किताब-घर

अच्‍छी पुस्‍तकों के पास होने से हमें अपने भले दोस्‍तों के दूर होने की कमी नहीं खटकती.- मोहन दास कर्मचंद गांधी

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11. ये खु़शबू तो मिट्टी की है

chaurahaखुशबू तो मिट्टी में होती है, बारिश तो बस उसकी याद दिलाती है. जिन लोगों की नाड़ मेह पानी और माटी से बंधी है उनके लिए ये पंक्तियां गहरे मानी रखती हैं. किशोर चौधरी की कहानियां ऐसी ही छोटी छोटी सी बातों से बुनी होती हैं जो आखिर तक बांधे रखती हैं. वे बिंब रचने के महारथी हैं, भाषा और भाव उनके सबसे मारक हथियार हैं. उनका पहला कहानी संग्रह ‘चौराहे पर सीढियां’ हाल में आया है. 

किशोर की बात की जाए तो वे किसी श्रेणी के रचनाकार नहीं हैं. उनकी अपनी श्रेणी है. अपनी बातें और कहने का अपना ढंग. उनके चरित्र हमारे पास के ही किसी चौराहे पर सीढियों से उतरते हैं और चित को बींध देते हैं. कई बात लगता है कि उनकी कहानी हमारे पास बैठकर अपनी बात कह रही है. हम उसे देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं. कहानी कहने के उनके लहजे, शैली के बाद हमें अपनी भाषा से प्रेम करने का मन होता है. ठेठ थार में रहकर हिंदी में इतनी मिठास से लिखना इस दौर की पीढी में हर किसी के बस का नहीं होता. 

वे अपनी कहानियों में छोटी छोटी बातों को इतने सरल ढंग से कह जाते हैं. जैसे- कौन किसको खराब करता है, सब आप डूबते हैं (कहानी-अंजलि तुम्‍हारी डायरी से), मी‍ठी जुबान वाले धोखेबाज ही हुआ करते हैं या कि सीढियों की उपयोगिता घर के मन पर है, उनका खुद का कोई अस्तित्‍व नहीं होता (कहानी-चौराहे पर सीढियां). बरसात में अवसर सबके लिए बराबर होते हैं मगर चरित्र की फसल की जगह मौज की खरपतवार ज्‍यादा फलती फूलती है (खुशबू बारिश की नहीं). भय और लालच से बुनी गयी इस दुनिया में बस एक इंतजार स्‍थायी है, जो आखिरी वक्‍त जब दुनिसा से थक हार जायेंगे तब भी बचा रहेगा (बताशे का सूखा पानी).

निसंदेह रूप से कोई कहानी या पूरी किताब पाठक को नहीं बांधती. उसका कुछ बातें या पंक्तियां ही दिल को छूती हैं. इस कहानी संग्रह में चौदह कहानियां हैं. भाषा, शिल्‍प और प्रवाह के लिहाज से वे कहीं न कहीं जरूर चौंकाती हैं. जैसे कि संजय व्‍यास ने अपने ब्‍लाग पर लिखा है कि परंपरा में मिली किस्सागोई, स्थानीय मुहावरे और परिवेश से ठेठ देसीपन को सुरक्षित रखते हुए किशोर की कहानियों का संसार विशिष्ट रूप से मौलिक है. वे जटिल मनोभावों और उनकी ऊहापोह के शिल्पी हैं. उनके यहाँ अमूर्त भाव भी छुए जा सकते हैं, वे कई रंगों में रंगे हैं, उन्हें कभी किसी कोने में तो कभी एकदम सामने देखा जा सकता है.लगता है जैसे वे टोकरी में पड़े फल हैं.

इस कहानी संग्रह से एक और महत्‍वपूर्ण पहल को समझना होगा. किशोर की ये कहानियां किसी कतिपय प्रतिष्ठित या गैर प्रतिष्ठित पत्रिका में नहीं छपीं. वे सबसे पहले अंतरजाल यानी ब्‍लॉग पर आईं और वहां से सीधे प्रिंट में. किताब ने आनलाइन प्रीबुकिंग के लिहाज से रिकार्ड प्रदर्शन किया है. इसे सोशल मीडिया की बढ़ती ताकत व पहुंच के रूप में देखना होगा. किशोर ब्‍लागिंग व सोशल नेट‍वर्किंग के जरिए पढे गए हैं. उसके बाद मित्रों के बार बार आग्रह से प्रकाशित हो रहे हैं. बीकानेर के सिद्धार्थ जोशी ने इसे सकारात्‍मक पहल मानते हुए लिखा है कि आने वाले दिनों में ऐसी और कई अच्‍छी और महत्‍वपूर्ण पुस्‍तकें ब्‍लाग अथवा अंतरजाल के माध्‍यमों में अच्‍छी खासी स्‍वीकृति पाने के बाद बाजार में आ सकती हैं. 

किशोर अपनी शीर्षक कहानी में कहते हैं कि जहां सीढियां खत्‍म होती हैं वहां रास्‍ते शुरू होते हैं. उनका यह कहानी संग्रह निश्चित रूप से एक नये रास्‍ते की शुरुआत है.

चौराहे पर सीढियां को आनलाइन यहां खरीदा जा सकता है.

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10. प्रीत कमेरी

कविता क्‍या है इस सवाल की पड़ताल करते हुए आचार्य शुक्‍ल ने कहा था कि कविता से मनुष्य-भाव की रक्षा होती है और इसके जरिए हम संसार के सुख, दुःख, आनन्द और क्लेश को यथार्थ रूप से अनुभव कर सकते हैं. इस लिहाज से कविता वही हुई जो जो पाठक को हंसाये, रूलाए या सोचने पर मजबूर करे? जो पाठक को बांधे और अपने साथ उस डगर पर ले जाए जहां कवि ने उसकी मंजिल तय की है? अगर यही कविता है तो विनोद स्‍वामी जोरदार कवि हैं, जो शानदार कविताएं गढते हैं. उनकी राजस्‍थानी कविताओं का संग्रह ‘प्रीत कमेरी’  मौजूदा दौर की धक्‍कमपेल में राहत की सांस देता है.

मैं
पीढियों से जानता हूं ये बात
कि चिडि़यों ने
हमारे भरे हुए खेत उजाड़े हैं.
फिर भी
चिडियों के साथ
पीढियों से
एक ही घर में रहता हूं मैं.

विनोद की कविताओं में मां है, बाबा हैं, गांव है, जेठ की दुपह‍री है और भींतों की छांव है. विनोद कोई बड़ी, भारी कविता नहीं कहते, वे बस छोटी छोटी कविताओं में बड़ी बड़ी बातें कर जाते हैं. ग्रामीण जीवन, जीवन के अनुभव से सीखे ज्ञान की यह सहज खासियत है, जो उनकी कविताओं को विशेष बना देती है डॉ. सत्‍यनारायण ने लिखा है कि विनोद की कविताएं ‘चाकू समय’ की कविताएं हैं, जबकि हम माटी की गंध और उसके संघर्ष से कटे जा रहे हैं या कि हमें उससे दूर धकेला जा रहा है. इन कविताओं को पढ़ते हुए पाठक ऐसी सौंधी गंध में डूब जाता है जहां वह रेत, खेत और धरती में रूळते-पळते अहसासों को महसूस कर सकता है.

छत
छत तो छत है
ऊपर चढ़ो तो नीचे गिरने का डर
और
नीचे बैठो तो
ऊपर गिरने का भय.

भाषा को बचाने की तमाम आंदोलनों के बीच इस बात पर चर्चा कम ही होती है कोई भाषा तभी मरती है जब हम उसे बोलना छोड़ देते. जब हम उसी भाषा में लिखते नहीं हैं. भाषा को बचाये रखने की कवायद यहीं से शुरू होती है कि अपनी मां भाषा में लिखें- रचें. राजस्‍थान के साहित्‍य ग्राम परलीका के विनोद का यह कविता संग्रह इस लिहाज से भी उल्‍लेखनीय है.

दादीpreet-1

सुई में

धागा डालती दादी को

समूचा घर ही

फटा हुआ दिखता है.

[प्रीत कमेरी जयपुर के बोधि प्रकाशन से आई है. कविताओं का राजस्‍थानी से भावानुवाद किया गया है.]

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9. त्रिभुवन : सुबह की कोंपलें

कागज पर चित्र बनाता बच्‍चा
बार बार बनाता है
‘ईश्‍वर’
और हर बार
मिटा देता है रबर से.

(त्रिभुवन की एक कविता)

पत्रकार मित्रों में त्रिभुवन को ‘व्‍याकरणाचार्य’ कहा जाता है क्‍योंकि संस्‍कृत, हिंदी पर उनकी पकड़ अद्भुत है और वे ही हैं जो किसी शब्‍द विशेष के इस्‍तेमाल या उसके सही-गलत होने पर बहस करने की कूव्‍वत रखते हैं. यह भाषा, शब्‍दों के सही इस्‍तेमाल के प्रति उनका आग्रह है. लंबे संघर्ष के बाद जयपुर और राष्‍ट्रीय राजधानी में धमक से पत्रकारिता कर चुके त्रिभुवन का कवि रूप उनके पहले कविता संग्रह ‘कुछ इस तरह आना’ से सामने आया है जो भाषा के प्रति उनकी अगाढ आस्‍था का प्रतिबिंब भी है. यह संग्रह शब्‍दों की आकाशगंगा में त्रिभुवन के प्रभावी दखल को ही रेखांकित नहीं करता बल्कि उनके सहारे छोटी छोटी बातों को रचनाशीलता के व्‍यापक कैनवास पर उकेरने की उनकी हतप्रभ कर देने वाली क्षमता को भी सामने लाता है. अंग्रेजीदां  होते इस समय में हम (विशेषकर नई पीढी के पत्रकार/युवा) जिन शब्‍दों को ‘आऊट डेटड, एक्‍सपायर्ड’ की श्रेणी में डाल चुके हैं उन्‍हें त्रिभुवन की कविताएं धम्‍म से हमारे सामने लाती हैं और हम आश्‍चर्यचकित होकर रह जाते हैं.

ठेठ ग्रामीण या आम भाषा के शब्‍दों को अपनी श्रेष्‍ठ कविताओं में लाना हर कवि के बस में नहीं होता क्‍योंकि इसके साथ वह अपनी रचनाओं को एक क्षेत्र (भाषा क्षेत्र) विशेष तक सीमित करने का जोखिम भी उठा रहा होता है. त्रिभुवन ने इस जोखिम को बड़े पैमाने पर तथा खुलकर उठाया है और यह उनकी कविताओं की एक खूबी बन गया है जो रड़कता नहीं, आषाढ़/सावन के पहले मेह सा महकता है. ‘कुछ इस तरह आना’ में त्रिभुवन ने मई मास की लू से लेकर देह की ऋतु पर बात की है. गलियों, खेतों में मंडराते भतूळिए व इनबाक्‍स में एसएमएस पर उनकी पंक्तियां हैं और वे ही चरखे, तंदूर और भैंस वाली जसमिंदर को सर्च इंजिन में तलाशने की बात करते हैं.

त्रिभुवन की कविताएं बिंबों, प्रतीकों की पगडंडियों पर चलती हुई संभावनाओं के नए क्षितिज टटोलती हैं. इन कविताओं में किसी क्रांति या बड़े सपने का कागजी आह्वान भले ही न हो वे सुबह की कोंपलों, आषाढ के अंधड़, चुलबुले बादलों, बीर बहूटी, सरकंडे, रूंख, अरड़ाते ऊंट, बच्‍चों की क्रिकेट क्रीज, जीवन में स्त्रियों, मां, दोस्‍तों आदि से बावस्‍ता आम आदमी के मनोभावों को सांगोपांग ढंग से सामने रखती हैं. जैसा प्रमुख कवि बद्रीनारायण कहते हैं कि त्रिभुवन की कविताएं ताजी हवा का झोंका है, जो अनुवादित या बोझिल एकसार तकनीकी कविताओं को पढकर बोर-व्‍यथित हो रहे पाठक के दिलो दिमाग पर प्रभावी दस्‍तक देती हैं. व्‍यक्तिगत जानकारी के आधार पर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि त्रिभुवन का यह संग्रह ‘पहल के लिए ही है’, इससे अच्‍छा और बहुत अच्‍छा तो अभी आना है.

//इन कविताओं के भीतर हम एक ऐसे संवेदनशील व्‍यक्ति या औसत नागरिक को देख सकते हैं जो समय और समाज की विसंगतियों का जिम्‍मेदार साक्षात्‍कार करते हुए मनुष्‍यता के सभी रंगों और संवेदनाओं को बचा रखना चाहता है. – हेमंत शेष//

।।।।।।।

कुछ भी नहीं बचेगा एक दिन
इस पृथिवी पर
न वर्षा, न वसंत, न शरद, न शिशिर,
न ग्रीष्‍म और न वसंत.
कुछ बचना संभव ही नहीं घृणा और उदासी में.
नहीं बचेगा बचना भी इस विक्षोभ में.
……….
जीवन में खिलने का अर्थ खिलने से नहीं,
गिरने, तपने, सूखने, झरने और ठिठुरने से है.
जीवन खिलने से है.

।।।।।।

हिंदी के नए कविताओं में एक ऊबाऊ नीरसता है. वह भाव की भी है, भाषा की भी है और विषयवस्‍तु की भी. समकालीन कविताएं एक खास तरह की कंडीशनिंग की शिकार हैं, जिसे गाहे – बगाहे आलोचकों और पत्र पत्रिकाओं के संपादकों ने बना दिया है. त्रिभुवन की कविताएं ताजी हवा के रूप में आती हुई महसूस होती हैं. इन कविताओं में इमेजिनेटिव फ्लाइट है और इनकी भाषा का अलग सौंदर्य है. विश्‍वास है कि इस संग्रह से आज के कविता जगत में फैली मोनोटोनी खत्‍म होगी. – बद्रीनारायण, प्रमुख कवि व समालोचक

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त्रिभुवन, फिलहाल दैनिक भास्‍कर में स्‍टेट ब्‍यूरो के प्रमुख हैं. उनसे यहां संपर्क किया जा सकता है- tribhuvun@gmail.com

किताब – कुछ इस तरह आना : त्रिभुवन
बोधि प्रकाशन 0141-2503989

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8. सत्‍य के लिए किसी से न डरो.

.. सत्‍य के लिए किसी से भी नहीं डरना, गुरू से भी नहीं, लोक से भी नहीं .. मंत्र से भी नहीं.

इसी कथन को हजारी प्रसाद द्विवेदी के अद्भुत कालजयी उपन्‍यास ‘बाणभट्ट की आत्‍मकथा’ का सार कहा जाए तो अतिश्‍योक्ति नहीं होगी.

बाणभट्ट की आत्मकथा उनका पहला उपन्‍यास है जो आत्मकथात्मक शैली में लिखी हुई एक विक्षण कृति है जिसमें इतिहास और कल्पना का ऐसा सुंदर समन्वय है कि वे दोनों एक-दूसरे के पूरक बन गये हैं. यह हर्षकालीन भारत (सातवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध) के परिवेश में लिखी गयी एक ऐतिहासिक रोमांच की सृष्टि है.

जिस पर विश्‍वास करना चाहिए, उस पर पूरा करना चाहिए, परिणाम जो हो. जिसे मानना चाहिए अंत तक मानना चाहिए. - बाणभट्ट की आत्‍मथा से एक वक्‍तव्‍य

जिस पर विश्‍वास करना चाहिए, उस पर पूरा करना चाहिए, परिणाम जो हो. जिसे मानना चाहिए अंत तक मानना चाहिए. – बाणभट्ट की आत्‍मथा से एक वक्‍तव्‍य

संस्‍कृतनिष्‍ठ और एक तरह से कलिष्‍ठ भाषा शैली का यह उपन्‍यास अपनी समस्त औपन्यासिक संरचना और भंगिमा में कथा-कृति होते हुए भी महाकाव्य की गरिमा से पूर्ण है. इसमें द्विवेदी जी ने प्राचीन कवि बाण के बिखरे जीवन-सूत्रों को बड़ी कलात्मकता से गूंथकर एक ऐसी कथा-भूमि निर्मित की है जो जीवन सत्यों से रसमय साक्षात्कार कराती है. इसमें वह वाणी मुखरित है जो सामगान के समान पवित्र और अर्थपूर्ण है: ‘सत्य के लिए किसी न डरना, गुरू से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’

इसमें प्रमुख पात्र तीन हैं- बाणभट्ट, भट्टिनी तथा निपुणिका; ये तीनों पात्र अंतर्मुखी और आत्मदान की भावना से युक्त हैं. इस उपन्यास की सभी घटनाओं में व्याप्त चरित्र अगर कोई है तो वह है-निपुणिका. बाण जिस विचार को लेकर स्थाणीश्वर आया था, उसमें परिवर्तन का मुख्य कारण निपुणिका से उसका मिलन ही था और आगे चलकर जो घटनाएँ घटित होती हैं उनमें भी निपुणिका ही का प्राधान्य रहता है. इस रूप में इस उपन्यास में निपुणिका महत्व वैसा ही है जैसा किसी नायिका को होता है. वैसे निपुणिका इस उपन्यास की नायिका नहीं है.
………..
.. भट्टिनी का मुख मंडल प्रभात कालीन नवमल्लिका की भांति खिल गया. स्‍मयमान मुख की कपोल पालि विकसित हो गई. नयनकोरकों में वंकिम आनंद रेखा विद्युत की भांति खेल गई. ललाटपट्ट की वलियां विलीन हो गईं और वह अष्‍टमी के चंद्रमा की तरह मनोहर हो गया..’
(उपन्‍यास की सुंदर भाषा शैली का एक उदाहरण)

………..

बाणभट्ट की आत्मकथा का कथानायक कोरा भावुक कवि नहीं वरन् कर्मनिरत और संघर्षशील जीवन-योद्धा है। उसके लिए ‘शरीर केवल भार नहीं, मिट्टी का एक ढेला नहीं, बल्कि ‘उससे बड़ा’ है और उसके मन में आर्यावर्त के उद्धार का निमित्त बनने की तीव्र बेचैनी है. ‘अपने को निशेष भाव से दे देने’ में जीवन की सार्थकता देखनेवाली निउनिया और ‘सबकुछ भूल जाने की साधना’ में लीन महादेवी भट्टिनी के प्रति उसका प्रेम जब उच्चता का वरण कर लेता है तो यही गूँज अंत में रह जाती है-‘‘वैराग्य क्या इतनी बड़ी चीज है कि प्रेम के देवता को उसकी नयनाग्नि में भस्म कराके ही कवि गौरव का अनुभव करे।

(राजकमल पैपरबैक्‍स, दिल्‍ली द्वारा प्रकाशित इस उपन्‍यास की उक्‍त समीक्षा के शब्‍द अलग अलग जगहों से साभार लिए गए हैं. इनके लिंक यहां दिए जा रहे हैं जहां पूरी समीक्षाएं पढ़ी जा सकती हैं.
http://www.taptilok.com/pages/details.php?detail_sl_no=361&cat_sl_no=8
http://aanchalik.blogspot.com/2008/06/blog-post_08.html
http://pustak.org/bs/home.php?bookid=7109)

(Tags: Banbhat ki atmkatha, Hajariprasad Divedi, Punarnwa, Anamdas ka potha)

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7. किसान, जो कथाएं उगाता है!

परलीका (जिला हनुमानगढ, राजस्‍थान) गांव के किसान साहित्यकार रामस्वरूप किसान को केंद्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली की ओर से डेढ़ लाख रुपए की स्कॉलरशिप दी जाएगी। कांकड़ के लिए उसने उनसे बात करने के लिए घंटी मारी तो वे खेत से लौटे ही थे.. पुराने कागजों को पलट रहे थे. वे ठेठ बागड़ी में उसी सहजता और अपनत्‍व से बात करते हैं..

क्‍या हो रहा है किसान जी?
अभी खेत से लौटा हूं और कागजों के बीच बैठा हूं. बिरखा तो हुई नहीं, ट्यूबवैल से जुगाड़ किया जा रहा है. अब देखते हैं कैसे क्‍या होगा.

स्‍कालरशिप के मायने?
आर्थिक रूप से भी हैं और यह प्रेरक भी है. ज्‍यादातर लेखक भी किसानों की तरह आर्थिक रूप से पिछड़े ही हैं… आर्थिक संबल कुछ नया करने को प्रेरित तो करता ही है. यह स्‍कालरशिप कुछ नया करने को प्रेरित करेगी.

कोई योजना?
सही बात तो यह है कि पिछले दो साल में कुछ नहीं लिखा सिर्फ दो चार कविताओं के सिवा. वरना पिछले दो दशक में ऐसा कोई साल नहीं रहा जब कम से कम एक किताब नहीं छपी हो. दो साल काफी कड़े रहे…. हालात कठिन थे. खैर, अंदर बहुत कुछ जमा है. जो अगले छह महीने में निकाल देंगे. कहानी संग्रह की योजना है.

स्‍कालरशिप योजना : साहित्यकार रामस्वरूप किसान को केंद्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली की ओर से डेढ़ लाख रुपए की स्कॉलरशिप दी जाएगी। अकादेमी के पत्र के हवाले से किसान ने बताया कि राजस्थानी भाषा में सृजनात्मक लेखन के लिए अकादेमी ने अपनी नई योजना ‘राइटर्स इन रेजीडेंसी’ के तहत उनका चयन किया है तथा अकादेमी आगामी 6 माह तक उन्हें 25 हजार रुपए मासिक के हिसाब से कुल डेढ़ लाख रुपए प्रदान करेगी। इस दौरान वे राजस्थानी कहानियों का सृजन करेंगे. राजस्‍थानी में किसान के अलावा यह अवार्ड मालचंद तिवाड़ी, विजयदान देथा, रामेश्‍वर दयाल, भगवती व्‍यास को दिया गया है. अकादमी की यह योजना इसी साल शुरू हुई है और लगभग 24 भाषाओं के पांच पांच रचनाकारों को इसके लिए चुना गया है.

किसान : रामस्वरूप किसान खेत में कड़ी मेहनत के बल पर जीवनयापन करने वाले राजस्थानी के अनूठे साहित्यकार हैं तथा वे राजस्थानी भाषा के मान्यता आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उन्हें साहित्य अकादेमी के अनुवाद पुरस्कार तथा राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर के मुरलीधर व्यास राजस्थानी पुरस्कार सहित कई महत्त्वपूर्ण पुरस्कार मिल चुके हैं तथा इनकी रचनाएं अंग्रेजी, हिन्दी, पंजाबी, गुजराती, तेलुगु आदि भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। किसान की रचनाएं माध्यमिक शिक्षा बोर्ड तथा विश्वविद्यालयों के पाठयक्रम में भी शामिल हुई हैं।

मेरी ऑंखें जल्द लौटाना बाबा!

मैं राजी-खुशी हूँ

रामस्‍वरूप किसान

रामस्‍वरूप किसान

मेरे बाबा!
यह खत तो मैं
एक जरूरी काम से लिख रही हूँ।

याद होगा आपको
घर छोड़ते वक्त
आपकी देहरी में ठोकर खाकर
गिरने लगी थी जब मैं
तो न जाने
विदाई-गीत गाती
औरतों के उस हुजूम को चीरते
आपके हाथ
मुझ तक कैसे पहुँचे थे बाबा!

हाँ बाबा,
वे आपके ही हाथ थे
कौन बेटी नहीं पहचान सकती
बाप के हाथ?
मैंने पहचान लिए थे आपके वे हाथ
जो घर को ढहने से बचाने की मशक्कत में
इतने अशक्त हो गए थे
कि कांपते-कांपते
पहुंच पाए थे मुझ तक।

लेकिन ऊपर का ऊपर
सम्भाल लिया था
उन अशक्त हाथों ने मुझे।
आपके हाथों के कम्पन का स्पर्श
मेरे बाजुओं के रास्ते
मेरे कलेजे में पहुंचकर
आपकी लड़खड़ाती सूखी काया का बिम्ब
अभी भी बना रहा है बाबा!

शायद नहीं सोचा होगा आपने
कि आपकी देहरी पर
क्यों लगी थी ठोकर मुझे?

मैं अंधी थी बाबा!
बिल्कुल अंधी।
जब मैं विदाई के लिए तैयार की जा रही थी
मेरी ऑंखें
मेरे तन से जुदा होकर
आपके पथराए चेहरे से चिपक गई थीं बाबा!
फुरसत मिले तो
मेरी ऑंखें जल्द लौटाना बाबा!

यहाँ जब-जब मुझे
ठोकर लगती है,
मेरी सास डांटती है-
‘देखकर नहीं चलती
अंधी है क्या?’
(कविता का हिन्दी अनुवाद तथा अन्‍य जानकारी उपलब्‍ध कराने के लिए सत्यनारायण सोनी का आभार, उनका ब्‍लाग http://satyanarayansoni.blogspot.com/)

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6.छूटते छूटते छूटता है..

राजस्‍थानी के वरिष्‍ठतम लेखकों में से एक मोहन आलोक ने हाल ही में ज़फ़रनामा का सुंदर, सार्थक और सराहनीय अनुवाद किया है. ग-गीत, डांखळा, चित मारौ दुख नै, सौ सोनेट और वनदेवी जैसी कई उपलब्धिपरक किताबें लिख चुके मोहन जी ने पिछले दिनों थोड़ी सी जमीन खरीदी और उसमें दर्जनों पेड़ लगाए. उनका कहना है कि बात सिर्फ बातों से नहीं बनेगी कुछ करना भी होगा. उनसे मुलाकात होती रहती है. इस बार छूटते ही चार सवाल उनके सामने पेल दिए. वे श्रीगंगानगर में रहते हैं.

mohan jee

क्‍या कर रहे हैं आजकल?
‘ छूटते छूटते छूटता है उनकी गली में जाना..’ , लिखने पढने वाला आदमी हूं, वही कर रहा हूं. राजस्‍थानी में नया प्रयोग रूबाइयों के रूप में किया है. 100 के करीब रूबाइयां लिखी हैं.. किताब का रूप दे रहा हूं.

राजस्‍थानी साहित्‍य की मौजूदा स्थिति?
स्थिति संतोषजनक है.. साहित्‍यकार बलिदान कर रहे हैं… खून जलाकर लिखते हैं, पेट काटकर छपवाते हैं, फिर टिकटें लगाकर भिजवाते हैं. खरीद के कोई कोई पढ़ना नहीं चाहता. राजस्‍थानी का अपना कोई पाठक वर्ग नहीं, प्राय: सभी हिंदी से ही हैं.

राजस्‍थानी साहित्‍य का भविष्‍य?
दिक्‍कत है कि राजस्‍थानी में पुरस्‍कार बहुत हैं. बड़े बड़े पुरस्‍कार हैं, अच्‍छी खासी नकदी वाले! यही कारण है कि हिंदी मूल के लेखक भी राजस्‍थानी की ओर रुख कर रहे हैं. तो हिंदी या अंग्रेजी में सोचकर लिखे राजस्‍थानी साहित्‍य में तंत नहीं होता. गहराई का सवाल ही नहीं! बड़ी चिंता यह कि स्‍थाई महत्‍व का नहीं लिखा जा रहा जिसको पढ़कर उम्‍मीद बंधे.. !

राजस्‍थानी को मान्‍यता का सवाल..?
मान्‍यता से बड़ा मुद्दा जनजुड़ाव का है. जनजुड़ाव नहीं होने पर मान्‍यता कोई मायने नहीं रखती. आम लोग भाषा के सवाल को नहीं मानते क्‍योंकि उन्‍हें लगता है कि काम चल रहा है. दरअसल लोगों को मान्‍यता नहीं मिलने से होने वाले नुकसान की जानकारी नहीं. फिर शायद प्रशासनिक और राजनीतिक स्‍तर पर भी ज्‍यादा इच्‍छा नहीं है. शायद वहां एक सवाल यह भी है कि हिंदी बेल्‍ट से राजस्‍थान प्रदेश को निकाल दिया जाए तो बचेगा क्‍या?

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5.घुळगांठ : जो है!

ola-coverघुळगांठ जो है! कोई गांठ जब गडमड होकर उलझ जाती है उसे घुळगांठ कहते हैं. यानी अनखुल ग्रंथि. मूल रूप से एक सस्‍ंकृत शब्‍द का तत्‍भव है जिसका हिंदी में समानार्थी ढूंढना मुश्किल ही है. भरत ओळा ने अपने इस शीर्षक के माध्‍यम से भारतीय समाज की एक नहीं खुलने वाली ग्रंथि या घुळगांठ को समेटा है जो जातीयता के रूप में न केवल गहरे और चिंताजनक रूप से विद्यमान है बल्कि निरंतर बढ़ रही है.

एजेंडा : मनीसा मेघवाल! यह उपन्‍यास अलग अलग जाति के चार युवकों और तीन युवतियों के इर्द गिर्द घूमता है. इसमें भी केंद्र में मेघवाल जाति की एक लड़की मनीसा है यानी मनीसा मेघवाल. भरे बदन की एक सुंदर षोड्षी. एजेंडा यहीं से शुरू होता है कि इस लड़की का नाम क्‍या है, नाम है तो जाति क्‍या है, जाति मेघवाल! हो ही नहीं सकता है और अगर वह मेघवाल है तो इंडु चौधरी के शब्‍दों के ‘झट फाऊल’ यानी वर्ण संकर है. या कि पंडताई तो पंडतों के खून मे होती है. बहस यही है कि नीची जाति की लड़की सुंदर कैसे हो सकती है. इसका एक उत्‍तर उपन्‍यास में कहीं इस सवाल में भी निकलता है कि चौधरियों के सारे लड़के ‘मर्द’ जैसे क्‍यों नहीं होते!

कथावस्‍तु: साहसिक और अनूठी. उपन्‍यास की कथावस्‍तु राजस्‍थान के एक सिरे के जिले हनुमानगढ़ तथा उसके दो कस्‍बों नोहर, भादरा में यहां वहां घूमती है. राजस्‍थान का इस इलाके की सीमा पंजाब के साथ साथ हरियाणा से लगती है और सांस्‍कृतिक लिहाज से इसे बहुभाषी भी कहा जा सकता है. दूसरी बात उस ग्रंथि की है जिस पर यह उपन्‍यास आधारित है. जातियों की घुळगांठ.. यह घुळगांठ थार से इतर पंजाब या हरियाणा ही नहीं एक तरह से समूचे भारतीय समाज की एक जटिलता व विकार है. सुपरियरिटी या इनफरियरिटी कांपलेक्‍स .. जाति विशेष को एक निम्‍नतम संबोधन से बुलाना भारतीय समाज की विशेषता रही है जिसका उदाहरण इस उपन्‍यास में जाट यानी खोता या खोतणा, बणिया यानी किराड़, ब्राहमण यानी गरड़ा और मेघवाल यानी रूंगा के रूप में है.

भाषा शैली:बहुत सुंदर . अनुवादित और तकनीकी शब्‍दों वाली किताबें पढ़ते पढ़ते उब गए लोगों के लिए ताजी हवा का झोंका. सही मायने में बतरस का बेहतरीन नमूना क्‍योंकि सभी ने तो गूंग (मूर्खता) नहीं पहन रखी और कई लोगों की फूंक से भी घास जल जाती है! सीधे साधे जीवन की अनघड़ भाषा बोली इस उपन्‍यास को और भी पठनीय बना देती है.

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ऊपरी तौर पर लगता है कि शिक्षा और धन प्रवाह के बढ़ने के साथ जाति की बात ही खत्‍म हो गई. ऐसा नहीं है. राजस्‍थानी के सामंतवादी समाज में इसकी जड़ें आज भी बहुत गहरी हैं. यह कहना अति‍श्‍योक्ति नहीं होगा कि जातिवाद भयंकर रूप में मौजूद है. जातिवाद के इसी सामूहिक मनोविज्ञान पर केंद्रित है नया उपन्‍यास ‘घुळगांठ’.- भरत

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रूंगा झूंगा : आरक्षण पर एक अच्‍छी बहस, भगतसिंह, अंबेडकर, महात्‍मा गांधी और मनु का किन्‍हीं अच्‍छे व सारगर्भित संदर्भों में जिक्र. कथाओं के रूप में पंडतों की कमाई का धंधा, स्‍टेट्स के नाम पर शादी ब्‍याह पर किए जाने वाले अंधाधुंध खर्च जैसे मुद्दों पर बेबाक टिप्‍पणी. उपन्‍यास का एक उपन्‍यास न होकर अपने साथ या आसपास घटित होने वाला कोई घटनाक्रम लगना. जीवंत शब्‍दावली और आनंद देने वाली लोकोक्तियां व मुआवरे. अनघड़ लेकिन सुघड़ उपन्‍यास!

कांकड़ की सलाह : खरीद के पढि़ए! थार ही नहीं तो कम से कम उत्‍तर भारतीय समाज के सामूहि‍क मनोविज्ञान या जातिगत आधारित कुंठाओं को जानने का एक बेहद सरल और अद्भुत उपन्‍यास. उपन्‍यास के अग्रलेख में माल‍चंद तिवाड़ी ने लिखा है कि यह उपन्‍यास सामूहिक मनोविज्ञान की गहरी झड़ों पर रोशनी डालता है. उपन्‍यास भारतीय समाज की उस घुळगांठ को सामने लाया है जो उसकी पूरी मनोरचना में समाई है. एक ऐसा विषय जिसे ज्‍यादा से ज्‍यादा ढंकने की कोशिश की जाती है या कमतर माना जाता है, उसे अपने उपन्‍यास का विषय बनाकर ओळा ने अपने लेखकीय साहस और व्‍यक्तिगत जीवतटता का परिचय दिया है. निसंदेह रूप से भरत ओळा ने मनीसा मेघवाल की इंडु चौधरी के साथ प्रेम कहानी नहीं लिखी है. न ही उन्‍होंने जातिव्‍यवस्‍था पर कोई शोध ग्रंथ देने का प्रयास किया है. वे उपन्‍यास में होकर भी गायब हैं और न होते हुए भी मौजूद हैं. उन्‍होंने वक्‍त के एक हिस्‍से को पन्‍नों पर उतार कर पाठक के हवाले कर दिया है. यही इसका सरलता और यही इसकी जटिलता है. कल्‍पना आधारित होकर भी यह उपन्‍यास हकीकत से कहीं अधिक कठोर तथा सपनों से अधिक मुलायम लगता है. हर पेज की कोई टिप्‍पणी या कोई बात पाठक यही सोचता है- यह तो हो रहा है, यह सही है.. अरे ये तो मेरे साथ भी हुआ है. घुळगांठ की किसी अन्‍य किताब से तुलना करना बेमानी और भरत ओळा के साथ अन्‍याय होगा क्‍योंकि यह उपन्‍यास अपने आप में एक प्रतिमान घड़ता है.

सार-सार
भरत ओळा : राजस्‍थानी के साथ हिंदी में भी कविता कहानी करने वाले ओळा को 2002 में साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार मिला. उनके राजस्‍थानी कहानी संग्रह ‘ जीव री जात’ का पंजाबी में अनुवाद हो चुका है. एकता प्रकाशन, चुरू द्वारा प्रकाशित घुळगांठ का हिंदी और पंजाबी संस्‍करण प्रस्‍तावित है. ओळा का पता है- 37, सेक्‍टर नं. 5, नोहर, जिला- हनुमानगढ (राजस्‍थान).
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4. राजस्‍थानी की दशा दिशा बेहतर – भरत ओळा
राजस्‍थानी साहित्‍य के सशक्‍त हस्‍ताक्षर भरत ओळा का मानना है कि इस भाषा के साहित्‍य की दशा अच्‍छी है और दिशा बेहतर. यानी आने वाले दिन सुखद संकेत दे रहे हैं. किताबघर में इस बार भरत ओळा से चार सवाल ..

भरत ओळा का मानना है कि राजस्‍थानी साहित्‍य में इन दिनों काफी सुधार आया है. मौलिकता, गहराई और विविधता के मामले में राजस्‍थानी साहित्‍य आज अधिक बेहतर है.

भरत ओळा का मानना है कि राजस्‍थानी साहित्‍य में इन दिनों काफी सुधार आया है. मौलिकता, गहराई और विविधता के मामले में राजस्‍थानी साहित्‍य आज अधिक बेहतर है.

राजस्‍थानी साहित्‍य : दशा और दिशा
वर्तमान शब्‍द सृजन आने वाले बेहतर भविष्‍य का संकेत है. कुछ बातें थीं जिनमें हमारा साहित्‍य पीछे था जैसे विविधता, गहराई और मौलिकता. लेकिन अब इस मोर्चे पर भी बेहतर संकेत मिल रहे हैं. आने वाले दिन और अच्‍छे होंगे.

राजस्‍थानी को मान्‍यता का सवाल
राजस्‍थानी को मान्‍यता तो मिलनी ही है. बस समय की बात है. भारतीय रिजर्व बैंक तथा लोक सेवा आयोग की कुछ आपत्तियां हैं जिन्‍हें नियमों में बदलाव से दूर किया जा सकता है. वह दिन दूर नहीं जब राजस्‍थानी मान्‍यता प्राप्‍त भाषा होगी.

नयी किताब
राजस्‍थानी समाज में जातिवाद पर. ऊपरी तौर पर लगता है कि शिक्षा और धन प्रवाह के बढ़ने के साथ जाति की बात ही खत्‍म हो गई. ऐसा नहीं है. राजस्‍थानी के सामंतवादी समाज में इसकी जड़ें आज भी बहुत गहरी हैं. यह कहना अति‍श्‍योक्ति नहीं होगा कि जातिवाद भयंकर रूप में मौजूद है. जातिवाद के इसी सामूहिक मनोविज्ञान पर केंद्रित है नया उपन्‍यास ‘घुळगांठ’.

नोहर के बारे में
गांव का गांव, शहर का शहर. यहां रहते हुए गांव और शहर दोनों को समान रूप से अनुभव किया जा सकता है. ऐतिहासिक और प्राचीन मानवीय बसावट. सिंधु घाटी जैसी प्राचीन सभ्‍यता के अवशेष क्षेत्र में मिलते ही रहे हैं. कई मायनों में सोचते हैं तो छोटी जगह अधिक बेहतर होती है. वहीं इसकी अपनी सीमाएं भी हैं.

(कलम के धनी भरत ओळा का जन्‍म भिरानी गांव, भादरा में हुआ. राजस्‍थानी के हर पाठक वर्ग में आपका नाम आदर से लिया जाता है. राजस्‍थानी, हिंदी और पंजाबी पर आधिकारिक पकड़. साहित्‍य अकादमी व राजस्‍थानी कथा साहित्‍य पुरस्‍कार सहित कई सम्‍मान पा चुके हैं. फिलहाल नोहर में अध्‍यापक हैं.)
(Bharat ola, Nohar, Rajasthan, Bhadra, Rajashtani literature)
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3. कहो कर्ण ! अपनी जीवन गाथा .

‘…भीतर से-मेरे मन के एकदम गहन-गम्भीर अन्तरतम से एक आवाज बार-बार मुझको सुनाई देने लगी है। दृढ़ निश्चय के साथ जैसे-जैसे मैं मन ही मन उस आवाज़ को रोकने का प्रयत्न करता हूँ, वैसे-ही-वैसे हवा के तीव्र झोंको से अग्नि की ज्वाला जैसे बुझने के बजाय पहले की अपेक्षा और अधिक जोर से भड़क उठती है, वैसे ही वह आवाज बार-बार गरजकर मुझसे कहती है, ‘‘कहो कर्ण ! अपनी जीवन कथा आज सबको बता दो। वह कथा तुम ऐसी भाषा में कहो कि सब समझ सकें, क्योंकि आज परिस्थिति ही ऐसी है। सारा संसार कह रहा है, ‘कर्ण, तेरा जीवन तो चिथड़े के समान था !’ कहो, गरजकर सबसे कहो कि वह चिथड़ा नहीं था, बल्कि वह तो गोटा किनारवाला एक अतलसी राजवस्त्र था। केवल-परिस्थितियों के निर्दय कँटीले बाड़े में उलझने से ही उसके सहस्त्रों चिथड़े हो गये थे। जिस किसी के हाथ में वे पड़े, उसने मनमाने ढंग से उनका प्रचार किया। और फिर भी तुमको उस राजवस्त्र पर इतना अभिमान क्यों ?’’ (-मृत्‍युंजय की शुरुआती पंक्तियां)

428mritunjayसातेक साल पहले एक राजीव जी ने एक किताब का नाम लिया था. पांडे जी ने दिल्‍ली से वह किताब लाकर दी और शुरू की तो पढ़ता ही गया. पूरी पढ़ गया फिर भी तृप्ति नहीं हुई. लगा कुछ पन्‍ने और होने चाहिए थे. किताब थी शिवाजी सावंत लिखित मृत्‍युंजय. राजीव जी से चर्चा से पहले न तो लेखक का नाम सुना था न ही इस किताब का. पर फिर यह किताब अपने किताबों के झोले का प्रमुख हिस्‍सा बन गई. आज भी समय मिलने पर इसके पन्‍ने पलट लेता हूं. दरअसल यह किताब नहीं एक अद्भुत महारचना है किसी एक व्‍यक्तित्‍व पर. भारतीय भाषाओं में किसी एक व्‍यक्तित्‍व पर इतनी सांगोंपांग किताब शायद ही दूसरी कोई हो.

सूर्यपुत्र महारथी कर्ण .. एक योद्धा, भाई, पति, पिता और सबसे बढ़कर एक महान दानवीर. आमतौर पर हम शायद कर्ण के व्‍यक्तित्‍व को उतने अच्‍छे से नहीं जान पाते जितना इस कालजयी उपन्‍यास को पढ़ने के बाद. यह उपन्‍यास कर्ण के बारे में अपनी सोच ही नहीं बदलता, जीवन के बारे में हमारे नजरिए को भी प्रभावित करता है. महाभारत का कर्ण हमारे लिए एक विराट व्‍यक्तित्‍व बन जाता है. कर्ण जो अपने पूरे जीवन में अलग अलग मोर्चों पर संग्राम करता रहा और जिसके समक्ष हमेशा एक यक्ष प्रश्‍न रहा- ‘ मैं कौन हूं ?’ शिवाजी सावंत का यह उपन्‍यास अद्भुत शोध के बाद सतत लगन, मेहनत से लिखा गया है. आधुनिक भारतीय कथा-साहित्य में निःसन्देह एक विरल चमत्कार है। यह ‘मूर्तिदेवी पुरस्कार’ सहित कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित और अनेक भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनूदित हो चुका है.

मृत्युंजय उपन्यास में  कर्ण की ओजस्वी, उदार, दिव्य और सर्वांगीण छवि प्रस्तुत करते हुए सावंत ने जीवन के सार्थकता, उसकी नियति और मूल-चेतना तथा मानव-सम्बन्धों की स्थिति एवं संस्कारशीलता की मार्मिक और कलात्मक अभिव्यक्ति की है.

मृत्युंजय उपन्यास में कर्ण की ओजस्वी, उदार, दिव्य और सर्वांगीण छवि प्रस्तुत करते हुए सावंत ने जीवन के सार्थकता, उसकी नियति और मूल-चेतना तथा मानव-सम्बन्धों की स्थिति एवं संस्कारशीलता की मार्मिक और कलात्मक अभिव्यक्ति की है.

डॉ. संध्या भराड़े ने शिवाजी सावंत के निधन के बाद कहीं लिखा था कि पुस्तक लिखकर, छपने के बाद अक्सर पाठक और लेखक का संबंध टूट जाता है लेकिन शिवाजी सावंत उन सौभाग्यशाली लेखकों में रहे जिनकी ‘मृत्युंजय’ एक घर की तीसरी पीढ़ी भी उसी रुचि से पढ़ रही है. मृत्युंजय लिखकर शिवाजी सावंत ने कर्ण की जनसाधारण के मन में जो धूमिल और तिरस्कृत प्रतिमा थी उसे आदरणीय बना दिया इसमें दो राय नहीं हो सकती.

‘मृत्युंजय उपन्यास महारथी दानवीर कर्ण के विराट् व्यक्तित्व पर केन्द्रित है. महाभारत के कई मुख्य पात्रों के बीच – जहाँ स्वयं कृष्ण भी – कर्ण की ओजस्वी, उदार, दिव्य और सर्वांगीण छवि प्रस्तुत करते हुए सावंत ने जीवन के सार्थकता, उसकी नियति और मूल-चेतना तथा मानव-सम्बन्धों की स्थिति एवं संस्कारशीलता की मार्मिक और कलात्मक अभिव्यक्ति की है. मृत्युंजय में पौराणिक कथ्य और सनातन सांस्कृतिक चेतना के अन्तः सम्बन्धों को पूरी गरिमा के साथ उजागर किया गया है. उपन्यास को महाकाव्य का धरातल देकर चरित्र की इतनी सूक्ष्म पकड़, शैली का इतना सुन्दर निखार और भावनाओं की अभिव्यक्ति में इतना मार्मिक रसोद्रेक – सब कुछ इस उपन्यास में अनूठा है.’ -भारतीय साहित्‍य संग्रह

शिवाजी सावंत- कोल्हापुर जिले के अजरागांव में 31 अगस्त 1940 में एक किसान के यहां शिवाजी सावंत का जन्म हुआ था. विद्यालयी शिक्षा उसी गांव में संपन्न हुई लेकिन आर्थिक स्थिति साधारण होने के कारण आगे की पढ़ाई रुक गई और टाइपिंग तथा स्टेनोग्राफी की शिक्षा लेकर उन्होंने कोल्हापुर के राजाराम विद्यालय में 18 वर्ष अध्यापन का कार्य किया. शिवाजी सावंत के मन में बाल्यावस्था से ही कर्ण के चरित्र को लेकर उत्सुकता थी. विद्यालय में शिवाजी जयंती के उपलक्ष्य में अंगराज कर्ण नाटक खेला गया था. जिसमें श्रीकृष्ण की भूमिका शिवाजी सावंत ने की थी और तीस वर्ष पूर्व की हुई भूमिका मन के कोने में ऐसी छुपकर बैठी थी कि उस बीज का रूपांतर वटवृक्ष के रूप में मृत्युंजय में हुआ.

मृत्युंजय के संदर्भ में शिवाजी सावंत ने 6-7 वर्ष गहन अध्ययन किया. केवल अध्ययन ही नहीं पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, हिमाचल प्रदेश आदि प्रदेशों का भ्रमण भी किया जिससे कर्ण की व्यक्ति रेखा को समझने और वास्तविकता लाने में सहायता हो सके. इसी समय उनकी मुलाकात दिल्ली में श्री रामधारीसिंह दिनकर से हुई और ‘रश्मिरथी’ पुस्तक के साथ कर्ण के जीवन के अन्य पहलुओं पर भी चर्चा हुई. केदारनाथ मिश्र का हिन्दी में लिखित कर्ण पर खंडकाव्य पढ़ने के बाद शिवाजी सावंत ने तय कर लिया कि उन्हें कर्ण का चरित्र ही लिखना है, अब प्रश्न विधा का था. काव्य लिखा जाए, नाटक के रूप में लिखा जाए या फिर उपन्यास के रूप में लिखा जाए. लेकिन वृषाली, कुंती, कृष्ण, दुर्योधन, अश्वत्थामा, शोण आदि व्यक्ति रेखाएं स्पष्ट होती गईं और निश्चित हुआ कि कर्ण के चरित्र पर उपन्यास लिखा जाए. मृत्‍युंजय का प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ ने किया है और इसका हिंदी में बेहतरीन अनुवाद ओम शिवराज ने किया है. (pustak.org व डा भराडे की पंक्तियां साभार)

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2.सफलता के नए रहस्‍य
सफलता के सौ बाप हों या नहीं लेकिन सफलता आखिर सफलता होती है. सुपरस्‍टार और ग्रेट अचीवर जैसे शब्‍दों वाले इस युग ने सफलता के मायने एक तरह से बदल ही दिए हैं. सफलता के गुर देने वाले गुरुओं की भीड़ है और बाज़ार सफलता की सीढि़यां बताने वाली किताबों से अटा पड़ा है. यह अलग बात है कि भावनाओं की चाशनी में लिपटी बातें न तो सफलता का सूत्र बनती हैं और न ही ऐसी राह दिखाती हैं जो सफलता की ओर ले जाए. ऐसे में कुछ नई अवधारणाएं, सिद्धांत तथा अनुसंधानों सफलता के नए रहस्‍यों को उदघाटित किया है. वे बताते हैं कि सफलता का एकमात्र सूत्र मेहनत और मेहनत ही है. हां, अवसर और फिर कहीं जाकर भाग्‍य भी इसमें महती भूमिका निभाते हैं.

टाइगर वुडस

टाइगर वुडस

महान् गोल्‍फर टाइगर वुड्स, साफ्टवेयर दिग्‍गज बिल गेट्स और व्‍यवसायी निवेशक वारेन बुफे या बीटल्‍स अथवा मोजार्ट…कैसे ये आम होते भी खास और बहुत खास हो गए. इन्‍होंने अपने अपने क्षेत्र में जो अर्जित किया बाकी लोग उसके आसपास भी नहीं फटक सके. इन्‍हीं सब सवालों का टोह लेती दो किताबें इन दिनों खासी चर्चित हुई हैं। इनमें से एक है ज्‍याफ कोलविन लिखित ‘टेलेंट इज ओवररेटेड’ तथा दूसरी मेलकम ग्‍लेडवेल की ‘आऊटलियर्स’ है. इसके अलावा जर्मनी स्थित म्‍यूजिक आफ एकेडमी का नया अनुसंधान भी है. इन सभी में विभिन्‍न सफल हस्तियों की सफलताओं का वैज्ञानिक व चरणबद्ध अध्‍ययन किया गया है जो बताते हैं कि सफल होने के लिए क्‍या चाहिए.
को‍लविन की कड़ी मेहनत
ज्‍याफ कोलविन अपनी किताब ‘टेलेंट इज ओवररेटेड’ में सफलता की सीढि़यों की पड़ताल करते हुए इसका श्रेय ‘निर्दिष्‍ट या उद्देशित मेहनत’ को देते हैं. यह मेहनत, सामान्‍य मेहनत से कहीं अधिक केंद्रित व उद्देशित होती है. इनका कहना है कि कुछ लोग अच्‍छा प्रदर्शन करते हैं लेकिन बहुत कम लोग ही सर्वश्रेष्‍ठ या महान् प्रदर्शन करते हैं. इस अवधारणा का सार यही है कि ग्रेट परफारमेंस या उपलब्धियां किन्‍हीं व्‍यक्ति विशेष के लिए नहीं है बल्कि आम लोग भी उन्‍हें पा सकते हैं बशर्ते कि निर्दिष्‍ट मेहनत (deliberate practice) की जाए.

टेलेंट इज ओवररेटेड: सफलता के लिए सिर्फ मेहनत या कड़ी मेहनत से काम नहीं चलेगा. इसके लिए ‘उद्देशित मेहनत’ की जरूरत है. आपकी मेहनत में यह मायने रखता है कि आप अपनी प्रगति की समीक्षा किस तरह से करते हैं और अपनी गलतियों से किस तरह सीखते हैं, यही सब आपको महान् बनने में सक्षम बनाता है. सही तरह के प्रयास से कोई भी श्रेष्‍ठ बन सकता है.

टेलेंट इज ओवररेटेड: सफलता के लिए सिर्फ मेहनत या कड़ी मेहनत से काम नहीं चलेगा. इसके लिए ‘उद्देशित मेहनत’ की जरूरत है. आपकी मेहनत में यह मायने रखता है कि आप अपनी प्रगति की समीक्षा किस तरह से करते हैं और अपनी गलतियों से किस तरह सीखते हैं, यही सब आपको महान् बनने में सक्षम बनाता है. सही तरह के प्रयास से कोई भी श्रेष्‍ठ बन सकता है.

उनका कहना है कि प्रतिभा जन्‍म के साथ नहीं आती. चाहे टाइगर वुड्स हो या विंस्‍टल चर्चिल या वारेन बुफे अथवा जैक वेल्‍श .. कोई जन्‍म से ही महान् नहीं होता. न ही यह आनुवांशिक है, बल्कि दीर्घकालिक मेहनत व अध्‍यवसाय यानी कृतसंकल्‍प से ही सफल, महान् या आऊटलियर बना जा सकता है. यहां कठोर मेहनत से तात्‍पर्य दादा-नाना या अन्‍य बड़े बुजुर्गों द्वारा सुझाए जाने वाले पारंपरिक तौर तरीकों की मेहनत से नहीं है. यहां उनका मंतव्‍य एक व्‍यवस्थित व वैज्ञानिक तरीके से की जाने वाली मेहनत से है जिसमें हम अपनी प्रगति की समीक्षा करते हुए गलतियों से सीखते हैं न कि उन्‍हें दोहराते हैं. इस तरह से हम अपना श्रेष्‍ठ प्रदर्शन करते हैं.
मैलकम का ‘आऊटलियर’
‘टिपिंग प्‍वाइंट’ तथा ‘ ब्लिंक’ जैसी चर्चित और सफल किताबों के बाद ‘आऊटलियर्स’ में मैलकम ग्‍लेडवेल सफलता के नए रहस्‍यों के साथ हाजिर हैं. उन्‍होंने अपनी इस नई किताब में बिल गेट्स से लेकर बीटल्‍स तक कई हस्तियों और क्षेत्र विशेष के लोगों की अनूठी उपलब्धियों का अध्‍ययन कर यह बताने की कोशिश की है कि क्‍यूं कुछ लोग सफलता के झंडे गाड़ते चले जाते हैं. जबकि दूसरे लोग प्रतिभा में उनसे अव्‍वल होने के बावजूद अपनी क्षमता के संपूर्ण स्‍तर को हासिल नहीं कर पाते. वे पश्चिम की ‘सेल्‍फ मैड मेन’ इस अवधारणा को खंडित करते हैं. उनकी लोकतांत्रिक अवधारणा है कि सुपरस्‍टार कहीं और से नहीं आते वे तो प्रतिभा और योग्‍यता द्वारा प्रेरित लोग ही होते हैं.
बेहद सफल हस्तियों या आऊटलियर के बारे में उनकी अवधारणा है ‘वे निरापवाद रूप से बेहतर सांस्‍कृतिक पृष्‍ठभूमि वाले ऐसे लोग होते हैं जिन्‍हें कुछ विशिष्‍ट कारक तथा विशेष अवसर मिले. सांस्‍कृतिक पृष्‍ठभूमि उन्‍हें जिज्ञासु और कठोर मेहनती बनाती है और वे दुनिया को उस नज़र से देखते हैं जिससे कोई और देख नहीं सकता.’

आऊटलियर्स : बीटल्‍स या बिल गेट्स आदि बेहद सफल हस्तियों की विशिष्‍टता उनकी अतिविशिष्‍ट प्रतिभा नहीं बल्कि उन्‍हें मिले विशिष्‍ट अवसर हैं. महान् हस्तियों की सफलता केवल उनके द्वारा निर्मित ही नहीं है बल्कि ‘वह उन परिस्थितियों से निकली जिनमें वे बड़े हुए.’ जैसे उन्‍हें कडी मेहनत का कोई अवसर मिला और उन्‍होंने इसे दोनों हाथों से भुनाया.

आऊटलियर्स : बीटल्‍स या बिल गेट्स आदि बेहद सफल हस्तियों की विशिष्‍टता उनकी अतिविशिष्‍ट प्रतिभा नहीं बल्कि उन्‍हें मिले विशिष्‍ट अवसर हैं. महान् हस्तियों की सफलता केवल उनके द्वारा निर्मित ही नहीं है बल्कि ‘वह उन परिस्थितियों से निकली जिनमें वे बड़े हुए.’ जैसे उन्‍हें कडी मेहनत का कोई अवसर मिला और उन्‍होंने इसे दोनों हाथों से भुनाया.

मोजार्ट से लेकर बिल गेट्स तक की सफलताओं का आकलन करते हुए ‘आऊटलियर’ सफल हस्तियों के बारे में कहती है कि ये सब उपलब्‍ध अवसरों के लाभ की लहरों पर सवार होते हैं. यानी ‘कुछ डिजर्व करते होते हैं, कुछ नहीं- कुछ अर्जित करते हैं जबकि कुछ तो सिर्फ भाग्‍यशाली होते हैं.’ ग्‍लेडवेल अपनी इस किताब में कई रोचक पहलुओं पर अध्‍ययन करते हैं जैसे कि कनाडा के अधिकतर सफल हाकी खिलाड़ी जनवरी में ही क्‍यों पैदा हुए या किसी दक्षता को संवारने में कितना समय लगता है.
प्रतिभा व महत्‍वाकांक्षा के साथ साथ अवसर भी मायने रखते हैं. इन्‍हीं अवसरों को भुनाते हुए आम व्‍यक्ति स्‍टार या सुपरस्‍टार बनता है. ग्‍लेडवेल असाधारण व्‍यक्तिगत प्रतिभा की अवधारणा को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं कि किसी के महान्, श्रेष्‍ठ या आऊटलियर बनने में संस्‍कृति, परिस्थितियां, टाइमिंग, जन्‍म और भाग्‍य मायने रखता है।
मूल बात यही है कि हम अपनी सफलता का न तो श्रेय ले सकते हैं और न ही उन लोगों पर आरोप लगा सकते हैं जो विफल रहे. हमारी सफलता को पर्यावरण यानी माहौल या परिस्थितियां नियंत्रित करती हैं और वे ही इसे आकार देती हैं. और यह परिस्थितियां, सांस्‍कृतिक पृष्‍ठभूमि (लिगसी) के मौजूदा हालात के मिश्रण का परिणाम होती हैं. आमतौर पर हम मानते हैं कि विशिष्‍ट प्रतिभा या योग्‍यता वाले लोग ही आऊटलियर बनते हैं. ग्‍लेडवेल का तर्क है कि इन हस्तियों के जीवन का मुख्‍य पहलू परिस्थितियां व अवसर हैं. यहां तक कि अधिकतम आईक्‍यू या श्रेष्‍ठ शारीरिक दक्षता भी अच्‍छी परिस्थतियों में ही निखर कर सामने आती है. उचित समय पर जन्‍म या ‘सही’ सांस्‍कृतिक पृष्‍ठभूमि के लाभ भी मायने रखते हैं. वे कहते हैं कि उचित परिस्थितियों को कड़ी मेहनत के साथ जोड़ दें तो ‘आऊटलियर’ तैयार हो जाएगा.

10,000 घंटे की मेहनत : अगर हम जीनियस बनना चाहते हैं तो हमें अपने चुने हुए क्षेत्र में 10,000 घंटे का समय देना होगा. सफल होने के रहस्‍यों पर यह नया शोध बर्लिन की एकेडमी आफ म्‍यूजिक का है. इसमें अनुसंधानकर्ताओं का अध्‍ययन कहता है कि एक प्रतिशत प्रेरणा तथा 99 प्रतिशत पसीने यानी कड़ी मेहनत को मिलाया जाए तो प्रतिभा या जीनियस तैयार होती है. अगर कोई अपने क्षेत्र का सुपरस्‍टार या आऊटलियर बनना चाहता है तो उसे 10,000 घंटे देने होंगे.
यह अध्‍ययन कहता है कि प्रतिभा और भाग्‍य महत्‍वपूर्ण है लेकिन यह अभ्‍यास या मेहनम ही आम और खास या सामान्‍य और ब्रिलियंट में अंतर पैदा करती है. कमोबेश ऐसी ही धारणा ग्‍लेडवेल तथा कोलविन की है. तो, सफलता के ये जो नए रहस्‍य और सूत्र सामने आ रहे हैं उनका लबोलुआब यही है कि सफलता न तो पैतृक होती है और न ही प्रतिभाएं जन्‍मजात. प्रतिभाओं को लक्षित मेहनत से निखारा-संवारा जा सकता है जबकि उचित समय पर उचित अवसर मिलने पर हम भी अचीवर या आऊटलियर बन सकते हैं, बशर्ते कि भाग्‍य की छौंक उसमें लग जाए. इति (विभिन्‍न समीक्षाओं और समझ पर आधारित)

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1. आज भी खरी-खरी

आज भी खरे हैं तालाब.. कोई धांसू नहीं बल्कि एक सहज, सरल किताब है. उतनी ही प्रवाहमान जितना की जीवन और जल. इसकी सहजता और प्रवाह ही इसे अनूठा बनाता है. जल, थल व नभ की सोचने वालों पाठकों के लिए अद्भुत, कालजयी पुस्‍तक.talab जुलाई 1993 के बाद से इस किताब के विभिन्‍न प्रकाशकों और भाषाओं से अनेक संस्‍करण प्रकाशित हो चुके हैं. कापीराइट के बंधन से मुक्‍त होने ने इसकी उपलब्‍धता बढाई. कुछ साल पहले एक मित्र ने मुझे यह अद्भुत किताब दी. पढना शुरू किया और पूरी पढने से पहले ही कई प्रतियां मित्रों को भेजीं. बहुत कम किताबें ही इतनी सरल हो सहज होती हैं. किताब जो जल जैसे जीवन तत्‍व के बारे में सोचने को मजबूर करे. जीवन में जल का महत्‍व है, वह पांच मूल तत्‍वों में है.. बिन पानी सब सून.

विडंबना है कि कभी जरूरत तो कभी विकास के नाम पर हमने उपलब्‍ध संसाधनों और अमूल्‍य विरासत का सत्‍यानाश कर दिया. उनका कोई विकल्‍प भी हम पेश नहीं कर सके. जीवन से जोहड पायतन ही नहीं सिकुडे, उनसे जुडा एक भरा पूरा समाज गायब हो गया. हमने कभी नहीं सोचा उसके बारे में. कहते हैं कि विकास का कोई विकल्‍प नहीं होता. इस किताब को पढते हुए लगता है कि नासमझी और भेडचाल का विकास हमें विकल्‍पहीनता की स्थिति में ले जाएगा. अमृता प्रीतम ने कहीं लिखा है कि अकाल सिर्फ खेत खलिहानों में नहीं पडते वे कहीं न कहीं हमारे दिल दिमाग में भी तो होते हैं. यह किताब सिर्फ मौसमी अकाल की बात नहीं करती, इतर सूखेपन पर भी टिप्‍पणी करती है, किसी गुरबत की तरह.
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सैकड़ों, हजारों तालाब अचानक शून्‍य से प्रकट नहीं हुए थे. इनके पीछे एक इकाई थी बनवाने वालों की, तो दहाई थी बनाने वालों की. यह इकाई, दहाई मिलकर सैकड़ा हजार बनती थी.पिछले दो सौ बरसों में नए किस्‍म की थोड़ी सी पढाई पढ गए समाज ने इस इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार को शून्‍य बना दिया.
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अभिव्‍यक्ति पर सुरेंद्र बंसल ने इस विरली पुस्‍तक की समीक्षा में लिखा है कि बहुत कम किताबें ही पाठकों को कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में तराशती हैं। अपनी प्रसन्न जल जैसी शैली तथा देश के जल स्रोतों के मर्म को दर्शाती एक पुस्तक ने भी देश को हज़ारों कर्मठ कार्यकर्ता दिए हैं।

वे कहते हैं कि अपने देश में बेजोड़ सुंदर तालाबों की कैसी भव्य परंपरा थी जिसका यह पुस्तक उसका पूरा दर्शन कराती है। तालाब बनाने की विधियों के साथ-साथ अनुपम जी की लेखनी उन गुमनाम नायकों को भी अंधेरे कोनों से ढूँढ़ लाती है, जो विकास के नए पैमानों के कारण बिसरा दिए गए हैं। पुस्तक के पहले संस्करण के बाद देशभर में पहली बार अपने प्राचीन जल स्रोतों को बचाने की बहस चली, लोगों ने जगह-जगह बुजुर्गों की तरह बिखरे तालाबों की सुध लेनी शुरू की। इसकी गाथा बेशक लंबी है, लेकिन फिर भी देखने का प्रयास करते हैं।

मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेंद्र सिंह बताते हैं कि राजस्थान की उनकी संस्था तरुण भारत संघ के पानी बचाने के बड़े काम को सफल बनाने में इस पुस्तक का बहुत बड़ा हाथ है। मध्यप्रदेश के सागर जिले के कलेक्टर बी. आर. नायडू, जिन्हें हिंदी भी ठीक से नहीं आती थी, पुस्तक पढ़ने के बाद इतना प्रभावित हुए कि जगह-जगह लोगों से कहते फिरे, ‘अपने तालाब बचाओ, तालाब बचाओ, प्रशासन आज नहीं तो कल अवश्य चेतेगा।’ मध्यप्रदेश के ही सीधी और दमोह के कलेक्टरों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में इस पुस्तक की सौ-सौ प्रतियाँ बाँटी।

गुजरात से लेकर उत्‍तरांचल, कर्नाटक, पंजाब, बंगाल व महाराष्‍ट्र .. देश के हर राज्‍य हिस्‍से में जल, जमीन से जुडे आंदोलनों में इस किताब की महत्‍ती भूमिका रही है. सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ साथ सरकारी अधिकारियों व संत महात्‍माओं ने इस पुस्‍तक को केंद्र में रखकर अनेक पहल कीं जिनका सांगोपांग असर क्षेत्र विशेष के जनजीवन पर दिखा. यह पुस्तक फ्रांस की एक लिखिका एनीमोंतो के हाथ लगी। एनीमोंतो ने इसे दक्षिण अफ्रीकी रेगिस्तानी क्षेत्रों में पानी के लिए तड़पते लोगों के लिए उपयोगी समझा। फिर उन्होंने इसका फ्रेंच अनुवाद किया।

अनुपम जी

अनुपम जी

बंसल बताते हैं कि अनेक संस्‍थाएं इस किताब को प्रकाशित कर बांट चुकी हैं. देशभर के १६ रेडियो स्टेशन पुस्तक को धारावाहिक रूप में ब्रॉडकास्ट कर चुके हैं। कपार्ट की सुहासिनी मुले ने इस पुस्तक पर बीस मिनट की फ़िल्म भी बनाई है। सीमा राणा की बनाई फिल्म दूरदर्शन पर आठ बार प्रसारित हो चुकी है। भोपाल के शब्बीर कादरी ने पुस्तक का उर्दू अनुवाद किया और मध्यप्रदेश के मदरसों में मुफ्त में बाँटी। उर्दू तथा पंजाबी अनुवाद पाकिस्तान भी पहुँच चुके है। गुजरात की एक संस्था ‘समभाव’ के श्री फरहाद कांट्रैक्टर पर इस पुस्तक का गहरा प्रभाव पड़ा। सदियों से ऐसी मान्यता है कि मनुष्य जाति का विकास मीठे जल-स्रोतों के मुहानों पर ही हुआ। जीवन के राग-विराग मनुष्य ने वहीं पर सीखे, लेकिन विकास की अंधी होड़ में मनुष्य के चारों ओर अंधेरा बढ़ता जा रहा है। इस अंधेरे की बाती को हम सब तथा हमारी तरह-तरह की नीतियाँ-प्रणालियाँ दिन-ब-दिन बुझाने की कोशिश में लगी हुई हैं। ‘आज भी खरे हैं तालाब’ पुस्तक न केवल धरती का, बल्कि मन-माथे का अकाल भी दूर करती है।
(इस समीक्षा में बाद के अंश अभिव्‍यक्ति http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2008/aajbhi.htm में सुरेंद्र बंसल के हैं. कांकड़ ने साभार लिए हैं.)

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Responses

  1. Vedo mein kaha gaya hai, ” jayte yasmaat liyate yasmin, iti jalah.” yani jal wah cheez hai jisse jeev janm leta hai aur fir usi mein mil jata hai…

    anupam ji ki is kitab ne baar baar is shlok ki yaad dilai hai… ye anupam ji aur dileep chinchalkar ji ka baddapan hai ki unhone ismein copyright nahi rakhe pur buri baat yah hai ki kuch prakashkao ne yah kitab hubahu chhapi aur anupam ji ya sunder rekhankan karne wale dileep ji ka usmein naam tak nahi diya…

  2. bahut khub likha hai aapne mrityunjay ke baare mein… shiwaji sawant ki ek khubi yah hai ki hai wah swagat ya atmanivedan shaily mein tathyo ki is tarah pesh karte hain ki kahi bhi zyadati nahi lagti… maine bhi kuch saal pahle jab yah upnyas padha to karn ke bare mein nazriya badal gaya… kauravo ki bheed ho ya pandwo ki nidh ho… jo lad kawach kundal daan kar ek hi maa ke putro se lad saka hai wahi mahan hai… yah upnyas zati kashmkash zahir karne ki ek misaal hai…

  3. भाई बहुत अच्‍छा लगा. आपका प्रयास सराहनीय है. बस लगे रहो यही दुआ है.

    – Pawan Prajapat, hanumangarh

  4. thanx…..Ji

  5. good

  6. पृथ्वी भाई. कांकड ब्लॉग देख कर बहुत ख़ुशी हुई. आपका प्रयास सराहनीय है. बधाई.
    दीनदयाल शर्मा
    http://deendayalsharma.blogspot.com

  7. मैंने इतना खुबसूरत ब्लाग पहले कहीं नहीं देखा, बेहद महत्वपूर्ण जानकारियाँ उपलब्ध करवा रहे हैं आप।

  8. aapko salam karta hun. aap bada kam kar rahe hai.

  9. ये तो वाक़ई अध्भुत है….शुभकामनाएं पृथ्वी जी

  10. sir aapka blog bahut pasand aaya

  11. bhaiya bahut achha blog h mind blowing nd ak dam desi,,,,,,

  12. वास्तव में आपकी इन कविताओं की लाइनों ने हृदय और मन दोनों को बहुत ही शीतलता और सुकून दिया. धन्यवाद

    “मैं
    पीढियों से जानता हूं ये बात
    कि चिडि़यों ने
    हमारे भरे हुए खेत उजाड़े हैं.
    फिर भी
    चिडियों के साथ
    पीढियों से
    एक ही घर में रहता हूं मैं.

    कागज पर चित्र बनाता बच्‍चा
    बार बार बनाता है
    ‘ईश्‍वर’
    और हर बार
    मिटा देता है रबर से.

    जीवन में खिलने का अर्थ खिलने से नहीं,
    गिरने, तपने, सूखने, झरने और ठिठुरने से है.
    जीवन खिलने से है.

    सम्भाल लिया था
    उन अशक्त हाथों ने मुझे।
    आपके हाथों के कम्पन का स्पर्श
    मेरे बाजुओं के रास्ते
    मेरे कलेजे में पहुंचकर
    आपकी लड़खड़ाती सूखी काया का बिम्ब
    अभी भी बना रहा है बाबा!

    यहाँ जब-जब मुझे
    ठोकर लगती है,
    मेरी सास डांटती है-
    ‘देखकर नहीं चलती
    अंधी है क्या?’”

  13. v nice


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