Posted by: prithvi | 14/09/2014

नीर नजर नहीं आवे

जिंदगी हमें हजार रास्ते नहीं देती कि हम सैकड़ों मंजिलें तय कर लें. जिंदगी के हमारे तरकश में गिने चुने तीर हैं इसलिए हमारे लक्ष्य भी कम ही होने चाहिए.

फिरोजपुर जाने वाली ट्रेन से बठिंडा में ही उतरना होगा. आगे का रास्ता बस से तय करना ​है. गिदड़बाहा, मलोट, अबोहर, बल्लुआना, श्रीगंगानगर और आगे. भादो की बारिश में भीगी पंजाब की धरती पानी से पगी है. घरों व सड़कों को छोड़ दें तो हर कहीं पानी भरा है. खेतों से लेकर खलिहानों, खाली पड़े अहातों तक हर जगह. धान के खेत तो इसे झेल भी लेंगे, नरमा कपास का क्या होगा. मोठ, ग्वार, ज्वार की फसल मुरझाने लगी है. मौसमी और अमरूद के बागों में पानी भरा है. लेकिन वास्तविकता की जमीन की यह सेम दलदल हम तक आने वाले समाचारों से गायब है. हर दु:ख दर्द को बहा, धो देने की ताकत रखने वाला पानी हमारी चिंता का बड़ा सबब बन गया है और हमारा किया धरा मानों जमीन पर उग आया है. यही जमीन की फितरत है. वह अपने पास कुछ नहीं रखती. सबकुछ उगाकर हमारे सामने रख देती है.

रेत और रेगिस्तान में रहने वाले हम तो बारिशों के लिए बने ही नहीं. हम तो अकाल, आंधी और सूखे के लिए बने हैं. बारिशें हमारी जिंदगी के पन्नों के हाशिए पर नुक्तों की तरह दर्ज हैं. लेकिन पंजाब, हरियाणा के नखलिस्तान को क्या हो गया कि जमीन ‘ये लो तुम्हारी हरित क्रांति, ये लो तुम्हारा जलवायु परिवर्तन’ कह कह कर दलदल हुई जाती है. रही सही कसर शायद हर खाली पड़ी जमीन पर कब्जा करने की हमारी भूख ने पूरी कर दी है. पानी के बारे में सोचता हूं-

सुना कि पानी मर गया है
तभी तो वह तेरे शहर में भर गया है.
जिंदा होता तो ​बह जाता नदी नालों में
वह क्यूं बेनूर मेरे खेतों को कर गया है.

केर के लाल और कीकर के खिलते पीले फूलों के बीच देखता हूं कि राजस्थान की ‘कपास पट्टी’ कही जाने वाली जमीन ग्वार की फसल से भरी है. जो काम सरकारें सोच नहीं सकीं या कर नहीं पाईं वह बाजार ने एक झटके से कर दिया. पर्याप्त पानी की कमी और अच्छे भाव न मिलने से परेशान किसानों को कम मेहनत में अधिक मुनाफे का विकल्प ग्वार में मिल गया है. अबोहर से आगे खासकर श्रीगंगानगर से लेकर सूरतगढ, पदमपुर, रायसिंहनगर, अनूपगढ, रावला, खाजूवाला तक ग्वार ही बोया जा रहा है. एशिया की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजना इंदिरा गांधी नहर से सिंचित यह इलाका कुछ दिन पहले तक सिंचाई पानी के बड़े संकट से दो चार था. अब भी यहां कि अधिकांश नहरें सूखी हैं तो पीछे पंजाब हरियाणा पानी में डूब रहा है.

भादों की अगली रात अनूपगढ़ के पास एक ढाणी में सत्संग सुनने में बीती. वहां सुने एक भजन का यही भाव था कि- 
ये जग अथाह जल सागर,
नीर नजर नहीं आवे.

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Responses

  1. सुना कि पानी मर गया है
    तभी तो वह तेरे शहर में भर गया है.
    जिंदा होता तो बह जाता नदी नालों में
    वह क्यूं बेनूर मेरे खेतों को कर गया है.

    वाह!

  2. 🙂


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