Posted by: prithvi | 06/01/2016

शूद्र: इस धरती के ललित ललाम

shoodra by tribhuvuan

हम शूद्र थे
इसलिए न किसी ने हमारी
रामायण लिखी
न लिखा गया कोई महाभारत।

मेहरानगढ़ का किला जोधपुर ही नहीं समूचे राजस्‍थान की शान मान जाता है। यह अद्भुत ऐतिहासिक दुर्ग है। दुर्ग निर्माण कला के अद्वितीय उदाहरणों में से एक। जोधपुर जाने वाले पर्यटक इसे देखे बिना नहीं लौटते। लेकिन हम अगर यहां इस तथ्‍य का जिक्र कर दें कि जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग के निर्माण में पहली ईंट की जगह एक शूद्र को जीवित चिना गया था तो शायद इस किले को देखने को हमारा सारा नजरिया ही बदल जाए। यह छोटी सी घटना है। हमारा इतिहास इस तरह की ‘छोटी छोटी’ घटनाओं से भरा है। इन दबा दी गई घटनाओं को इतिहास में (भले ही क्षेपक की तरह) जोड़कर पढ़ा जाए तो सारा एतिहासिक परिदश्‍य ही बदल जाएगा। वर्तमान के तमाम महल मालों, अट्टालिकाओं, दुर्गों को देखने की हमारी सोच बदल जाएगी।

त्रिभुवन के नये कविता संग्रह ‘शूद्र’ की यही खासियत है। यह इतिहास, समाज और काल में शूद्रों के योगदान को सामने रखती है और उनके अवदान का लेखा जोखा मांगती है। दरअसल शूद्र कोई बड़ा कविता संग्रह नहीं बल्कि एक लं‍बी कविता का विस्‍तार भर है जिसकी शुरुआत बरसों पहले हुई थी। बीते लगभग दो दशकों में त्रिभुवन ने इस कविता को कई तरह से मांजा और अपडेट किया है। इस कविता की शुरुआत एक लोमहर्षक घटना से है कि कस प्रकार जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग के निर्माण में पहली ईंट की जगह एक शूद्र को जीवित चिना गया!

दरअसल शूद्र एक शब्‍द भर नहीं है. वह हमारे समाज और इतिहास का ऐसा हिस्‍सा है है जिसे शिकारियों की शौर्यगाथाएं सुना सुना कर शिकार होते रहने को बाध्‍य किया गया. उन्‍हें कभी लगने नहीं दिया गया कि वे नींव से निकलकर कंगूरे तक पहुंच सकते हैं.  त्रिभुवन का नया कविता संग्रह शूद्र इन्‍हीं तमाम विद्रूपताओं पर रोशनी डालता है। यह किसी शूद्र के व्‍यक्तिगत अनुभवों का ब्‍यौरा नहीं है बल्कि देश समाज के निर्माण में शूद्रों के योगदान का एतिहासिक आख्‍यान है। त्रिभुवन का कहना है कि उन्‍होंने इस काव्‍य किताब में भारतीय समाज के निर्माण और सृजन में वंचित वर्ग के योगदान को आधार बनाया है। दलित चेतना को झकझोरती यह लंबी कविता अपना मुख्य फोकस इस वर्ग पर हुए अत्याचारों और उत्पीड़न के साथ-साथ बात पर करती है कि इस वर्ग का भारतीय समाज के निर्माण और विकास में कितने युगों से कैसा ऐतिहासिक और अन्य वर्गों से अलग तरह का जमीनी योगदान रहा है।

उन्‍होंने इस पुस्तक के आखिर में एक नया शोध भी प्रस्तुत किया है, जिसमें यह बताया गया है कि किस तरह हमारे समाज के क्रांतिकारी युवाओं को अभिशप्त करके हजारों साल पहले व्यवस्था के संचालकों ने शूद्र बनने पर विवश किया। इस देश ने हजारों साल की जिस गुलामी को भोगा, शायद वह सब इसी तरह के नतीजों का प्रतिफल था।

समालोचक व कवि असद जैदी ने अपने पूर्वकथन में लिखा है कि त्रिभुवन की काव्‍य रचना शूद्र कविता के झीने आवरण में एक सभ्‍यतापरक आख्‍यान है;  साथ ही हमारे वर्तना की सर्वांगीण आलोचना भी.

“जिस समाज में सारी रचना बेसमेंट में हुई हो, उसमें ऊपर की मंज़िलों में स्थापित श्रेष्ठिजन के विमर्श में वह बेसमेंट अनुपस्थित रहता है। उनके योगदान को, उनके विद्रोह और क्रांतियों तक को, स्मृतियों से गायब कर दिया जाता है। त्रिभुवन की यह कविता इस विशाल धरोहर की रिकवरी का काम बड़ी प्रश्नाकुलता, विवेकशीलता और नैतिक दृढ़ता से करती है।”

समाज संस्‍कृति के निर्माण में शूद्रों के योगदान का जिक्र करते हुए त्रिभुवन लिखते हैं-

कि शूद्र थे तो ऋचाएं थीं
शूद्र थे तो कंडिकाएं थीं
शूद्र थे तो सूत्र थे
शूद्र थे तो भजन थे
शूद्र थे तो कामडिए थे
शूद्र थे तो बाबा रामापीर थे
शूद्र थे तो बुद्ध बुद्ध थे
और गांधी गांधी थे।

लेकिन विद्रूपता यह रही कि:  

हम शूद्र थे
इसलिए पंचायतें और
पालिकाएं हमारी नहीं।
विधानसभाएं और संसद हमारी नहीं।
बाबा साहब ने रचना
लेकिन संविधान हमारा नहीं।

और वे आगाह करते हैं:

शूद्र न होते तो
कौन मरे पशु उठाता
कौन उनका चमड़ा उतारता
कौन दुनिया के पांव धूप से बचाता
कौन जूते बनाता
शूद्र न होते तो
हिंदुस्‍तान की पगथलियां जल जातीं।

और अंतत: वे उम्‍मीद करते हैं:

शूद्रों के लिए
इस अंधेरी रात का जादू टूटेगा
सुनहरा सूर्योदय फूटेगा।

फेसबुक, ट्वीटर व व्‍हाटसएप्‍प जैसे आनलाइन मंचों के इस दौर में जब ‘खोदा और ले भागे’ को रचनाधर्मिता में सफलता का सूत्र मान लिया गया है कौन अपनी कविता के परिपक्‍व होकर छपने के लिए लगभग बीस साल का धैर्य रखता है (किसान के अलावा)? त्रिभुवन के लेखन में यह गंभीरता व धैर्य दिखता है। पहले कविता संग्रह ‘कुछ इस तरह आना’ में त्रिभुवन ने अपनी भाषा शैली से चमत्‍कृत किया और शब्‍दों की आकाशगंगा में अपने प्रभावी दखल से पाठकों को रूबरू कराया। वहीं इस नये संग्रह में वे अपनी समाजशास्‍त्रीय निगाह, इतिहास व मिथक के ज्ञान तथा दार्शनिक गहराई से हतप्रभ करते हैं। पुस्‍तक के आमुख में त्रिभुवन ने अपने जीवन की जिन चार महिलाओं का आभार व्‍यक्‍त किया है उनमें समाज के वंचित तबके की केसरदेवी मेघवाल भी हैं जो उनकी धाय मां रहीं। सच को इस तरह स्‍वीकारना और व्‍यक्‍त कर देना ही त्रिभुवन की कविता व लेखनकर्म को विशिष्‍ट बनाता है।

*****
शूद्र कविता संग्रह को अंतिका प्रकाशन ने छापा है। इसकी कीमत 235/- रुपए है। अमेजॉन इंडिया पर इसे यहां खरीदा जा सकता है। त्रिभुवन के पहले काव्‍य संग्रह के बारे में यहां पढ़ें। त्रिभुवन से फेसबुक पर यहां संपर्क किया जा सकता है।

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Responses

  1. बहुत खूब। बधाई त्रिभुवन जी। ऑर्डर कर रहा हूँ। शुक्रिया पृथ्वी भाई।

  2. kharedney ka pata batiyey kripaya, ya vpp se bhijwayiye aabhar

  3. anil ji fb par link de raha hun. sadar

  4. jai ho sa! 🙂

  5. पृथ्वी आपके गंभीर प्रयास के लिये धन्यवाद
    लेकिन आज तो फेसबुक और ट्वीटर का जमाना है । फेसबुक खोला और जितना दिमाग में है उगल दिया या फिर किसी की पोस्ट पर अपने मन की भडास निकाल ली । काम खत्म

  6. अरूण सर सब आपके प्रोत्साहन का परिणाम है. अपना जो काम है करेंगे, बाकी की चिंता नहीं! 🙂

  7. बहुत ही उम्दा है ये कृति ….

  8. जी बिलकुल, अनिवार्य रूप से पढे जाने वाली कृति है। 🙂

  9. don’t be ridiculous, writer of Ramayan Sri Valmiki was a Shudra and writer of Mahabharat Ved Vyas was also a Shudra (fisherman)

    I believe you guys are just hunting something create issues and divide society

    They are only expecting reservation by these means. They are nothing but targeting to divide people in their own religion and land.

  10. @Hanuvant Rajpurohit, only one request, just read the book then you get better idea of entire subject.

  11. समीक्षा पढ़कर बुक पढ़ना अब ज़रूरी हो गया है ।

  12. बिलकुल सा, अनिवार्य रूप से पढ़ी जाने वाली किताब है.

  13. “सा” ???

  14. सा.. साहेब, साब यह एक तरह का अादरसूचक संबोधन है.


कुछ तो कहिए..

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