Posted by: prithvi | 30/10/2014

हर पत्थर में इक आग बसत है

kankad14.1

नानू काका चले गए. उनके बाद घोटकी चाची भी चल बसीं. चाची का असली नाम कभी जाना नहीं, न ही किसी से सुना. उनके डील डौल और हंसमुख प्रकृति के कारण ही शायद उनका नाम घोटकी पड़ा. सात भाई व एक बहन वाली एक लंबी चौड़ी गुवाड़ तो पहले ही बिखर गई थी अब उस लंबे चौड़े परिवार से दो जी और चले गए. डेढ महीने भर में. क्या बदला है? उमस भरी रात ठंडी होने लगी है और ढाणी के पास जो क्यारियां ग्वार से भरी थीं, अब वे खाली हैं. ग्वार बिक चुका है और पास की अनूपगढ़—गंगानगर रोड पर पराळी से भरी ट्रालियां दिखती हैं. बाकी दुनिया ठीक वैसे ही चल रही है जैसे कुछ हफ्ते भर पहले थी. सुबह की शुरुआती बस पकड़ने के लिए जल्द ही बस अड्डे पर आ जाता हूं. टेल पर पहुंची जीबी माइनर में पानी है.

सत्संगी साज समेट कर अगले घर जा चुके हैं. एक रात जो कबीर, रैदास व बन्नानाथ जैसे संतों की भजन बाणी ​सुन जागृत हुई जा रही थी फिर नींद के आगोश में जाने को व्याकुल है. दिन की चमक में उसकी आंखें चकाचौंध हैं. यही तो रात भर सत्संगी कहते रहे कि हम जिस बाजार में होते हैं उसी के अनुसार बोली लगाते हैं. उसी की मुद्रा में कारोबार करते हैं. वहां हमारी सोच के सिक्के नहीं चलते. हमारा कोई क्रेडिट/डेबिट कार्ड, चैक या रुक्का वहां नहीं चलता. उस बाजार में हमारी हैसियत सिर्फ और सिर्फ एक ग्राहक की है. बाजार, वहां के बणिए,उनके कारिंदे हमें ऐसा कोई कदम नहीं उठाने देते जिससे उनका बना बनाया बाजार खराब हो. या उसका उल्लंघन हो.

इसीलिए रात को दिन उगते उगते सो जाना है. यही इस बाजार का नियम है. जब रात जागृत हो, दिन से पंजा लड़ाएगी तब ही असली क्रांति घटित होगी. वरना तो सब पाखंड है. इक बाजार है. हम उस बाजार से कुछ आग खरीदने के लिए पत्थर झोले में भर घूम रहे हैं. हम पत्थरों के बदले आग खरीदने की बचकानी हरकतों पर उतरे नादान हैं. बाजार में हमारी नादानी पर हंसने वाले कारिंदे तो हैं पर यह बताने वाला कोई नहीं कि भले मानस आग तो उन पत्थरों में भी छिपी है जो तुम उठाए घूम रहे हो. जला लो. यह सलाह तो कोई कबीर, रैदास ही दे सकता है.

खैर, अगली सुबह इक ऐसे शहर में होनी है जहां हमारे करियर की नाड़ बंधी है. जहां संतरी कलस्टर बस की दायीं ओर की सीट पर बैठे हुए यह सोचना बेवजह है कि संसद मार्ग पर नीम की जगह मैपल के पेड़ होते तो चमकती दुपहरियों में कैसे दिखते या कि इंडिया गेट इन अकेली दुपहरियों में किन यादों के साथ वक्त काटता होगा. लेकिन यह चिंता जरूर की जा सकती है कि संयुक्त परिवारों की टूटन के किरचों को समेटे हमारे दरवाजे पर चली आईं इन नकचढी सुबहों का जवाब देने के लिए हमारे पास क्या है?

  • एक शे’र सुनिए
    यूं ही खफा नहीं हूं तेरे हसीं मौसमों से,
    मैंने अपने खेतों में गिरते ओले देखे हैं.
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Responses

  1. यूं ही खफा नहीं हूं तेरे हसीं मौसमों से,
    मैंने अपने खेतों में गिरते ओले देखे हैं।
    गजब!

  2. jai ho sa! 🙂


कुछ तो कहिए..

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