आसमां की सफेद झक्‍क चादर पर बादलों की थिगलियों को तकते जाना मेरी जमीं की नियति और इंतजार है. बालू के मनोहारी रेतीले समंदर पर नंगे पांव चलते हुए अजब प्‍यास के साथ जीने की चाह होती है. कि मेरे देस में मोहब्‍बत के अद्भुत गीत रचे गए हैं. बात इतनी सी है कि गर्मी के संदेशे लेकर आनी वाली फागुनी चिट्ठियों को, पहली बार पानी भरकर चलाए कूलर से आने वाली माटी की सौंधी खुशबू में बैठकर पढ़ना। बाकी सब क्या है? पानी रंग मुहब्बत!

दरअसल अपने पसंदीदा लेखक डॉ. जितेंद्र कुमार सोनी का राजस्थानी कहानी संग्रह ‘भरखमा‘ पढ़ते हुए माटी की महक से सरोबार होने से बचा भी नहीं जा सकता। तीन लंबी कहानियों के इस संग्रह में उन्होंने जो लोक रचा है पाठक उसके रंग में रंगे बिना नहीं रहता। उसकी महक कहीं न कहीं उसे चित को बींधती और बांधती है।

राजस्थानी के चाहे ठाहे रचनाकार रामस्वरूप किसान ने ‘भरखमा’ की भूमिका में लिखा है कि यह राजस्थानी में लंबी कहानियों का पहला संग्रह है। और कहानियों की लंबाई सायास नहीं बल्कि अनायास ही है। दरअसल जितेंद्र सोनी की एक और खासियत माहौल गढ़ना या घटनाओं की डिटेलिंग है। वे छोटी छोटी घटनाओं का ब्यौरा इस तरह से देते हैं कि पाठक चकित हुए पढ़ता जाता है। वे अपनी इस महारत से ‘एडियोस’ में पाठकों को आश्चर्यचकित कर चुके हैं।

इसके साथ ही उनकी कहानियां राजस्थानी में आधुनिक परिवेश की आहट है। राजस्थानी कहानी ढाणी, चक गांव से निकल कर नगर और महानगरों में आ रही है। उसकी पृष्ठभूमि, उसके चरित्र और चेहरे आधुनिक हो रहे हैं। यह बदलाव इतना ‘समूद’ है कि पाठक को लगता नहीं कि वह पारंपरिक कहानी से आधुनिकता वाले समय में आ गया है।  राजस्थानी कहानी में यह बदलाव बहुप्रतीक्षित था।

‘बेओसाण’, ‘धूड़ नाखणी’ व ‘रमाण ना करो’ जैसे छोटे छोटे शब्द व मुहावरे जहां इन कहानियों की भाषागत जड़ों को सींचते हैं वहीं ‘कंडीशनिंग’ जैसे शब्द उन्हें आधुनिकता के पंख देते हुए दिखते हैं। किसान के ही शब्दों में ये तीनों कहानियां रोचकता, पठनीयता व उपयोगिता के मानकों पर सांगोपांग खरी उतरती हैं।

जैसे सोनी ने एक कहानी में लिखा है कि हर किसी के अंतर्मन में बेनाम गलियों का ऐसा शहर होता है जिसमें वह गाहे बगाए भटकता रहता है। उनकी कहानियां भी शब्दों का ऐसा चमत्कारिक शहर है जिसमें पाठक खो जाता है।

चमत्कारिक से याद आया कि संगीत की दुनिया में नए प्रयोगों से हैरान करने वाले कोक स्टूडियो के इस साल वाले संस्करण में कई अच्छे गाने हैं। इनमें से एक ‘नेड़े नेड़े वस वे ढोला‘ प्ले कर बालकनी में आता हूं तो गली में धूप खड़ी मुस्कुरा रही होती है।
**
‘भरखमा’ को ऑनलाइन मंगवाने के लिए यहां क्लिक करें।