। उसकी कड़वाहट को जीभ पर रखना पड़ता है। कि यह जहर चखे बिना ऊन का पारखी नहीं हुआ जाता। जिंदगी इतनी आसानी से किसी को भी पारखी नहीं बना देती। तो 140 शब्दों के ज्ञान पर खायी अघायी पीढ़ी से आप इतिहास की किन पोथियों को सहेजने की उम्मीद करेंगे। और क्या उम्मीद करेंगे भविष्य ग्रंथ रचे जाने की?

कि हाट से माल, माल से माल रोड और माल रोड से मॉल। यह तो व्यवस्था हमारे बड़े शहरों से रिसती हुई छोटे शहरों व कस्बों में आ रही है वह कहीं उधार के रंग तो नहीं हैं जिन्हें हम बिना मोल भाव किए ही अपने सपनों में भरे जा रहे हैं? रामस्वरूप किसान ने अपने एक नयी कहानी में बड़ी मार्के की बात कही है- उधार में किसका और कैसा मोलभाव। यानी जो बाजार देगा वहीं हमें लेना है और उसी कीमत पर लेना है। कोई मोलभाव, आनकानी नहीं। देखिए कि हमारे कितने शहरों में माल रोड है, सोचिए कि हमारे सारे शहरों में मॉल है। उन मॉल में किसी और का माल है और हम सिर्फ और सिर्फ ग्राहक हैं। हमारा अपना कोई ब्रांड नहीं। हमारे जुलाहों की मेहनत, कारीगरों की कारीगरी, रंगरेजों के रंग जैसा कुछ भी नहीं। सबसे बड़े बाजार का जो झुनझुना विश्व व्यापार व्यवस्था ने हमें पकड़ाया उसी को लेकर नाचते हुए हम मेड इन इंडिया तो कभी मेक इन इंडिया खेल रहे हैं।

कि कॉल सेंटरों में अपनी रातें काली करने वाली पीढ़ी ने सुनहरे दिन सोकर निकाल दिए।

ऊन को चखकर उसकी गुणवत्ता बताने वाली पीढियां पहाड़ों, पत्थरों, जंगलों और रेगिस्तानों में सिमट गई हैं। हमारे हिस्से में जो बचा है वह मॉल रोड है और मॉलों की भ्रमित करने वाली चकाचौंध और लुभाने वाले ब्रांड। हम इस बाजार के हरकारे हैं और शायद हमारे लिए लिखा गया  पता है माल रोड इंडिया।

Posted by: prithvi | 22/01/2017

ना लोहा न लुहार!

 लुहार
मेरील स्ट्रीप के संबोधन से निकली चिंताएं ओबामा के विदाई भाषण की भावुकता पर आकर ठहर गईं और सीरिया से लेकर फलस्तीन व कालेधन से लेकर भ्रष्टाचार तक की सारी परेशानियां कमबख्त यह नया साल भी अपने झोले में  लिए चला आया है। जिन लोगों ने ताउम्र जमीनों का धंधा किया उन्हें खेतों की रखवाली दे दी गई और अपने हिस्से की लड़ाइयां हार चुके हमारी क्रांतियों के अगुवा हैं। आप कहते हैं गुजरा साल अच्छा था!  आपके इस भोलेपन के सदके। और सारी शुभकामनाएं सर माथे पर। लेकिन अगर लोकतंत्र में सिर गिना करते हैं तो बता दें कि शिकागो, लास एं‍जलिस व वाशिंगटन जैसे शहरों में महिलाओं की अगुवाई में जुटी भीड़ कैपिटल हिल में आए लोगों से कम तो हरगिज नहीं थी।

कि विश्‍वग्राम और वैश्‍वीकरण के अश्‍वों को बांधने के लिए आप संरक्षणवाद की जिन सांकलों पर भरोसा कर रहे हैं उन्‍हें बनाने वाले लुहार तो किसी तीसरे देश में बैठते हैं। आपके पास न तो लोहा है न लुहार। जिन दीवारों को चुनने का आपका सपना है उसके लिए ईंट, गारा देने वाली हकीकती जमीन भी आपके पास नहीं है।फिर ये घुड़की घमंड कैसा?

खैर, किसी सयाने ने कहा है कि बारिशें और कुछ नहीं, बस बूंदों को सहेजने की कला है। यह कला जल के प्रति आदर और संस्‍कारों से ही आ सकती है। हमारे फ्रीजरों में जमा हुआ पानी, पहाड़ पर बिछ गई बर्फ का मुकाबला नहीं कर सकता।  बस इतनी सी बात है।

बचपन में माटी खाने वाले बच्चे, आंखों से जुड़े दरिया में नमकीन पानी भरकर पत्थरों के शहर चले जाते हैं। कि नन्हें पैरों में चुभ गए बड़े कांटों का दर्द इतनी जल्दी नहीं जाता और मेरी सारी पसंदीदा खुश्बुओं के बरक्स वह किताबों की महक रख देती है। नहीं नहीं करते हुए भी कहना चाहता हूं कि किताबों की मंडियों के चकाचौंध भरे समाचार इस दर्द व निराशा को कम नहीं कर पाते। बिलकुल सही कि कोई बजरी की खेती नहीं करता फिर वक्त की हमारी मंडियां पत्थरों से क्यूं भरी हैं? बताओ तो!
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(Painting horizon of hope by laura harris curtsy net)

Posted by: prithvi | 22/12/2016

आज भी खरी-खरी

तालाबआज भी खरे हैं तालाब.. कोई धांसू नहीं बल्कि एक सहज, सरल किताब है. उतनी ही प्रवाहमान जितना की जीवन और जल. इसकी सहजता और प्रवाह ही इसे अनूठा बनाता है. हमारी भाषा में बहुत कम किताबें ही इतनी सरल हो सहज होती हैं. किताब जो जल जैसे जीवन तत्‍व के बारे में सोचने को मजबूर करे. जीवन में जल का महत्‍व है, वह पांच मूल तत्‍वों में है.. बिन पानी सब सून. जल, थल व नभ की सोचने वालों पाठकों के लिए यह अद्भुत, कालजयी पुस्‍तक है.

यह विडंबना है कि कभी जरूरत तो कभी विकास के नाम पर हमने उपलब्‍ध संसाधनों और अमूल्‍य विरासत का सत्‍यानाश कर दिया. उनका कोई विकल्‍प भी हम पेश नहीं कर सके. जीवन से जोहड़ पायतन ही नहीं सिकुड़े, उनसे जुडा एक भरा पूरा समाज गायब हो गया. हमने कभी नहीं सोचा उसके बारे में. कहते हैं कि विकास का कोई विकल्‍प नहीं होता. इस किताब को पढते हुए लगता है कि नासमझी और भेड़चाल का विकास हमें विकल्‍पहीनता की स्थिति में ले जाएगा. अमृता प्रीतम ने कहीं लिखा है कि अकाल सिर्फ खेत खलिहानों में नहीं पड़ते वे कहीं न कहीं हमारे दिल दिमाग में भी तो होते हैं. यह किताब सिर्फ मौसमी अकाल की बात नहीं करती, इतर सूखेपन पर भी टिप्‍पणी करती है, किसी गुरबत की तरह.
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सैकड़ों, हजारों तालाब अचानक शून्‍य से प्रकट नहीं हुए थे. इनके पीछे एक इकाई थी बनवाने वालों की, तो दहाई थी बनाने वालों की. यह इकाई, दहाई मिलकर सैकड़ा हजार बनती थी.पिछले दो सौ बरसों में नए किस्‍म की थोड़ी सी पढाई पढ गए समाज ने इस इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार को शून्‍य बना दिया.
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अभिव्‍यक्ति पर सुरेंद्र बंसल ने इस विरली पुस्‍तक की समीक्षा में लिखा है कि बहुत कम किताबें ही पाठकों को कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में तराशती हैं। अपनी प्रसन्न जल जैसी शैली तथा देश के जल स्रोतों के मर्म को दर्शाती एक पुस्तक ने भी देश को हज़ारों कर्मठ कार्यकर्ता दिए हैं।

वे कहते हैं कि अपने देश में बेजोड़ सुंदर तालाबों की कैसी भव्य परंपरा थी जिसका यह पुस्तक उसका पूरा दर्शन कराती है। तालाब बनाने की विधियों के साथ-साथ अनुपम जी की लेखनी उन गुमनाम नायकों को भी अंधेरे कोनों से ढूँढ़ लाती है, जो विकास के नए पैमानों के कारण बिसरा दिए गए हैं। पुस्तक के पहले संस्करण के बाद देशभर में पहली बार अपने प्राचीन जल स्रोतों को बचाने की बहस चली, लोगों ने जगह-जगह बुजुर्गों की तरह बिखरे तालाबों की सुध लेनी शुरू की। इसकी गाथा बेशक लंबी है, लेकिन फिर भी देखने का प्रयास करते हैं।

मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेंद्र सिंह बताते हैं कि राजस्थान की उनकी संस्था तरुण भारत संघ के पानी बचाने के बड़े काम को सफल बनाने में इस पुस्तक का बहुत बड़ा हाथ है। मध्यप्रदेश के सागर जिले के कलेक्टर बी. आर. नायडू, जिन्हें हिंदी भी ठीक से नहीं आती थी, पुस्तक पढ़ने के बाद इतना प्रभावित हुए कि जगह-जगह लोगों से कहते फिरे, ‘अपने तालाब बचाओ, तालाब बचाओ, प्रशासन आज नहीं तो कल अवश्य चेतेगा।’ मध्यप्रदेश के ही सीधी और दमोह के कलेक्टरों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में इस पुस्तक की सौ-सौ प्रतियाँ बाँटी। जुलाई 1993 के बाद से इस किताब के विभिन्‍न प्रकाशकों और भाषाओं से अनेक संस्‍करण प्रकाशित हो चुके हैं.

गुजरात से लेकर उत्‍तरांचल, कर्नाटक, पंजाब, बंगाल व महाराष्‍ट्र .. देश के हर राज्‍य हिस्‍से में जल, जमीन से जुडे आंदोलनों में इस किताब की महत्‍ती भूमिका रही है. सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ साथ सरकारी अधिकारियों व संत महात्‍माओं ने इस पुस्‍तक को केंद्र में रखकर अनेक पहल कीं जिनका सांगोपांग असर क्षेत्र विशेष के जनजीवन पर दिखा. यह पुस्तक फ्रांस की एक लिखिका एनीमोंतो के हाथ लगी। एनीमोंतो ने इसे दक्षिण अफ्रीकी रेगिस्तानी क्षेत्रों में पानी के लिए तड़पते लोगों के लिए उपयोगी समझा। फिर उन्होंने इसका फ्रेंच अनुवाद किया।

अनुपमबंसल बताते हैं कि अनेक संस्‍थाएं इस किताब को प्रकाशित कर बांट चुकी हैं. देशभर के १६ रेडियो स्टेशन पुस्तक को धारावाहिक रूप में ब्रॉडकास्ट कर चुके हैं। कपार्ट की सुहासिनी मुले ने इस पुस्तक पर बीस मिनट की फ़िल्म भी बनाई है। सीमा राणा की बनाई फिल्म दूरदर्शन पर आठ बार प्रसारित हो चुकी है। भोपाल के शब्बीर कादरी ने पुस्तक का उर्दू अनुवाद किया और मध्यप्रदेश के मदरसों में मुफ्त में बाँटी। उर्दू तथा पंजाबी अनुवाद पाकिस्तान भी पहुँच चुके है। गुजरात की एक संस्था ‘समभाव’ के फरहाद कांट्रैक्टर पर इस पुस्तक का गहरा प्रभाव पड़ा।

सदियों से ऐसी मान्यता है कि मनुष्य जाति का विकास मीठे जल-स्रोतों के मुहानों पर ही हुआ। जीवन के राग-विराग मनुष्य ने वहीं पर सीखे, लेकिन विकास की अंधी होड़ में मनुष्य के चारों ओर अंधेरा बढ़ता जा रहा है। इस अंधेरे की बाती को हम सब तथा हमारी तरह-तरह की नीतियाँ-प्रणालियाँ दिन-ब-दिन बुझाने की कोशिश में लगी हुई हैं। ‘आज भी खरे हैं तालाब’ पुस्तक न केवल धरती का, बल्कि मन-माथे का अकाल भी दूर करती है।

(इस समीक्षा में बाद के अंश अभिव्‍यक्ति http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2008/aajbhi.htm में सुरेंद्र बंसल के हैं. कांकड़ ने साभार लिए हैं.)

Posted by: prithvi | 20/11/2016

धूप के नोट!

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जिंदगी कभी अपने नोट नहीं बदलती और सफलता के बाजारों में अब भी मेहनत के सिक्के चलते हैं। यारियां खरीदने निकले सौदागर सारी दौलतें लुटाकर खाली हाथ लौटे तो पाया कि मोहब्बत के खजाने की कोई चौकीदारी नहीं करता। नोटबंदी? नहीं, इस सदी का सबसे बड़ा संकट यह है कि ठट्ठाकर हंस सकने वाली रोशन महफिलें और बुक्का फाड़कर रो सकने वाले अंधेरे कोने लगातार कम हुए हैं।

कि मुहब्बत कारोबार नहीं करती और नफरत भरे बाजार बिक जाती है।

वक्त के रोजानमचे में नीली स्याही से यह बयान जाते हुए काती (कार्तिक) ने दर्ज कराया था। शाम को लिखी पंक्तियों को सुबह नहीं पढ़ना चाहिए, कि उनमें ज्यादातर उदासियों की कलम होती हैं। सयानों की इसी बात को मानते हुए मिंगसर (मार्गशीर्ष) ने शायद लागबुक पढ़ने के बजाय सिस्टम पर सिया का नेवर गिव अप सुनना ज्यादा ठीक समझा। उसे यही ज्यादा फायदे का सौदा लगा।

उसने खुद देखा, कि सपनों के खनकते सिक्कों को उम्मीदों की मुट्टी में भरकर घरों से भाग आई एक पीढ़ी दिन में लोगों को क्रेडिट कार्ड बेचती है और रात में उन स्वाइप मशीनों के ख्वाब देखती है जो उसकी कमाई के बदले थोड़े से सुकून की पर्चियां छापेंगी। कहते हैं कि छुट्टियों में घर आए अपने बेटे को नींद में यस सर, नो सर, प्लीज सर बड़बड़ाते सुन गांव की रात रो पड़ी।

कि कौन था जो सपनों के बदले अपनी नींद दांव पर लगा आया।
कि उसके खाते में किन नाशुक्रों ने बेचैनियों का फिक्स डिपाजिट करवा दिया और नवंबर की इन नम सुबहों में मुंह पर स्कार्फ बांध कमरों से निकलने वाली लड़कियां किन कर्जों का ब्याज चुकाती हैं।

दोस्त, कहने को यह बात इस डिस्कलेमर के साथ खत्म की जा सकती है कि इसका किसी वक्त, बेवक्त हुई सच्ची झूठी घटना से कोई लेना देना नहीं है। लेकिन बताना चाहता हूं कि कई साल बाद जिंदगी में चाय की गर्माहट सर्दियों से पहले लौट आई है। हां बदलाव बस लोटे-बाटी की जगह एक बड़े से मग का होना है। और एक कमबख्त धूप है जो नोटबंदी की परवाह किए बिना इन दिनों बेसमेंट वाले उस टेबल पर आ बैठती है जहां सुबह लॉगइन करती है। कुछ कह भी नहीं सकते क्योंकि सर्दियों के बाजार में आज भी धूप के नोट चलते हैं!

तुम बस इस शनिवार की शाम एमी विर्क को सुनना! 

(photo curtsy net)

Posted by: prithvi | 27/04/2016

कोमोरेबी तेरा नाम

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|अपने खेत में पक आए गेहूं से सुनहरा व मादक कुछ नहीं होता.

दिनों के पास ऐसी कोई कुल्हाड़ी नहीं है जो रातों को एक बिलांत छोटा कर दे और रातों के झोले की कोई आरी दिनों से दुपहरों को काट कर अलग नहीं कर सकती. जीना यूं ही होता है.. सुबह, दुपहरी, शाम और रात. बताते हैं कि प्रकृति को किसी तरह की कतरब्योंत पसंद नहीं थी इसलिए उसने काम खत्म होने के बाद सारे कारीगरों के कान में फूंक मार दी कि वे आला दर्जे के दर्जी हैं. पेरिस में हुए जलवायु समझौते का ब्यौरा अखबार में 12वें पन्ने पर छपा है. पढ़ लो, मैं तो बस ये कह रहा हूं कि वैशाख के बाद जेठ आएगा. देख लेना!

दूसरी बात, दूसरी बात यह कि अपने खेत में पक आए गेहूं से सुनहरा व मादक कुछ नहीं होता. कि आंधियों के हरावल दस्ते फिर मेरे देस की माटी से जूझने आ रहे हैं लेकिन अभी उन्हें वैशाख के बाकी बचे कुछ दिनों तक इंतजार करना होगा. क्योंकि यही दिन हैं जब हम खेतों की मादक खूशबू को ढलती, चांदनी भरी रातों में तूड़ी (चारे) के रूप में बैलगाड़ियों, ट्रालियों में भरकर घर ले आते हैं. यह खुशबू किसी साळ (कमरे) या कुप्प में बंधी और नशीली होती जाती और पशुधन का साल भर काम चल जाता.

देर रात मैसेंजर पर एक दोस्त बताता है कि वह खेत से तूड़ी ढो रहा है. यानी दोस्त लोग हाड़ी (रबी) की बची खुची खुशबू को घर ला रहे हैं. कि कणक निकाल ली गई है, हाड़ी का काम सिमटने वाला है. चने के बाद ग्वार-ग्वारी भी आ रही है. एक फसल पककर सही सलामत खेतों से खलिहानों, खलिहानों से घरों या मंडियों तक पहुंच जाए खेती बाड़ी करने वाले के लिए इससे बड़ा उत्सव क्या हो सकता है? तो यह उत्सव का समय है.

देश का एक बड़ा हिस्सा जब पीने के पानी के लिए जद्दोजहद कर रहा है और जलवायु परिवर्तन को लेकर सौदेबाजी लगभग सिरे चढ़ चुकी तो इस साल अच्छी बारिशों के अनुमानों से भरे खत खेतों को भेजे जा रहे हैं. मुझे कोमोरेबी शब्द याद आता है. कोमोरेबी… जापान में पेड़ों की घनी पत्तियों से छनकर आने वाली सूरज की रोशनी को कोमोरेबी कहा जाता है. मैं बारिशों से भरी इन्हीं उम्मीदों को कोमोरेबी नाम देता हूं. कि धूप तो हमें विरासत में मिली है, मेरे खेतों को इन बारिशों की जरूरत होगी.

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[sunlight pic curtsy net]

हमें अपने बच्चों को नसीब की सीढियों का भ्रम नहीं मेहनत के मजबूत पांव देने चाहिएं
कि थार की माटी में दबा दिए गए तरबूजों तक कोई हिम्मती ही पहुंच पाता है.

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कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है: धूमिल

आज जब भी कविता की बात होती है तो दो बड़े सवाल हमेशा सामने आते हैं. प्रकाशक वर्ग कहता है कि कविताएं (वह भी खरीदकर) कौन पढ़ता है;  तो आलोचकों की घोषणा रहती है कि अच्छी कविताएं अब लिखी ही नहीं जातीं. इस लिहाज से देखा जाए तो अभिव्यक्ति और लेखन की यह सक्षम व सुंदर विधा कड़े समकालीन सवालों का सामना कर रही है. कविता के लिए इस संकट को इंटरनेट, सोशल मीडिया व व्हाट्सएप जैसे मैसेजिंग मंचों ने और भी गहरा दिया है जहां कविता के नाम पर थोक के भाव में अधपकी पंक्तियां पाठकों तक पहुंच रही हैं.

लेकिन कविता के मंच पर सबकुछ निराशाजनक भी नहीं हैं. अपने इर्द गिर्द कंटीले सवालों के बावजूद पठनीय और संभावनाओं के नए क्षितिज बुनती कविताएं लिखीं जा रही हैं, छप रही हैं और लोग खरीदकर पढ़ते भी हैं. जितेंद्र कुमार सोनी के राजस्थानी कविता संग्रह ‘रणखार’ की कविताएं भी इसी श्रेणी की हैं. यहां कविता के सामने खड़े हुए एक बड़े सवाल की बात भी करनी प्रासंगिक होगी कि कविता क्या है. कवि चिंतक रामस्वरूप किसान यहां मुक्तिबोध, अरस्तू व धूमिल के विचारों को एक सूत्र में पिरोते हुए कहते हैं कि कविता का समाज से जुड़ाव ही उसे कविता बनाता है. नहीं तो वह रचना और कुछ हो सकती है, कविता तो कतई नहीं. इस खांचे से देखा जाए तो जितेंद्र सोनी की रचनाएं सुखद आश्चर्य की तरह खुद को कविताएं साबित करती हैं.

बड़ी बात यह है कि जितेंद्र सोनी कवि होने से पहले एक सच्चा इंसान होने की शर्तें पूरी करते हैं. ये शर्तें उनकी कविताओं में प्याज के छिलके की तरह परत दर परत उघड़ती जाती हैं. सोनी का यह कविता संग्रह उनके मानव होने का प्रमाण है: रामस्वतरूप किसान

एसिड अटैक
तुम्हारे खातिर एक खबर
फेंकने वाले के लिए एक बदला
पर मेरे लिए
एक त्रासदी है.

जितेंद्र सोनी की कविताओं में मानव रचित और प्राकृतिक.. अनेक विपदाओं पर टीका टिप्पणी है.  वे थार की सांस सुखा देने वाली लुओं के बरक्स् जीवटता को खड़ा कर बताते हैं कि माटी के इस समंदर में परेशानियों की मोटे तनों से मजबूत तो उम्मीदों की कुल्‍हाड़ी है जो उन्‍हें काटती जाती है. वे कहते हैं कि क्रांति की मशालें खाली पेट वाले नंगे पैर लेकर निकलते हैं. कि इंकलाब का पहला और आखिरी नारा इसी वर्ग से लगता है. उनकी कविताएं हरसिंगार, गेंदे, कनेर और गुड़हल के फूलों से गुजर हमारे आंगन में उतर आई धूप की बात करती हैं. वे बताते चलते हैं कि वैश्वीकरण जैसे तमाम नये शब्दों के हमारे शब्दकोषों में शामिल होने के बावजूद सर्वहारा व समाजवाद जैसे शब्दों की प्रासंगिकता खत्म नहीं हुई है.

जितेंद्र सोनी की कविताओं में बचपना है, बचपन है, पलायन है, धारावी है, एकांत है.. और सबसे बड़ी बात उनमें हमारे आसपास का लोक है. इस दौर में जबकि अंग्रेजी बोलना व अंग्रेजी में लिखना ही सफलता का पर्याय मान लिया गया है कितने लोग अपनी भाषा बोली में लिखते हैं. आईएएस जितेंद्र सोनी को इस बात के लिए भी सराहा जाना चाहिए कि उन्होंने कविताओं के लिए मातृभाषा राजस्थानी को चुना है. इस तरह से उन्हों ने एक तरह से अपनी रचनाओं को एक पाठक व इलाके तक सीमित रखने का जोखिम उठाने का साहस दिखाया है. जैसा कि रामस्वरूप किसान ने आमुख में लिखा है कि जितेंद्र सोनी का लोक से जुड़ाव राजस्थानी कविता में बड़ी संभावना जगाता है.

पानी-
थार में
एक सवाल है
पीढियों से

पानी-
बर्फ ही बर्फ होने  के बाद
एक चुनौती है
साइबेरिया जैसे इलाकों में.

आप ग्लोब पर कहीं भी
अंगुली तो रखो
सभी रिश्तों से पहले
मिलेगा
पानी का रिश्ता.

*****
[भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी जितेंद्र कुमार सोनी के राजस्थानी कविता संग्रह ‘रणखार’ को जयपुर के बोधि प्रकाशन ने प्रकाशित किया है. इसे यहां से भी खरीदा जा सकता है.]

shoodra by tribhuvuan

हम शूद्र थे
इसलिए न किसी ने हमारी
रामायण लिखी
न लिखा गया कोई महाभारत।

मेहरानगढ़ का किला जोधपुर ही नहीं समूचे राजस्‍थान की शान मान जाता है। यह अद्भुत ऐतिहासिक दुर्ग है। दुर्ग निर्माण कला के अद्वितीय उदाहरणों में से एक। जोधपुर जाने वाले पर्यटक इसे देखे बिना नहीं लौटते। लेकिन हम अगर यहां इस तथ्‍य का जिक्र कर दें कि जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग के निर्माण में पहली ईंट की जगह एक शूद्र को जीवित चिना गया था तो शायद इस किले को देखने को हमारा सारा नजरिया ही बदल जाए। यह छोटी सी घटना है। हमारा इतिहास इस तरह की ‘छोटी छोटी’ घटनाओं से भरा है। इन दबा दी गई घटनाओं को इतिहास में (भले ही क्षेपक की तरह) जोड़कर पढ़ा जाए तो सारा एतिहासिक परिदश्‍य ही बदल जाएगा। वर्तमान के तमाम महल मालों, अट्टालिकाओं, दुर्गों को देखने की हमारी सोच बदल जाएगी।

त्रिभुवन के नये कविता संग्रह ‘शूद्र’ की यही खासियत है। यह इतिहास, समाज और काल में शूद्रों के योगदान को सामने रखती है और उनके अवदान का लेखा जोखा मांगती है। दरअसल शूद्र कोई बड़ा कविता संग्रह नहीं बल्कि एक लं‍बी कविता का विस्‍तार भर है जिसकी शुरुआत बरसों पहले हुई थी। बीते लगभग दो दशकों में त्रिभुवन ने इस कविता को कई तरह से मांजा और अपडेट किया है। इस कविता की शुरुआत एक लोमहर्षक घटना से है कि कस प्रकार जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग के निर्माण में पहली ईंट की जगह एक शूद्र को जीवित चिना गया!

दरअसल शूद्र एक शब्‍द भर नहीं है. वह हमारे समाज और इतिहास का ऐसा हिस्‍सा है है जिसे शिकारियों की शौर्यगाथाएं सुना सुना कर शिकार होते रहने को बाध्‍य किया गया. उन्‍हें कभी लगने नहीं दिया गया कि वे नींव से निकलकर कंगूरे तक पहुंच सकते हैं.  त्रिभुवन का नया कविता संग्रह शूद्र इन्‍हीं तमाम विद्रूपताओं पर रोशनी डालता है। यह किसी शूद्र के व्‍यक्तिगत अनुभवों का ब्‍यौरा नहीं है बल्कि देश समाज के निर्माण में शूद्रों के योगदान का एतिहासिक आख्‍यान है। त्रिभुवन का कहना है कि उन्‍होंने इस काव्‍य किताब में भारतीय समाज के निर्माण और सृजन में वंचित वर्ग के योगदान को आधार बनाया है। दलित चेतना को झकझोरती यह लंबी कविता अपना मुख्य फोकस इस वर्ग पर हुए अत्याचारों और उत्पीड़न के साथ-साथ बात पर करती है कि इस वर्ग का भारतीय समाज के निर्माण और विकास में कितने युगों से कैसा ऐतिहासिक और अन्य वर्गों से अलग तरह का जमीनी योगदान रहा है।

उन्‍होंने इस पुस्तक के आखिर में एक नया शोध भी प्रस्तुत किया है, जिसमें यह बताया गया है कि किस तरह हमारे समाज के क्रांतिकारी युवाओं को अभिशप्त करके हजारों साल पहले व्यवस्था के संचालकों ने शूद्र बनने पर विवश किया। इस देश ने हजारों साल की जिस गुलामी को भोगा, शायद वह सब इसी तरह के नतीजों का प्रतिफल था।

समालोचक व कवि असद जैदी ने अपने पूर्वकथन में लिखा है कि त्रिभुवन की काव्‍य रचना शूद्र कविता के झीने आवरण में एक सभ्‍यतापरक आख्‍यान है;  साथ ही हमारे वर्तना की सर्वांगीण आलोचना भी.

“जिस समाज में सारी रचना बेसमेंट में हुई हो, उसमें ऊपर की मंज़िलों में स्थापित श्रेष्ठिजन के विमर्श में वह बेसमेंट अनुपस्थित रहता है। उनके योगदान को, उनके विद्रोह और क्रांतियों तक को, स्मृतियों से गायब कर दिया जाता है। त्रिभुवन की यह कविता इस विशाल धरोहर की रिकवरी का काम बड़ी प्रश्नाकुलता, विवेकशीलता और नैतिक दृढ़ता से करती है।”

समाज संस्‍कृति के निर्माण में शूद्रों के योगदान का जिक्र करते हुए त्रिभुवन लिखते हैं-

कि शूद्र थे तो ऋचाएं थीं
शूद्र थे तो कंडिकाएं थीं
शूद्र थे तो सूत्र थे
शूद्र थे तो भजन थे
शूद्र थे तो कामडिए थे
शूद्र थे तो बाबा रामापीर थे
शूद्र थे तो बुद्ध बुद्ध थे
और गांधी गांधी थे।

लेकिन विद्रूपता यह रही कि:  

हम शूद्र थे
इसलिए पंचायतें और
पालिकाएं हमारी नहीं।
विधानसभाएं और संसद हमारी नहीं।
बाबा साहब ने रचना
लेकिन संविधान हमारा नहीं।

और वे आगाह करते हैं:

शूद्र न होते तो
कौन मरे पशु उठाता
कौन उनका चमड़ा उतारता
कौन दुनिया के पांव धूप से बचाता
कौन जूते बनाता
शूद्र न होते तो
हिंदुस्‍तान की पगथलियां जल जातीं।

और अंतत: वे उम्‍मीद करते हैं:

शूद्रों के लिए
इस अंधेरी रात का जादू टूटेगा
सुनहरा सूर्योदय फूटेगा।

फेसबुक, ट्वीटर व व्‍हाटसएप्‍प जैसे आनलाइन मंचों के इस दौर में जब ‘खोदा और ले भागे’ को रचनाधर्मिता में सफलता का सूत्र मान लिया गया है कौन अपनी कविता के परिपक्‍व होकर छपने के लिए लगभग बीस साल का धैर्य रखता है (किसान के अलावा)? त्रिभुवन के लेखन में यह गंभीरता व धैर्य दिखता है। पहले कविता संग्रह ‘कुछ इस तरह आना’ में त्रिभुवन ने अपनी भाषा शैली से चमत्‍कृत किया और शब्‍दों की आकाशगंगा में अपने प्रभावी दखल से पाठकों को रूबरू कराया। वहीं इस नये संग्रह में वे अपनी समाजशास्‍त्रीय निगाह, इतिहास व मिथक के ज्ञान तथा दार्शनिक गहराई से हतप्रभ करते हैं। पुस्‍तक के आमुख में त्रिभुवन ने अपने जीवन की जिन चार महिलाओं का आभार व्‍यक्‍त किया है उनमें समाज के वंचित तबके की केसरदेवी मेघवाल भी हैं जो उनकी धाय मां रहीं। सच को इस तरह स्‍वीकारना और व्‍यक्‍त कर देना ही त्रिभुवन की कविता व लेखनकर्म को विशिष्‍ट बनाता है।

*****
शूद्र कविता संग्रह को अंतिका प्रकाशन ने छापा है। इसकी कीमत 235/- रुपए है। अमेजॉन इंडिया पर इसे यहां खरीदा जा सकता है। त्रिभुवन के पहले काव्‍य संग्रह के बारे में यहां पढ़ें। त्रिभुवन से फेसबुक पर यहां संपर्क किया जा सकता है।

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अपने खेत के गन्नों से बने गुड़ की मिठास और अपने आंगन में तारों की छांव में सोने का सुख अलग ही होता है.

चौमासा खत्म हो गया है और कार्तिक हल्की सर्दी के साथ हमारे आंगन में उतर रहा है. आकाश में तारों की म​हफिल जमी है. दिन की गर्मी शायद सुस्ता कर सो गई है और मौसम के मैदान में सर्दी के बच्चों का कब्जा है. थार में रातें अचानक ही सर्द हो जाती हैं. तापमान तेजी से गिरता है. पास की चारपाई पर बच्चे एक दूसरे से गुंथे सो रहे हैं. पायताने पड़ी रजाई उन्हें ओढा देता हूं.

एक से ज्यादा समय तो हो ही गया होगा. मोबाइल पर चलती ‘द व्सिलब्लोअर‘ को रोककर हैडफोन उतारता हूं. मोबाइल की स्क्रीन बताती है कि रात के डेढ बजा चाहते हैं. बाहर बाखळ (बाहरी आंगन) में तारों से छिटकी हल्की रोशनी है. घड़ों का पानी बहुत ठंडा है इसलिए डिग्गी पर नलके से गिलास भरता हूं.

कभी नरमे कपास की बेल्ट रहा यह इलाका गवारी या गवार के दम पर अपने अस्तित्व को बचाए रखने की कोशिश कर रहा है. भारी मुनाफे वाली नरमे कपास की फसल अब लगभग नहीं है. बढ़ते खर्च और घटते पानी और उत्पादकता के बीच किसानों ने गवारी के विकल्प को चुना है पर वह भी दूर तक साथ चलता नजर नहीं आ रहा. भाव नहीं हैं और उत्पादकता भी कम. हरित क्रांति के गीत गाने वालों तथा दूसरी हरित क्रांति का आह्वान करने वालों को इस संकट को बांचना चाहिए कि खेती किस तेजी से घाटे का सौदा हुई है और क्यूं हुई है?

गोबर लिपा आंगन पगथलियों को भीगा सा लगता है. चारपाई पर लौटता हूं तो रजाई की उपरी सतह से नमी हथेलियों पर उतर आती है. बहुत साल बाद खुले आंगन में सोया हूं और आकाश की गंगा, मंदाकिनी कहीं दूर मुस्कुराती दिखती है. उसकी मुस्कुराहट के सदके, अपनी पसंदीदा अदाकारा रेशल वेइज और मोनिका बेलुची को एक साथ एक ही फिल्म में देखने को कल तक के लिए टाल देता हूं. मृत्युंजय की एक बात याद आती है- निद्रा और वचन कभी अधूरे नहीं रहने चाहिए. 🙂

Posted by: prithvi | 26/06/2015

सूखी हुई लूणी

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थार में हम नमक को लूण/नूण कहते हैं. इसी से लूणी यानी नमकीन शब्‍द बना है जिस नाम की एक नदी कभी अजमेर, बाड़मेर, जालोर, जोधपुर नागौर, पाली व सिरोही जिलों को सरसब्‍ज करते हुए बहती थी.

दरअसल अजमेर के निकट अरावली पर्वतमाला के बर-ब्यावर के पहाड़ों से निकल यह नदी बिलाड़ा, लूणी, सिवाणा, कोटड़ी-करमावास व सिणधरी होते हुए पाकिस्तान की सीमा के पास स्थित राड़धरा तक बहती जाती. और कच्‍छ के रण में मिलने से पहले मारवाड़ के कई गांवों कस्‍बों को छूते हुए निकलती. इसका एक किनारा बाड़मेर के बालोतरा कस्‍बे को छूते हुए निकलता है. अगर हम मोकळसर, गढ सीवाणा व आसोतरा से होते हुए बालोतरा आएं तो एक पुराना सा पुल है. इसके किनारे पर मंदिर है. मंदिर के किनारे हाथियों की दो उंची प्रतिमाएं हैं. कहते हैं कि लूणी के स्‍वर्णकाल में ये हाथी पूरे के पूरे डूब जाते थे और उसका पानी कस्‍बे के बाजार तक अपने लूणी निशान छोड़ जाता था.

लेकिन यह ‘वे दिन वे बातें’ जैसा है. अब तो लूणी में पानी ही आए बरसों बरस हो गए हैं. मारवाड़ के एक बड़े इलाकों की प्‍यास बुझाने वाली लूणी नदी दशकों से प्‍यासी है. मारवाड़ की यह मरूगंगा अब सूख चुकी है और इसके तल में जम गए नमक को जेठ आषाढ की दुप‍हरियों में दूर से ही चमकते हुए देखा जा सकता है.

लूणी नदी की गहराई भले ही न हो लेकिन इसका बहाव क्षेत्र बहुत व्‍यापक रहा है. सवा पांच सौ किलोमीटर से ज्‍यादा दूरी नापने वाला लूणी नदी का पानी आंकड़ों के लिहाज से 37,300 किलोमीटर से अधिक (प्रवाह) क्षेत्र को सींचता था. जोधपुर से पाली जाने वाली सड़क पर निकलें तो रोहेत से दायीं ओर वाली सड़क जालोर जाती है. यह जैतपुर, बस्‍सी, भाद्राजून, नींबला, आहोर व लेटा होकर जालोर पहुंचती है. लेकिन जालोर से बाहर से ही बागरा, बाकरा रोड़ स्‍टेशन, बिशनगढ, रमणिया, मोकळसर, गढ सीवाण, आसोतरा, बालोतरा व पचपदरा होते हुए वापस जोधपुर आएं तो एक साथ चार जिलों में घूमा जा सकता है. लगभग साढे चार सौ किलोमीटर की इस यात्रा में लूणी नदी, उसकी सहायक नदियां बार बार मिलती हैं. लेकिन सब की सब सूखीं.

कहते हैं कि लूणी मूल रूप से खारी नदी नहीं है. इसका पानी बालोतरा या इसके आसपास आकर ही खारा होता है. जब यह नदी बहती थी तो इसके दोनों ओर कई मीलों तक कुएं भर भर आते थे. लेकिन उन कुंओं में लूण की मोटी परतें जम चुकी हैं. लूणी का स्‍वर्णकाल अतिक्रमणों व औद्योगिक कचरे के नीचे दब गया है और लूणी बेसिन योजना मानों इतिहास के किसी डस्‍टबिन में फेंक दी गई है.

[फोटो इंटरनेट से साभार; लूणी नदी पर एक वीडियो का लिंक यहां देखें.]

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‘हमने युद्ध शुरू करने के लिए अंधेरा इसलिए चुना कि हलचल व पहचान को छुपाए हुए सुरक्षित रहें. ताकि हम बचे रहे संकटों से और अपने काम को निर्बाध करते रहें.’

अपने पसंदीदा लेखक की कहानियों की यह पंक्ति पढने के बाद किताब से नजरें हटाकर सामने देखता हूं कि सराय रोहिल्‍ला रेलवे स्‍टेशन की जिस ट्रेन पर सवार होना है, वह प्‍लेटफार्म पर लग चुकी है; हालांकि उसके रवाना होने में अभी घंटा भर है. रेल के डिब्‍बों के दरवाजे नहीं खुले हैं. सराय रोहिल्‍ला पर आमतौर पर दिल्‍ली के बाकी दो पुराने स्‍टेशनों की तरह भीड़ भाड़ या मारामारी नहीं रहती. इसलिए यह अच्‍छा लगता है.

खैर, वह ट्रेन जिस पर सवार होना है उसके काले शीशों वाले आरक्षित डिब्‍बे फुटओवर ब्रिज की सीढियों के पास लगे हैं. यात्रा शुरू होने से पहले की बैचेनी ट्रेन से लेकर प्‍लेटफार्म तक पसरी है. हल्‍की उमस के बीच यात्रीगण इधर उधर टहल रहे हैं. कि जिन यात्रियों की टिकट कन्‍फर्म नहीं हुई वे बेचैन हैं और टीटी का इंतजार कर रहे हैं. जिनकी टिकट कन्‍फर्म है वे और ज्‍यादा उतावले नजर आते हैं. तीन चार सज्‍जन को देखा जो बोर्ड पर टांगे चार्ट में अपना नाम देखने के बाद डिब्‍बे के बाहर चस्‍पां किए गए चार्ट पर नजर डालते हैं और अपना नाम दिखने के बाद मुंडी हिलाते हुए दूसरी ओर चले जाते हैं. वे पांचेक मिनट बाद फिर यही क्रम दोहराते हैं. वहीं कुछ भाई लोग तो एसी वाले डिब्‍बे के काले शीशों के भीतर देखने की कोशिश करते हैं मानों सीटों की जगह किसी ने  सिंहासन तो नहीं लगा दिए हों. अजब सी बेकली व बालसुलभ जिज्ञासा है.

इस क्रम से इतर देखता हूं तो ज्‍यादातर युवा व प्रौढ स्‍मार्टफोन पर स्‍मार्ट हुए जाते हैं. वे पांच या साढे पांच ईंच की टचस्‍क्रीन पर कुछ अंगुलियों की मदद से एक अलग आभासी दुनिया में पहुंचते हैं और वहां कुछ पल बिताकर फोन को जेब में रख लेते हैं; इधर उधर देखते हैं कि ज्‍यादातर बाकी लोगों की अंगुलियां भी टचस्‍क्रीन पर फिसल रही हैं तो फिर अपना फोन निकालते हैं और चमचमाती स्‍क्रीन के नीचे बसी दुनिया में खो जाते हैं. वास्‍तविकता की कठोर जमीन से दूर बसती यह आभासी दुनिया है. कहने को तो कहा जा सकता है कि चमकती स्‍क्रीनों के पीछे इक अंधेरी दुनिया है. इस तकनीक को लेकर हम जब तक मानसिक व तकनीकी स्‍तर पर विकसित होंगे तब तक तो यह हम जैसे हर इंसान का एक पहलू या आधा सच इसी दुनिया में बसता है. वरना क्‍या वजह है कि यह आभासी दुनिया अनेक तरह के फोल्‍डरनुमा कोठरियों में बंटी हैं जिनके लिए हम कठिन से कठिन पासवर्ड का ताला ढूंढते हैं.

खैर यह आषाढ की एक रात की बात है. रात जो गहरा रही है. चलने को आतुर रेल के सामने लोहे की बैंच पर बैठे हुए अपने प्‍यारे लेखक की कहानियों को पढना शुरू करता हूं और संगरूर का स्‍टेशन आने तक पूरा कर लेता हूं कि-

कभी कभी चुप्‍पी को
बोलना भी चाहिए
हर किसी के पास ऐसी तीन छुट्टियां
और बरसता हुआ मौसम हो जरूरी नहीं है
किसी के पास इतना वक्त नहीं है
कि वह इंतजार में बना रहे.

[किशोर चौधरी का नया कहानी संग्रह जादू भरी लड़की हिंदी युग्‍म प्रकाशन ने प्रकाशित किया है. आलेख की शुरुआती पंक्तियां व कविता उन्‍हीं की इस किताब से है. किताब यहां से मंगवाई जा सकती है.]

Posted by: prithvi | 25/04/2015

मील का पत्थर होना!

जिंदगी के दोस्तों को इस आभासी दुनिया में विदाई देने की अपनी रवायत नहीं है फिर भी इक बात कहूंगा- मील साब के जाने से अपने लिए उस शहर और इस पेशे में रहने की एक वजह और कम हो गई.

ramprakash-meel-journalistवैशाख की इक भरी दुप​हरी में जब आप अपनी कामकाजी स्क्रीन पर फसलों पर कहर बरपाती बारिश व ओलों की खबरों से विचलित हो रहे हों कि अचानक अशोक रोड की रेडलाइट पर समाचार मिले कि आपका भाइयों जैसा यार जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है. तो, मन करता है कि सर बायीं ओर खड़े इंडिया गेट की दीवार पर जाकर मारें और चिल्लाएं कि यह अच्छा नहीं हुआ.

इन दिनों जब खेत गेहूं, चने व सरसों की पकी फसलों से भरे हैं इतनी बुरी खबर कहां से और क्‍यूं आती है; कि ऐसी खबरें तो किसी भी मौसम में नहीं आनी चाहिएं. मील साब नहीं रहे यह सोचकर ही दिल बैठ जाता है. कहते हैं ना कि जिंदगी में हम हर किसी से मोहब्बत नहीं कर सकते. मोहब्बत का रिश्ता तो एकाध से होता है बाकी से तो बस हाय हल्लो होती है. मील साब से यही भाइयों वाली मोहब्बत थी. पिछली गर्मियों की ही तो बात है. बस तक छोड़ने मील साब ही आए थे. पानी की बोतल ली और पैसे देने लगा तो डपट दिया- छोटो भाई ह,  इसा काम ना करे कर.

यही बात किसी रामप्रकाश मील को मील साब बनाती रही. उन्होंने अपने हिस्‍से के आसमान की लड़ाई के लिए घरों से भाग आए हम जैसे कितने लड़कों को छोटा भाई बना अपने दिल और घर में जगह दी. उन्हें आगे बढाया और कभी इस बात की बड़ाई नहीं ली. अपनी व्यक्तिगत जिंदगी की लड़ाइयों के बीच वह हमेशा उन लोगों की जायज लड़ाइयों के लिए तैयार रहे जिनका उनसे कोई ‘रिश्ता’ नहीं था.

एक खांटी पत्रकार होने से पहले एक खांटी इंसान. जमीन से जुड़े लेकिन आसमान जितनी खुली सोच वाले. इधर का अनुभव यही कहता है कि अच्छा पत्रकार अच्छा इंसान नहीं होता और अच्छा इंसान इक अदद अच्छा पत्रकार नहीं बन पाता. मील साब इसके चुनींदा अपवादों में से एक थे. मेरे लिए वह हमेशा मानवीय चेहरे वाली पत्रकारिता का प्रतीक रहे. इस शहर का पत्रकारिता में भले ही कोई बड़ा नाम नहीं हो लेकिन वहां से कई अद्भुत पत्रकार निकले जिनमें मील साब शामिल हैं.

खबरों की समझ, मुद्दों पर पकड़ और एक व्यापक सुलझी सोच उन्हें कई कतारों से अलग करती गई. दरअसल मील साब उन ‘गिने चुने’ पत्रकारों में से एक रहे जो पत्रकारिता में ‘पेशे’ के लिए नहीं बल्कि ‘पैशन’ की वजह से आए थे. जिन्‍होंने पत्रकारिता में अपने कमाल को लगन व दिनरात की मेहनत से निखारा. जिनकी पत्रकारिता में निष्‍ठा थी. शायद यही कारण है कि जनसरोकारों से जुड़े किसी भी मुद्दे पर बेबाक रिपोर्टिंग करने से चूके नहीं. फिर मुद्दा चाहे किसी प्रशासनिक अधिकारी या व्यक्ति विशेष के​ खिलाफ रहा हो या किसी​ समाज के वंचित तबके या संघर्षरत किसान का रहा हो.

मील साब इस इलाके के उन गिने चुने पत्रकारों में थे जिनके साथ क्षेत्र की छोटी छोटी और दुनिया जहान की बड़ी घटनाओं पर घंटों चर्चा की जा सकती थी. आज उनके बारे में यह सब लिखना बहुत तकनीकी सी बातें लगती हैं. क्‍योंकि पत्रकारिता और जीवन के प्रति उनकी जीवटता मेरे लिए गूंगे के गुड़ सा है जिसे चाहकर भी बयान नहीं किया जा सकता. उनसे मिलकर हमेशा सोचता था कि कोई कैसे अपने पेशे से निष्‍ठा रखते हुए निजी जिंदगी की चुनौतियों को इतनी शिद्दत से टक्‍कर दे सकता है और मील साब ने मेरे लिए हमेशा यह साबित किया कि-

मील का पत्थर, पत्थर बन जमीन पर गड़ जाना भर नहीं होता,
बल्कि इक जिंदा रूह का माटी होना होता है.

और आज वह जिंदा रूह माटी होकर मील का पत्‍थर बन गई है. [गंगानगर के खांटी पत्रकार रामप्रकाश मील के निधन पर एक आलेख राजेश सिन्हा ने यहां लिखा है.]

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सूरज ढलने से पहले अस्त होना और रो लेना आंखें सूखने से पहले, बादलों से पहले बरस जाना, बह जाना हवा के आगे आगे.. बीजों सा बिखर जाना और उग आना पहले पौधों से, मरने से पहले जी लेना और मर जाना जीने से पहले .. जीवन की किसी दुपहरी में बड़ के नीचे बड़े बाबा ने इक कमबख्त को यह सीख दी थी. जो बाद वक्त किसी सर्च इंजिन में इसके मायने नहीं खोज पाया तो जोगी हो गया.

कहते हैं कि उस जोगी के कमंडल में कागज के पुर्जों पर लिखे और भी कई सवाल भरे थे. जैसे कि भौतिकी, स्टीफन हाकिंग के भविष्यवाणी के अनुसार खत्म क्यूं नहीं हो गई और भौतिकवाद, एक नये उपभोक्तावाद के रूप में सारे आदर्शों को रौंधता हुआ हमारे सामने आकर खड़ा क्यों हो गया है? कि बारिशें फागण चैत के महीनों में क्यों आती हैं जबकि खेत की गलियां जवान फसलों से लकदक हुई जाती हैं.

और तो और उस जोगी के शरीर पर जमी भभूत स्मार्टफोन से उड़े आते इन सवालों को छुपा नहीं पाती कि क्या क्रांतियां लोगों को ठगने/भ्रमाने का जरिया हो गई हैं? कि एक क्रांतिकारी, दूसरे क्रांतिकारी के पैरों के नीचे के जमीन खींचकर अपना कौनसा धरातल मजबूत कर रहा है. कि यह सारा भ्रम ही है जो हमेशा किसी अवतार के इंतजार में रहे इक समाज के सामने रचा जा रहा है. सब मिथ्या है, सुबह शाम लगने वाली भूख के सिवा?

बताते हैं कि इस जोगी ने दुनिया की किसी बड़ी अदालत में सारे सर्च इंजिनों के खिलाफ मामला दर्ज कराया कि उन्हें बंद कर दिया जाना चाहिए क्योंकि ऐसे जमीनी सवालों की खोज करने पर उनमें ‘इन्फोरमेशन नाट फाउंड’ का संदेश आता है. बल्कि ये सर्च इंजिन सुझाव देते हैं कि आप ‘दुनिया के दस श्रेष्ठ क्रांतिकारी’ या ‘साल 2014 के सबसे शक्तिशाली क्रांतिकारी’ पर सर्च करें. जोगी के अनुसार यह मूल प्रश्नों से भटकाने की बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चाल है क्योंकि सारे सर्च इंजिनों पर उन्हीं का कब्जा है.

इस जोगी को दिल्ली के रामलीला मैदान और कभी जंतर मंतर पर दायें वाली स्टालों पर अजीब से सवाल करते भी देखा गया. बताते हैं कि इस जोगी के कमंडल से एक बार कागज का एक पुर्जा निकलकर गिर गया जिस पर लाल स्याही में लिखा था-

हम लू, आंधी और सूखे के लिए बने,
कि बारिशें
हमारी किताबों के हाशिए पर नुक्तों की तरह दर्ज हैं.

Posted by: prithvi | 17/01/2015

चंबल की धारियां

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अपने समय से चार घंटे देरी से चलती ताज एक्सप्रेस आगरा से निकले के बाद ही एक्सप्रेस जैसी चलने लगी है. कुहरे के बंधन कमजोर हो रहे हैं और दूर आसमान में सूरज टंगा दिखता है. शायद धुंध का राज खत्म हो रहा है. जमीन से ऐसी नाड़ बंधी है कि पेड़ पौधे व झाड़ियां, जमीन, लोग देखकर ही अपनी माटी की खुशबू आ जाती है. लगा कि अपना देस है और धौलपुर के इलाके वाला बोर्ड लगा दिख गया. 
 
तो, अपनी अल्हड़ता से बहती चंबल के उपर से गुजर रहे हैं. पुल से चंबल कितनी सुंदर, प्यारी दिखती है. यह देश की सबसे निर्मल नदियों में से एक है. यानी मानवीय व औद्योगिक प्रदूषण से बची हुई. इसे देखकर हम अपने देश की नदियों पर संतोष व गर्व कर सकते हैं. कि यह किसी भी महानगर को छूती हुई नहीं निकलती. इसी पुल के खत्म होते ही चंबल की विश्व विख्यात घाटियां हैं. चंबल के दस्युओं की कहानियों में वर्णित और फिल्मों में दिखी तस्वीरों से कहीं अधिक सुंदर और लुभावनी. थार के धोरों यानी रेत के टीलों व अरावली की पहाड़ियों जितनी ही मनमोहक. किसी गिलहरी के शरीर पर लहराती धारियों सी. बांयी ओर की खिड़की से देखते हुए उर्वी कहती है— वॉव, क्या हम यहां घूम नहीं सकते. मैंने कहा क्यूं नहीं. दिन के उजाले में एक सीमा तक तो जा ही सकते हैं. 
 
शायद कभी चंबल की घाटियों की सफारी हो. आखिर पता तो चले कि 18 लाख हेक्टेयर में फैली यह प्रकृति की लीला अपने भीतर कितने रहस्य समेटे हैं. कितनी सुंदरता इनकी खंदकों में छुपी हुई है. ऐसा होगा यह निश्चित नहीं क्योंकि ग्वालियर में एक अंग्रेजी अखबार की खबर बताती है कि प्रदेश सरकार ने इन घाटियों को एकसार कर खेती करनी चाही है. सरकार उद्योगों के लिए इन मनोहारी घाटियों के ए​क हिस्से को समतल करने का काम पहले ही शुरू कर चुकी है. कितने देशों में इस तरह का विशिष्‍ट प्राकृतिक सौंदर्य है? जिन विविधिताओं को सहेजा जाना चाहिए हम सबसे पहले उन्‍हीं को निशाना बनाते हैं; पता नहीं विकास की कीमत हमेशा प्रकृति को ही क्यों चुकानी पड़ती है? 
 
शहर लौटता हूं तो हवाओं में नारे और दीवारों पर क्रांति के चमचमाते पोस्टर हैं. शहर में इन दिनों इतिहास की बुनियाद पर नया भविष्य बनाने वाले मिस्त्री करंडी, सूतली लेकर आए हुए हैं. वे खुद को स्वयंसिद्ध बताते हैं तो नए दिनों का दावा करने वालों के झोले में कुछ दिनों की कथित उपलब्धियों से भरे आधे अधूरे सर्टिफिकेट हैं. बड़े बुजुर्गों ने हमें तपती दुपहरियों व ढलती रातों में जिन चौराहों से बचने की सलाह दी थी जिंदगी की सड़क हमें वहीं पर ले आती है. कल तक जिन हाथों में देश के झंडे थे आज वही साफ सपाट डंडे लिए खड़े हैं. जिन्हें क्रांति का अगुवा कहा गया था वे जमीनी युद्ध मैदानों के भगौड़े साबित हुए. मीडिया हमारे चारों ओर अफवाहों और अर्धसत्यों का चक्रव्यूह रच रहा है और सयाने कह गए हैं कि आधा सच, झूठ से भी अधिक खतरनाक होता है. 
 
साबिर का शे’र है-
सूखी रेत समझ के राही डूब गए,
बाढ का पानी कैसी दलदल छोड़ गया.
*****
Posted by: prithvi | 05/11/2014

बर्फ कुछ भी नहीं

PGS

रोमानिया में जन्में माइकल क्रेतु ने एनिग्मा के गाने ‘बियांड द इनविजिबल’ को ब्रिटेन के एक जंगल में फिल्माया जहां आइस रिंक की बर्फ को जमाने में सात दिन लगे. इस गाने में लातवियन और जार्जियन गीतों के बोल हैं और इसका वीडियो फिनलैंड के एक आइस डांस युगल पर फिल्माया गया है. काले धन को लेकर जारी उबाऊ जुबानी जमाखर्च से उकताकर जब बालकनी में आया तो हवाओं के सिस्टम पर यह प्ले हो रहा था. कि अदृश्य की सीमाओं से परे किसी को कुछ छुपाना नहीं होता. कुछ भावों की वास्तविकता बंद आंखों से ही महसूस की जा सकती है.

सामने मानीटर के ठीक नीचे रखे पूजा गर्ग सिंह के कविता संग्रह को देखते हुए क्रेतु और उनके इस गाने का दर्शन बरबस याद आ जाता है. पन्नों पर की गई नोटिंग को पढता हूं तो लगता है कि क्रेतु और उनका दर्शन कितना मेल खाता है. क्योंकि ​कविता केवल शब्दों को विषय की किसी एक लड़ी में पिरो देना ही नहीं होता बल्कि वह कवि के दर्शन और सोच को लेकर भी आगे बढ़ती है. पूजा गर्ग सिंह की कविताएं कुछ ऐसी ही हैं. वे विषय की गहराइयों, उंचाइयों व विस्तार की कसौटी पर खरी उतरती हैं कि उनकी कविताओं में गिरती हुई बर्फ, उगता हुआ सूरज और ढलती हुई रातें हैं. वे मचलती लहरों व जलते हुए खेतों की बात करती हैं. उनकी कविताओं में दुनिया जहान का वह समसा‍मयिक विषय है जो एक कवि का विचलित करता है.

पूजा गर्ग सिंह अपने हिस्से की सर्दियों और हमारे गर्मी के मौसमों की बात करते हुए  अपनी हर व्यक्तिगत खुशी और दुख को इस व्यापक प्रकृति से जोड़कर देखती हैं. यही उनकी कविताओं को विशिष्ट बनाता है.

उनके शब्दों में कहूं तो तुम्हारे आसमान पर टंगा चांद मेरा वह सिक्का है जो मैं हर शुक्ल पक्ष में अंधेरों की बावड़ी में फेंकता हूं और जो फिर नहीं मिलता. या कि मेरे लिए रात का मतलब तुम्हारा घर आना है और मेरी रात कई दिनों से नहीं हुई है. कि बर्फ कुछ भी नहीं तुम्हारी यादों पर बिछी झूठ की सफेद मोटी चादर के सिवा. उनकी कविताओं में मुहब्बत किसी सुनसान राह पर झर गए पीले पत्‍तों सी है जिन्हें वक्त अल सुबह बुहारता है.

कि पूजा की कविताएं सिर्फ शब्दों का ताना बना नहीं है बल्कि अपने आप में एक दर्शन है. वे यूं ही छोटी छोटी बातों में बड़े सवाल उठा देती हैं कि क्यूं कुछ नदियों की मंजिल इक दरिया में जाकर खत्म हो जाती है और सीख देती हैं कि सभी दूरियों को नापने के लिए अंतरिक्ष के पैमानों की जरूरत नहीं होती. वे कहती हैं…

And let moments fall in my lap

like a poet’s  words

So full of themselves

And yet so empty!


 

[अमेरिका में रह रहीं पूजा गर्ग सिंह का कविता संग्रह ‘एवरीडे एंड सम अदर डेज’ आथर्सप्रेस ने प्रकाशित किया है. आनलाइन आर्डर यहां किया जा सकता है.]

kankad14.1

नानू काका चले गए. उनके बाद घोटकी चाची भी चल बसीं. चाची का असली नाम कभी जाना नहीं, न ही किसी से सुना. उनके डील डौल और हंसमुख प्रकृति के कारण ही शायद उनका नाम घोटकी पड़ा. सात भाई व एक बहन वाली एक लंबी चौड़ी गुवाड़ तो पहले ही बिखर गई थी अब उस लंबे चौड़े परिवार से दो जी और चले गए. डेढ महीने भर में. क्या बदला है? उमस भरी रात ठंडी होने लगी है और ढाणी के पास जो क्यारियां ग्वार से भरी थीं, अब वे खाली हैं. ग्वार बिक चुका है और पास की अनूपगढ़—गंगानगर रोड पर पराळी से भरी ट्रालियां दिखती हैं. बाकी दुनिया ठीक वैसे ही चल रही है जैसे कुछ हफ्ते भर पहले थी. सुबह की शुरुआती बस पकड़ने के लिए जल्द ही बस अड्डे पर आ जाता हूं. टेल पर पहुंची जीबी माइनर में पानी है.

सत्संगी साज समेट कर अगले घर जा चुके हैं. एक रात जो कबीर, रैदास व बन्नानाथ जैसे संतों की भजन बाणी ​सुन जागृत हुई जा रही थी फिर नींद के आगोश में जाने को व्याकुल है. दिन की चमक में उसकी आंखें चकाचौंध हैं. यही तो रात भर सत्संगी कहते रहे कि हम जिस बाजार में होते हैं उसी के अनुसार बोली लगाते हैं. उसी की मुद्रा में कारोबार करते हैं. वहां हमारी सोच के सिक्के नहीं चलते. हमारा कोई क्रेडिट/डेबिट कार्ड, चैक या रुक्का वहां नहीं चलता. उस बाजार में हमारी हैसियत सिर्फ और सिर्फ एक ग्राहक की है. बाजार, वहां के बणिए,उनके कारिंदे हमें ऐसा कोई कदम नहीं उठाने देते जिससे उनका बना बनाया बाजार खराब हो. या उसका उल्लंघन हो.

इसीलिए रात को दिन उगते उगते सो जाना है. यही इस बाजार का नियम है. जब रात जागृत हो, दिन से पंजा लड़ाएगी तब ही असली क्रांति घटित होगी. वरना तो सब पाखंड है. इक बाजार है. हम उस बाजार से कुछ आग खरीदने के लिए पत्थर झोले में भर घूम रहे हैं. हम पत्थरों के बदले आग खरीदने की बचकानी हरकतों पर उतरे नादान हैं. बाजार में हमारी नादानी पर हंसने वाले कारिंदे तो हैं पर यह बताने वाला कोई नहीं कि भले मानस आग तो उन पत्थरों में भी छिपी है जो तुम उठाए घूम रहे हो. जला लो. यह सलाह तो कोई कबीर, रैदास ही दे सकता है.

खैर, अगली सुबह इक ऐसे शहर में होनी है जहां हमारे करियर की नाड़ बंधी है. जहां संतरी कलस्टर बस की दायीं ओर की सीट पर बैठे हुए यह सोचना बेवजह है कि संसद मार्ग पर नीम की जगह मैपल के पेड़ होते तो चमकती दुपहरियों में कैसे दिखते या कि इंडिया गेट इन अकेली दुपहरियों में किन यादों के साथ वक्त काटता होगा. लेकिन यह चिंता जरूर की जा सकती है कि संयुक्त परिवारों की टूटन के किरचों को समेटे हमारे दरवाजे पर चली आईं इन नकचढी सुबहों का जवाब देने के लिए हमारे पास क्या है?

  • एक शे’र सुनिए
    यूं ही खफा नहीं हूं तेरे हसीं मौसमों से,
    मैंने अपने खेतों में गिरते ओले देखे हैं.
Posted by: prithvi | 14/09/2014

नीर नजर नहीं आवे

जिंदगी हमें हजार रास्ते नहीं देती कि हम सैकड़ों मंजिलें तय कर लें. जिंदगी के हमारे तरकश में गिने चुने तीर हैं इसलिए हमारे लक्ष्य भी कम ही होने चाहिए.

फिरोजपुर जाने वाली ट्रेन से बठिंडा में ही उतरना होगा. आगे का रास्ता बस से तय करना ​है. गिदड़बाहा, मलोट, अबोहर, बल्लुआना, श्रीगंगानगर और आगे. भादो की बारिश में भीगी पंजाब की धरती पानी से पगी है. घरों व सड़कों को छोड़ दें तो हर कहीं पानी भरा है. खेतों से लेकर खलिहानों, खाली पड़े अहातों तक हर जगह. धान के खेत तो इसे झेल भी लेंगे, नरमा कपास का क्या होगा. मोठ, ग्वार, ज्वार की फसल मुरझाने लगी है. मौसमी और अमरूद के बागों में पानी भरा है. लेकिन वास्तविकता की जमीन की यह सेम दलदल हम तक आने वाले समाचारों से गायब है. हर दु:ख दर्द को बहा, धो देने की ताकत रखने वाला पानी हमारी चिंता का बड़ा सबब बन गया है और हमारा किया धरा मानों जमीन पर उग आया है. यही जमीन की फितरत है. वह अपने पास कुछ नहीं रखती. सबकुछ उगाकर हमारे सामने रख देती है.

रेत और रेगिस्तान में रहने वाले हम तो बारिशों के लिए बने ही नहीं. हम तो अकाल, आंधी और सूखे के लिए बने हैं. बारिशें हमारी जिंदगी के पन्नों के हाशिए पर नुक्तों की तरह दर्ज हैं. लेकिन पंजाब, हरियाणा के नखलिस्तान को क्या हो गया कि जमीन ‘ये लो तुम्हारी हरित क्रांति, ये लो तुम्हारा जलवायु परिवर्तन’ कह कह कर दलदल हुई जाती है. रही सही कसर शायद हर खाली पड़ी जमीन पर कब्जा करने की हमारी भूख ने पूरी कर दी है. पानी के बारे में सोचता हूं-

सुना कि पानी मर गया है
तभी तो वह तेरे शहर में भर गया है.
जिंदा होता तो ​बह जाता नदी नालों में
वह क्यूं बेनूर मेरे खेतों को कर गया है.

केर के लाल और कीकर के खिलते पीले फूलों के बीच देखता हूं कि राजस्थान की ‘कपास पट्टी’ कही जाने वाली जमीन ग्वार की फसल से भरी है. जो काम सरकारें सोच नहीं सकीं या कर नहीं पाईं वह बाजार ने एक झटके से कर दिया. पर्याप्त पानी की कमी और अच्छे भाव न मिलने से परेशान किसानों को कम मेहनत में अधिक मुनाफे का विकल्प ग्वार में मिल गया है. अबोहर से आगे खासकर श्रीगंगानगर से लेकर सूरतगढ, पदमपुर, रायसिंहनगर, अनूपगढ, रावला, खाजूवाला तक ग्वार ही बोया जा रहा है. एशिया की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजना इंदिरा गांधी नहर से सिंचित यह इलाका कुछ दिन पहले तक सिंचाई पानी के बड़े संकट से दो चार था. अब भी यहां कि अधिकांश नहरें सूखी हैं तो पीछे पंजाब हरियाणा पानी में डूब रहा है.

भादों की अगली रात अनूपगढ़ के पास एक ढाणी में सत्संग सुनने में बीती. वहां सुने एक भजन का यही भाव था कि- 
ये जग अथाह जल सागर,
नीर नजर नहीं आवे.

Posted by: prithvi | 16/08/2014

हारी हुई बाजियां

एक प्यारी सी लड़की थी जिसने पता नहीं कितने सपनों को अपने शरीर पर गोदनों के रूप में गुदवा लिया. जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया और दुनिया को ठेंगे पर रखा. अपने अंतिम दिनों में डायरियों के पुराने पन्नों में खो चुके दोस्तों को ढूंढा और उनसे सालों साल बाद बात की. और ऐसे ही सावन में एक दिन अपनी जिंदगी का मोबाइल स्विच आफ कर दिया. राबिन विलियम्स का जाना एमी जैसे कितने प्यारे लोगों की याद दिला देता है जिन्होंने अपने हिस्से के आसमान की लड़ाई में जमीन से नाता तोड़ लिया.

amy

एमी, इक हारी हुई बाजी 

सावन में इतने स्‍तब्‍ध करने वाले समाचार नहीं आते, नहीं आने चाहिए. एमी वाइनहाऊस के चले जाने की खबर, कुछ ऐसा ही समाचार था. भले ही इन कुछ वर्षों में एमी ने कोई याद रखने वाला नया तराना नहीं गाया लेकिन अपनी शुरुआत से उसने उम्‍मीदों के जो क्षितिज बुने थे वहां सुरों की सतरंगी सफल कहानियां थी, अच्‍छे संगीत के सपने थे,इक भरोसा था कि वह फिर किसी दिन अपने बिंदास रूप में चौंकाने वाले गानों के साथ स्टेज पर होगी. पर एमी अपनी मौत से इन सब आशाओं पर हताश करने वाला तारकोल पोत कर चली गई. 27 साल की उम्र में, चंद यादगार नग्‍में हमारी झोली में डालकर.

एमी के टैक्सी चालक पिता को जैज से बहुत लगाव रहा और वे गाहे बगाहे कुछ गुनगुनाते रहते थे. शायद पिता का संगीत से प्रेम एमी की नसों में लहू बनकर दौड़ने लगा और उसकी नाड़ संगीत से बंध गई. दस साल की थी तो अपने दोस्त  के साथ मिलकर रैप ग्रुप ‘स्वीट एन सोर’ बनाया. जैज से प्रभावित पहले एलबम फ्रेंक के साथ संगीत में औपचारिक रूप से उतरी. इसके गानों के लिए उसे इवोर नोवेलो गीतकार अवार्ड मिला, ब्रिट अवार्ड में नामांकन हुआ तथा इस एलबम को मर्करी म्यूजिक प्राइज के लिए भी छांट लिया गया. 2006 में बेक टु ब्लैक आया और धूम मच गई. ब्रिटेन से लेकर अमेरिका तक में. पांच ग्रेमी अवार्ड मिले और स्टारडम, शौहरत उसके कदमों में लोटने लगी.

बस इतनी सी बात है मित्रो, बाकी तो कहानियां किस्से हैं एक जन्मजात संगी‍त प्रतिभा के तबाह होने की. प्रेम में टूटती, टूटते रिश्तों से बिखरती एक युवती जो अपने हिस्से के आसमान की लड़ाई में जमीन से नाता तोड़ देती है. एमी ने शुरू में एक बार कहा था कि वह शौहरत पाने के लिए नहीं आई है, वह तो बस एक संगीतकार है. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. शौहरत और व्यक्तिगत जीवन के किस्सों में उसका संगीत बहुत पीछे छूट गया और उसकी प्रतिभा भी. प्रेम के नशे का तोड़ उसने मरिजुआना, क्रेक में ढूंढना चाहा. ग्लानि में खुद के शरीर को चोटें पहुंचाईं और बीमारियों को दावत दी. अपनी कमजोरियों से लड़ती, सड़कों पर अर्द्धनग्न बदहवास घूमती एमी की तस्‍वीरें बाद के समय की दीवारों पर चस्पां होती रहीं.

इस तरह नशे, ड्रग्स  के कारण तबाह होने वाली एमी कोई पहली प्रतिभा नहीं है. संगीत से ही कई प्रतिभाशाली, संभावनाशील नाम इस सूची में हैं. जिम्मी हेंडरिक्स, जेनिस जोपलिन, कुर्त कोबेन तथा जिम मोरिसन को कैसे भूला जा सकता है. संभावनाओं के पौधों का इस तरह मुरझा जाना, अंदर से कुछ दरकाता है क्योंकि इन्हीं  छोटी छोटी प्रतिभाओं से बेहतर समय समाज की उम्मीदें निकलती हैं. तो एमी संगीत की हो या किसी और क्षेत्र की, एमी ब्रिटेन की हो या किसी और देश की, उसका यूं खुद को तबाह करना सालने वाला है.

लंदन की एक घटना याद आती है. मर्करी प्राइज समारोह हो रहा था और एमी को आना था लेकिन किसी को भरोसा नहीं था कि वह आएगी भी. अचानक किसी कोने से एमी दबे पांव स्टेनज पर आती है और पूरे हॉल में सन्नाटा पसर जाता है.. एमी के दिल में पता नहीं क्या होता है कि वह ‘प्यार इक हारी बाजी है’ (लव इज ए लूजिंग गेम) गाना शुरू करती है. सिर्फ एक अकूस्टिक गिटार के साथ. सुनने वाले बताते हैं कि एमी के गले से सुर नहीं मानों दर्द, पीड़ा की गहरी नदियां बह रहीं थीं. गाना पूरा हुआ तो एमी काफी देर तक संभलने की कोशिश करती रही और शुक्रिया जैसा कुछ बोलकर मंच से नीचे उतर गई. कितने कलाकार ऐसा समां बांध पाते हैं. एमी ने कर दिखाया क्योंकि दर्द और संगीत से उसका गहरा नाता रहा. उसकी आवाज में जो ताजगी, गहराई थी वह हर गले को नहीं मिलती. जैज, सॉल व आरएंडबी की यह प्यारी सी गायिका थी जिसने पता नहीं कितने सपनों को अपने शरीर पर गोदनों के रूप में गुदवा लिया. जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया और दुनिया को ठेंगे पर रखा. जो दिल में आया बोला, जो दिल में आया किया. अपने अंतिम दिनों में डायरियों के पुराने पन्नों में खो चुके दोस्तों को ढूंढा और उनसे सालों साल बाद बात की. और ऐसे ही एक दिन अपनी जिंदगी का मोबाइल स्विच आफ कर दिया.

अपने सिस्टम से इन दिनों उसका प्यार इक हारी बाजी सुनता हूं तो शब्द गडमगड होकर एमी एक हारी बाजी जैसे कुछ हो जाते हैं.

[एमी (1983—2011) को याद करते हुए यह आलेख कुछ साल पहले एक सावन में लिखा था.]

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Posted by: prithvi | 21/06/2014

ब्राजील की बेटी

बाहर से आती चिड़ी की चहचहाट और रोशनी के बीच शरीर कहता है कि अब सो जाना चाहिए. सुबह के पांचेक बज रहे हैं. दिन निकल आया और रात सोने चली गई है. होंडूरस व इक्वाडोर का मैच चल रहा है जबकि कोस्टा रिका ने इटली को हराकर इंग्लैंड की इस प्रतियोगिता से रवानगी पक्की कर दी है. ग्रुप डी में से अगले दौर की 16 टीमों में स्थान बनाने वाली कोस्टा रिका पहली टीम है. इस ग्रुप की बाकी तीन टीमें, कभी न कभी विश्व कप विजेता रह चुकी हैं. पिछली बार के विश्व चैंपियन स्पेन की विदाई से तय हो गया है कि इस बार विजेता नया होगा. हालैंड और क्रोएशिया धमक से जीतकर आगे आए हैं. स्टीफन हाकिंग ने कहा है कि उनका दिल इंग्लैंड के साथ है पर वे बाजी ब्राजील पर लगाना चाहेंगे.

आखिर क्यों नहीं ब्राजील ही तो है जिसका नाम फुटबाल के नाम के बाद आता है. उसका पर्यायवाची है. फुटबाल मतलब ब्राजील, ब्राजील मतलब फुटबाल.

कहते हैं कि बेटियां जब घर आती हैं तो दीवारें मुस्कराने और दरवाजे गाने लगते हैं. साओ पाउलो से लेकर नेताल और रीयो डी जेनेरियो से लेकर सल्वाडोर तक ब्राजील की हर गली इन दिनों नाच रही है क्योंकि उसकी बेटी घर आई है. फुटबाल ब्राजील की बेटी है. उसकी लाडकंवर है. वह यहां की गलियों, नुक्कड़ों में खेल खेल कर बड़ी हुई है. संवरी है. माओं ने इसे अपने बेटों से ज्यादा लाड से पाला पोसा तो पिताओं ने तमाम वर्जनाओं को ताक पर रखकर इसे फलने फूलने का मौका दिया है. तभी तो दुनिया भर में जिसकी अपनी टीम नहीं होती वह ब्राजील के लिए हूटिंग करता है. पेले की महान विरासत को संजोए यह देश रोमारियो, रोनाल्डो, काका से लेकर नेमार और आस्कर की अल्ट्रा माडर्न पीढी तक आ गया लेकिन फुटबाल के लिए उसका लाड अब भी कम नहीं हुआ है. मैच किसी का भी हो स्टेडियम भरे रहतेे हैं. यूं ही नहीं ब्राजील को दुनिया का फुटबाल देश कहा जाता है और उसके 10000 से अधिक खिलाड़ी हर समय दुनिया के किसी न किसी कोने में फुटबाल खेल रहे होते हैं.

सयानों ने कहा है कि हमें धीरे धीरे चीजों की आदत जो जाती है. हम युद्ध के भी आदी हो जाते हैं. लेकिन ब्राजील ने फुटबाल की आदत डाली. उसने जमीनी स्तर पर फुटबाल खेलने, इसे बढाने के मानक गढे और देखते ही देखते वह उस खेल का सिरमौर बन गया जो उसे एक स्काटिश नागरिक ने सिखाया था. ब्राजील में बच्चे फुटबाल सीखते नहीं हैं यह तो उनके खून में, संस्कारों में प्रीलोडेड होती है. अब तक हुए उन्नीस में से पांच विश्व कप ब्राजील ने जीते हैं. उसने अब तक हुए हर विश्व कप के लिए क्वालीफाइ किया है. ऐसी उपलब्धि हासिल करने वाला वह दुनिया का एक मात्र देश है.

निसंदेह फुटबाल खेल नहीं एक भावना है. यह दुनिया का ब्राजील को दिया गया सबसे नायाब तोहफा है. जिसे उतने ही आदर सहेज संजोकर रखा है. यूं ही फुटबाल  हमारी इस दुनिया को कसकर साथ में बांधने वाली एक मजबूत डोर नहीं है. याद है ना साल 1970 की वह बात जब पेले ने नाइजीरिया में प्रदर्शनी मैच खेलने की हामी भरी. नाइजीरिया, जो उस समय गृहयु़द्ध से जूझ रहा था. पेले और फुटबाल के प्रति दीवानगी देखिए कि सैनिक और विद्रोही, दोनों पक्ष दो दिन के लिए युद्धविराम पर राजी हो गए ताकि सैनिक आराम से पेले को अपनी सरजमीं पर खेलते हुए देख सकें. जिन लड़ाइयों को तमाम कूटनीतियां और चालबाजियां नहीं रोक पाईं उसे इस खेल ने कर दिखाया. कितने और खेलों में इस तरह का दम है?

ओशो ने खेलों की एक खास खूबसूरती की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया था. कि खेल हमें सिखाते हैं कि हार या जीत मायने नहीं रखती. मायने रखता है बढिया खेलना, समग्रता से खेलना और अपनी सारी उर्जा से खेलना. दूसरे भी जीतेंगे लेकिन इसमें कुढने की जरूरत नहीं हम उन्हें भी बधाई दे सकते हैं और उनकी जीत का उत्सव मना सकते हैं. फुटबाल ऐसा ही उत्सव है. यह खेल प्रेमियों का उत्सव और ब्राजील की बेटी है. ***

 

ओह स्पेन: हालेंड ने चार साल पहले जोहानिसबर्ग की हार के भूत को सल्वाडोर में अपने पहले ही मैच में एक के बदले पांच गोल, जमीन के नीचे दबा दिया. गत विश्व विजेता स्पेन की बुढाती टीम अब तक की इस सबसे करारी पराजय की टीस से नहीं उबर पाई दूसरी हार के साथ खिताबी दौड़ से बाहर हो गयी. खैर, दो बार के यूरो और एक बार के इस विश्व चैंपियन ने एक पीढी को फुटबाल के साथ जीने के सपने दिए और शायद यह साल उसके युग के अवसान का है. बाकी, तय रहा कि इस बार चैंपियन नया होगा. ***

[photo curtsy internet]

Posted by: prithvi | 16/06/2014

संगरिया का अमलतास

तपते जेठ में जब हवाएं अपना घर लू को संभलवाकर बारिशों को लेने चली गई हों और सूरज ने मौसमों की सारी नमी पीकर डकार ली हो, उस समय उमस रात के सिर पर चढ़कर सांबा करती है. गोया सावन से हमारी मुहब्बत उसे सौतिया डाह बन डसती है. सात घंटे देर से चल रही हमारी ट्रेन उस स्टेशन पर चढते दिन के साथ पहुंचती है जिसे उसे रात के अंधेरों में ही लांघ जाना था. बाहर निकल कर देखता हूं कि संगरिया है.

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गाड़ी हनुमानगढ़ की ओर बढ़ रही है. बायीं ओर कस्बा बसा है. आबादी और पटरियों के बीच एक सड़क है और उसी सड़क पर ग्रामोत्थान विदयापीठ का दरवाजा है. विद्यापीठ की चारदीवारी के पास एक अमलतास झक पीले रंग के फूलों के सा​थ मुस्कुराकर मानों गाड़ी से कह रहा था—अपनी लेटलतीफी से बाज नहीं आओगी! खैर, इस विद्यापीठ से अपनी पुरानी नाड़ बंधी है. बाबा की पढाई यहीं हुई थी. उनके दस्तावेजों, बातों में कई बार इसे जीते हुए देखा है. दरअसल यह कोई छोटा मोटा आम स्कूल नहीं यह एक शिक्षा आंदोनल का एक प्रमुख केंद्र है जिसकी धमक उत्तरी पश्चिम राजस्थान, उससे चिपते हरियाणा व पंजाब तक सुनाई दी गई थी. वह आंदोलन खड़ा किया था किशोरावस्था में ही अनाथ हो गए तथा आर्य अनाथालय में पले पढे एक युवक ने जो बाद में स्वामी केशवानंद के रूप श्रद्धेय हुआ.

हद दर्जे तक खुदखर्ज होते जा रहे इस जमाने में यह यह जानना ही कितना सुकून देता है कि पारिवारिक और आर्थिक संकट के कारण औपचारिक शिक्षा तक नहीं ले पाए एक व्‍यक्ति (साधु) ने देश का अपनी तरह का सबसे बड़ा शिक्षा आंदोलन खड़ा कर दिया. उन्‍होंने जन सहयोग से सैंकड़ो स्‍कूल, छात्रावास और पुस्‍तकालय खोले जो आज भी अपनी साख को बनाए रखते हुए काम कर रहे हैं.राजस्‍थान के इस कस्‍बे संगरिया की पहचान आज भी ग्रामोत्‍थान विद्यापीठ से है तो इसमें गलत क्‍या है. थार की तपती लू और उम्‍मीदों को उड़ा देने वाली आंधियों में अपने मां बाप को खो चुका एक किशोर आगे चलकर संत स्‍वामी केश्‍ावानंद के नाम से जाना पहचाना गया. एक ऐसा समाज जिसे राजे रजवाड़ों की बंदिशों की आदत हो गई थी, जहां वंचितों में भी वंचितों व पिछड़ों को और दबाए रखने के सारे प्रयास किए जाते थे वहां के घने अंधेरों और जड़ताओं के खिलाफ स्‍वामी केशवानंद ने  शिक्षा की मशाल को अपना अचूक हथियार बनाया. जात पूछकर पानी पिलाने वाले दौर में उन्‍होंने लिंग,जाति का भेदभाव किए बिना सभी के लिए समान अवसर वाले शिक्षा अवसर वाले शिक्षण संस्‍थान खोले.

इस इलाके ही नहीं देश भर में भी शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह का अनूठा योगदान करने वाले कितने हैं?

किसी सयाने ने कहा था कि अगर हम एक विद्यालय खोलते हैं तो सौ कैदखानों की राह बंद कर देते हैं. इस कसौटी पर स्वामी केशवानंद के काम के फलक का विस्तार आंकना आसान नहीं होगा. अपनी ईएमआई और छोटी छोटी जरूरतों में फंसे हम बस कल्पना ही कर सकते हैं. कई मित्र इस कस्बे में रहते हैं सोचता हूं अगली बार इसी स्टेशन पर उतर जाउंगा कुछ दिनों के लिए.आखिर थार के कितने गांवों में यूं अमलतास​ खिलता है, ज्यूं वह संगरिया में इन दिनों खिला है?

घर की लीपी दीवारों को छूकर खुश हो जाते हैं
मां के अरमानों को यूं समझते हैं गांव के बच्चे.

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स्वामी केशवानंद चैरिटेबल स्मृति ट्रस्ट, अमलतास का फोटो साभार राजेश एकनाथ

एक शहर में लोग तालों के इतने शौकीन थे कि उन्होंने अपनी आवाज से लेकर उम्मीदों तक के दरवाजों पर ताले जड़ दिए. इसके बाद उन्होंने अक्ल पर पर्दे डाल लिए हालांकि इससे वे संतुष्ट नहीं थे और कुछ और ताले इन तालों व पर्दों पर भी लगाना चाहते थे. लेकिन इसी दौरान हुआ यह कि एक ही काम से उकताए शहर के तालागर (कारीगर) अपने भविष्य पर लगे तालों की चाबी खोजने गये और चाबियों के जंगल में खो गए. वहीं सरकार ने चाबियों के इन जंगल को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ठेके पर दे दिया. ये कंपनियां इन चाबियों को गलाकर ऐसे आटोमेटिक लॉक बनाती हैं जिन्हें  बंद करने के लिए चाबी की जरूरत नहीं होती. ऐसे ही समय खबरें आईं कि एक शहर अपने लोगों के कारण नहीं, तालों के लिए जाना जाता है.

बताया जाता है कि इस कहानी की शुरुआत की लाइन पत्रकार रिशार्द केपूसिंस्की ने सन पचहत्तर में अंगोला की तत्कालीन राजधानी लुआंडा के लिए लिखी थी जब बारिश में भीगा एक देश कतिपय आजादी से पहले होच पोच हुआ जा रहा था. और इसका आज की दिल्ली या भारत देश से कोई लेना देना नहीं था. ना है?

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कि भारत में तालों की अवधारणा ही बहुत बाद आई थी.  ताले का सबसे प्राचीन अवशेष हजारों मील दूर असीरिया में मिला. औद्योगिक क्रांति आई तो न जाने कौन कौन सी जगह  के लिए किस किस तरह  के ताले बनने लगे. लेकिन यहीं कहीं चूक हो गई. जो ताले भौतिक सामान की रक्षा आदि के लिए बने थे उसे यहां हमने अलग अर्थ में लेकर पहले ज्ञान पर जड़ा फिर अक्‍ल पर. तभी तो अनजान ने मजाक मजाक में ‘खाइके पान बनारस वाला खुल जाए बंद अक्‍ल का ताला लिख दिया.’ वरना इसका तो भारतीय समाज से कोई लेना देना नहीं था? हां, सयाने लोग कह गए कि अक्‍ल के तालों को खोलने की एक मात्र चाबी स्‍कूलों में मिलती है और अच्‍छी शिक्षा के घन से घड़ी जाती है.

खैर, ग्रीन टी के बड़े मग को मिस करते हुए देखता हूं कि धूप सर पे चढ़ आई है. यह भौतिकी का कोई नियम नहीं लेकिन सच है कि छुट्टी वाले दिन बच्चे जल्दी उठ जाते हैं. जबकि स्कूल जाने वाले आम दिनों में उन्हें कुछ सपने दिखा दिखाकर उठाना पड़ता है. कि देगची में उफनती हुई खुशबू की जगह जब आपके हिस्से में डेयरी से आया थैली वाला दूध लिखा हो तो कौन कमबख्त अलसुबह उठना चाहेगा?

दरअसल बाहर जो धूप खड़ी है ना, उसने अपनी खूबसूरती का राज केवल उस दोपहर को बताया था जो खेत वाले रास्ते  में बड़े बरगद के नीचे बैठती थी. वक्तय की नयी पीढियों ने जब बरगद का सौदा आरे वालों से कर लिया तो वह चमचमाती दोपहर भी कहीं चली गई. वैशाख की इस ढलती शाम के पास उस दोपहर की कुछ धुंधली यादें हैं और हम मृगतृष्णा में फंसे हिरण. इसे आपके रोजानमचे में बयान के रूप में दर्ज किया जाए.

चलिए, मौसम की नगरवधू के लिए ग्यारह महीने पति​ के और एक महीना जेठ का होता है. वही जेठ (ज्येष्ठ) शुरू हो रहा है. और गर्मियां आपकी गली के नुक्कड़ वाले पार्क में सो रही हैं, अमलतास के पीले चटक फूल ओढकर.

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[painting by Bonnie Auten curtsy internet]

तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति के साथ रिश्‍ते की खनक और खुद उन्‍हें उजागर कर अंधेरी चमक में आई मोनिका लेविंस्‍की ने अपनी चुप्‍पी तोड़ने के लिए अंग्रेजी में 4300 शब्‍द लिखे हैं. वेनिटी फेयर में साढे छह पेज में उसने बीते डेढ दशक को समेटने की कोशिश की है जो कि व्‍हाइट हाउस में लगभग अट्ठारह महीनों के कारण दुनियावी चटखारों और व्‍यक्तिगत चुप्पियों का सबब बन गए. सारे घटनाक्रम के डेढ दशक बाद मोनिका ने क्लिंटन के साथ अपने रिश्‍तों पर खेद जताते उन्‍हें ‘सहम​ति से बने संबंध’ बताया है. लेकिन उस समय यह ऐसा भूचाल था जिसने अमेरिकी समाज के दोहरे चरित्र को देखने का अवसर तो दिया ही था. यादों की दराज में एक लेख है जो शायद साल 1998 में लिखा था.

monica-lewinsky

हथियार, विश्व कूटनीति व जीने के तौर तरीकों में अपने मनमर्जी के सूत्र लागू करने वाली सफलतम सभ्यता के नायक (तत्कालीन) राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पर महाभियोग की तलवार लटका देने वाली मोनिका लेविंस्की पहले यौनाकृष्ट यु​वती थी जिसने बाद में मोहित प्रेमिका हो क्लिंटन की पत्नी बनने के खवाब पाल लिए. हालांकि एक समय वह क्लिंटन के ठंडे रवैये से इतना निराश हुयी कि उनकी ही पोल खोलने की धमकी दे डाली. उनकी, जो दुनिया की सफलतम महाशक्ति का राष्ट्रपति होने का दंभ भरते थे. यानी विलियम जेफरसन क्लिंटन उर्फ बिल क्लिंटन.

दरअसल क्लिंटन-मोनिका प्रकरण की जांच करने वाले स्वतंत्र ​अधिवक्ता कैनेथ डब्ल्यू स्टार ने अपनी 485 पृष्ठों की रपट में यह स​ब खुलासे किए थे. इसके अनुसार जुलाई 1995 में मोनिका जब व्हाइट हाउस पहुंचती है तो पांच फीट से ज्यादा लंबे कद की, गोरी चिट्टी और बला की खूबसूरत इस युवती के पास रुपये—पैसे की कोई कमी नहीं थी. वस्तुत: वह उस चमकीले समाज की ऐसी युवती थी जो देश की सबसे शक्तिशाली हस्ती के साथ लीला मात्र से विजयोन्मत्त हो जाता है. राष्ट्रपति भवन यानी व्हाइट हाउस में पहुंचते ही वह क्लिंटन की आंखों में अपने लिए आकर्षण देखती महसूस करती है. फिर वह उन्हें रिझाने के लिए अपनी पीठ से शर्ट हटा अपने अंड​रवियर के चमड़े के पट्टे को उन्हें दिखाने तक ‘टीनएजर’ हो जाती है.

बतौर प्रशिक्षु व्हाइट हाउस पहुंची मोनिका व राष्ट्रपति क्लिंटन की यह लीला विभिन्न उतार चढावों के बीच अट्ठारह महीने चली. मोनिका से संबंध बनने के बाद राष्ट्रपति ने उससे इस बारे में किसी को नहीं बताने को कहा. मोनिका, क्लिंटन को तो निश्चिंत रहने को कहती रही लेकिन पर खुद हजम नहीं कर पाई और एक नहीं, ग्यारह लोगों से इसकी चर्चा की. सिर्फ तुम्हें बता रही हूं, आगे मत बताना, की तर्ज पर. हुआ यूं कि क्लिंटन से कई बार ‘संबंध’ बनाने व फोन … के बाद उनकी घटती रुचि से मोनिका बेचैन थी. वह सोचने लगी कि इन संबंधों का कुछ भविष्य भी है या वह क्लिंटन के हाथों का खिलौना भर है. वह राष्ट्रपति की अन्य गर्लफ्रेंड के बारे में सोच कर सोतिया डाह से भी परेशान थी.

स्टार के रपट में इन दोनों की छवि बिलकुल युवा उम्र के उन दो प्रेमियों से उभरती है जो बस एक दूसरे पर फिदा हैं. दोनों ने न केवल प्रेम पत्रों का आदान प्रदान किया बल्कि एक दूसरे को उपहार भी दिए. नवंबर 1995में शुरू हुए ये संबंध 24 मई 1997 को समाप्त हो गए. 

रोचक तो यह है कि कैनेथ की अध्यक्षता वाली ग्रेंड ज्यूरी का मोनिका लेविंस्की प्रकरण से कोई लेना देना नहीं था. वह तो पाउला जोंस बना बिल क्लिंटन मामले की जांच कर रही थी. इसमें मोनिका एक गवाह के रूप में पेश हुई और उसने मामले को नया ही रंग दे दिया. जांच रपट में इस रंग में ऐसे राष्ट्रपति की कहानी है जो अपने से आधी उम्र की लड़की पर आसक्त है. यह चेहरा एक कामुक राष्ट्रपति का था, रपट कहती है. ग्रेंड ज्यूरी के समक्ष मोनिका राष्ट्रपति के साथ अपने संबंधों की परतें सिर्फ इसलिए उघाड़े क्योंकि यह न करने पर वह शपथ लेकर झूठ बोलने के आरोप में फंस सकती थी. और ज्यूरी ने उसे माफ करने का वादा किया था. 

रपट में मोनिका ने राष्ट्रपति के साथ अपने संबंधों की इतनी खुलकर चर्चा की कि कभी कभी तो वह फुटपाथों पर बिकने वाली कामुक किताब लगती है.

इस रपट का जो हिंदी रूपांतरण ‘मैं शर्मिंदा हूं’ प्रका​शित हुआ उसके आमुख में यशवंत व्यास ने​ लिखा: झूठ की एक कीमत होती है. वह किसी ने किसी को चुकानी ही पड़ती है. लेकिन ऐसा लगता है कि अपनी विशिष्टताओं के लिए विख्यात अमेरिकी समाज के इस तत्कालीन नवनायक बिल क्लिंटन ने झूठ की कीमत वसूलने की कोशिश की. 

सारे घटनाक्रम के डेढ दशक बाद मोनिका ने क्लिंटन के साथ अपने रिश्‍तों पर खेद जताते उन्‍हें ‘सहम​ति से बने संबंध’ बताया है. लेकिन उस समय यह ऐसा भूचाल था जिसने अमेरिकी समाज के दोहरे चरित्र को देखने का अवसर दिया. इस प्रकरण में एक पन्‍ने पर फैसले के रूप में दर्ज है कि क्लिंटन पर महाभियोग सफल नहीं हुआ और उन्‍होंने अपना कार्यकाल पूरा किया. वहीं दूसरे पन्‍ने पर मोनिका के खाते में आत्‍मघाती हो जाने वाला एकांत, थोथी चमक और जिंदगी को फिर से सामान्‍य बनाने की उनकी सालों साल की जद्दोजहद है. मोनिका का हिस्‍सा बताता है कि हमारे चारों ओर मीडिया, शौहरत, चकाचौंध आदि आदि के नाम पर रचा गया यह जलसाघर हमें जितना देता है उसे हजार गुणा ब्‍याज के साथ्‍ा वसूल लेता है.

[क्लिंटन—मोनिका प्रकरण की जांच करने वाले स्वतंत्र अधिवक्ता कैनेथ डब्ल्यू स्टार की 485 पन्नों की रपट का हिंदी रूपांतरण राधाकृष्णन प्रकाशन ने किया था. ‘मैं शर्मिंदा हूं’ शीर्षक वाली 112 पृष्ठों की इस किताब में यशवंत व्यास की तीखी टिप्पणियों वाली क्लिंटन कथा के अलावा स्टार रपट का संक्षिप्त रूपांतरण है. इसमें मोनिका के व्हाइट हाउस पहुंचने, क्लिंटन पर आरोप, महाभियोग की चर्चा व स्टार—क्लिंटन में बुनियादी दलीलों का वर्णन है.यहां यह भी बताते चलें कि मोनिका ने यह चुप्‍पी ऐसे समय में तोड़ी है जबकि अमेरिका 2016 के राष्‍ट्रपति चुनाव की तैयारी कर रहा है जहां बिल क्लिंटन की पत्‍नी हिलेरी क्लिंटन भी दौड़ में होंगी.]

 

 

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