खोज़-ख़बर

ऐसा बहुत कुछ होता है जिसकी या तो हमें ख़बर नहीं होती या हम उसके बारे में ख़ोज नहीं करते. हमारे आस पास ही अनेक ऐसी घटनाएं होती हैं जिसकी ओर ध्‍यान देते हुए कुछ किया जा सकता है. गम में घर को सजाना हर किसी के बस का नहीं होता. यह तो आप जैसे भले मानस ही कर सकते हैं. जल, वायु, माटी से इतर भी कई मुद्दे हैं जिन पर ध्‍यान दिया जाना चाहिए. उन्‍हीं पर यह ख़ोज-ख़बर.
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ऐसी तालीम क्‍या करे कोई

दायीं ओर एक एक कर चार कुर्सियां लगी हैं. …नहीं बायीं ओर. सड़क पर चलने का जो नियम बचपन में सिखाया गया था उसके हिसाब से कुर्सियां बायीं ओर थीं. अपना दिशा भ्रम से बचने के लिए यही अचूक हथकंडा है. कहते हैं कि हर दिमाग दो अलग अलग तरह से काम करता है. कुछ लोग आंकड़ेबाजी में माहिर होते हैं तो बाकी तस्‍वीरों व नक्‍शों में. अपन दोनों ही मामलों में ब्‍लैंक से हैं. बायें दायें से लेफ्ट राइट का मामला जल्‍द समझ में आ जाता है.

खैर मुद्दा न तो दफ्तर में रखीं कुर्सियां थीं न उनके सामने आंख मीचे बैठी कंप्‍यूटर स्‍क्रीनें. मुद्दा क्रीम रंग कर वह टेलीफोन था जो कुर्सियों के सामने टेबल पर रखा था और बीच बीच में बजकर कुर्सियों की उंघ तोड़ देता और फिर मानों इधर उधर देखकर मुस्‍काराता. होना तो यह था कि फोन उठाकर नंबर डायल करता और बेटी के एडमिशन के लिए सिफारिश का जुगाड़ करता. ठीक यही करना था. यही मुद्दा था. लेकिन सोच सोच कर सोच के हालात खराब थे.

आपकी पार्टनर जब हर शाम को यह बताए कि किन किन बच्‍चों के एडमिशन कहां हो गए हैं, कितनी डोनेशन दी किसकी सिफारिश से हुआ है और आप यूं ही बड़बूजे खोद रहे हैं तो दिल्‍ली वाली यह चोट सीधे दिल पर लगती है. तब पता चलता है कि मूल्‍यों की जिस खेती को आप पाले हुए हैं उसके यहां अकालों का लंबा इतिहास है और पड़ोसी भ्रष्‍ट आचरण की खाद से लहलहाती फसलें ले रहे हैं. देखिए एसोचैम का सर्वे कहता है कि दिल्‍ली में नर्सरी में दाखिले के लिए आठ लाख रुपये तक की रिश्‍वत (डोनेशन) ली जा रही है. राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानी एनसीआर में नर्सरी व केजी में पढाई दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में पढने से भी महंगी है. तो सरकार संसद में स्‍वीकार करती है कि सीबीएसई को केरल से लेकर पंजाब और महाराष्‍ट्र से लेकर दिल्‍ली तक स्‍कूलों द्वारा कैपिटेशन फीस मांगने की शिकायतें मिली हैं. निजी स्‍कूलों में दाखिले के अपने अपने नियम व कायदे हैं. कहीं कोई पारदर्शिता नहीं.

दो साल की मशक्‍कत के बाद भी अगर आप अपनी बेटी का एक ढंग के स्‍कूल में एडमिशन नहीं करवा पायें तो निराशा कचोटती है. सवाल यह नहीं कि आप मूल्‍यों के पक्षधर हैं. बड़ी बात यह है कि सिस्‍टम चाहता है कि आप भ्रष्‍ट हों इसके अलावा आपके पास कोई चारा नहीं है. यह हमारी विकल्‍पहीन होती दुनिया है. जब बच्‍चा इसी भ्रष्‍ट सिस्‍टम से अपना करियर शुरू करता है तो आप कैसे उम्‍मीद रखेंगे कि वह वहां से एक ईमानदार नागरिक या कर्तव्‍यनिष्‍ठ अफसर बनकर निकलेगा?

यह विडंबना अपने जैसे कई पिताओं की है. खासकर सरकारी स्‍कूलों से किसी तरह पढ़ लिखकर दिल्‍ली, चेन्‍नई व बंबई जैसे महानगरों में आ फंसे युवाओं की. विडंबना है कि जिस शिक्षा को सर्वसुलभ और सस्‍ती होते जाना था वह महंगी और महंगी तथा आम लोगों की पहुंच से दूर होती गई. अपन ने कालेज तक की लगभग सारी पढाई सरकारी स्‍कूलों व कालेजों में पूरी की और फीस देने की कोई घटना याद नहीं है. किताबें भी पहले कक्षा पास कर गये छात्रों से मिल जाती थी. फैकल्‍टी के लिहाज से सरकारी स्‍कूलों का कोई मुकाबला नहीं रहा है. बीते एक दशक में जब से शिक्षा में बाजार घुसा है सब सत्‍यानाश हो गया. फीसें बढती गईं और गुणवत्‍ता में गिरावट आई. उलटा हुआ! 

तुर्रा यह कि दुनिया के 200 शीर्ष शैक्षणिक संस्‍थाओं में हमारा एक भी विश्‍वविद्यालय नहीं है. पिछले साल एक अध्ययन में कहा गया कि एमबीए जैसे कोर्स करने वाले 21 प्रतिशत छात्र ही नौकरी पाने के काबिल हैं. यानी 100 में से केवल 21 एमबीए ही नौकरी पर रखने जाने की योग्‍यता रखते हैं. मेट्रो क्रांति के अगुवा ई. श्रीधरन के अनुसार सिर्फ 12 फीसद इंजीनियरिंग छात्र ही नौकरी के लायक हैं. इन आंकड़ों के बीच अगर अपनी बेटी का पहली पक्‍की में दाखिला नहीं करवा पायें तो आप रोएं भले ही नहीं, उदास तो होंगे ही. अपने पास अगर सिफारिश कर सकने वाले नंबर हैं तो उन्‍हें डायल करने लायक भ्रष्‍ट भी हो जाएंगे. आप अपनी सोच लेना!

जमीर जाफरी साब ने कहीं कहा था-
जिससे घर ही चले न मुल्‍क चले
ऐसी तालीम क्‍या करे कोई. 

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– हमारे अकाल में तुम्‍हारी बारिशें

सामने बन रही बिल्डिंग से उसकी शिकायत यही है कि उसने हमारी हवा रोक ली और गर वह ‘छोटे भीम’ जितनी स्‍ट्रांग हुई तो इनको स‍बक सिखाएगी. वह आजकल जब भी बालकनी में मेरे साथ बैठती है तो यह मुद्दा उठ ही जाता है. फिर वह अपने छोटे हाथों और बड़ी आंखों से समझाने की कोशिश करती है कि बादल कैसे बनते हैं और कैसे बारिश होती है. थोड़ी देर खामोश हो जाती है और कहती है अबकी बार अच्‍छी बारिश नहीं हो रही ना, पहली (पिछली) बार तो हम खूब नहाए थे. टप टप टप.. वह अपनी रौ में बारिश की कहानियां बताने लगती हैं.

ये बिल्‍डरों के दिन हैं. बारिशों के नहीं!  इन दिनों ने हमें न तो जमीन पर रहने दिया है और न जमीन का ही.  

इस साल सामान्‍य से कम बारिश के आंकडे़ अखबारों में है. रुखे सूखे सावन के बाद भादों की उमस में ये आंकड़े टीसते हैं. आंकड़े, हालात का एक पहलू भी ढंग से बयान नहीं करते. इनमें यह तो बताया जाता है कि अबके सामान्‍य मेह नहीं हुआ. बारिश कम हुई है लेकिन कितनी हुई, इसका न तो कोई जवाब है, न सवाल ही उठाया जाता है! बारिश हुई नहीं के तथ्‍य को सामान्‍य से थोड़ी कम बारिश के कुतर्क तक लाने में जो खपाई जा रही ऊर्जा हैरान परेशान करती है.

भ्रम इस कदर रचा गया है कि बारिश को अंगुलियों से नापने वाला गांव ही सकपकाया सा है. डगमगाते भरोसे के साथ्‍ा वह कभी अपने सूखे खेतों तो कभी अंगुलियों को देखता है. उसकी अंगुलियां उस कम मेह को नाप क्‍यूं नहीं सकीं जो खबरों में है. गांव का सूखा, शहर की खबरों में गीला होकर पानी के रूप में कैसे बहने लगता है इसे इन दिनों देखा जा सकता है. पढा जा सकता है, महसूस किया जा सकता है.

अपने गांव में अगर कुल मिलाकर 50-60 अंगुल मेह हो जाए तो जमाना माना जाता है. इस साल दस अंगुल भी मेह नहीं हुआ. नरमे कपास से लहलहाने वाले खेतों में रुखा सूखा ग्‍वार उंघ रहा है. नीरे चारे का संकट उगने लगा है. अगर मौजूदा हालात सामान्‍य से कम बारिश के हैं तो आंकड़े देने वाले भाई लोग सूखे और अकाल को क्‍या कहेंगे, कैसे बताएंगे?

अकाल में सुकाल के संकेत बांचने और बताने के इन दिनों, रातों में आंकड़ों का घनघोर अंधेरा है. हर सुबह खबरों में बारिशें पढ़ता हूं और भीगता हूं.

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बदहाली से खुशहाली की ओर लापोडि़या गांव

यह कहानी है ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास की जिसने सूखे से प्रभावित एक गांव को खुशहाली और उम्‍मीद का प्रतीक बना दिया. एक युवक की पहल पर ग्रामीणों ने जल संरक्षण, भूमि संरक्षण तथा गौर संरक्षण की पहल की और देखते ही देखते सबकुछ बदल गया. इंडिया वाटर पोर्टल से देवकरण सैनी की यह रपट साभार-

water-shade1-300x225जयपुर-अजमेर राजमार्ग पर दूदू से 25 किलोमीटर की दूरी पर राजस्थान के सूखाग्रस्त इलाके का एक गांव है – लापोड़िया। यह गांव ग्रामवासियों के सामुहिक प्रयास की बदौलत आशा की किरणें बिखेर रहा है। इसने अपने वर्षों से बंजर पड़े भू-भाग को तीन तालाबों (देव सागर, फूल सागर और अन्न सागर) के निर्माण से जल-संरक्षण, भूमि-संरक्षण और गौ-संरक्षण का अनूठा प्रयोग किया है। इतना ही नहीं, ग्रामवासियों ने अपनी सामूहिक बौद्धिक और शारीरिक शक्ति को पहचाना और उसका उपयोग गांव की समस्याओं का समाधान निकालने में किया। आज गोचर का प्रसाद बांटता यह गांव दूसरे गांवों को प्रेरणा देने एवं आदर्श प्रस्तुत करने की स्थिति में आ गया है। 1977 में अपनी स्कूली पढ़ाई के दौरान गांव का एक नवयुवक लक्ष्मण सिंह गर्मियों की छुट्टियां बिताने जयपुर शहर से जब गांव आया तो वहां अकाल पड़ा हुआ था। उसने ग्रामवासियों को पीने के पानी के लिए दूर-दूर तक भटकते व तरसते देखा। तब उसने गांव के युवाओं की एक टीम तैयार की, नाम रखा, ग्राम विकास नवयुवक मंडल, लापोड़िया। शुरूआत में जब वह अपने एक-दो मित्रों के साथ गांव के पुराने तालाब की मरम्मत करने में जुटा तो बुजुर्ग लोग साथ नहीं आए। बुजुर्गों के इस असहयोग के कारण उसे गांव छोड़कर जाना पड़ा। कुछ वर्षों बाद जब वह वापस गांव लौटा तो इस बार उसने अपने पुराने अधूरे काम को फिर से शुरू करने के लिए अपनी टीम के साथ दृढ़ निश्चय किया कि अब कुछ भी करना पडे पर पीछे नहीं हटेंगे। कुछ दिनों तक उसने अकेले काम किया।

उसके काम, लगन और मेहनत से प्रभावित होकर एक के बाद एक गांव के युवा, बुजुर्ग, बच्चे और महिलाएं उससे जुड़ते चले गए। देव सागर की मरम्मत में सफलता मिलने के बाद तो सभी गांव वालों ने देवसागर की पाल पर हाथ में रोली मोली लेकर तालाब और गोचर की रखवाली करने की शपथ ली। इसके बाद फूल सागर और अन्न सागर की मरम्मत का काम पूरा किया गया। उन्हें गोचर की सार संभाल करने, खेतों में पानी का प्रबंध करने, सिंचाई कर नमी फैलाने का अनुभव तो पीढ़ियों से था किन्तु इस बार उन्होंने पानी को रोकने और इसमें घास, झाड़ियां, पेड़-पौधे पनपाने के लिए चौका विधि का नया प्रयोग किया। इससे भूमि में पानी रुका और खेतों की बरसों की प्यास बुझी। इसके बाद भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए विलायती बबूल हटाने का देशी अभियान चलाया गया।

उनकी वर्षों की कठोर तपस्या पूरी हुई थी। पहले स्त्रियों को रोजाना रात को दो बजे उठकर पानी की व्यवस्था के लिए घर से निकलना पड़ता था। उनका अधिकांश समय इसी काम में व्यर्थ हो जाता था। किन्तु अब तालाबों में लबालब पानी भरने से पीने के पानी की समस्या से तो निजात मिली ही, क्षेत्र में गोचर, पशुपालन और खेती-बाड़ी का धन्धा भी विकसित होने लगा। गांव वालों ने उजड़ चुके गोचर को फिर से हरा-भरा करने का संकल्प लिया। अब तक गांव वालों को अपनी क्षमता पर भरोसा हो चला था। गांव का नक्शा बनाकर चौका पद्धति से पेड़ (विशेषकर देशी बबूल और कैर) लगाकर पानी का सम्पूर्ण उपयोग किया गया। एक समय सूखाग्रस्त रहे इस गांव को सभी के सम्मिलित प्रयास ने ऊर्जा ग्राम में बदल दिया। इसके बाद भूमि सुधार कर मिट्टी को उपजाऊ बनाया गया और गांव के बहुत बड़े क्षेत्र को चारागाह के रूप में विकसित किया गया। आज इस गोचर में गांव के सभी पशु चरते हैं। उधर गोपालन से दुग्ध व्यवसाय अच्छा चल पड़ा। परिवार के उपयोग के बाद बचे दूध को जयपुर सरस डेयरी को बेचा गया, जिससे अतिरिक्त आय हुई। इससे कितने ही परिवार जुड़े और आज स्थिति यह है कि 2000 की जनसंख्या वाला यह गांव प्रतिदिन 1600 लीटर दूध सरस डेयरी को उपलब्ध करा रहा है। इस वर्ष 34 लाख रूपए का दूध सरस डेयरी को बेचा गया। जब भूख-प्यास मिटी तो लोगों का धयान शिक्षा व स्वास्थ्य की ओर भी गया। पिछले छ: वर्षों से आस-पास के गांव अकाल जैसी स्थिति से जुझ रहे हैं, किन्तु लापोड़िया में अन्न सागर से सिंचित फसल अकाल को हर बार झुठला देती है।

ग्रामीण विकास नवयुवक मंडल को अपने कार्यों के संचालन के लिए देशी-विदेशी विभिन्न स्रोतों से अब तक 3 करोड़ 10 लाख 54 हजार चार सौ सत्तावन रूपये प्राप्त हो चुके हैं जिसमें से लगभग आधा (1 करोड़ 54 लाख, 14 हजार पांच सौ उनहत्तर रूपये) विदेशी संस्थाओं से मिला है। गांव की प्रेरणा से आस-पास के गांवों के युवक काम देखने लापोडिया आए और लापोडिया के कुछ कार्यकर्ता दूसरी जगहों पर गए और लोगों के साथ अपने अनुभवों को आदान प्रदान किया। परिणामस्वरूप आज ग्रामीण विकास नवयुवक मण्डल का काम पाली, टोंक, जयपुर, दौसा, अलवर और नागौर सहित 400 से भी अधिक गांवों में चल रहा है और निरंतर प्रगति पर है।( कांकड़ ने यह रपट इंडिया वाटर पोर्टल से साभार ली है. जल संरक्षण जैसे विषय पर और जानकारी (http://hindi.indiawaterportal.org) पर देखी जा सकती है.
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शायद यह भारतीय संस्‍कार है जो इस्‍तेमाल करने से पहले बचाना या सहेजते हुए उपयोग में लाना सिखाता है. थार में पानी को घी की तरह बरतना किसी पाठशाला में सिखाया नहीं जाता, आ जाता है स्‍वभाव में. यह स्‍वाभाविक है. शायद यह भी है कि कमी कद्र बढा देती है. खाया- अघाया समाज चीजों की कद्र क्‍यूं करेगा, उसके पास तो थोक में सब उपलब्‍ध है. जोहड़, बाव‍डियां,कुएं, डिग्गियां .. इन सबने थार में समाज को रचा और आधार दिया. ज्‍यादातार आबादी इस तरह जोहड़ों या बा‍वडियों के आसपास बसी. इनसे लगाव आध्‍यात्मिक स्‍तर का रहा लेकिन वक्‍त ने सब बदल दिया. घर में टोंटियां क्‍या लगीं, जोहड़ पायतन सब छूट गए. जबकि आज भी इनकी उपयोगिता कम नहीं है. जरूरत तो बस समय के अनुसार इनके उपयोग की है. जल प्रबंधन के क्षेत्र में एक उल्‍लेखनीय प्रयास पर आधारित यह दूसरी ख्रोज ख्रबर जो कांकड़ ने भारतीय पक्ष से साभार ली है.

बावड़ियों ने सुलझाई पानी की समस्या

csp‘बिन पानी सब सून’ यह कहावत शहरों के साथ-साथ गांवों और कस्बों और यहां तक कि जंगलों में भी लागू होती है. खासतौर पर संरक्षित वन क्षेत्रों में तो बिना पानी के वहां के आकर्षण को जीवंत रखना संभव ही नहीं है. ऐसे में बेहतर जल प्रबंधन का प्रयास ही कामयाब हो सकता है. यह बात राजस्थान जैसे सूखे इलाकों में किए गए जल प्रंबधन के प्रयासों की हो तो वह और भी अधिक रोचक बन जाती है। रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान में तैनात सहायक वन अधिकारी गोविंद सागर भारद्वाज ने वहां उपलब्ध संसाधनों की मदद से जल संरक्षण का अदभुत कार्य कर दिखाया है. उन्होंने पार्क में स्थित वर्षों पुरानी बावड़ियों का पुनरुद्धार किया। उन्हें जीवंतता देकर पुन: जल से परिपूर्ण किया. आज ये पुरानी बावड़ियां उद्यान व उसके आसपास के क्षेत्रों में पानी के स्रोत के साथ-साथ यहां आने वाले पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन गई हैं.

रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान राजस्थान के दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्र के सवाई माधोपुर व करौली जिले में स्थित है. इसका नामकरण चौहान शासकों द्वारा निर्मित रणथम्भौर किले के नाम पर किया गया है. उद्यान की स्थापना 1980 में की गई थी. उद्यान में भांति-भांति के पक्षियों के अलावा शेर, बाघ, तेंदुए, चीतल, सांभर आदि जंगली जानवर भी हैं. मरुप्रदेश में होने के कारण यहां जल की उपलब्धता सामान्य नहीं है. मानसून के दौरान तो पानी की पर्याप्त मात्रा मिल जाती है लेकिन बरसात के बाद पानी की कमी से जानवरों की स्थिति दयनीय हो जाती है. उद्यान में मुख्यत: जल के छह स्रोत हैं – पद्म तालाब, राजबांध, मिलिक तालाब, लाहपुर झील, गिलाई सागर व मानसरोवर तालाब. लेकिन गर्मियों में ये सभी जल स्रोत सूख जाते हैं. पिछले कुछ वर्षों से राजस्थान में सूखा पड़ रहा था.

वर्ष 2002 में तो स्थिति बहुत खराब हो गई. सवाई माधोपुर में इस बीच दो मानसूनों में बारिश हुई, पर कम मात्रा में. इसका नतीजा यह हुआ कि उद्यान में जल के स्रोत सूखते चले गए. पद्म तालाब, राजबांध, लाहपुर झील व मिलिक तालाब सूख चुके थे. ऐसा पहली बार हुआ था. रही-सही कसर उद्यान को दो हिस्सों में बांटने वाले बकौला नाले के सूखने से पूरी हो गई. उद्यान के सभी जल स्रोत बिल्कुल सूख चुके थे. ऐसे में जानवरों को चिलचिलाती धूप में प्यास बुझाने के लिए उद्यान के आसपास बसे आबादी वाले क्षेत्रों में जाना पड़ा. इसकी उन्हें काफी कीमत भी चुकानी पड़ी, क्योंकि संरक्षित क्षेत्र से बाहर आते ही वे शिकारियों का निशाना बनने लगे, जो अपने आप में काफी चिंताजनक स्थिति थी।

स्थिति की गंभीरता को समझते हुए उद्यान के अधिकारियों ने जल प्रंबधन की योजना लागू करने का फैसला किया. इसके तहत जल स्रोतों पर निरंतर नजर रखना, नए जल स्रोतों की पहचान करना, नए स्रोतों का निर्माण करना, उद्यान में जल संरक्षण के लिए गङ्ढे बनाकर उसमें पानी भरने जैसे उपाए किए गए. उद्यान में 15-20 कुएं खोदने का कार्य भी शुरू किया गया. किंतु इस प्रयास पर उस समय पानी फिर गया, जब न्यायालय ने इस पर दो महीने के लिए रोक लगा दी. ऐसे में उद्यान के जल प्रंबधन को दुरुस्त करने के लिए पूर्व वन्य अधिकारी एस. अहमद ने खोमचा कुंड की सफाई करने का सुझाव दिया. इसी बीच सहायक वन्य अधिकारी गोविंद सागर भारद्वाज ने उद्यान में स्थित बावड़ियों का पुनरूद्धार करने की इच्छा जताई. उन्होंने सोचा कि राजस्थान में जल संरक्षण की बड़ी समृद्ध परंपरा रही है और इसके तहत वहां काफी संख्या में तालाब और बावड़ियां बनाई गई थीं. आज ये बावड़ियां सरकार और लोगों की उपेक्षा के कारण बेकार पड़ी हैं. उनका जल या तो सूख चुका है या तो उनमें उग आई खर पतवार के कारण वे उपयोगी नहीं रहे.

इसलिए भारद्वाज ने सोचा कि यदि इन्हें ठीक कर लिया जाए तो उद्यान में जल के अतिरिक्त स्रोत विकसित हो जाएंगे. इस अभियान में सबसे पहले उद्यान के दरवाजे के समीप स्थित मोरकुंड का पुनरुद्धार किया गया. इसके लिए भारद्वाज ने राजीव गांधी परंपरागत जल स्रोत पुनरुद्धार योजना के तहत सरकार से आर्थिक मदद भी ली. कुछ दिनों की मेहनत के बाद आए परिणाम चौंकाने वाले थे. मोरकुंड बावड़ी से 12,000 लीटर जल प्रतिदिन प्राप्त होने लगा. इस जल को उद्यान स्थित जल के अन्य स्रोतों तक पहुंचाया गया. मोरकुंड बावड़ी की सफलता से उत्साहित होकर उद्यान के अधिकारियों ने अन्य सात बावड़ियों का भी पुनरुद्धार करने का निश्चय किया। इसमें खेमचा, दूध, झूमर, लोहर, हिंदवार तथा रायपुर बहादुर आदि बावड़ियां शामिल हैं.

जल प्रंबधन के इस अनूठे प्रयास को सफल बनाने का श्रेय रणथम्भौर नेशनल उद्यान में सहायक वन्य अधिकारी गोविंद सागर भारद्वाज को जाता है, जिन्होंने विकट परिस्थितियों में अपनी सूझबूझ से बावड़ियों के ऐतिहासिक व आकर्षक विकल्प को जीवंतता प्रदान की. उन्होंने बताया कि बावड़ियों के पुनरुद्धार के प्रयास में उनकी जीवंतता व आकर्षण को संजोए रखना एक चुनौती थी. यही वजह है कि वर्षों पुरानी इन बावड़ियों को पुन: उपयोग में लाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी. इस प्रयास में उन्होंने आसपास की आबादी के बड़े-बुजुर्गों के साथ-साथ स्कूली बच्चों का भी सहयोग लिया.

साभार- यह रपट विपिन दिसावर की है जो भारतीय पक्ष की वेबसाईट पर है. भारतीय पक्ष भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था की पक्षधर हिन्दी मासिक पत्रिका है. प्रिंट संस्करण के साथ-साथ इन्टरनेट पर भी आप इस पत्रिका को पढ़ सकते हैं. (http://bhartiyapaksha.com/?p=2694)
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रेत का समंदर कहे जाने वाले थार यानी राजस्‍थान के एक इलाके विशेष में हिरण व नीलगाय आदि वन्‍य जीव नहरों में डूब कर मर रहे हैं. सुनने-पढ़ने में यह भले ही अटपटा लगे लेकिन गंगानगर व हनुमानगढ़ जिले की एक कठोर सचाई है जिससे ग्रामीण कई पिछले वर्षों से निरीह भाव से दो चार हो रहे हैं. इसी पर आधारित है हमारी पहली खोज़ खबर –

नहरों में डूब कर मर रहे हैं वन्‍य जीव

नहर से हिरण को निकालते ग्रामीण

नहर से हिरण को निकालते ग्रामीण

डूब कर दम तोड़ते वन्‍य जीव
रेत का समंदर कहे जाने वाले थार यानी राजस्‍थान के एक इलाके विशेष में हिरण व नीलगाय आदि वन्‍य जीव नहरों में डूब कर मर रहे हैं. सुनने-पढ़ने में यह भले ही अटपटा लगे लेकिन गंगानगर व हनुमानगढ़ जिले की एक कठोर सचाई है जिससे ग्रामीण कई पिछले वर्षों से निरीह भाव से दो चार हो रहे हैं. 50 मील प्रति घंटे की रफ्तार से दौडने वाला कृष्‍ण मृग शिकारियों नहीं, बहती नहरों का शिकार हो रहा है. उत्‍तर-पश्चिमी राजस्‍थान में एलएनपी (नहर) का क्षेत्र जिसे 10,000 से अधिक वन्‍य जीवों की शरणस्‍थली कहा जाता है,में इस तरह की घटनाएं आम हैं. ग्रामीण लंबे समय से इस क्षेत्र की नहरों पर गऊघाट बनाने तथा इस क्षेत्र को कम्‍युनिटी रिजर्व घोषित करने की मांग कर रहे हैं लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है.

एलएनपी क्षेत्र और हिरण
हनुमानगढ और गंगानगर जिले में फैले एलएनपी (लालगढ़ नान पैरेनियल) नहर क्षेत्र में हिरणों, नीलगायों के झुंडों का स्‍वच्‍छंद विचरण करते देखा जा सकता है. वाइल्‍डलाईफ के हिसाब से यह इलाका बेहद समृद्ध है. गंगानगर के उप वन संरक्षक ललित राणावत कहते हैं, ‘ निजी भूमि पर इतनी बडी संख्‍या में वन्‍य जीव एशिया में शायद ही कहीं और हों.’ काले हिरण तो हजारों हैं. इसके अलावा चिंकारा, खरगोश, लोमडी, सियार, काला तीतर, तीतर पाटा गोह व मोर जैसे जीव जंतु भी यहां बडी संख्‍या में हैं. यह क्षेत्र लखासर से लेकर लिखमीसर, दुलमाना, भगवानगढ, जोडकियां, लालेवाला, 64-69 एलएनपी, रतनपुरा, उडसर, डाबला व बुढा जोहड तक फैला है. दोनों जिलों में 468 वर्ग किलोमीटर में वन्‍य क्षेत्र है.

समस्‍या
विडंबना है कि थार के इस इलाके में हिरण अब प्‍यास से नहीं बल्कि डूबने से मर रहे हैं. दरअसल पिछले कुछ वर्षों में इलाके की नहरों को पक्‍का किया गया है. अब उनकी ढलान अंग्रेजी के ‘वी’ आकार में है जो बडी फिसलन वाली होती है. यही कारण है कि पानी पीने के लिए उतरने पर या दुर्घटनावश नहर में गिर जाने पर पशु विशेषकर हिरण बाहर नहीं निकल पाते और वहीं डूब कर मर जाते हैं. सितंबर 2006 में 23 हिरण एलएनपी नहर में डूबने से मरे. गंगनहर की एलएनपी के साथ-साथ भाखड़ा नहर की एलकेएस, एमओडी व एलजीडब्‍ल्‍यू शाखाओं में भी इस तरह की घटनाएं आम हैं. नहरें जब कच्‍ची थीं तो यह दिक्‍कत नहीं थी. इस इलाके में वन्‍यजीवों के लिए पानी का एक मात्र स्रोत नहरें ही हैं. इसके अलावा इन पशुओं के शिकारियों तथा वाहनों की चपेट में आना भी आम बात है. यहां तक कि जैतसर कृषि फार्म में मोरों व नीलगायों के शिकार या संदिग्‍ध परिस्थितियों में मौत अनेक बार चर्चा का विषय बन चुकी हैं. वैसे यह भी एक सचाई है कि अधिकाधिक भूमि के कमांड होने के बाद वन्‍य जीवों के लिए आश्रय स्‍थल घट रहा है. पानी के प्राकृतिक स्रोत नहीं रहे हैं. जीवों को पानी के लिए नहरों पर ही आना पडता है. किसान अपनी फसल बचाने के लिए इन्‍हें इधर उधर भगाते रहते हैं. इस संकट को मानव-वन्‍य जीव संघर्ष के रूप में भी देखे जाने की जरूरत है.

अनेक वजहें है हिरणों की असमय मौत की

अनेक वजहें है हिरणों की असमय मौत की

2007 में शिकार की 29 घटनाएं हुईं जिनमें से 26 काले हिरण के शिकार से जुड़ी हैं. राष्‍ट्रीय राजमार्ग संख्‍या सहित कई प्रमुख सडक मार्ग इस इलाके में हैं और कुलांचे भरते वन्‍य जीव प्राय: उनकी चपेट में आ जाते हैं. क्षेत्र में कार्यरत जीव रक्षा सभा के आंकड़े कहते हैं कि बीते तीन साल में 150 से अधिक काले हिरण विभिन्‍न कारणों से असमय काल कल्वित हुए. विभाग में 1986 के बाद से भर्ती नहीं हुई है और स्‍टाफ नाम मात्र का है. गंगानगर जिले के लिए ही 25 गार्डों की मांग की गई है. फिलहाल इलाके में मात्र दो सुरक्षा गार्ड तैनात हैं जो भी उप वन्‍य संरक्षक (वन्‍य जीव) बीकानेर के अधीन आते हैं. क्षेत्र में कोई चौकी नहीं है. बीकानेर से स्‍टाफ के आने में ही 5-6 घंटे लग जाते हैं. उनके पास अच्‍छे वाहनों या अन्‍य साजो सामान का भी टोटा है. स्‍थानीय स्‍तर पर वन्‍य जीव चौकी स्‍थापित करने की बात लंबे समय से चल रही है लेकिन कुछ हुआ नहीं.

मांग
दोनों जिलों की 19 पंचायतों ने वन्‍य जीव सुरक्षा अधिनियम 1972 की धारा 36 एसडी के तहत अपने- अपने क्षेत्र को कम्‍युनिटी रिजर्व घोषित करने की मांग की है. अखिल भारतीय जीव रक्षा बिश्‍नोई सभा के प्रदेश महासमंत्री अनिल धारणियां कहते हैं वन विभाग में जीव रक्षकों की भर्ती, गऊ घाट बनाना तथा वन्‍य जीव अपराध के मामलों के कडी कारवाई जैसे कदम उठाना भी जरूरी है. उनका कहना है कि इस दिशा में बहुत बार प्रयास किए जा चुके हैं लेकिन कोई परिणाम नहीं निकल रहा. वैसे यह सही है कि बदलते वक्‍त के साथ समाज के लगभग हर वर्ग ने इस समस्‍या की ओर ध्‍यान देना शुरू किया है. अपवादों को छोड दें तो हर कोई अब वन्‍य जीवों के संरक्षण की बात करता है और इसके लिए प्रयास करता दिखता है.

समाधान
जानकारों का मानना है कि सबसे पहले हिरणों के लिए पानी की समस्‍या को निदान जेठ आषाढ़ से पहले करना होगा. इसके लिए उचित जगहों पर गऊघाट बनाए जा सकते हैं. इसके अलावा कई किसानों ने अपने खेतों में खेळियां (पानी की हौदी) बनाईं हैं जहां पर्याप्‍त पानी उपलब्‍ध कराने की व्‍यवस्‍था हो. इस दिशा में स्‍थानीय स्‍तर पर प्रयासरत संगठन व कार्यकर्ता काफी मददगार साबित हो सकते हैं. वन्‍य जीवों की रक्षा के लिए पर्याप्‍त संख्‍या में गार्ड तथा यहां चौकियां स्‍थापित करनी होंगी तथा इस इलाके को कम्‍युनिटी रिजर्व घोषित करना व्‍यापक व स्‍थायी समाधान होगा.

टीका-टिप्‍पणी

ललित राणावत, उप वन संरक्षक गंगानगर

ललित राणावत, उप वन संरक्षक गंगानगर

क्षेत्र की वन संपदा अद्भुत है. एशिया में निजी भूमि पर इतनी समृद्ध वन संपदा एवं जीव शायद ही कहीं और हों. इनके बचाव के लिए कई प्रयास किए गए हैं. वन्‍यजीवों के लिए पानी की व्‍यवस्‍था का मुद्दा है. किसानों की अपनी समस्‍याएं हैं लेकिन क्षेत्र के किसान बहुत धैर्य वाले हैं आमतौर पर वे वन्‍यजीवों को नुकसान नहीं पहुंचाते. बडे स्‍तर पर सामूहिक प्रयास किए जा सकते हैं ताकि इस दिशा में आ रही परेशानियों और चुनौतियों से निपटा जा सके. (ललित राणावत, उप वन संरक्षक गंगानगर)

अनिल धारणियां

अनिल धारणियां

सरकारी स्‍तर पर बड़े कदम उठाए जाने की आवश्‍यकता है. बीकानेर संभाग में एक भी वन्‍य जीव चौकी नहीं होना क्‍या दर्शाता है. कम्‍युनिटी रिजर्व का मामला छोडिए, वन्‍य जीव रक्षकों की नियुक्तियां दशकों से नहीं हुईं. गऊ घाट बनाने का मुद्दा अटक गया है. वन विभाग के पास न तो मानव संसाधन हैं और न ही वाहन जैसी सुविधाएं जबकि शिकारियों के पास सब कुछ है. (अनिल धा‍रणियां लखासर)
(कांकड ब्‍लाग, इस रपट में योगदान के लिए अनिल धारणियां लखासर, पुष्‍पेंद्र शर्मा रिडमलसर, कृष्‍ण चौहान गंगानगर का आभारी है. आप भी अपनी टिप्‍पणियां, सुझाव दे सकते हैं. स्‍वागत है.)

Responses

  1. भाई अपने ब्‍लाग में रायसिंह नगर को भी जगह दो ..
    – मनीष गोयल

  2. very good.

  3. बहुत खूब

  4. आपके ब्लाग से काफी कुछ समझने सीखने को मिल रहा है, राजस्थान की मूल वासी होते हुए भी मेरी जिन्दगी तो केरल में बीती है, इसलिए मै आपके बल्ाग से काफी कुछ अपनापा सा महसूस कर रही हूँ।
    कृत्या को देखिए, और कुछ राजस्थानी रंग यहाँ भी दीजिए।

  5. pahle pani main dubkar hiran mar rahe the ab pani ki kami se payase taraf raihe hain.

  6. We Have Proud for Each Rajasthani.


कुछ तो कहिए..

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