Posted by: prithvi | 22/01/2017

ना लोहा न लुहार!

 लुहार
मेरील स्ट्रीप के संबोधन से निकली चिंताएं ओबामा के विदाई भाषण की भावुकता पर आकर ठहर गईं और सीरिया से लेकर फलस्तीन व कालेधन से लेकर भ्रष्टाचार तक की सारी परेशानियां कमबख्त यह नया साल भी अपने झोले में  लिए चला आया है। जिन लोगों ने ताउम्र जमीनों का धंधा किया उन्हें खेतों की रखवाली दे दी गई और अपने हिस्से की लड़ाइयां हार चुके हमारी क्रांतियों के अगुवा हैं। आप कहते हैं गुजरा साल अच्छा था!  आपके इस भोलेपन के सदके। और सारी शुभकामनाएं सर माथे पर। लेकिन अगर लोकतंत्र में सिर गिना करते हैं तो बता दें कि शिकागो, लास एं‍जलिस व वाशिंगटन जैसे शहरों में महिलाओं की अगुवाई में जुटी भीड़ कैपिटल हिल में आए लोगों से कम तो हरगिज नहीं थी।

कि विश्‍वग्राम और वैश्‍वीकरण के अश्‍वों को बांधने के लिए आप संरक्षणवाद की जिन सांकलों पर भरोसा कर रहे हैं उन्‍हें बनाने वाले लुहार तो किसी तीसरे देश में बैठते हैं। आपके पास न तो लोहा है न लुहार। जिन दीवारों को चुनने का आपका सपना है उसके लिए ईंट, गारा देने वाली हकीकती जमीन भी आपके पास नहीं है।फिर ये घुड़की घमंड कैसा?

खैर, किसी सयाने ने कहा है कि बारिशें और कुछ नहीं, बस बूंदों को सहेजने की कला है। यह कला जल के प्रति आदर और संस्‍कारों से ही आ सकती है। हमारे फ्रीजरों में जमा हुआ पानी, पहाड़ पर बिछ गई बर्फ का मुकाबला नहीं कर सकता।  बस इतनी सी बात है।

बचपन में माटी खाने वाले बच्चे, आंखों से जुड़े दरिया में नमकीन पानी भरकर पत्थरों के शहर चले जाते हैं। कि नन्हें पैरों में चुभ गए बड़े कांटों का दर्द इतनी जल्दी नहीं जाता और मेरी सारी पसंदीदा खुश्बुओं के बरक्स वह किताबों की महक रख देती है। नहीं नहीं करते हुए भी कहना चाहता हूं कि किताबों की मंडियों के चकाचौंध भरे समाचार इस दर्द व निराशा को कम नहीं कर पाते। बिलकुल सही कि कोई बजरी की खेती नहीं करता फिर वक्त की हमारी मंडियां पत्थरों से क्यूं भरी हैं? बताओ तो!
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(Painting horizon of hope by laura harris curtsy net)

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Responses

  1. वेस्विकरण की आंच आम जन तक जब पहुचेगी तब तक बहुत देर हो जाएगी। बहुत जल्द ये धरती चंद कुबेरों और बाकि सर्वहारा लोगो में बंट जाएगी। लोग मालिक और नोकर में विभाजित रहेंगे और जीने के हक केवल मालिको के पास रहेंगे। नोकर केवल शोषण के भागी रहेंगे।
    पर जनता फिर भी whatsapp से बाहर आने को त्यार नहीं है ।पढने समझने को तत्पर नहीं है। इन्टरनेट को अपनी दुनिया मानती है। और कहते है की हम विकसित हो रहे है।
    वाह रे मानव !

  2. हां भाई ये बड़ी चिंता है। हमें प्रौद्योगिकी के सदुपयोग को सीखना होगा और समझना होगा कि उसका बेहतरी के लिए कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है।


कुछ तो कहिए..

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