लोकतंत्र की सफलता की पहली शर्त यह है कि ज्यादातर लोग ईमानदार हों.

शराब के ठेके पर इस पोस्टर पर लिखा है-आपका वोट कीमती है उसे शराब के बदले ना बेचें.

शराब के ठेके पर इस पोस्टर पर लिखा है-आपका वोट कीमती है उसे शराब के बदले ना बेचें.

बामसेफ से एक राजनीतिक तूफान में बदली बसपा के सुप्रीमो काशीराम उन दिनों सामाजिक क्रांति के झंडाबरदार थे और वाजपेयी जी बड़े स्टाइल में ‘दिल्ली की किल्ली घुमाने’ की बात करते थे. एक दोस्त पायल टाकीज रोड पर कैसेटों में गाने भरा करता था जिससे ‘स्‍पाइस गर्ल’ के गाने भरवाने के बाद यारों को हर रविवार लगने वाले लंगर का बेसब्री से इंतजार रहता. कि क्रांतियों का इतिहास, भूख से खड़ा होता है. कहते हैं कि पायल टाकीज के उस मकान को तोड़कर दुकानें बना दी गई हैं जहां कुछ सिरफिरे देर रात डैक में फुल वोल्यूम पर ‘ला बोशे’ बजाया करते थे.

यादों की पुरानी गलियों में होली खेलकर निकली हवा कुछ ज्यादा ही खुल गई है शायद. नीम के पत्ते झर रहे हैं तो पीपल भी उदास है. सुबह-सुबह सड़कें नीम व पीपल के पीले पतों से भरी मिलती हैं. दुनिया के नक्शे पर नये देशों के जन्म का समय… जब कहीं मातम हुआ तो कहीं थाल बजे. साउथ सूडान के नामकरण में बैंड बाजों के साथ शामिल हुए देश क्रीमिया को रूस की अवैध संतान बताकर खारिज कर देना चाहते हैं. शायद वे भूल गए कि एक खेत में फसल पकने से पहले ही दूसरी जगह कोई फसल बोई जा चुकी होती है. सुनने में आया है कि दुनिया के सिमटकर बच्चों के माउस में आ जाने के दावों के बीच एक भरे पूरे बोइंग जहाज को हवा निगल गई तथा हवाई यात्रा के और सुरक्षित होने का भरोसा सुदूर हिंद महासागर में 400 वर्ग किलोमीटर के इलाके में बिखर गया है.

हैरान कर देने वाली खबरों के बीच एफएम पर देश को बचाने की सौगंध खाई जा रही हैं तो पद प्रतिष्‍ठा को मोक्ष मानने वाले टिकट न मिलने पर निष्‍ठा और नैतिकता के सारे खूंटे तोड़कर भाग गए हैं. कुछ आस्‍थाएं यूं बदली हैं मानों सूरज ने धरती के चक्‍कर लगाने शुरू कर दिए हों. कुछ राजनीतिक दलों के नारों में तो कुछ के कर्म में व्‍यक्ति पूजा है.बाकी के एजेंडे में किसी न किसी तरह सत्ता में बने रहना है. उनकी सोच सत्ता में आने वाले दल के अनुसार ही बदल जाती हैं.खुद को बेहतर साबित न कर दूसरे को बदतर बताने की होड़ मची है. सच्‍चाई मौन है, झूठ चिल्‍ला रहा है और हम कहते हैं कि देश में लोकतंत्र का पर्व है! सच मौन है, झूठ चिल्ला रहा है और हम कहते हैं कि देश में लोकतंत्र का पर्व है! सच में तो यह झूठ का जलसा लगता है. अगर नहीं तो ऐसे पदलोभुओं, मुद्दों की बात के बजाय अगड़म बगड़म कर रहे लोगों व अच्‍छे ईमानदार दावेदारों को नकार देने वाले दलों को हार क्यूं नहीं जाना चाहिए?

रस्किन बांड ने देहरा गांव में रहते हुए एक रोचक वाकया लिखा था. एक कुबडे़ भिखारी गणपत का. गणपत ने अपने कुबड़े होने की जो नाटकीय कहानी बताई उससे अधिक रोचक उससे मिली शिक्षाएं है जैसे कि जनतंत्र की सफलता की पहली शर्त यह है कि ज्यादातर लोग ईमानदार हों. और कि आजादी वह चीज है जिसके लिए लगातार आग्रह करते रहना होता है. उन्हें पढते हुए दुष्यंत कुमार की यह गजल याद आती है—

यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा.
यहां तो सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
ख़ुदा जाने वहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा.

इस बार सीधी अंगुली का सही इस्तेमाल नहीं किया तो सच में पानी यहीं ठहर जाएगा.
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[फोटो साभार फेसबुक ]

सपनों का रंग गुलाबी हो तो आ ही जाते हैं बाजार के रंगरेज,
वरना मुहब्बत तो सांगरी की सब्जी है.

24 x 30 Rainy Romance a

हवा जब अपनी सारी सखी सहेलियों के साथ बसंत ओढे चली आ रही थी, उसने 18 कदम भरने चाहे उस खिड़की तक जहां से वह नज़र आता था. लेकिन जुदाई के अस्थमा में उसे ‘ओवर एक्साइट’ होने की मनाही थी और आक्सीजन की कमी उसकी सांसों पर भारी पड़ गई. कहते हैं कि हम सब एक पुरानी बिल्डिंग में रखे उस पियानो को ढूंढते हैं जिसकी सीक्रेट धुन से हमारी नाड़ बंधी है. सीक्रेट? ताइवान में बनी इस फिल्म का नाम तो पियानो होना चाहिए था.

इसी फिल्म को देखने के बाद याद आता है कि एक दोस्त ने मुहब्बत पर कुछ लिखकर देने को कहा है. सिस्टम में मुहब्बत से जुड़े कितने गाने भरे हैं. इश्क, मुहब्बत और प्यार इन तीन शब्दों से सर्च करने पर 300 के करीब गाने सूची में आते हैं. इनमें कुछ गाने पार्टनर के पसंदीदा हैं जिन्हें वह यथाकदा हाइवोल्यूम में प्ले करती है. मेज के नीचे की रैक में इस बार पुस्तक मेले से लाई गई किताबें हैं. कविता संग्रहों को पलटता हूं तो अधिकांश कविताएं प्रेम पर हैं. गजब है, दोस्त लोग बुक्का फाड़ कर रोने वाले इस समय में भी कितने मनोयोग से प्रेम कविताएं लिख रहे हैं. छप रहे हैं, बिक रहे हैं. यह मुहब्बत आश्वस्त करती है?

जर्मन कवि रानिया माइनेर रिल्के का वह पत्र याद आता है जो उन्होंने मिलिटरी अकादमी में दीक्षारत एक युवक को लिखा था. इसमें उन्होंने सलाह दी— प्रेम कविताएं मत लिखो. उन सब कला रूपों से बचो जो सामान्य और सरल हैं. उन्हें साध पाना कठिनतम काम है. यह सब ​व्यक्तिगत विवरण जिनमें श्रेष्ठ और भव्य परंपराएं बहुलता से समाई हों, बहुत उंची और परिपक्व दर्ज की रचना क्षमता मांगती हैं, अत: अपने को इन सामान्य विषय वस्तुओं से बचाओ.

रिल्के ने कविताएं लिखने के इच्छुक एक युवा को यह राय क्यूं दीं? पाश याद आते हैं-
कि उस कविता में
महकते हुए धनिए का जिक्र होना था
ईख की सरसराहट का जिक्र होना था
उस कविता में वृक्षों से टपकती ओस
और बाल्टी में दुहे दूध पर गाती झाग का जिक्र होना था
और जो भी कुछ
मैंने तुम्हारे जिस्म में देखा
उस सब कुछ का जिक्र होना था.

खैर, वैलेंटाइंस डे गुजरा है. इनबाक्स में कुछ प्रोमोशनल मेल हैं जिनको चुन चुनकर स्पैम में डालता हूं. मुहब्बत की हरी-भरी कहानियां कब रुखी सूखी तारीखों को देखकर खिलीं? यह इतिहास में दर्ज है कि मोहब्बत की फसल औपचारिकताओं के बंजर मैदानों में नहीं होती वह तो रिश्तों की उस उपजाऊ जमीन पर फलती है जिसे सालों साल भरोसे से सींचा गया हो. आइंसटाइन के शब्दों में किसी की मुहब्बत में खिंचे चले जाने के लिए कोई गुरूत्वाकर्षण जिम्मेदार नहीं है. न ही यह किसी चुंबक का का चमत्कार है. यह तो अलग तरह का ही मसला है. भौतिकी और रसायन शास्त्र के सारे बंधे बंधाए नियमों से परे. इसे भींत पर टंगे कागजी कैलेंडर की तारीखों में कैसे बांधा जा सकता है. ठीक वैसे ही मुहब्बत मे पग जाना और उसे शब्दों का जामा पहनाना शायद हर किसी के बस की बात नहीं होता. यह तो पाश जैसा कोई क्रांतिकारी ही कर सकता है.

हफ्ते भर की बूंदाबांदी, बादलवाही के बाद सफेद बालों वाली धूप गेहूं की मेड़ पर उतरने लगी है. वक्त अपने घर के बाहर एक नोट छोड़ गया कि वैलेंटाइन के सपने देखने वाली एक पीढ़ी हमारे आंगन में बड़ी हो रही है और एक समाज है जो लिव इन रिलेशन के नफे नुकसान पर चर्चा कर रहा है. वर्जनाओं की विंडोज एक एक कर क्रप्ट होती जा रही हैं और नयी पीढी धड़ाधड़ सिस्टम को फारमेट करती है. मोबाइल, इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साइटों ने मुहब्बत का रूप व चेहरा तो बदल दिया लेकिन चरित्र कमोबेश वही है. शायद!

एक दोस्त के लिए लिखा था कि गोया, मुहब्बत सांगरी है. थार की लू और आंधियों के बावजूद जमीन से गहरे तक जुड़ी खेजड़ी की फळी जिसे अगले मौसमों के लिए सायास सहेजा गया हो. सांगरी, जिसमें बचपन की यादों का स्वाद हो, किसी के हाथों की खुशबू मसालों सी घुली हो. सांगरी, जिसे आप दोनों साथ बैठ मनभर खाएं और अगली रुतों के लिए भी ऐसी उम्मीद कर सकें. तो मुहब्बत सांगरी की सब्जी है क्योंकि एक दोस्त का कहना है कि वास्तव में प्रेम कुछ नहीं होता. प्रेम होता है दो घड़ी साथ सटकर बैठना.

[संदर्भ- रिल्के का फ्रांज जेवियर काप्पुस को पत्रोत्तर.  अवतार सिंह पाश की कविता अव विदा लेता हूं. चित्र कारेन टार्लटन का रैनी रोमांस, साभार नेट]

highway-0v (1)
कूदा तिरे घर में कोई यूं धम्म से न होगा
वो काम किया हमने कि रुस्तम से न होगा.

हाइवे पर इससे अच्छी टिप्पणी क्या होगी? दरअसल जिंदगी में सबसे अच्छी घटनाएं वे होती हैं जो यूं ही घटे. अनायास. बिना किसी प्लान, बिना सोच विचार के. फागुन की सर्द सी सुबह में अचानक देखा कि शहतूतिए लगने लगे हैं और घर लौटकर यूं ही बोलेरो क्लास पढने लगा जो पिछले साल के पुस्तक मेले में खरीदी थी. दोपहर में अनायास ही बेटी के साथ हाइवे देखी और पार्टनर ने शाम को फ्रूट कस्टर्ड बना लिया. ऐसे ही एक दोस्त ने इंतिजार हुसैन का यह शेयर मैसेज किया तो लगा कि हाइवे पर दो पंक्तियों में इससे अच्‍छा कुछ नहीं कहा जा सकता. 

हाइवे हिंदी​ दर्शकों के लिए अनायास घटित हुई सुखद घटना जैसी है. इसे इस साल देखी जाने वाली हिंदी​ फिल्‍मों की सूची में शामिल करने के कई कारण हैं. कि यह हमारे यानी हिंदी सिनेमा के चालू मुआवरों को तोड़ती है. कहानी, अभिनय, फोटोग्राफी जैसे मानकों से इतर हाइवे सिनेमा के समाज से संबंध तथा समाज में सिनेमा की प्रासंगिकता के सवालों पर नये सिरे से विचार का मौका देती है. हाइवे में निर्देशक इम्तियाज ने वह कठिन राह चुनी है जिसे आमतौर पर कुछ ही लोगों के लिए आरक्षित राजमार्ग माना जाता है. यह संभावनाओं की नयी खिड़की है. 

सिनेमा के समाज से संबंध की बात करते समय इस साल आस्कर की दो चर्चित फिल्में टवेल्व ईयर ए स्लेव तथा डलास बायर्स क्लब देखें. वे सिनेमा की प्रासं​गकिता व इसके होने का सबसे बड़ा उदाहरण है. दोनों ही फिल्में सत्य घटनाओं पर आधारित हैं. सिनेमा ऐसा ही होना चाहिए प्रासंगिक व सच के धरातल पर कल्पनाओं की उड़ान. इम्तियाज ने एक साक्षात्कार में कहा था कि कला को, सिनेमा को अप्रासंगिक (इर्रैलेवेंट) नहीं होना चाहिए. यानी ​मनोरंजन के बिना सिनेमा की कल्पना नहीं की जा सकती लेकिन मुझे लगता है कि समाज में प्रासंगिक हुए बिना मनोरंजन भी नहीं हो सकता. तो इम्तियाज के शब्दों में ही वे अपनी फिल्मों में यथार्थ में कल्पना का शौंक लगाते हैं और सच में झूठ को मिलाते चलते है. यही एक बेहतर वाणिज्यिक सिनेमा के लिए आदर्श स्थिति है.

जबकि प्रभात रंजन ने एक जगह लिखा है कि आदमी ऐसा प्राणी है जिसकी सोच सबसे ज्यादा बदलती है. और कि बाजार बनती इस दुनिया में हर कोई अपने हुनर को बाजार में बेच देने को बेचैन नजर आता है. ऐसे में कैसे विश्वास करेंगे कि इस दौर की सबसे वर्सटाइल आवाज की धनी दो बहनें [नूरां बहनें] कई साल से पंजाब के गांव में सूफियाना संगीत में रमी हुई हैं. अपनी कला पर ‘नॉट फोर सेल’ का टैग लगाए हुए. टुंग-टुंग के बाद उन्हें हाइवे में एक और सूफी कलाम में सुनना सुखद आश्चर्य है. इसलिए यह सवाल नहीं उठता कि यह किसकी फिल्म है. इम्तियाज की, रणदीप हुड्डा की या आलिया भट्ट की. नूरां बहनों की,  ए आर रहमान की या कि पूरी टीम की. निसंदेह पूरी टीम की. इम्तियाज को श्रेय इसलिए दिया जाना चाहिए कि उन्होंने अपनी टीम को बड़े सलीके और संजीदगी से चुना और टीम के सदस्यों को बड़प्पन इसमें है कि उन्होंने अपने अपने हिस्से को पूरी लगन से पूरा किया.

खोदा और ले भागे की अमेरिकी अवधारणा के पीछे दौड़ रही इस पीढी में कितने लोग हैं जो एक सपने को 15 साल तक सीने से चिपकाए बस एक मौके का इंतजार करते हैं. इम्तियाज ने हाइवे के लिए किया. एक आइडिए को फिल्म में बदलने के लिए इतना लंबा इंतजार कि जो आलिया उनसे बच्ची के रूप में मिली थी, एक षोड्षी के रूप में उनकी फिल्म की हीरोइन बन गई. हां, यहां थिन रेड लाइन के टेरेंस मेलिक याद आते हैं. मेलिक ने साल 1978 में डेज आफ हेवन बनाई. इसके बाद सार्वजनिक जीवन से एक तरह से गायब हो गए और 20 साल बाद थिन रेड लाइन का निर्देशन किया जो अब तक की सबसे बढिया वार मूवी में से एक है. मेलिक ने अपने चार दशक से अधिक लंबे करियर में केवल आधा दर्जन फिल्‍मों का निर्देशन किया है. खैर बात हाइवे की. ईरानी फिल्‍मकार अब्बास कियारोस्तमी ने एक बार कहा था कि अच्‍छा सिनेमा विश्‍वसनीय होता है, जिस पर हम विश्‍वास कर सकें और खराब सिनेमा अविश्‍वसनीय. जब वी मेट से लेकर हाइवे तक, इम्तियाज का सिनेमा भरोसा करने लायक है. हाइवे उसकी एक और मजबूत कड़ी है.

इम्तियाज के लिए सुरजीत पातर के शब्द-
युगां तों काफ़ले आए ने इस सच दा गवाह बणदे,
मैं राहां ते नहीं तुरदा, मैं तुरदा हां तां राह बणदे.
[सार कि मैं राहों पर नहीं चलता, मैं चलता हूं तो राहें बनती हैं.]

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बोलेरो क्‍लास, प्रभात रंजन का कहानी संग्रह है जो प्रतिलिपि प्रकाशन ने प्रकाशित किया.  फोटो इंटरनेट से साभार. 

Posted by: prithvi | 08/02/2014

ये धरती कमली है.

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विज्ञान को आज भी मालूम नहीं कि मरने से पहले आदमी किस तरह मर जाता है. किस तरह पूरे भीगे हुए आदमी को एक आंसू की गरमी महसूस हो जाती है. इसलिए उसे प्राणी शास्त्र के रिसालों में खास दिलचस्पी कभी नहीं रही. [कहानी-धूप के आईने में]

मैंने बाबा को कभी किसी पूजा पाठ में शामिल होते नहीं देखा. जिंदगी हमें साथ रहने का जितना मौका देती है उसमें शायद ऐसी किसी बात के लिए समय ही नहीं निकलता. हां, एक बार गेहूं से भरे खेत में उन्होंने कहा था कि बेटा भले किसी के भी आगे सर मत झुकाओ लेकिन इस माटी की कद्र जरूर करो. क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी सचाइयों में से एक सच यही है. किसान के लिए खेतीबाड़ी और आमो खास के लिए माटी! बाबा की इस सीख को आगे बढाते हुए ही शायद किशोर चौधरी ने लिखा है कि स्वर्ग नरक कुछ नहीं होता है. आदमी इस मिट्टी से जन्मता है और इसी में खत्म हो जाता है. ये धरती काल है. माया है. कुदरत की अनूठी कारीगरी है. ये धरती जीवन है. ये धरती कमली है.

क्रिस्टोफर नोलान की ‘अंडर द आई आफ द क्लॉक‘ पढ़नी शुरू ही थी कि बेटी पूछती है— शह​तूतिए गर्मियों में होते हैं या बारिश में?  शहतूतिया उसका फेवरेट है जो हम रेललाइन के पास वाले पार्क में यूं ही तोड़ कर खा सकते हैं. फ्री में! सोचने लगता हूं कि अभी तो शहतूतिया बसंत की अगवानी में नाई की दुकान से निकला रंगरूट हो रहा है. बिना पत्तों का. तो शहतूतिए तो गर्मियों के आसपास ही होंगे. इतने में ही कूरियर आ जाता है और ‘धूप के आईने में’ लेकर. किशोर चौधरी का नया कहानी संग्रह. अपनी माटी की खुशबू में चित्त ऐसा बंधा कि ​क्रिस्टोफर अगले कुछ दिनों के लिए टल जाते हैं.

कि इस दुनिया में असंख्य लोग खुशबुओं की चादरें सर पर उठाए हुए मुहब्बत की पुरानी मजारों की चौखटें चूमते रहते है. और मुहब्बत कहां हर किसी के साथ होती है. यह तो अद्भुत घटना है जो लाखों में से किसी एक साथ घटती है. यूं ही नहीं वक्त की अमृता अपनी अंगुलियों से इमरोज की पीठ पर साहिर के नाम लिखती रहती.

तो, इस सदी को भागे हुए लोगों की सदी कहकर अपने पहले कहानी संग्रह ‘चौराहे की सीढियों’ से चौंका देने वाले किशोर चौधरी का यह दूसरा कहानी संग्रह है. जिसमें में इस दौर की पीढ़ी के संकट को रेखांकित करते हुए कहते हैं— किस्मत को चमकाने वाले पत्थरों के रंग अंगुलियों में पहने पहने धुंधले हो जाते हैं. अफसोस जिंदगी में कुछ खास नहीं. एक लड़की से प्रेम है. उसके लिए कुछ लम्हे चाहिए. बात इतनी सी है कि हर चाय की अपनी औकात होती है. तीन उबाल के बाद वह अपनी औकात में आ ही जाती है.

इस किताब की अलमारी में पेज 9 से 118 तक में फैली छह कहानियां हैं.कुल जमा जिंदगी रेत का बिछावन है और लोकगीतों की खुशबू है. दूर थार के किसी सुनसान कोने में बैठा एक किशोर हमारी भाषा में दिल की छू लेने वाली पंक्तियां लिखता है. इस मुनाफाखोर समय में इससे बड़ा सुकून और क्या हो सकता है?

सिस्टम में वडाली बंधुओं की अगली पीढी की प्रतिभा लखविंदर वडाली को गाते हुए सुनता हूं. मास्टर सलीम ने उनकी प्रशंसा में कहा कि सुरों की समझना और समझकर गाना सबसे मुश्किल होता है.. लखविंदर में वह काबिलियत है. अगर कहानी के लिए यही बात कहनी होती तो किशोर चौधरी के लिए कही जाती. कि उनमें कहानी कहने का दम व सलीका है. उन्हीं के किरदार के शब्दों को चुराकर कहा जाए तो- पांव फैलाकर बैठिए. जब खुद को समझना हो तो किसी को कुछ मत समझिए.

….
[कमली, कमला का एक अपभ्रंश रूप है. किशोर चौधरी के कहानी संग्रह 'धूप के आइन में' को यहां खरीदा जा सकता है. इस बीच एक मित्र आशीष चौधरी के पहले उपन्यास 'कुल्फी एंड कैपेचीनो' की प्रीबुकिंग शुरू हो गई है जिसे यहां आर्डर किया जा सकता है.]

Posted by: prithvi | 31/01/2014

खोए हुए गुल

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दरअसल पुष्कर के एक स्वतंत्रता सेनानी ने हेमा मालिनी को बताया था कि हर महिला में एक एक्ट्रेस छुपी होती है और उन्होंने ही तत्कालीन प्रधानमंत्री ‘राजू’ को पत्र लिखकर मांग की थी कि क्रिकेट और समाज में गुगली के इस्ते्माल पर प्रतिबंध हो. एक लड़का जो बहुत देर तक सांस रोकने में माहिर था वह एक दिन हीलियम हो गया. जिंदगी जीना अगर राकेट साइंस होता तो हमारे स्कूलों में ई बराबर एमसीस्क्वेयर के भौतिकी नियम नहीं पढाए जाते और दुनिया का एक बड़ा हिस्सा राकेट की खेती कर रहा होता. कुहरे को कुहरा न कहकर जलवायु परिवर्तन के रूप में परिभाषित करने वाले इन दिनों में ओम दर बदर यह याद दिलाती है कि हमारे देश में बायोलाजी पढने वाले अब मेंढकी की तलाश में पुराने जोहड़ के किनारे नहीं मिलते. कि प्रयोगशालाओं के बड़े मर्तबानों में सुरक्षित रखे शरीरों का अपने चारों ओर फैले द्रव से इतना ही रिश्ता होता है कि वे दोनों कांच की ​एक ​मोटी दीवार में रहने को अभिशप्त हैं.
 
खैर,​ सर्दी की पहली बारिश में नहाया दिन बालकनी में बैठा है. ओस में भीगी रात सूखने डालकर दुपहरियां, सरसों से पीला रंग लेने चली गईं. माघ तो बचे तिलों और गजक के सहारे कट जाएगा.. फागुन के लिए रंग जो जमा करने हैं. एक शहर दिल्ली है जिसके बारे में ​टीवी पर दिखाया जा रहा है मानों वहां आग लगी हो. जबकि यहां तो मावठ की बारिश के बाद माघ की ठंडी हवा चल रही है. हमारे दफ्तर के पीछे वाली सड़क के पास केजरीवाल धरने पर बैठे हैं. टीवी पर हंगामा बरपा है तो घटनास्थल पर लोगों से ज्‍यादा टीवी वाले हैं, उनसे ज्‍यादा गाडियां हैं, उनसे भी ज्‍यादा पुलिस वाले हैं. चिल्‍लपौं है, बस होचपोच है! 
 
काल के इस खंड में अनाहूत आ गई क्रांति की बलाएं लेने वालों और कोसने वालों का जमावड़ा है. आधे सच की आग पर सिकी झूठ की रोटियां हैं. मीडिया के रचे जलसाघरों में, बरसते मेह में आग दिखाने और पढाने की कला यूं ही तो नहीं आ जाती!     
 
दोस्त संजय व्यास ने अपनी नयी और पहली किताब में लिखा है कि एक बस्‍ती के बाशिंदों के लिए हर तत्‍कालीन मौसम बुरा होता था और वे हर अगले मौसम की ही प्रतीक्षा करते रहते. सिर्फ मौसम ही नहीं बल्कि वे सुबह होती तो दुपहरी और दुपहरी में शाम का इंतजार करते. उनके जीवन के हर दिन का हर प्रहर प्रतीक्षा में ही लगा रहता था. शायद वे इसीलिए जीवन यात्रा में बने हुए थे कि उन्‍हें हर अगली बार में बेहतर होने उम्‍मीद थी. और इसी इंतजार में वे थोड़ा और जी जाते थे. हालांकि, संजय ने इस बस्ती का नाम नहीं लिखा है. न आपके गांव का, न मेरे शहर का.
 
अमेरिकी लोक गायन को नयी आवाज व पहचान देने वाले पीट सीगर नहीं रहे हैं. उनका एक गीत याद आ रहा है— Where Have All The Flowers Gone. खेत की डिग्गी में पूर्व की ओर खड़े शहतूत के सारे पत्ते पीले होकर गिर गए. बसंत आ रहा है!
संजय व्यास की पहली किताब 'टिम टिम रास्तों का अक्स' आई है.

संजय व्यास की पहली किताब ‘टिम टिम रास्तों का अक्स’ आई है.

['टिम टिम रास्तों का अक्स' के लिए यहां आर्डर किया जा सकता है. है. कमल स्वरूप के निर्देशन में फिल्म ओम दर बदर हाल ही में बड़े पर्दे रिलीज हुई.]

Posted by: prithvi | 12/01/2014

एक नंबर की ईंट

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धूप के साथ खिल जाती है.
हमारे आंगन की नरम बालू,
सुस्‍ताता मेमना और बच्‍चों का घरौंदा है
जिंदगी!

सरसों की क्यारियों में पनपी मुहब्बत की कहानियां गन्ने के खेतों में आकर खत्म नहीं होती. वक्त की लाल डायरी के 34वें पन्ने पर यह नोट लिखते वक्त उसके मन में संशय की कौनसी खरपतवार उग रही थी, पता नहीं. लेकिन मैं यह जरूर बताना चाहता हूं कि एडेले के एलबम ने डिजिटल बिक्री का नया रिकार्ड बनाया है. किस्सागो के रूप में मुहब्बत मेरे बस की बात होती तो मैं लिखता कि Sometimes it lasts in love but sometimes it hurts instead. 

खैर, मुहब्बत की मुहर बनाने वाले कारीगर, स्याही की तलाश में गए हैं. शायद इसलिए कुहरे से भरी समाचारों की दुनिया से दूर गांव में सरसों खिलखिला रही है और गेहूं ने अभी अभी कान निकाले हैं. गन्ने के मीठे खेत भले ही कम हो गए हों लेकिन लोगों के दिल में कसक तो है कि एक आध बीघा बीज लेते. सरसों के साग में डालने के लिए बथुआ, कढी के लिए कच्चा लहसुन व गूंदळी, सलाद में गाजर—मूली, मीठे में ताजा गुड़, फलों में किन्नू व मालटा.. कड़ाके की ठंड के बावजूद हमें इस मौसम में अपने घर गांव में क्यूं नहीं होना चाहिए, बताओ तो!  

ऐसे ही दिनों में जब धूप मूंगफली के छिलकों सी आंगन में बिखरी रहती है और आंगन में बाहर वाले चूल्हे पर हाथ तापती सर्दी आपको बताती है कि मावठ की बारिश नहीं हुई इसलिए ठंड सूखी है. छोटे भाई को राड़ (लड़ाई) से बाड़ अच्छी, की सीख देते हुए सच में लगता है कि मुहब्बत की फसलों को सर्दी की पहली बारिश का बेसब्री से इंतजार है. वक्त के सांचे में सारी ईंटें एक नंबर की नहीं होती, उसके भट्ठे से खोरे, तीन नंबर की ईंटे ही ज्यादा निकलती हैं. जिंदगी में उन्हीं से काम चलाने का हुनर आना चाहिए.

तो, लौटकर देखता हूं कि साल की दीवार का कैलेंडर बदल गया और एक नयी सरकार ने दिन गिनने शुरू किए हैं. विशेषज्ञ कहते हैं कि एक क्रांति करवट ले रही है. बेटी के टचस्क्रीन में फ्रूट नींजा डाउनलोड करते हुए हमारे सबसे बड़े विशेषज्ञ समय की रहस्यमयी चुप्पी के बारे में सोचता हूं! अमेरिका में जमी बर्फ पिघल जाएगी तब तक एक बात कहता हूं-

बिजलियां रोज गिरती नहीं बेवजह
इस चमन में  कोई तो गुनहगार होगा.
………
[हैप्पी न्यू ईयर, इस जनवरी में हमारी यह कांकड़ पांच साल की हो गई. चीयर्स एंड थैंक्स! इस बीच अपने दो प्यारे और दमदार लेखकों (किशोर चौधरीसंजय व्यास) की किताब की प्री बुकिंग भी शुरू हो गई है. लिंक यहां है, मेरी तरफ से नये साल का तोहफा मानकर बुक करिए, हमारे समय की भाषा, बोली और लेखनी पर गर्व तो हमें करना ही चाहिए! शे'र साभार]

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अब्बू कहते थे कि गणित दुनिया की कुंजी है. मैंने गणित पढ़ी. जब इंजीनियर हो गया तब मालूम हुआ कि दुनिया में इंजीनियरों के काम के लिए जगह ही नहीं बची. सारी दुनिया में इतना कुछ बनाया जा चुका है कि खाली जगह ही नहीं है. इसलिए मैंने आगे व्यापार पढ़ा. अब क्लाइंट पटाओ का कारोबार करता हूं. तुम्हारी तरह सिनेमा, कहानी, कविता, मोर्चा कुछ आता नहीं है…

एक दोस्त की कहानियों की पांडुलिपि पढ़ते हुए अचानक देखा कि उसने अपना छाता खुला छोड़ दिया है. रात घर घर खेलते हुए सो गई और छाता अब भी जाग रहा है. छोटा सा बहुरंगी छाता जिसमें चार पांच रंग तो हैं ही. लाल, पीला, नीला, हरा या तोतिया. तोतिया? अगर वह पास बैठी हो तो अकबकाकर कहेगी तोतिया? यह लाइट ग्रीन है. जब बच्चे आपको करेक्ट करने लगें तो बदलता समय आपके सामने खम ठोककर खड़ा हो जाता है. और मिसफिट होने का डर आंखों में लहराता है.

लाल, पीले व नीले जैसे मूल रंगों के अलावा संतरी, बैंगनी, मूंगिया, नसवारी, तोतिया, कत्‍थई और स्‍लेटी जैसे अंगुलियों पर गिने जा सकने वाले रंगों की हमारी दुनिया अब करोड़ों रंगों तक फैल चुकी है. सयाने लोगों का कहना है कि हम किसी प्रयोगशाला में एक ही स्थिति में लगभग एक करोड़ रंग देख सकते हैं. हमारा कंप्यूटर किसी एक फोटो को दिखाने के लिए डेढ़ करोड़ से ज्यादा रंगों का इस्तेमाल करता है. तो, फोटो में रंगों के जो चेहरे हमें दिखते हैं उनके पीछे हजारों रंगों के चेहरे होते हैं.

थार की रेत में बना रंगों का अपना हिसाब किताब पुराना हो गया है. डर यह नहीं कि अपने गेंहुए, जामुनी व सुरमई रंगों को किसी दूसरी भाषा में पहचाना जाने लगा है. दुनियादारी के हिसाब से रंगों की पहचान नहीं कर पाना चिंता की बात है. दादी कहा करती थी कि उधार के घी से चूरमा नहीं बनता! पर कुछ लोग उधार पर लिए चावों से जिंदगी में रंग भर लेते हैं. रेत के समंदर में पानी की नदियां नहीं होती फिर भी लोग छोटी छोटी बारिशों में जी भर कर नहा लेते हैं. खुद को दुनियादारी में फिट रखने की कोशिशें यूं ही चलती रहती हैं. दिसंबर चढ़ रहा है. एक ढलती शाम ने मुस्कुराकर पूछा- ये लंबी रातें तो इसी महीने भर की.. बाद के लंबे दिनों के लिए क्‍या प्‍लान है? 

प्लान? एक दोस्त ने बनाया है कि दोस्तों, अपरिचितों के यहां जाकर उनके घर के किसी कोने में रंग किया जाएगा. सिर्फ मूल रंगों को हमारे जीवन में वापस लाने की एक कोशिश के रूप में. यानी किसी भी रूप या भाषा या रूप में हों रंग हमारे जीवन में बने रहें क्योंकि (मधुकर उपाध्याय के शब्दों में) लकीरें खींचना, जिंदगी को आजमाने का पुराना तरीका हो गया है. जिंदगी में रंग बने रहें, साल दर साल इससे बड़ा प्लान क्या होगा? 

फातिमा हसन ने लिखा है-
बिखर रहे थे हर सम्त काएनात के रंग
मगर ये आंख कि जो ढूंढती थी जात के रंग
हवा चलेगी तो ख़ुशबू मिरी भी फैलेगी
मैं छोड़ आई हूं पेड़ों पे अपनी बात के रंग.

[पहला पैरा किशोर चौधरी की नयी कहानी से. अपने पहले कहानी संग्रह से चमत्कृत कर देने वाले किशोर का दूसरा कहानी संग्रह आ रहा है. सुशील झा के प्रोजेक्ट के बारे में यहां पढ़ें. फोटो साभार पूजा गर्ग सिंह]

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खुदाइयों के बाद घरों का इतिहास तो निकल आता है
पर टूटे हुए दिलों और खोए हुए रास्तों का नहीं.

विजय चौक की रेडलाइट की स्टापवाच के अनुसार वाहनों को अभी कुछ सेकंड और रुकना था. दायीं ओर के हरियाले पार्क में छाया सन्नाटा कहता है कि इंडिया गेट पर नाफिज कर्फ्यू को एक साल होने जा रहा है. रायसीना पहाडी की ओर से राष्ट्रपति भवन की मुंडेर झांक रही है और बोट क्लब के आस पास राजपथ के दोनों ओर हरियाली का राज है. बस में आगे से तीसरी सीट पर बैठी दो गुत (चोटी) वाली बच्ची ने अपना सीधा हाथ खिड़की से बाहर निकाल कर बूंदों को छुआ और मुस्कारने लगी. कुछ और मुस्कुराहटें आसपास खिल गईं.

काती (कार्तिक) के शुरुआती दिनों में कहां बारिश होती है. इस बार हो रही है. बताते हैं कि दसियों साल में पहली बार ऐसा हुआ है. सावन, काती तक बरस रहा है. हमारी सावणी (खरीफ) फसलों की सोचता हूं तो लगता है कि जमीन की यह नमी अगली हाड़ी (रबी) तक चल जाएगी. जमीन की यही खूबी है, या तो सब जज्ब कर लेती है या सबकुछ उगाकर सामने ला देती है. वक्त की दीवारों पर टंगे साइनबोर्डों के न्यूज अलर्ट बताते हैं कि हमारा समाज व सरकारी तंत्र जमीन में गड़े सोने के लिए कस्सी फावड़े लेकर निकल गया है.

फ्लैश बैक में बाबा लोगों की सुनाई एक कहानी है. एक किसान के चारों बेटे नालायक निकले. किसान को हमेशा यह चिंता सताती रही कि उसके बाद बेटों का क्या होगा. अपने अंतिम समय में उसने बेटों को पास बुलाया और रहस्यमयी ढंग से उन्हें बताया कि दूर वाले खेत में बहुत सारा सोना दबा है उसे निकालकर वे अपना जीवनयापन आराम से कर लें. किसान चला गया तो बेटों को तुरंत सोने का ध्यान आया. कस्सी फावड़े लेकर पूरा खेत खोद डाला. एक सिरे से दूसरे सिरे तक. एक क्यारी से दूसरा बीघा… सोना तो क्या लोहे का एक टुकड़ा न मिला. बेटे बहुत निराश हुए और अपने दिवंगत पिता को खूब कोसा. इस सारे घटनाक्रम को देख रहे पड़ोसी किसान ने बेटों को सलाह दी कि उन्होंने इतनी मेहनत कर खेत की खुदाई कर दी तो क्यों न थोड़े बीज भी छिड़क दें ताकि कम से कम खाने लायक दाने तो हों. बताते हैं कि उस साल जोरदार बारिश हुई और देखते ही देखते खेत फसल से भर भर गया. तब पड़ोसी किसान के जरिए बेटों ने समझा कि उनके पिता ने किस सोने की बात कही ​थी.

हमारा समाज व सरकारी तंत्र अब तक यह नहीं समझ पाया है कि इस देश में जमीन से सोना निकालने का काम सदियों से किसान—मजूर करते आए हैं न कि एएसआई वाले. और इसके लिए जमीन को खोदना नहीं पड़ता उसकी जुताई—बुवाई करनी होती है, सोना तो खुद ब खुद उग आता है.

कहते हैं कि वक्त अपने हर नालायक बेटे के कमीज की बांयी जेब में अच्छी फसलों, बेहतरी की उम्मीदों के कुछ बीज डालता है. जरूरत तो इन बीजों को अगली बारिशों से पहले उस जमीन में छिड़कने भर की है जिसे वे किसी सोने की तलाश में खोद देते हैं.

[खुदाइयों के बाद कविता साभार, फोटो साभार मृदुल वैभव]

Posted by: prithvi | 28/08/2013

ब से बांस

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उसने यह कायदा सीखा था कि क से कबूतर, च से चरखा, ठ से ठठेरा, फ से फल व ज से जल होता है और गाया कि मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है. आंखों के तल में उसी नमी को लेकर जब वह शहर आया तो बताया गया कि क से कमाई, ब से बाज़ार, म से मॉल, ड से डर होता है. यहां भ से भेड़ नहीं भेड़चाल और ब से बकरी नहीं बकरा होता है. और बकरे की मां ज्‍यादा दिन खैर नहीं मना सकती. उसने बकरियां चराने और बकरा बनने के विकल्‍प के रूप में जो चुना वह था बांस. ब से बांस! इस देश, समाज और भाषा के लिए अद्भुत शब्‍द है बांस, जिसे गाहे बगाहे किसी के भी किया जा सकता है.

बांस की महत्‍ता जानकर ही उसके ज्ञानचक्षु खुले कि कैसे अपने कायदे में ब से बकरी पढने वाली पीढियां जीवन की दौड़ में भेड़ें बनकर रह गईं. बाहर से लोग आए और उनके बांस पर बांस करते रहे. उसे लगा कि उन्‍हें जीवन के कायदे में ब से बांस और भ से भचीड़ (टक्‍कर) सिखाया गया होता तो आज शायद हमारे हालात अलग होते. जब उसने इस दिशा में शोध किया तो पाया कि बांस का एतिहासिक, राजनीतिक व धार्मिक महत्‍व किसी भी सीमा और काल से परे है. इसके जलवे बरेली (उल्‍टे बांस बरेली को) से लेकर रोम तक रहे हैं क्‍योंकि जब रोम जल रहा था तो नीरो ने जिसे बजाया वह किसी चैन वैन की बंसी नहीं बांस की ही छोटी बहन थी.

बंदे को शोध में पता लगा कि कुछ बात तो है तो वरना लोग यूं ही नहीं हरदम दूसरों के बांस किए रहते. बांस जैसा लंबा हमारा सदी का महानायक बंबू में तंबू लगा लेता है और काल सुकाल के बारे में मौसम विभाग से अच्‍छी भविष्‍यवाणी तो हमारे कनकूतक बांस के सफेद फूल देखकर कर देते हैं. बांस की फांस अगर नाखून और अंगुली के बीच  चली जाये तो नानी की नानी भी याद आ जाती है. गधे के सींग की तरह गायब हुए लोगों को ढूंढने के लिए कुओं में बांस डलवाये जाते हैं. हाल ही में खबरें आईं कि पंजाब के एक सांसद के गायब होने पर मतदाताओं ने उन्‍हें ढूंढने के लिए कुओं में बांस डलवा दिए. सांसद हैं कि हर शनिवार रविवार एक कामेडी शो में लोगों के बांस किए हंसते रहते हैं. गुरु, जहां बांस डूब जायें वहां पोरियों की क्‍या गिनती? ठोको ताली!

वह जब अपने इस मगजमारी में और गहराई में गया तो उसका वास्‍ता फच्‍चर व खपची जैसे बांस के उत्‍पादों या बाइप्राडक्‍ट से भी पड़ा. फच्‍चर तो फच्‍चर है जो काम बनाने से लेकर बिगाडने तक हर काम आती है. अगर चारपाई की सैटिंग सही नहीं हो तो खपची फंसाकर ठीक की जा सकती है. खपची का मामला कुछ कुछ स्‍टैपनी जैसा है. वहीं अगर चारपाई की सिमेटरी बिगाड़नी हो तो फच्‍चर निकाली जा सकती है.

वह बांस से मिला तो उन्‍होंने आरोप लगाया कि भारत जैसे विकासशील देशों में बांस के वनों की तबाही के पीछे बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों तथा सरकार का हाथ है. सरकार को पता है कि मात्रात्‍मक व गुणात्‍मक लिहाज से सबसे बढिया लाठी बांस की होती है. और जिसकी लाठी उसकी भैंस! तो यह लाठी यानी बांस अगर आम लोगों के हाथ में चला गया तो उसके पास न तो भैंस रहेगी और न ही व लोगों को बकरा बना सकेगी. तो उसने वन अधिकार कानून के जरिये बांस को माइनर फॉरेस्ट प्राडक्ट की श्रेणी में डाल दिया और राष्‍ट्रीय बांस मिशन का कोई नामलेवा नहीं बचा है. इस मामले में किसानों के सबसे अधिक बांस तो सरकार ने कर रखा है. वह अभी तक यही तय नहीं कर पाई कि बांस है क्‍या.. घास या लकड़ी? भारतीय वन अधिनियम बांस को लकड़ी मानता है, जिसके कारण इस पर वन विभाग का अधिकार है. यानी बांस को बांस की खेती करने वाले भी बिना इजाजत के नहीं काट सकते. उनका कहना है कि टांगें तोड़ने से लेकर टूटी हड्डियां जोड़ने तक बेंत और खपची के रूप में बांस काम आता है. फिर सब्‍जी से लेकर खूंटी और खूंटे से लेकर अर्थी तक.. जीवन के हर मोड़ पर साथ निभाने वाले बांस को राष्‍ट्रीय फल, फूल, घास या राष्‍ट्रीय हथियार जैसा क्‍यूं दर्जा क्‍यूं नहीं दिया गया इसकी जांच संयुक्‍त राष्‍ट्र जैसी किसी तटस्‍थ संस्‍था से कराई जानी चाहिए. काश राष्‍ट्रीय बांस म्‍यूजियम, राष्‍ट्रीय बांस सड़क हो. एक बांस संस्‍थान हो जहां लोगों को दूसरों के बांस करने की विधियां बताई सिखाई जाएं. बांस ओलंपिक हो. ऐसा कुछ हो जिससे लगे कि कुछ बांस किया जा रहा है. 

बाबा नागार्जुन ने बांस की दुर्दशा को अपनी कविता “सच न बोलना’  में व्‍यक्‍त किया था. लगता है कि यह बांस नहीं एक समाज की दुर्दशा की बयानी है जहां समान स्‍तर वाले एक दूसरे के तथा बाकी बचे खुचे हाशिए वालों के बांस किए हुए है. आप कविता पढिए..

मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को,
डंडपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को.
जंगल में जाकर देखा, नहीं एक भी बांस दिखा
सभी कट गए सुना, देश को पुलिस रही सबक सिखा.

वाया जुलाई की एक रात

इस साल अपने शहर में बारिश खामोश सी बरस रही है. गांव से आने वाले संदेशों में अब भी लू की तपन और आषाढ की उमस है. इधर आसपास तेजी से दड़बेनुमा मकान बन रहे हैं और लगता है कि हवा में घुटन लगातार बढ़ी है. बार्नबे जैक जुलाई के आखिरी हफ्ते में इस दुनिया से चला गया. एटीएम हैकर जैक हमारे जीवन में तेजी से जगह बनाते जा रहे पेसमेकर, आईसीड तथा इंसुलिन पंप जैसे उपकरणों के हैकिंग संबंधी खतरों के प्रति आगाह कर रहा था और अपने घर में मृत पाया गया. इंटरनेट की आजादी के लिए लड़ रहा आरोन स्‍वार्त्‍ज पिछले साल चला गया था. अपना मीडिया जब बाजार और सरकार की खबरों से चल रहा है वैकल्पिक समाज और व्‍यवस्‍था की हर खबर कहीं दब गई है.  आस्‍वाद और मत की भिन्‍नता को स्‍वीकारने वाली यह दुनिया कितनी तेजी से विकल्‍पहीन होती जा रही है?

दुष्‍यंत ने बड़ी सुंदरता से अपने वर्तमान का यथार्थ और समय का सच्‍चा इतिहास लिखा है.' - चंद्रप्रकाश द्विवेदी

दुष्‍यंत ने बड़ी सुंदरता से अपने वर्तमान का यथार्थ और समय का सच्‍चा इतिहास लिखा है. – चंद्रप्रकाश द्विवेदी

ग्रीनटी के अपने मग के साथ इन उदासियों को समेटे बालकनी से भीतर आ जाता हूं. भीतर से और भीतर जाने की कोशिश.. सफल नहीं होती. किसी सयाने कहा था कि लौटना कभी भी हमारी मर्जी से नहीं होता. हर चीज जन्‍म लेने से पहले पकती है. बिना पके जन्‍म नहीं. यही नियम है. इसी तरह खर्च होते दिनों और फिजूल होती रातों के बीच अपने लेखक भाई दुष्‍यंत का कहानी संग्रह ‘जुलाई की एक रात’ आया है. इसमें वे कहते हैं कि उदासियों की कोई रुत नहीं होती. वे तो थार की आंधियों की तरह हर मौसम में आती रहती हैं नाम बदल बदल कर. गर्मियों में लू तो सर्दियों में डांफर (तेज सर्द हवा) और बारिशों में झंखेड़े (तूफानी हवा) के रूप में!

दुष्‍यंत की कहानियां भी इन्‍हीं रुतों की बयानी है जिनमें व्‍यक्तिगत संघर्ष का ताप और उदासियों व बिछोड़े की नमी साथ साथ चलती है. उनकी तीन जोरदार कहानियों में गांव शिद्दत से है तो बाकी में शहरी विशेषकर युवा जीवन के तनाव, अंतरर्विरोध का ताना बाना. इधर के सालों में कुछ नामों ने कहा‍नी की सभी प्रचलित परिभाषाओं और फ्रेमों को तोड़कर लिखा है उनमें दुष्‍यंत भी आते हैं. कहानी की युवा लहर की दशा व दिशा क्‍या कहती है यह समझने के लिए इन कहानियों को पढा जाना चाहिए.

अपने इस समय के धुरंधर कथाकार उदयप्रकाश ने प्राक्‍कथन में लिखा है कि दुष्‍यंत की कहानियां जोखिम भरी निडरता के साथ हिंदी के समकालीन कथा लेखन के सामने अनुभव, स्‍थापत्‍य, भाषा और शैली की नयी खिडकियां खोलती हैं. ये कहानियां उत्‍तर आधुनिक वास्‍तविकताओं की किस्‍सागोई है. सच में! दुष्‍यंत छोटे छोटे क्षणों में बड़ी बातें रचते हैं और फिर किस्‍से के रूप में कहते चले जाते हैं. यह उनकी खासियत है और आधार भी. रिल्‍के ने एक बार कहा था कि कोई रचना तभी अच्‍छी होती है जबकि वह अनिवार्यता से उपजती हैं. दुष्‍यंत की कहानियां शायद उत्‍तर आधुनिक जीवन की उन्‍हीं अनिवार्य हो चुकी निराशाओं, वितृष्‍णाओं से निकली हैं. इन्‍हें दर्ज किया जाना चाहिए कि अभी दिलों में उदासियों के मेले हैं.

(जयपुर में रहने वाले पत्रकार लेखक दुष्‍यंत की हिंदी में यह तीसरी ‘किताब जुलाई की एक रात’ पेंगुइन ने प्रकाशित की है. इसे आनलाइन यहां खरीदा जा सकता है.)

गांव: गांधी, नेहरू व अंबेडकर

डॉ अंबेडकर ने गांधी के ग्राम स्‍वराज की अवधारणा को कुछ ज्‍यादा ही भावुकतापूर्ण बताया और अपने अनुयायियों से गांव छोड़ने, शिक्षित बनने तथा शहरों में जाने को कहा. अंबडेकर ने ग्राम स्‍वराज  को भारत की बर्बादी तक करार दिया था. उन्‍होंने कहा, ‘गांव क्‍या है... अज्ञानता, संकीर्णता व सांप्रदायिकता के गढ़’ उनकी सोच थी कि ग्राम्‍य जीवन की राय अस्‍पर्शयता, उत्‍पीड़न से होकर ही निकलती है.

डॉ अंबेडकर ने गांधी के ग्राम स्‍वराज की अवधारणा को कुछ ज्‍यादा ही भावुकतापूर्ण बताया और अपने अनुयायियों से गांव छोड़ने, शिक्षित बनने तथा शहरों में जाने को कहा. अंबडेकर ने ग्राम स्‍वराज को भारत की बर्बादी तक करार दिया था. उन्‍होंने कहा, ‘गांव क्‍या है… अज्ञानता, संकीर्णता व सांप्रदायिकता के गढ़’ उनकी सोच थी कि ग्राम्‍य जीवन की राय अस्‍पर्शयता, उत्‍पीड़न से होकर ही निकलती है.

गांव हमारी आंखों में भर गया नास्‍टलजिया का पानी है, खुश्‍बू भरे खेतों से गुजरती यादों की पगडंडियां हैं. शहर संभावनाओं के वनवे हाइवे हैं. गांव में शाम को लौट आने के सारे विकल्‍प रहते हैं और शहर में लौटकर भी लगता है कि इस सफर में हैं. बीच का कोई विकल्‍प नहीं है. आने वाले दिन शहरों के हैं जहां लोग गांवों की याद में तड़पेंगे. यह महज संयोग नहीं कि बीते साल दुनिया में सबस अधिक शहरी जनसंख्‍या के लिहाज से भारत दूसरे स्‍थान पर था और आने वाले दस 7-8 साल में यह उन देशों में शामिल होगा जहां शहरी जनसंख्‍या सबसे तेजी से बढेगी. तो शहर बरअक्‍स गांव की बहस फिर खड़ी हो गई है. आखिर गांवों में ऐसा क्‍या है जो हमें शहर नहीं दे पा रहे और गांव क्‍यूं शहरों से कदमताल नहीं कर पा रहे हैं?

 इतिहास पर निगाह डालें तो कार्ल मार्क्‍स ने भारतीय गांवों की कड़े शब्‍दों में आलोचना की थी. मार्क्‍स ने मानव विकास में नकारात्‍मक भूमिका के लिए ग्राम समुदायों की आलोचना करते हुए कहा कि ये सब जाति और किंकरता से दूषित हैं जहां मनुष्‍य को कूप मंडूक बना दिया जाता है. गांव के प्राकृतिक, सादगीपूर्ण, शुद्ध माहौल, जीवंत रिश्‍तों, स्‍पेस सब की बातें करने के साथ साथ हमें देखना होगा कि हमारे अपने नेताओं की इनके बारे में सोच क्‍या थी. वे क्‍या सोचते थे? यहां आधुनिक भारत की तीन बड़ी हस्तियों गांधी, नेहरू व अंबेडकर के गांव के बारे में सोच की चर्चा करना प्रासंगिक है. 

यह सही है कि अंबेडकर के अलावा इन दोनों बड़े नेताओं का गांव से वास्‍तविक नाता नहीं रहा. अंबेडकर का बचपन गांव में बीता और उन्‍हें वे सब दुश्‍वारियां झेलनी पड़ीं थीं जो लगभग अपने हर गांव में आम है. बाकी, तीनों ही विदेश में पढे और अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कहीं न कहीं बडे़ शहरों में की. शायद यही कारण है कि इन तीनों की गांवों के प्रति जो धारणा है वह प्रतिनिधि स्‍तर की नहीं कही जा सकती.

गांवों के सबसे बड़े पैरोकार महात्‍मा गांधी थे जिनका मानना था कि भारत गांवों में बसता है. उन्‍होंने ग्राम स्‍वराज की अवधारणा खड़ी की. महात्‍मा गांधी ने गांवों को वास्‍तविक या शुद्ध भारत करार दिया. इसके बरअक्‍स उन्‍होंने औपनिवेशक शासकों द्वारा बसाये जा रहे शहरों की आलोचना की. शहरों को उन्‍होंने पश्चिमी प्रभुत्‍व तथा औपनिवेशिक नियमों का गढ़ बताया. नेहरू ने जिस गांव का सपना देखा उसमें भू स्‍वामियों और भू स्‍वामित्‍व के लिए कोई जगह नहीं होनी थी. उन्‍होंने खेती बाड़ी से अधिक से अधिक लोगों को निकालकर उद्योग धंधों में लगाने की बात की. साथ ही वे हस्‍तशिल्‍प और कालीन उद्योग को नये सिरे से खड़े करने के पक्ष में थे.

गांव की जमीनी हकीकत से अधिक वाकिफ रहे डॉ (भीमराव) अंबेडकर ने गांधी के ग्राम स्‍वराज की अवधारणा को कुछ ज्‍यादा ही भावुकतापूर्ण बताया और अपने अनुयायियों से गांवों को छोड़ने, शिक्षित बनने तथा शहरी केंद्रों की ओर जाने को कहा. अंबडेकर ने ग्राम स्‍वराज (विलेज रिपब्लिक) को भारत की बर्बादी तक करार दिया था. उन्‍होंने कहा, ‘गांव क्‍या है… अज्ञानता, संकीर्णता व सांप्रदायिकता के गढ़’ उनकी सोच थी कि ग्राम्‍य जीवन की राय अस्‍पर्शयता, उत्‍पीड़न से होकर ही निकलती है.

फिर भी ये तीनों नेता कुल मिलाकर मानते थे कि गांवों के मौजूदा हालात रहने लायक नहीं हैं और वहां बदलाव की गुंजाइश नहीं बल्कि महत्‍ती जरूरत है. गांधी चाहते थे कि बाहर के स्‍वयंसेवक गांवों में जायें और ग्राम स्‍वराज तथा ऐसी दूसरी अवधारणों को अमली जामा पहनाएं. नेहरू की राय में किसानों को खेती बाड़ी का अपना तरीका बदलना ही होगा. नेहरू चाहते थे कि हमारे गांव बदलें, आधुनिकी प्रौद्योगिकी का इस्‍तेमाल गांव के सामाजिक व आर्थिक ढांचे को बदलने में हो. अंबेडकर कहते रहे कि दलितों का भविष्‍य कम से कम अज्ञानता के इन अड्डों में तो नहीं है. 

बीते साल यानी 2012 में दुनिया में सबस अधिक शहरी जनसंख्‍या के लिहाज से भारत दूसरे स्‍थान पर था और आने वाले दस 7-8 साल में यह उन देशों में शामिल होगा जहां शहरी जनसंख्‍या सबसे तेजी से बढेगी. (राष्‍ट्रीय सांख्यिकी)

बीते साल यानी 2012 में दुनिया में सबस अधिक शहरी जनसंख्‍या के लिहाज से भारत दूसरे स्‍थान पर था और आने वाले दस 7-8 साल में यह उन देशों में शामिल होगा जहां शहरी जनसंख्‍या सबसे तेजी से बढेगी. (राष्‍ट्रीय सांख्यिकी)

तो ग्राम्‍य समाज में स्थिरता तथा सतत सामाजिक सुरक्षा महत्‍वपूर्ण रहा और प्रगति के लिए कोई जगह नहीं थी. वह मायने ही नहीं रखती थी. लेखक, कार्यकर्ता अरूंधति राय ने एक साक्षात्‍कार में कहा कि भारत अपने गांवों में अब नहीं बसता, वह शहरों में बसता है. भारत गांवों में मरता है-अपमानित होता है. इसी दुनिया के प्रमुख शहर लंदन के मेयर बोरिस जॉनसन ने गांधी के गांव के प्रति मोह को खारिज करते हुए हाल ही में कहा कि 1948 में जब गांधी ने यह कहा कि भारत का भविष्‍य गांवों में है तो वे गलत थे. जॉनसन के अनुसार, ‘ यह अनरोमांटिक लेकिन सच है कि दुनिया का भविष्‍य शहरों में है. हां गांधी की यह बात स‍ही थी कि लोग गांव की याद में तड़पेंगे.’ इतिहास से इतर इस दौर का सबसे बड़ा संकट यह है हम पगडंडी और हाइवे तथा गांव व शहर के बीच का कोई रास्‍ता नहीं निकाल पाये हैं.


(कुरजां में प्रकाशित आलेख से साभार)

Posted by: prithvi | 06/07/2013

इल्‍म से शायरी

ओशो कहते हैं कि मनरूपी कचरे के साथ होकर भी उससे अलग होना ध्याकन है. यानी मन से कोई तादात्मूय ही नहीं रखना है बस. कृष्णामूर्ति ने कहा कि ध्या न सचेतन नहीं है, अभ्यािसित नहीं है, सोचा समझा नहीं है तो मुझे लगता है कि वह वही बात कहते हैं. अनायास घटित होने की. खुली हथेलियों पर अचानक गिरती बूंदों की. उन्हेंु महसूस करने की.

ओशो कहते हैं कि मनरूपी कचरे के साथ होकर भी उससे अलग होना ध्याकन है. यानी मन से कोई तादात्मूय ही नहीं रखना है बस. कृष्णामूर्ति ने कहा कि ध्यान सचेतन नहीं है, अभ्यासित नहीं है, सोचा समझा नहीं है तो मुझे लगता है कि वह वही बात कहते हैं. अनायास घटित होने की. खुली हथेलियों पर अचानक गिरती बूंदों की. उन्हें महसूस करने की.

बेंगलूर के पास पंचगिरि की पहाडियों में हम पश्चिम की ओर मुंह करके ध्‍यान के लिए बैठे हैं और पूर्वाई चल रही है. यानी हवा पीठ की ओर से आती है. पीठ की ओर से, पूरे बदन को सहलाती हुई कानों के पास से सर सर बहती है. थार (रेगिस्‍तान) का आदमी जहां भी जाता है अपनी धूल भरी आंधियां ढूंढता है और जब सुबह सवेरे की नरम हवाएं उससे इस शिद्दत से लिपटती हैं तो वह यूं ही खो जाता है. यही हाल कमोबेश हमारा है. सुबह की शीतल हवाओं को जीने के इन दिनों बायीं ओर से मोटी मोटी बूंदें कब आसमान की ओर खुली हथेलियों पर गिरने लगीं, पता ही नहीं चलता.

जे कृष्‍णमूर्ति, ओशो रजनीश से लेकर गुरू रविशंकर तक को पढने, सुनने के बाद अपनी समझ में मोटा माटी यही आया कि ध्‍यान खुद के साथ होना है और खुद के साथ होकर भी अलग होना है. खुद को कहीं बिठाकर ‘लांग ड्राइव’ पर निकल जाना है. अगर हम अपने पास बहती हवा को सुन पायें, हथेलियों पर गिरती बूंदों को महसूस कर पायें यह देख पायें कि दक्षिण भारत में निमोळी हमारे उत्‍तर भारत से कितनी मोटी होती है तो बस यही ध्‍यान है! ओशो कहते हैं कि मनरूपी कचरे के साथ होकर भी उससे अलग होना ध्‍यान है. यानी मन से कोई तादात्‍मय ही नहीं रखना है बस! कृष्‍णमूर्ति ने कहा कि ध्‍यान सचेतन नहीं है, अभ्‍यासित नहीं है, सोचा समझा नहीं है तो मुझे लगता है कि वह वही बात कहते हैं. अनायास घटित होने की. खुली हथेलियों पर अचानक गिरती बूंदों की.

ध्‍यान की अपनी इसी विशिष्‍ट परिभाषा के साथ देखा कि कर्नाटक व अन्‍य दक्षिण भारतीय राज्‍यों में सफेद फूल कहीं अधिक होते हैं. हर आयोजन में सफेद फूलों की अधिकता रहती है. अपने थार में महिलाओं के कपड़ों में लाल चटक रंग अधिक होता है, ज्‍यों ज्‍यों हम नीचे दक्षिण की ओर जाते हैं यह रंग मैहरून होता जाता है. हमारे यहां महिलाएं चांदी के कड़े, पजेब, नथ पहनती हैं तो दक्षिण में सोना अधिक पहना जाता है. नीम की नीमोळी हो, पपीता या नारियल सब थोड़े भरवां (हेल्‍दी) होते हैं. नीम के पत्‍ते कितने हरे भरे होते हैं और नीमोळी तो हमारे यहां के बेर जितनी बड़ी. वहां माटी में लाली अधिक होती है तो हमारे यहां क्रीमी सी. शायद कहीं कहीं काली माटी भी होती होगी.

 ध्‍यान शिविर से बाहर आता हूं बादलों के झुंड आसमान में डेरा जमाए हैं. हाथ पकड़े पहाड़ी से उतरते हुए उसने पूछा इन बादलों को भी कोई नहलाता है क्‍या? कहीं पढा था कि मेहनत से मद भरी मौज और कोई नहीं होती. मेहनत करके खाने वाले ध्‍यान नहीं करते! हमें अभी कुछ दिन इन पहाड़ों में ध्‍यान करते हुए बिताने हैं, जहां की लाल चींटी के काटने पर तेज जलन होती है.

कुछ बातें दिल की हैं जैसा किसी ने कहा था-
इश्‍क को दो दिल में जगह
इल्‍म से शायरी नहीं आती.

आसमान से कुछ यूं दिखते हैं बादल के खेत.

आसमान से कुछ यूं दिखते हैं बादल के खेत.

टैक्‍सी, विमान, रेल, कार, बस व बाइक… कई साधनों पर कुल मिलाकर ढाई हजार किलोमीटर से ज्‍यादा का सफ़र दो तीन दिन में पूरा कर थार के उस सिरे पर आ पहुंचा हूं जहां एक देश की सीमा बाहें समेट रही है तो दूसरे देश का बार्डर शुरू होता है. कनार्टक की पंचगिरि पहाडियों से अपने राजस्‍थान यानी थार तक की बालू की इस यात्रा में तापमान से लेकर जीवन जीने के ढंग और मुआवरे सब बदल चुके हैं.

जेठ आषाढ में अपने देस नहीं आने की तमाम कोशिशों के बावजूद यहां हूं तो शायद इसी कारण कि अपनी नाड़ इसी में कहीं दबी है. कि जेठ का आखिरी और आषाढ का पहला दिन थार में बीता है. सुबह धूल भरी आंधियां लपेटे आती हैं तो दुपहरियों में लू के तीखे थपेड़े हैं. शामें तो नहीं हां, उतरती रातों के पास राहत के कुछ खेस दरी जरूर होते हैं.

तो, खेतों के लिहाज से सुस्‍ताता समाज नये मकान बनाने में लगा है. पक्‍के मकान. अपने दस में से सात परिवार वाले नये मकान बना रहे हैं. हर कहीं काम चल रहा है. तोड़ फोड़ या निर्माण की गूंज सुनाई देती है. जो खाली हैं उन्‍होंने भी प्‍लाट ले लिए हैं. किसने, कहां प्‍लाट लिया या बेचा तथा कौन नया मकान बना रहा है, हर ओर यही बात है. टूटते घरों में इस तरह से मकान बनते हुए देखता हूं तो अपने घर की दो साल पहले गिर चुकी दीवार भी याद आ जाती है.

इस नये निर्माण की नींव की कुछ ईंटें एक नयी फसल ग्‍वार से भी आई हैं. जो इलाका कुछ साल पहले अकाल की मार झेल रहा था वह अचानक ही इतना खर्च करने वाला हो गया तो इस फसल के कारण भी. नरमे कपास तथा किसी भी अन्‍य नकदी फसल की तुलना में कम लागत, मेहनत से तैयार होने वाली ग्‍वार की फसल तुरता लाभ देती है. भाव भी ठीक ठाक हैं. सारे समीकरणों का निचोड़ यही कि अगर किसान को उसकी फसल की सही कीमत मिले तो वह खुदमुख्‍तयार हो सकता है. नरेगा पर अरबों खरबों के खर्च को जायज बताने वाले नौकरशाहों और भाड़े के कलमकारों को इस तथ्‍य पर गौर करना चाहिए. वे सोचें की नरेगा अच्‍छे उद्देश्‍य के साथ शुरू की गई गलत योजना कैसे साबित हो गई? अपने भाई बंदों ने इसे और भी गलत ढंग से लिया.. मुफ्त के पैसे की योजना के रूप में. मेहनत की कमाई की बरकत को समझने वाले देश समाज में इस योजना के मनोवैज्ञानिक दुष्‍प्रभावों को समझना होगा. किसान और खेती बाड़ी का भला सही मेहनताने और सही कीमत से ही हो सकता है. इस लिहाज से अपना वोट नरेगा के खिलाफ है. इसने एक तरह से खेती बाड़ी को नुकसान पहुंचाया है.

खैर, अपने ही शहर के जिस अच्‍छे खासे गेस्‍ट रूप में ठहरना पड़ा उसकी रिसेप्‍शन के पास बड़ा सा एक्‍वेरियम रखा है. रंग बिरंगी मछलियों वाला. जब भी एक्‍वेरियम को देखता हूं तो यही सवाल उठता है कि ये खाती अघाती मछलियां भी कभी बड़ी होती हैं क्‍या? इतनी बड़ी कि दुनिया का कोई भी एक्‍वेरियम उनके लिए छोटा पड़ जाये और उन्‍हें समंदरों में छोड़ने के अलावा कोई विकल्‍प नहीं बचे. थार के इस सिरे में समंदर की परियों को इन सजावटी एक्‍वेरियम में देखता हूं तो अंदर से कुछ घुटता है. लेकिन कुछ कहता नहीं क्‍योंकि यह गेस्‍ट अपने दोस्‍त का है और अपने कई यार आजकल एक्‍वेरियम जैसा कमाऊ धंधा करते हैं!

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ब्राडगेज पटरियों के साथ चलकर आने वाले संदेशों में लोहे की गंध इस कदर हावी थी कि सिग्‍नल की बत्तियां हरा होने से मुकर गईं. सुबह ड्यूटी पर निकले लाइनमैन को संदेशों के कुछ टुकड़े छोटे पत्‍थरों, कुछ पास की कीकरों पर अटके दिखे. उसके हथौड़े से शब्‍दों का कोई मेल नहीं था इसलिए वह फिश प्‍लेटों को ठकठका कर आगे बढ़ गया. बताते हैं कि दूसरों के सफर से उकताए स्‍टेशन एक दिन आंदोलन पर चले गए और ट्रेनों ने इस मांग के साथ हड़ताल कर दी कि उन्‍हें बदलाव के तौर पर कुछ दिन समंदर में चलाया जाये.

उन्‍हीं दिनों पता नहीं कैसे पटरियों की सड़कों से दोस्‍ती हो गई. सड़कों ने उन्‍हें बताया कि बिना वजह कहां और कब कब टूट बिखर जाना है. तारों से उतरकर बिजली पटरियों में दौड़ने लगी और डिब्‍बे इंजिन को लेकर भाग गए. टिकटें सिस्‍टम को बुक कर रहीं थीं कि मौसमों का कोई यात्री वेटिंग लिस्‍ट में ना आये. खैर बात आई गई होती गर ड्राइवर शांत रहते. वक्‍त के ड्राइवरों की यूनियन ने सरकार के सामने मांग रखी कि वे ट्रेनें चलाते चलाते थक गए हैं इसलिए उन्‍हें कुछ दिन देश चलाने का मौका दिया जाए. उधर देश था कि वह अपने देश होने के गर्व में ही फूला जा रहा था और सरकार उसे चला चला कर कुप्‍पा हुई जा रही थी.

तो जो पहिए थे वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि वे ट्रेन को ढो रहे हैं या कि ट्रेन उन्‍हें. पुलों का अलग मसला था. वे चाहते थे कि उनके नीचे बहने वाले नदी नालों को रोक दिया जाए और उन्‍हें बहने दिया जाए. यानी वे चलें, नदियां रुकें. नदियों का जो पानी था उसने इतने साल पुलों के नीचे बहने का मुआवजा मांगा और कहा कि उसे डबल डेकर के फर्स्‍ट एसी में देशाटन कराया जाए. पानी की इस मांग पर पटरियों के आसपास के पेड़ इतने खुश हुए कि वे क्रांति क्रांति के नारे लगाते हुए ट्रेनों के साथ दौड़ने लगे. (गोया वे आज भी दौड़ते हैं.)

किरदारों के इस अकबकाये व्‍यवहार से कहानी क्‍या मोड़ लेगी यह सोचता हुआ बालकनी के फट्टे पर बैठा हूं. चढ़ता हुआ वैशाख है. थोड़ी देर पहले की बूंदाबांदी के बाद छितराए बादल वैसे ही चमक रहे हैं जैसे इन दिनों थार के धोरे चमकते हैं. चम चम चमके चांदनी ज्‍यूं चांदी के खेत. आसमान का कारिंदा थार के एक्‍सरे को चांदनी में देख रहा है. गेहूं की गमक से लहराते खेतों के दिन हैं. खेतीबाड़ी के लिहाज से सबसे हसीन रातों की रुत जब उत्‍तर भारत का प्रमुख अनाज कणक (गेहूं) समेटा जा रहा है.

खैर बात इतनी सी है कि उल्‍टबांसियां हमेशा अपवाद रहती हैं. वे जीवन का नियम नहीं बन पाती हैं. अमृता ने कहीं लिखा था-
कि दुनिया की हर बगावत एक ताप की तरह चढती है,
ताप चढ़ते हैं और उतर जाते हैं. 

चंदा मामा की वाईफ जिम जाती है और बच्‍चे स्‍कूल ? उसने पूछा था. हम अपनी पसंदीदा जगह बालकनी की सीढियों पर बैठे थे. उसके चंदा मामा सामने से चले आ रहे थे. उनका रास्‍ता कुल मिलाकर वही है जो सुबह सुबह सूरज बाबा का होता था. हवा में फगुनहट तारी है और उसने हमेशा की तरह अपना सवाल चुपके से मेरे हाथ पर रखा कि क्‍या चंदा मामा की वाईफ जिम जाती है? और कि क्‍या उनके बच्‍चे स्‍कूल जाते हैं? कोई जवाब नहीं था. अंदर वह जिस डोरेमोन को देखते हुए आई है उसके पास हर समस्‍या का समाधान करने वाला गैजेट है जिसे वह नोबीता से लेकर जियान तक सभी को देता रहता है. अलादीन की चिराग की तरह. अपन ने भी धीरे से मुस्‍कुरा कर कहा अपने डोरेमोन से पूछ लेना. उसने अपने इस्‍टाइल से ‘हूं’ कहा और सीढियां उतर कर अंदर चली गई.

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अपने यहां हाल तक टीवी नहीं था. जब वह दो ढाई साल की हुई तो खरीदा कि इस बड़े शहर के अपने छोटे से मकान में उसका मन लगा रहे. उसके साथ बीते डेढ दो साल में जी भर  टीवी देखा. तभी यह ज्ञान प्राप्ति हुई कि हमारे यहां बच्‍चों के नाम पर जो चैनल चल रहे हैं वे भयंकर ढंग से अनुवादित और नीरस हैं. नोबिता से लेकर शिनचेन, डोरेमेन से लेकर कराती जैसे जापानी कैरेक्‍टर हों या डरावने और मारधाड़ से भरे अमेरिकी चरित्र. बार्बी और सिंड्रेला के नाम पर पता नहीं किस दुनिया के भयभीत कर देने वाले षड्यंत्र दिखाये जाते हैं. इसी तरह एक सीरियल में भारतीय अभिनेता अभिनेत्रियों के आवाज की भयानक मिमिक्री करते चरित्र हैं. कोई भी अपने भारतीय परिवेश से मेल नहीं खाता. भीम, छुटकी और कालिया कहीं मुकाबले में नहीं!

निसंदेह हम बच्‍चों के लिए चड्ढी पहन के इक फूल दशकों पहले खिला था. अनुवाद और एडाप्‍टेशन का अद्भुत अंतिम उदाहरण. उसके बाद बच्‍चों के सीरियल के नाम पर कचरा परोसने की लंबी फेहरिस्‍तें हैं. यह सोचकर इस दौर के बच्‍चों पर दया आती है.

इधर खोजबीन की तो पता चला कि बच्‍चों में दुनिया के लिहाज से पांच श्रेष्‍ठ चैनलों में से तीन हमारे यहां नहीं आते हैं. एक कार्टून नेटवर्क है जिस पर सबसे बढिया कार्यक्रम शायद टाम एंड जैरी है. आज भी बच्‍चों को गुदगुदाने वाला सबसे बढिया कार्यक्रम जिसे बच्‍चों के साथ साथ आप हम भी इंज्‍वाय कर सकते हैं. पूरे घर के लोग. अपन बीबीसी के सीबीज़ को भी इसी श्रेणी का अच्‍छा चैनल मानते हैं जिसमें बच्‍चों की क्रि‍एटिविटी और जिज्ञासा को बनाये और बढाये रखने के कई कार्यक्रम आते हैं. लेकिन यह चैनल अपने ज्‍यादातर घरों तक नहीं पहुंचता.

यह हैरान करने वाली बात है कि बच्‍चों के लिए अधिकांश सबसे बढिया एनिमेशन फिल्‍में जापान या अमेरिका में बनी हैं. अमेरिकी आइस एज या वाल ई तो निसंदेह काबिले तारीफ है लेकिन अपन को जापानी माय नेबर टोटोरो इन सब पर भारी लगती है. इसके निर्माता मिया‍जाकि ने बाद में पोरको रोसो तथा पोनयो जैसी अद्भुत ए‍नीमेशन फिल्‍में भी बनाईं. इसके बाद रियो आती है. और हमारे यहां टूनपुर का सुपर हीरो, हनुमान या अर्जुन और दिल्‍ली सफारी जैसी कुल जमा फिल्‍में बनी हैं. दिल्‍ली सफारी इन सबमें अच्‍छा प्रयास है.

यह हैरान ही नहीं दुखी करने वाली बात है कि अपने भविष्‍य, अपने बच्‍चों के मनोरंजन व ज्ञान के प्रति हम इतने लापरवाह हैं कि इस काम को उन कंपनियों के भरोसे छोड़ दिया है जिनका एक मात्र काम अनुवादित या ऐसे ही कार्यक्रमों के जरिए अपना काम धंधा चलाये रखना है. यानी मान लिया गया है कि बच्‍चों को अच्‍छे कार्यक्रम दिखाने भर की जिम्‍मेदारी माता पिता की है चैनल और कार्यक्रम बनाने वालों का इससे कोई लेना देना नहीं. यहां अमेरिकी लेखक संपादक ग्रेग इस्‍टरब्रुक की बात याद आती है. इस्‍टरब्रुक के अनुसार जब टेलीविजन निर्माता यह कहते हैं कि बच्‍चों को टेलीविजन से बचाने की जिम्‍मेदारी उनके माता पिता की है तो वे खुद के लिए ही यह चेतावनी जारी कर रहे होते हैं कि उनके उत्‍पाद खाने लायक नहीं हैं.

इधर जब बच्‍चों के चैनल पर एडल्‍ट सीरियलों के एड या सेमी एडल्‍ट एड आते हैं तो अपने फिर डोरेमोन का ही मुंह ताकते हैं कि क्‍या इन चैनलों के इलाज का कोई गैजेट उसके पास नहीं है. शुक्र है, टोरेंट और यूट्यूब जैसे नेटवर्क का जिनकी बदौलत अच्‍छी फिल्‍में डाउनलोड कर हम अपने बच्‍चों को दिखा पा रहे हैं. 

(picture curtsy My Neighbor Totoro)

देश में शिक्षा प्रणाली को देखने वाले मानव संसाधन मंत्रालय को अगले वित्‍त वर्ष (2013-14) के लिए 65,867 करोड़ रुपये का बजट देने का प्रस्‍ताव है. दुनिया के 200 शीर्ष शैक्षणिक संस्‍थाओं में हमारा एक भी विश्‍वविद्यालय नहीं है और दिल्‍ली व चेन्‍नई जैसे महानगरों में नर्सरी जैसी कक्षाओं में प्रवेश के लिए लाखों रुपये का डोनेशन दिया जाता है.

दायीं ओर एक एक कर चार कुर्सियां लगी हैं. …नहीं बायीं ओर. सड़क पर चलने का जो नियम बचपन में सिखाया गया था उसके हिसाब से कुर्सियां बायीं ओर थीं. अपना दिशा भ्रम से बचने के लिए यही अचूक हथकंडा है. कहते हैं कि हर दिमाग दो अलग अलग तरह से काम करता है. कुछ लोग आंकड़ेबाजी में माहिर होते हैं तो बाकी तस्‍वीरों व नक्‍शों में. अपन दोनों ही मामलों में ब्‍लैंक से हैं. बायें दायें से लेफ्ट राइट का मामला जल्‍द समझ में आ जाता है.

खैर मुद्दा न तो दफ्तर में रखीं कुर्सियां थीं न उनके सामने आंख मीचे बैठी कंप्‍यूटर स्‍क्रीनें. मुद्दा क्रीम रंग कर वह टेलीफोन था जो कुर्सियों के सामने टेबल पर रखा था और बीच बीच में बजकर कुर्सियों की उंघ तोड़ देता और फिर मानों इधर उधर देखकर मुस्‍काराता. होना तो यह था कि फोन उठाकर नंबर डायल करता और बेटी के एडमिशन के लिए सिफारिश का जुगाड़ करता. ठीक यही करना था. यही मुद्दा था. लेकिन सोच सोच कर सोच के हालात खराब थे.

आपकी पार्टनर जब हर शाम को यह बताए कि किन किन बच्‍चों के एडमिशन कहां हो गए हैं, कितनी डोनेशन दी किसकी सिफारिश से हुआ है और आप यूं ही बड़बूजे खोद रहे हैं तो दिल्‍ली वाली यह चोट सीधे दिल पर लगती है. तब पता चलता है कि मूल्‍यों की जिस खेती को आप पाले हुए हैं उसके यहां अकालों का लंबा इतिहास है और पड़ोसी भ्रष्‍ट आचरण की खाद से लहलहाती फसलें ले रहे हैं. देखिए एसोचैम का सर्वे कहता है कि दिल्‍ली में नर्सरी में दाखिले के लिए आठ लाख रुपये तक की रिश्‍वत (डोनेशन) ली जा रही है. राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानी एनसीआर में नर्सरी व केजी में पढाई दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में पढने से भी महंगी है. तो सरकार संसद में स्‍वीकार करती है कि सीबीएसई को केरल से लेकर पंजाब और महाराष्‍ट्र से लेकर दिल्‍ली तक स्‍कूलों द्वारा कैपिटेशन फीस मांगने की शिकायतें मिली हैं. निजी स्‍कूलों में दाखिले के अपने अपने नियम व कायदे हैं. कहीं कोई पारदर्शिता नहीं.

दो साल की मशक्‍कत के बाद भी अगर आप अपनी बेटी का एक ढंग के स्‍कूल में एडमिशन नहीं करवा पायें तो निराशा कचोटती है. सवाल यह नहीं कि आप मूल्‍यों के पक्षधर हैं. बड़ी बात यह है कि सिस्‍टम चाहता है कि आप भ्रष्‍ट हों इसके अलावा आपके पास कोई चारा नहीं है. यह हमारी विकल्‍पहीन होती दुनिया है. जब बच्‍चा इसी भ्रष्‍ट सिस्‍टम से अपना करियर शुरू करता है तो आप कैसे उम्‍मीद रखेंगे कि वह वहां से एक ईमानदार नागरिक या कर्तव्‍यनिष्‍ठ अफसर बनकर निकलेगा?

यह विडंबना अपने जैसे कई पिताओं की है. खासकर सरकारी स्‍कूलों से किसी तरह पढ़ लिखकर दिल्‍ली, चेन्‍नई व बंबई जैसे महानगरों में आ फंसे युवाओं की. विडंबना है कि जिस शिक्षा को सर्वसुलभ और सस्‍ती होते जाना था वह महंगी और महंगी तथा आम लोगों की पहुंच से दूर होती गई. अपन ने कालेज तक की लगभग सारी पढाई सरकारी स्‍कूलों व कालेजों में पूरी की और फीस देने की कोई घटना याद नहीं है. किताबें भी पहले कक्षा पास कर गये छात्रों से मिल जाती थी. फैकल्‍टी के लिहाज से सरकारी स्‍कूलों का कोई मुकाबला नहीं रहा है. बीते एक दशक में जब से शिक्षा में बाजार घुसा है सब सत्‍यानाश हो गया. फीसें बढती गईं और गुणवत्‍ता में गिरावट आई. उलटा हुआ! 

तुर्रा यह कि दुनिया के 200 शीर्ष शैक्षणिक संस्‍थाओं में हमारा एक भी विश्‍वविद्यालय नहीं है. पिछले साल एक अध्ययन में कहा गया कि एमबीए जैसे कोर्स करने वाले 21 प्रतिशत छात्र ही नौकरी पाने के काबिल हैं. यानी 100 में से केवल 21 एमबीए ही नौकरी पर रखने जाने की योग्‍यता रखते हैं. मेट्रो क्रांति के अगुवा ई. श्रीधरन के अनुसार सिर्फ 12 फीसद इंजीनियरिंग छात्र ही नौकरी के लायक हैं. इन आंकड़ों के बीच अगर अपनी बेटी का पहली पक्‍की में दाखिला नहीं करवा पायें तो आप रोएं भले ही नहीं, उदास तो होंगे ही. अपने पास अगर सिफारिश कर सकने वाले नंबर हैं तो उन्‍हें डायल करने लायक भ्रष्‍ट भी हो जाएंगे. आप अपनी सोच लेना!

जमीर जाफरी साब ने कहीं कहा था-
जिससे घर ही चले न मुल्‍क चले
ऐसी तालीम क्‍या करे कोई. 

Posted by: prithvi | 03/03/2013

इक दोस्‍त का बयान

तनहा खड़े पेड़ पर खिली हुई कोंपल.

-किशोर चौधरी
व्यापार सबसे बड़ी विधा है। इसलिए कि ये हर विधा को अपना हिस्सा बना कर उसका उपयोग कर सकती है। इस prithvi1तरह की खूबी के कारण इसका आचरण भी स्वछंद हो जाता है। मैंने सुना है कि प्रेम, दया, करुणा और रिश्ते जैसी अनुभूतियों तक में व्यापार का आचरण आ जाता है। मैं ऐसी किताब के बारे में बात करना चाहता हूँ जिस विधा को व्यापार ने निगल लिया है। इस किताब को हाथ में लेने पर मुझे बेहद खुशी हुई और आपका भी हक़ है कि आप इस खुशी के साझीदार हो सकें और इसे अपना बना सकें। यह किताब इसलिए महत्वपूर्ण और संग्रहणीय है कि इस किताब ने फीचर विधा के खत्म न हो जाने की उद्घोषणा की है।  फीचर उस समाचार को कहते हैं जो तथ्यों के साथ मानवीय अनुभूतियों और संवेदनाओं को प्रभावी ढंग से रेखांकित करे। समाचार की नीरसता में जीवन का रस घोल सके।

मैंने सबसे पहले रांगेय राघव के लिखे हुये फीचर पढे थे। उनमें मानव जीवन के दुखों की गहनतम परछाई थी और ये भी था कि जीवन फिर भी वह नदी है जो सूख कर भी नहीं सूखती। इसके बाद मुझे नारायण बारेठ के लिखे हुये फीचर पढ़ने को मिले। वे सब पत्रिका के कोटा संस्करण और कुछ मासिक साप्ताहिक पत्रिकाओं में छपे थे। इसके बाद कई सालों तक एक आध फीचर पढ़ने के लिए जनसत्ता और नवभारत टाइम्स जैसे समाचार पत्रों का इंतज़ार करना होता था। रेडियो प्रसारण में फीचर आकाशवाणी और बीबीसी पर खूब लोकप्रिय रहे। इन माध्यमों ने समाचार पत्र-पत्रिकाओं से बेहतर फीचर बुने लेकिन जो सुख फीचर को छपे हुये कागज पर पढ़ने को मिलता है, वह मुझे कहीं और नहीं मिला।

हाल के समय में व्यापार ने समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और सभी तरह के माध्यमों ने फीचर की हत्या कर दी है। मैंने फीचर के लिए संघर्ष करते हुये आखिरी आदमी रविश कुमार को देखा। “रविश की रिपोर्ट” को देखते हुये टीवी के अत्याचार से मुक्ति मिल जाती थी। जिस तरह की खबरों के जरिये टीवी ने दर्शकों को प्रताड़ित किया उसी के बीच ये फीचर सुख का कारण रहे। मुझे मालूम नहीं कि फिर उसका क्या हुआ मगर ये सच है कि वह आखिरी कार्यक्रम था जिसने मुझे टीवी के सामने खुशी से बैठने को प्रोत्साहित किया। इसके सिवा मेरी नज़र में सिर्फ एक ही आदमी है, पृथ्वी परिहार। आप पीटीआई के लिए काम करते हैं। इस किताब को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। जो दोस्त कभी पत्रकार बनना या स्वतंत्र लेखन करना चाहते हैं, उनकी किताबों की अलमारी में इस किताब को ज़रूर होना चाहिए। किताब है, कांकड़। इसके प्रकाशक हैं, बोधि प्रकाशन। इसका मूल्य है दस रुपये किन्तु ये दस किताबों के सेट का हिस्सा है। इसे आप किस तरह पा सकते हैं ये जानने के लिए इस नंबर पर फोन कर सकते हैं- 082900 34632

कांकड़, आत्मा की खिंची हुई एक अदृश्य लकीर है. जिसके इस पार ह्रदय से बंधी हुई गाँव के जीवन की उदात्त और गुनगुनी आवाज़ें हैं और उस पार शहर के जीवन का आरोहण करते हुए अपने साथ चले आये स्मृतियों के लम्बे काफ़िले हैं. समय की अपरिभाषित गति की कसौटी पर छीजते जा रहे दृश्यों और अनुभवों के कोलाज में बचे हुए रंगों को सहेज लेने का एक ठिकाना है. इस अविराम निष्क्रमण में गाँव की सचमुच की भौतिक कांकड़ को डिजिट्स में बदल देने का अनवरत काम है. इसकी खुशबुएँ रेगिस्तान में बहते हुए पानी, आँखों के सूखे हुए पानी और दिलों के उजड़े हुए पानी की कहानी भी कहती हैं. यह जितना आत्मीयता से भरा है, उतना ही इसके खो जाने के डर और फिर उसे बचा लेने के हौसले से भरा हुआ है. यह रेगिस्तान के जीवन की कला, संस्कृति, साहित्य और जिजीविषा का एक रोज़नामचा भी है. इसमें जो कुछ भी दर्ज़ है, वह सब ब्योरे न होकर एक आर्द्र पुकार है. यह अपने अनूठे रिवाजों, अनछुई निर्मल बोलियों और रेत के स्वर्ण रंग में भरे हुए असंख्य रंगों की झलक से भरी हुई एक तस्वीर है.

***
मैं इसके पहले पाठकों में हूँ. मेरे भीतर के खिले हुए रेगिस्तान ने कांकड़ को पढ़ते हुए पाया कि ऊँटों के टोले और लोकगीतों के काफ़िले चले आ रहे हैं. लोक कविता और कहानी के लम्बे सिलसिले हैं. कोई बदलते हुए रेगिस्तान की कहानी कह रहा है और मैं सुनता जा रहा हूँ. मैंने चाहा कि इस कांकड़ पर बार बार लौट कर आना चाहिए. यहीं दिखाई देगी रेत के धोरे पर तनहा खड़े हुए पेड़ पर खिली हुई नई कोंपल.

***
(कांकड़ के चुनिंदा आलेख अब पुस्‍तक रूप में भी उपलब्‍ध हैं. बोधि प्रकाशन, जयपुर ने अपने जन संस्‍करण के तहत सौ रुपये में दस किताबों के सैट में कांकड़ को पुस्‍तक रूप में प्रकाशित किया है. मित्र किशोर चौधरी ने कांकड़ की समीक्षा अपने ब्‍लाग हथकढ पर की है. वहीं से इसे साभार लिया गया है. )

निराशा की धुंध में उम्‍मीदों का सूरज तलाशते इस मौसम में भी आरोन (Aaron Swartz) का चले जाना धोखा सा लगता है. मैं इस खबर पर विश्‍वास ही नहीं करना चाहता कि 26 साल के इस बंदे ने दो दिन पहले आत्‍महत्‍या कर ली. आरोन की मौत, इंटरनेट विशेषकर आनलाइन ज्ञान पर सबके अधिकार की लड़ाई के लिए झटका ही नहीं बल्कि इस बात का एक और पुख्‍ता सबूत है कि सारे सिस्‍टम गैरबराबरी के लिए बने हैं चाहे अमेरिका हो या भारत. साथ ही यह घटना बताती है कि किसी भी संवेदनशील युवा के लिए हमारी समाज की जमीन कितनी प‍थरीली हो चुकी है.

शायद यह इंटरनेट पर सेंसरशिप संबंधी अमेरिकी कानून सोपा के खिलाफ अभियान संबंधी कोई खबर थी जब पहली बार इस नौजवान का नाम पढ़ा. फिर उसकी प्रोफाइल देखी तो उसके नाम के आगे कंप्‍यूटर प्रोग्रामर, साफ्टवेयर डेवल्‍पर, लेखक, राजनीतिक कार्यकर्ता, इंटरनेट एक्टिविस्‍ट और कंप्‍यूटर का चमत्‍कार जैसे कई विश्‍लेषण थे. तेरह चौदह साल की उम्र में उसने आरएसएस की शुरुआती लिपि‍ लिखी और रेडिट कंपनी का सह संस्‍थापक बना. उसने विकीपीडिया से पहले ही नि:शुल्‍क आनलाइन इनसाइक्‍लोपीडिया बना दिया था. बाद में इस क्षेत्र में उसने क्‍या नहीं किया. कंप्‍यूटर महारथी के रूप में, इंटरनेट की आजादी के समर्थक और ज्ञान पर सबके समान अधिकार के आंदोलनकर्ता के रूप में. ज्ञान के संसाधनों की आजादी और उनके इस्‍तेमाल में समानता के लिए उसकी प्रतिबद्धता व लड़ाई मानीखेज है. ज्ञान को अपनी बपौती समझने और इससे बड़ी कमाई कर रही कंपनियों तथा येन प्रकरेण इंटरनेट की आजादी को सीमित करने के प्रयासों में लगी सरकारों के खिलाफ उसकी हुंकार मायने रखती थी.

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सोपा के खिलाफ लड़ाई का आगाज करते हुए आरोन ने कहा था कि इंटरनेट के जरिए संपर्क की आजादी ठीक वैसे ही है जैसे अभिव्‍यक्ति की आजादी जो हमें संविधान देता है. उसने कहा था कि नयी प्रौद्योगिकी ने आजादी को नये रंगरूप में हमारे सामने पेश किया है जो कहीं अधिक गहरी व मजबूत, मानीखेज है. वह वैश्विक सूचना संसाधनों के इस्‍तेमाल में समानता व आजादी का घोर समर्थक था.

पिछले साल इन्‍हीं दिनों उसे जेस्‍टर के आनलाइन संग्राहलय से अकादमिक जर्नलों को कथित अवैध रूप से डाउनलोड करने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया. कहते हैं कि इसके बाद बार बार की पुलिसिया पूछताछ और व्‍यक्तिगत त्रासदियों के चलते वह जमाने और व्‍यवस्‍था से लगातार निराश होता गया और उसे लगा कि जीने का कोई मकसद नहीं है. इस तरह से एक और प्रतिभा समय से पहले मिली प्रसिद्धि की दुश्‍वारियों की बेली चढ़ गई. रपटें बताती हैं कि समय के साथ आरोन बाहर से चर्चित और अंदर से अकेला होता गया. लेकिन उसने अपने दोस्‍तों को जी भर कर प्‍यार किया. उम्र में कहीं बड़ी क्विन से प्‍यार हुआ, रिश्‍ता रखा और एक अदद गुरू, साथी की तलाश में भटकता रहा. साल भर पहले जब से अमेरिकी सरकार उसके पीछे पड़ी उसके भीतर निराशा गहराती गई और अंतत: उसने अपने जीवन के सिस्‍टम को शटडाउन कर दिया.

उसका यूं चले जाना एक कथित भरे पूरे समाज और दुनिया की सबसे भरपूर ताकतवर सरकार के मुंह पर तमाचा है. एक समाज जो अपनी संभावनाशील प्रतिभाओं को सहेज नहीं पा रहा और अधिकारों के नशे में चूर सरकार, प्रतिभाओं से खिलवाड़ करती है.

26 साल.. यह कोई जाने की उम्र नहीं होती. डब्‍ल्‍यूडब्‍ल्‍यूडब्‍ल्‍यू का विकास करने वाल सर टिम बर्नर्स-ली ने आरोन के निधन पर कहा,’हम में से एक कम हो गया, हमारा एक बच्‍चा चला गया, चलो रो लेते हैं.’ आरोन की लंबे समय तक साथी रही क्विन ने उसे याद करते हुए डब्‍ल्‍यू एच आडन की एक कविता का जिक्र किया है…

Stop all the clocks, cut off the telephone,
Prevent the dog from barking with a juicy bone,
Silence the pianos and with muffled drum
Bring out the coffin, let the mourners come.

Shoda Koho, Moonlit Sea, c. 1920साल के आखिरी दिनों में होना तो मेड़ता में था. मीरां बाई के मेड़ता में. सोते जागते कई बार इस कस्‍बे से गुजरे लेकिन कभी ठहरना नहीं हुआ. इस बार ठहरने के लिए जाना था. पर दिल्‍ली के हद दर्जे तक व्‍यथित कर देने वाले माहौल में नहीं जा पाये. कुछ घटनाएं हमारे अस्तित्‍व, हमारे होने के विश्‍वास को हिला देती हैं और अचानक लगता है कि कुहरा बाहर से ज्‍यादा भीतर भर गया है. न कुछ दिखाई दे रहा है न सूझ रहा है. यह भीतरी अंधेरा अधिक खतरनाक होता है.

ऐसे ही कुहरे भरे दिनों में पता चला कि ‘अभिनव राजस्‍थान’ मेड़ता में सम्‍मेलन कर रहा है. अशोक चौधरी, भारतीय प्रशासनिक सेवा (सिविल सर्विसेज) छोड़कर आये और यह अभियान शुरू किया. उनका मानना है कि सरकारी योजनाओं का सही सही लाभ आम लोगों को मिले तो हालात बदल सकते हैं.

यानी सिस्‍टम में अगर कमी है तो उसे दूर किया जा सकता है लेकिन इसके लिए जरूरी है कि जिनको लाभ मिलना है उन्‍हें योजनाओं की जानकारी रहे. लोग अपने हक के लिए जागरूक रहें. वे सरकारी योजनाओं के कार्यान्‍वयन पर निगरानी रखें और किसी भी कमी के खिलाफ आवाज उठाएं. अपन जो समझे हैं, उनकी लड़ाई सिस्‍टम के खिलाफ नहीं उसे बेहतर बनाने, उसका अधिकतम फायदा लेने के समर्थन में है. शासन प्रणाली जिसे फैशन में सिस्‍टम कहते हैं, उसे लेकर निराश होने वाले दिनों में अशोक भाई और अभिनव राजस्‍थान जैसे प्रयास अपने पैरों के नीचे खिसकी हौसले की जमीन को यूं नहीं थाम लेते हैं. वैचारिक तौर पर लाख विभेद हों, लेकिन इस पर तो एक राय ही है कि हमें खुद पर, अपने सिस्‍टम पर भरोसा रखना होगा. बेहतर कल की उम्‍मीद और उसके लिए प्रयास करने का हौसला रखना होगा. 

किसी सयाने ने कहा है कि धीरे धीरे हमें चीजों की आदत हो जाती है. हम युद्ध जैसी चीजों के भी आदी हो जाते हैं. पाश के लिए यही स्थिति सबसे खतरनाक होती है. बीते साल दिल्‍ली और देश में जो हुआ वह इस जकड़न के टूटने का संकेत है. एक समाज जिसे सदियों से बहन बेटियों के खिलाफ होने बदतमीजी की आदत हो गई थी वह उसके आवाज उठा रहा है तो इसके गहरे माने हैं. सबसे बड़ी बात कि यह आवाज उस पीढी से आ रही है जिसे हम एक्‍स या वाई जेनरेशन कहते  हैं. यानी बात दूर तलक जाएगी इसकी उम्‍मीद की जा सकती है.  

राजस्‍थानी की एक बहुत चर्चित कविता की शुरुआत है ‘तू बोल तो सरी जबान खोल तो सरी’ (तू बोल तो सही, जुबां खोल तो सही). एक समाज जिसके बारे में कहा जाता है कि उसकी हवेलियों को बहुओं की ऊंची आवाज और बच्चियों की किलकारियां सुनना अच्‍छा नहीं लगता, वहां लगभग साढे चार सौ साल पहले मीरां बाई तमाम वर्जनाओं के खिलाफ खड़ी ही नहीं हुई, ताउम्र रूढियों से लोहा लिया. आवाज तो उठानी ही होगी.  और अगर कहीं से आवाज उठती है तो उसको थाम लेना होगा. 

निराशा के ऐसे दिनों में मुझे नादेश्‍दा मेंडलस्‍टेम (nadezhda mandelstam) भी याद आती है. स्‍टालिन की सत्‍ता खिलाफ कविताएं रचने वाले अपने पति के साथ निर्वासन भोगती, गिरफ्तारी से बचने के लिए गांव दर गांव घूमती नादेश्‍दा. नादेश्‍दा ने स्‍टालिन के शासन में लगभग बीस साल निर्वासन भोगा. आजीविका के लिए दिहाड़ी पर पढाने का काम किया. गिरफ्तारी के दौरान पति की मौत के बाद उनकी लेखकीय विरासत को संजोये रखने के संकल्‍प के साथ एक बर्फीली धरती पर संघर्ष करती रही और पहली किताब उम्‍मीदों के खिलाफ उम्‍मीद या होप अगेंस्‍ट होप (Hope Against Hope) छपवाई.

हमारे आसपास की, नाउम्‍मीदी और निराशा की काली दीवारों पर नादेश्‍दा जैसे कई नाम लटृ्टू से यूं ही नहीं चमकते रहते. नादेश्‍दा का रूसी अर्थ होप याने उम्‍मीद होता है. और उम्‍मीद इक जिंदा शब्‍द है.

(painting shoda koho, Moonlit Sea, c. 1920, curtsy net)

Horizon of Hope - 48x96

स्‍याह अंधेरी रजाइयों में दुबके टीले सन्‍नाटों के जाले बुनते हैं और रेत का समंदर तूफानों के सपने देखता है. मिंगसर (मार्गशीर्ष) की ठंडाती, लंबी रातें दिनों की खुसर फुसर कर गहराती रहती हैं. हमारा एसयूवी राष्‍ट्रीय राजमार्ग संख्‍या 15 पर दौड़ रहा था. रेतीले थार में अंधेरे को चीरता हुआ. थार के राजमार्ग, जहां हर वाहन अपनी रोशनी खुद लेकर चलता है. अंधेर पख(वाड़ा) होने के कारण रात कुछ ज्‍यादा ही अंधेरी लगती है और शीशे के बाहर कुछ नहीं दिखता.

शायद मूंगफली के खेत रहे होंगे. या सरसों के. तारामीरा के. कुछ तो बोया ही होगा. छोले (चने) की चटनी शाम को ही भोजन में थी. अधखुली आंखों से देखता हूं, सज्‍जे हाथ की ओर बीकानेर पीछे छूट रहा है. थार के गांव कस्‍बे अब भी रात में तानकर सोते हैं और जेठ आषाढ में तो दुपहरियों में भी उंघते नजर आते हैं. यही रस्‍ता नोखा, नागौर होते हुए थार को पार कर अरावली पर्वतमाला तक पहुंचाता है.

अकेले होते ही अंधेरा शातिर हो जाता है. गहराने लगता है और ईमेल के इनबाक्‍स में पड़े खेदपत्र को जहन पटल पर रख देता है. आवेदन से खेदपत्र के बीच का दौर अद्भुत सपनों भरा होता है जब हम देखते हैं कि समंदर उठकर बादलों से पानी मांगने चला गया या कि पाताल ने आसमान को सर पर उठाकर जमीन पे पटक दिया. लेकिन खेदपत्र आने के बाद अचानक सारी चीजें फिर जमीन पर आ जाती हैं.

यह यात्राओं की खूबी है कि वे विफलताओं की धूल को उड़ाती रहती हैं और हम किसी अगले सफर की तैयारी में पिछली सारी विफलताओं पर शोक सभाओं को मुल‍तवी कर आगे बढते जाते हैं. इधर के सालों में अगर डिप्रेशन बढा है तो इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि हमने सफर करना छोड़ दिया. किसी ने कहा था कि यात्राएं हमें बाहर ही नहीं ले जाती, वे हमें अपने भीतर के उस स्‍पेस में भी ले जाती है जहां जाने से हम प्राय: कतराते रहते हैं. यात्राएं करनी चाहिएं.

देशनोक के आसपास रोशनी में खेतों में मोडी (काट छांट दी गई) खेजड़ियां दिखती हैं. सीधी और लंबी जड़ वाली खेजड़ी भी थार की अद्भुत देन है जिसकी जड़ से लेकर छोडे (छिलके), लकड़ी, पत्तियां और फळी तक काम आती है. इस मौसम में खेजड़ियों को कांट छांट दिया जाता है ताकि आने वाली गर्मियों से पहले वे फल फूलकर तैयार हो सकें. अपन भी आंखों की कोरों से निकालकर खेदपत्र के छींटों को मोडी खेजड़ियों की ओर उछाल देते हैं…. कि उम्‍मीदों की नयी कोंपले खिलेंगी.

सूरज बाबा के आने से पहले हम सूर्यनगरी में थे. एसयूवी से 500 किलोमीटर की दूरी सिर्फ चार घंटे में पूरी कर.

(Painting curtsy net- Horizon of hope by Laura Harris)

खुशबू तो मिट्टी में होती है, बारिश तो बस उसकी याद दिलाती है. जिन लोगों की नाड़ मेह पानी और माटी से बंधी है उनके लिए ये पंक्तियां गहरे मानी रखती हैं. किशोर चौधरी की कहानियां ऐसी ही छोटी छोटी सी बातों से बुनी होती हैं जो आखिर तक बांधे रखती हैं. वे बिंब रचने के महारथी हैं, भाषा और भाव उनके सबसे मारक हथियार हैं. उनका पहला कहानी संग्रह ‘चौराहे पर सीढियां’ हाल में आया है. 

किशोर की बात की जाए तो वे किसी श्रेणी के रचनाकार नहीं हैं. उनकी अपनी श्रेणी है. अपनी बातें और कहने का अपना ढंग. उनके चरित्र हमारे पास के ही किसी चौराहे पर सीढियों से उतरते हैं और चित को बींध देते हैं. कई बात लगता है कि उनकी कहानी हमारे पास बैठकर अपनी बात कह रही है. हम उसे देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं. कहानी कहने के उनके लहजे, शैली के बाद हमें अपनी भाषा से प्रेम करने का मन होता है. ठेठ थार में रहकर हिंदी में इतनी मिठास से लिखना इस दौर की पीढी में हर किसी के बस का नहीं होता. 

वे अपनी कहानियों में छोटी छोटी बातों को इतने सरल ढंग से कह जाते हैं. जैसे- कौन किसको खराब करता है, सब आप डूबते हैं (कहानी-अंजलि तुम्‍हारी डायरी से), मी‍ठी जुबान वाले धोखेबाज ही हुआ करते हैं या कि सीढियों की उपयोगिता घर के मन पर है, उनका खुद का कोई अस्तित्‍व नहीं होता (कहानी-चौराहे पर सीढियां). बरसात में अवसर सबके लिए बराबर होते हैं मगर चरित्र की फसल की जगह मौज की खरपतवार ज्‍यादा फलती फूलती है (खुशबू बारिश की नहीं). भय और लालच से बुनी गयी इस दुनिया में बस एक इंतजार स्‍थायी है, जो आखिरी वक्‍त जब दुनिसा से थक हार जायेंगे तब भी बचा रहेगा (बताशे का सूखा पानी).

निसंदेह रूप से कोई कहानी या पूरी किताब पाठक को नहीं बांधती. उसका कुछ बातें या पंक्तियां ही दिल को छूती हैं. इस कहानी संग्रह में चौदह कहानियां हैं. भाषा, शिल्‍प और प्रवाह के लिहाज से वे कहीं न कहीं जरूर चौंकाती हैं. जैसे कि संजय व्‍यास ने अपने ब्‍लाग पर लिखा है कि परंपरा में मिली किस्सागोई, स्थानीय मुहावरे और परिवेश से ठेठ देसीपन को सुरक्षित रखते हुए किशोर की कहानियों का संसार विशिष्ट रूप से मौलिक है. वे जटिल मनोभावों और उनकी ऊहापोह के शिल्पी हैं. उनके यहाँ अमूर्त भाव भी छुए जा सकते हैं, वे कई रंगों में रंगे हैं, उन्हें कभी किसी कोने में तो कभी एकदम सामने देखा जा सकता है.लगता है जैसे वे टोकरी में पड़े फल हैं.

इस कहानी संग्रह से एक और महत्‍वपूर्ण पहल को समझना होगा. किशोर की ये कहानियां किसी कतिपय प्रतिष्ठित या गैर प्रतिष्ठित पत्रिका में नहीं छपीं. वे सबसे पहले अंतरजाल यानी ब्‍लॉग पर आईं और वहां से सीधे प्रिंट में. किताब ने आनलाइन प्रीबुकिंग के लिहाज से रिकार्ड प्रदर्शन किया है. इसे सोशल मीडिया की बढ़ती ताकत व पहुंच के रूप में देखना होगा. किशोर ब्‍लागिंग व सोशल नेट‍वर्किंग के जरिए पढे गए हैं. उसके बाद मित्रों के बार बार आग्रह से प्रकाशित हो रहे हैं. बीकानेर के सिद्धार्थ जोशी ने इसे सकारात्‍मक पहल मानते हुए लिखा है कि आने वाले दिनों में ऐसी और कई अच्‍छी और महत्‍वपूर्ण पुस्‍तकें ब्‍लाग अथवा अंतरजाल के माध्‍यमों में अच्‍छी खासी स्‍वीकृति पाने के बाद बाजार में आ सकती हैं. 

किशोर अपनी शीर्षक कहानी में कहते हैं कि जहां सीढियां खत्‍म होती हैं वहां रास्‍ते शुरू होते हैं. उनका यह कहानी संग्रह निश्चित रूप से एक नये रास्‍ते की शुरुआत है.

चौराहे पर सीढियां को आनलाइन यहां खरीदा जा सकता है.

Posted by: prithvi | 08/10/2012

ला इसला बोनिता

जिंदगी के उन अंधेरे कोनों में निराशाओं के जाले और हताशाओं की गिरती हुए पपड़ियां थीं. आंखों की सीलन इस कदर दीवारों में बैठ गई थी कि हर वक्‍त बदन ठिठुरता रहता. इन्‍हीं कोनों में, सुबहें धुंधलकों में खोईं और शामें हद दर्जे तक निराश करने वाली थीं. तब मौसमों की बात करना बेमानी हो गया था और इतिहास केवल उनका लिखा गया जो दिखते हुए, बोलते थे. बताते हैं कि मौन को एक सिरे से खारिज करने वाले ऐसे ही किसी चीखते समय में एमी वाइनहाउस ने लव इज ए लूजिंग गेम जैसे गीत गाये और जो बोल नहीं पाई उसे आत्‍महंता होने की हद तक गोदनों के रूप में अपने जिस्‍म पर गुदवा लिया.

जिंदगी के उन अंधेरे कोनों में सांसों की डोरियां और पतली होकर आपस में इतनी उलझ गईं थीं कि कोई सुलझाना तो दूर सुलझाने की सोच तक नहीं  पाया. टेबल के एक कोने में ऐशट्रे अधजली यादों की सिगरेटों से भरी थी और हवा में बेवफाई सा कड़वापन था. ऐसे ही अंधेरे उदास कोनों में छोटे होते दिनों ने हिसाब किया. हिसाब किया कि.. स्‍नेह जैसी कोई चिट्ठी उनके इस पते पर नहीं आई.. हां, आए तो अपेक्षाओं-उपेक्षाओं के भारी बेरंग (खत), जिनको छुड़वाने के लिए उन्‍हें अपनी कतरा कतरा उम्‍मीदें भी डाकिए को सौंपनी पड़ीं. थामने वाले से मांगने वाले हाथ ज्‍यादा थे. हौसला एक शब्‍द था जिसे दूसरी भाषा का बताकर खारिज कर दिया गया.

यानी बही खाते में घाटा था, घाटे का ब्‍यौरा था. लाभ के खाने में शून्‍य और कई शून्‍य थे.

बताते हैं कि उन्‍हीं दिनों रोशनी की सबसे बड़ी अदालत ने जिंदगी के उन अंधेरे कोनों को अतिक्रमण मानते हुए ढहाने का आदेश दिया. अदालत ने यह कदम स्‍वत संज्ञान से उठाया था. और इस खुशी में रातें इतनी रोईं कि उनकी आंखों का पानी आपके खेत की फसलों पर ओस के रूप में जम गया. शायद जब तक आप यह वाक्‍या (कहानी) पढ़ रहे हों, उम्‍मीदों के कारिदें उन कोनों को मिटा चुके होंगे जहां पड़े पियानो पर ग्‍लूमी संडे की धुन बजती रहती थी.

क्‍योंकि दिन आजकल मडोना के ला इसला बोनिता पर झूमते हैं.

इतिहास में दर्ज है कि यह गाना माइकल जैक्‍सन को गाना था लेकिन मडोना ने गाया और क्‍या गाया? उनके सबसे प्‍यारे गानों में से एक है. यह एक सुंदर द्वीप का सपना है, एक सुबह, सूरज और प्रेम का ख्‍वाब है. ठीक वैसा ही सपना जिसे सीलन और अंधेरे से भरे कोनों में बैठे दिनों ने निराशाओं के भंवर में भटकने से पहले देखा था. ये दिन लव इज ए लूजिंग गेम गाते हुए एमी की तरह आत्‍महंता हो जाएं इससे पहले उन्‍हें ला इसला बोनिता सुनाना जरूरी हो गया है.

ऐसा रोशनी की सबसे बड़ी अदालत के फैसले में लिखा गया था.

(आप गाना यहां सुन सकते हैं.)

Posted by: prithvi | 23/09/2012

उड़ने वाले कछुए

मानसून की लौटती बारिश में नहाई धूप ने मौसमों का जो डियो लगाया है उसमें दशहरे की खूश्बू आती है. दिन दीवाली से नीम नीम, शहद शहद हैं. आंख बंद कर हवाओं से लिपटता हूं तो बता देती हैं कि रोशनियों के दिये किसी ने जला रखे हैं. हर साल में कहां दो महीने होते हैं. यह दूसरा भादो है और उतर रहा है. पिछली बालकनी से झांक रहा चांद शायद थक कर सो गया है और सामने की बालकनी से दूर पूर्व में रोशनी दरवाजे दरवाजे खोल रही है.

सुबह के चारेक बजे होंगे. प्‍यास के साथ नींद तड़क कर टूट जाती है. जमीन पर सोना अब भी अच्‍छा लगता है. संडे को स्‍कूल नहीं जाने की निश्चिंतता उसके चेहरे पर देखी जा सकती है जो कल खांसी जुकाम में भी छुप छुप कर ‘कोल्‍ड ड्रिंक’ पी रही थी. शरारती बंदर.. कहकर खेस उसके ऊपर कर देता हूं. कूलर बंद करने के दिन अभी नहीं आये हैं. निराश होने के सौ (बे)कारणों के बीच खुश होने के कतरा कतरा क्षण हमारे जीवन में मौसम ले आता है, इससे अच्‍छा क्‍या होगा!

रात सोते सोते पढ़ा था कि ‘बर्फी’ को आस्‍कर के लिए भेजा जा रहा है. विदेशी फिल्‍म की श्रेणी में. सिस्‍टम पर बैठते ही उसका ख्‍याल हो आता है… इधर की तमाम ओढी गई व्‍यस्‍तताओं के बावजूद पिछले दिनों यह फिल्‍म देखी.. गंगाजल, हासिल, चकदे इंडिया और अब बर्फी. बीते दस साल में यह चौथी बालीवुड फिल्‍म हैं जिसे सिनेमा हाल में जाकर देखा. पूरे परिवार के साथ पहली. अच्‍छी फिल्‍म, शायद नहीं..प्‍यारी फिल्‍म. लाइफ इन मेट्रो इससे अलग टेस्‍ट की अच्‍छी फिल्‍म थी. अनुराग बसु के लिए दिल में तभी से दिल में जगह है जो बर्फी से और पक्‍की हो गई.

फिर भी आस्‍कर के लिए इसे भेजा जाना.. जमा नहीं. अनुराग (बसु) भाई माफ करना. प्‍यारी व अच्‍छी फिल्‍म होना और शानदार, श्रेष्‍ठ और सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍म होना अपनी नज़र में अलग अलग मामला है. (नहीं पता कि) सुप्रान सेन ने किन बाकी 19 फिल्‍मों में से छांटकर इसे निकाला है. निसंदेह यह उनमें से बेहतर होगी लेकिन इतना तय लगता है कि या तो सेन साहब आस्‍कर वाली फिल्‍में नहीं देखते या उनकी सोच हमारे यहां रिकार्ड बनाने वाले तीरंदाजों सी है जो राष्‍ट्रीय रिकार्ड पर रिकार्ड बनाने के बावजूद ओलंपिक में क्‍वालीफाइ तक नहीं कर पाते. दौड़ अगर कुएं की है तो ठीक है.. लेकिन पार अगर समंदर करना है तो भाई उस स्‍तर का प्रदर्शन और स्‍टेमिना भी चाहिए.

इधर दो फिल्‍में बार बार दिमाग में आ रही हैं. बहमन घोबादी की टर्टल केन फ्लाई (Turtles Can Fly) और अपने ऋतुपर्णा घोष की ‘रेनकोट’. टर्टल तो खैर अलग थीम की अलग ऊंचाई वाली फिल्‍म है. रेनकोट से तुलना करें तो भी बर्फी.. की मिठास फीकी लगती है. तो अनुराग भाई यू जस्‍ट कीप इट अप.. डोंट गेट अवे विद दिस नामिनेशन. अपना तो यही मानना है कि फिल्‍म ऐसी होनी चाहिए जो खुद बोले, उसे किसी विज्ञापन या शोशेबाजी की जरूरत नहीं हो (film that speaks for itself; no advertising needed).

 रोशनी ने दरवाजा पूरा खोल दिया है. चाय पीने का मन हो रहा है. उठकर किचन में आ जाता हूं. 

(फोटो फिल्‍म बर्फी से एक स्टिल साभार)

सामने बन रही बिल्डिंग से उसकी शिकायत यही है कि उसने हमारी हवा रोक ली और गर वह ‘छोटे भीम’ जितनी स्‍ट्रांग हुई तो इनको स‍बक सिखाएगी. वह आजकल जब भी बालकनी में मेरे साथ बैठती है तो यह मुद्दा उठ ही जाता है. फिर वह अपने छोटे हाथों और बड़ी आंखों से समझाने की कोशिश करती है कि बादल कैसे बनते हैं और कैसे बारिश होती है. थोड़ी देर खामोश हो जाती है और कहती है अबकी बार अच्‍छी बारिश नहीं हो रही ना, पहली (पिछली) बार तो हम खूब नहाए थे. टप टप टप.. वह अपनी रौ में बारिश की कहानियां बताने लगती हैं.

ये बिल्‍डरों के दिन हैं. बारिशों के नहीं!  इन दिनों ने हमें न तो जमीन पर रहने दिया है और न जमीन का ही.  

इस साल सामान्‍य से कम बारिश के आंकडे़ अखबारों में है. रुखे सूखे सावन के बाद भादों की उमस में ये आंकड़े टीसते हैं. आंकड़े, हालात का एक पहलू भी ढंग से बयान नहीं करते. इनमें यह तो बताया जाता है कि अबके सामान्‍य मेह नहीं हुआ. बारिश कम हुई है लेकिन कितनी हुई, इसका न तो कोई जवाब है, न सवाल ही उठाया जाता है! बारिश हुई नहीं के तथ्‍य को सामान्‍य से थोड़ी कम बारिश के कुतर्क तक लाने में जो खपाई जा रही ऊर्जा हैरान परेशान करती है.

भ्रम इस कदर रचा गया है कि बारिश को अंगुलियों से नापने वाला गांव ही सकपकाया सा है. डगमगाते भरोसे के साथ्‍ा वह कभी अपने सूखे खेतों तो कभी अंगुलियों को देखता है. उसकी अंगुलियां उस कम मेह को नाप क्‍यूं नहीं सकीं जो खबरों में है. गांव का सूखा, शहर की खबरों में गीला होकर पानी के रूप में कैसे बहने लगता है इसे इन दिनों देखा जा सकता है. पढा जा सकता है, महसूस किया जा सकता है.

अपने गांव में अगर कुल मिलाकर 50-60 अंगुल मेह हो जाए तो जमाना माना जाता है. इस साल दस अंगुल भी मेह नहीं हुआ. नरमे कपास से लहलहाने वाले खेतों में रुखा सूखा ग्‍वार उंघ रहा है. नीरे चारे का संकट उगने लगा है. अगर मौजूदा हालात सामान्‍य से कम बारिश के हैं तो आंकड़े देने वाले भाई लोग सूखे और अकाल को क्‍या कहेंगे, कैसे बताएंगे?

अकाल में सुकाल के संकेत बांचने और बताने के इन दिनों, रातों में आंकड़ों का घनघोर अंधेरा है. हर सुबह खबरों में बारिशें पढ़ता हूं और भीगता हूं.

(pic curtsy net, with due respect)

Posted by: prithvi | 13/07/2012

ये जो शहर जोधपुर है

कान्‍या मान्‍यां कुर्रर, चाळां जोधपुर

जोधपुर म्‍हे उड़े कबूतर, बोले फुर फुर्रर

किसी शहर के लिए इससे बचपना सम्‍मोहन क्‍या हो सकता है? जो शहर दादी की लोरियों में बोलता था उसे अब बेटी मेरे कान में गाती है. परदेसी शहरों का सम्‍मोहन हमारे लोकगीतों में महकता है, विरहणियों ने उनके लिए उलाहनें गाए तो बच्‍चों के लिए कल्‍पनाओं का संसार रचा गया. प्रेमिकाओं के लिए वे मनपसंद चूड़ी, चूंदड़, परांदे की मांग करने का मौका थे. थार के गीतों-लोकगीतों में दिल्‍ली, मुंबई उतना नहीं आता जितना जोधपुर, जैपुर, बीकानेर या उदयपुर.

यह अलग बात है कि हाल ही के वर्षों में चीजों के आनलाइन होने बहुत से सम्‍मोहन टूट गए हैं. शहरों, स्‍थानों की कल्‍पनाओं के पखेरू अब उस शिद्दत से हमारे जीवन, भाषा व बातों में नहीं आते.

फिर भी, जोधपुर थार के लगभग हर बच्‍चे में कुछ इस तरह बड़ा हुआ कि वहां पता नहीं कितने कबूतर और मोटर होंगी. इस बार जब ट्रेन ने शहर की कांकड़ में प्रवेश किया तो मानों वह बस आंखें मलता हुआ यूं देख रहा था कि यह कौन आया है. यह थार की सूर्य नगरी है. इस शहर में उगते सूरज के साथ प्रवेश करना अलग ही अनुभव है. जब आथूणी यानी उत्‍तर की ओर से चलने वाली ठंडी हवा आपका स्‍वागत करती है. जोधपुर और लगभग पूरे मारवाड़ की यह खासियत है कि जेठ आषाढ में दिन ढलते ही ठंडी हवा बहने लगती है और दिन में तपे पहाड़ों की सारी तपन दूर कर देती है.

राजे रजवाड़ों का यह शहर आधुनिक बदलावों से कदमताल करने की कोशिश कर रहा है. मेहरानगढ़ से नीचे देखें तो लगता है कि घरों को किसी ने नीले रंग की बुशर्ट पहना दी और वे स्‍कूल जाने की तैयारी कर रहे हों. थड़े और बड़े यहां की खासियत है. चाय की थडियां जहां स्‍टूल, मुड्डों पर बैठकर अड्डेबाजी की जा सकती है और मिर्च के बड़े जो राजस्‍थान के असली टेस्‍ट से अवगत कराते हैं. थार का जीवन जीतना सरल दिखता है लोग उतने ही तीखे व मीठे होते हैं. यह उनके खान पान में नजर आता है. यही कारण है कि सबसे ज्‍यादा देसी घी, मीठा और तीखा खाने वाले इस प्रदेश जहां के रसगुल्‍ले और भुजिया दोनों समान रूप से सराहे जाते हैं.

थड़ों और बड़ों के अस्तित्‍व को मित्र लोग यहां रवायतों के अस्तित्‍व से भी जोड़कर देखते हैं. शायद यह देश के उन चुनिंदा शहरों में होगा जहां आज भी संयुक्‍त परिवार हैं. कई पीढियां साथ साथ रह रही हैं. लोग एकलखोर (अकेले रहने के आदी) नहीं हुए हैं. लोगों के पास दोस्‍तों के साथ थड़ों पर बैठकर चाय की चुस्कियां लेने का समय है. नाश्‍ते में साथ बैठकर मिर्च बड़े का आनंद ले सकते हैं. भले ही यहां आईटी कंपनी महिंद्रा सत्‍यम का कार्यालय हो, बेंगलूर को सीधी ट्रेन हो, आईआईटी हो, देश के सबसे विधि विश्‍वविद्यालयों में से एक एनएलयू हो.. लोग आज भी जयपुर जैसे किसी भी दूसरे शहर से अधिक जमीन से जुड़े हैं. जड़ों वाले हैं. यही इस जोधपुर का सम्‍मोहन है. जान बर्गर ने कहा था कि हर शहर की एक उम्र और स्‍वभाव होता है. जोधपुर एक धीर गंभीर पुरूष सा सम्‍मोहक है. ये बड़ों का शहर है जिनके पास हमें सिखाने/बताने के लिए बहुत कुछ है.

“Every city has a sex and an age which have nothing to do with demography.Romeis feminine. So isOdessa.Londonis a teenager, an urchin, and, in this, hasn’t changed since the time of Dickens.Paris, I believe, is a man in his twenties in love with an older woman.”- John berger 

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