Posted by: prithvi | 18/05/2014

तालों के शहर में केपूसिंस्की

एक शहर में लोग तालों के इतने शौकीन थे कि उन्होंने अपनी आवाज से लेकर उम्मीदों तक के दरवाजों पर ताले जड़ दिए. इसके बाद उन्होंने अक्ल पर पर्दे डाल लिए हालांकि इससे वे संतुष्ट नहीं थे और कुछ और ताले इन तालों व पर्दों पर भी लगाना चाहते थे. लेकिन इसी दौरान हुआ यह कि एक ही काम से उकताए शहर के तालागर (कारीगर) अपने भविष्य पर लगे तालों की चाबी खोजने गये और चाबियों के जंगल में खो गए. वहीं सरकार ने चाबियों के इन जंगल को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ठेके पर दे दिया. ये कंपनियां इन चाबियों को गलाकर ऐसे आटोमेटिक लॉक बनाती हैं जिन्हें  बंद करने के लिए चाबी की जरूरत नहीं होती. ऐसे ही समय खबरें आईं कि एक शहर अपने लोगों के कारण नहीं, तालों के लिए जाना जाता है.

बताया जाता है कि इस कहानी की शुरुआत की लाइन पत्रकार रिशार्द केपूसिंस्की ने सन पचहत्तर में अंगोला की तत्कालीन राजधानी लुआंडा के लिए लिखी थी जब बारिश में भीगा एक देश कतिपय आजादी से पहले होच पोच हुआ जा रहा था. और इसका आज की दिल्ली या भारत देश से कोई लेना देना नहीं था. ना है?

Bonnie-Auten-06

कि भारत में तालों की अवधारणा ही बहुत बाद आई थी.  ताले का सबसे प्राचीन अवशेष हजारों मील दूर असीरिया में मिला. औद्योगिक क्रांति आई तो न जाने कौन कौन सी जगह  के लिए किस किस तरह  के ताले बनने लगे. लेकिन यहीं कहीं चूक हो गई. जो ताले भौतिक सामान की रक्षा आदि के लिए बने थे उसे यहां हमने अलग अर्थ में लेकर पहले ज्ञान पर जड़ा फिर अक्‍ल पर. तभी तो अनजान ने मजाक मजाक में ‘खाइके पान बनारस वाला खुल जाए बंद अक्‍ल का ताला लिख दिया.’ वरना इसका तो भारतीय समाज से कोई लेना देना नहीं था? हां, सयाने लोग कह गए कि अक्‍ल के तालों को खोलने की एक मात्र चाबी स्‍कूलों में मिलती है और अच्‍छी शिक्षा के घन से घड़ी जाती है.

खैर, ग्रीन टी के बड़े मग को मिस करते हुए देखता हूं कि धूप सर पे चढ़ आई है. यह भौतिकी का कोई नियम नहीं लेकिन सच है कि छुट्टी वाले दिन बच्चे जल्दी उठ जाते हैं. जबकि स्कूल जाने वाले आम दिनों में उन्हें कुछ सपने दिखा दिखाकर उठाना पड़ता है. कि देगची में उफनती हुई खुशबू की जगह जब आपके हिस्से में डेयरी से आया थैली वाला दूध लिखा हो तो कौन कमबख्त अलसुबह उठना चाहेगा?

दरअसल बाहर जो धूप खड़ी है ना, उसने अपनी खूबसूरती का राज केवल उस दोपहर को बताया था जो खेत वाले रास्ते  में बड़े बरगद के नीचे बैठती थी. वक्तय की नयी पीढियों ने जब बरगद का सौदा आरे वालों से कर लिया तो वह चमचमाती दोपहर भी कहीं चली गई. वैशाख की इस ढलती शाम के पास उस दोपहर की कुछ धुंधली यादें हैं और हम मृगतृष्णा में फंसे हिरण. इसे आपके रोजानमचे में बयान के रूप में दर्ज किया जाए.

चलिए, मौसम की नगरवधू के लिए ग्यारह महीने पति​ के और एक महीना जेठ का होता है. वही जेठ (ज्येष्ठ) शुरू हो रहा है. और गर्मियां आपकी गली के नुक्कड़ वाले पार्क में सो रही हैं, अमलतास के पीले चटक फूल ओढकर.

….
[painting by Bonnie Auten curtsy internet]

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Responses

  1. kamal ki jugalbandi hai sabdo ki janab….

  2. @preet- jai ho bhai! 🙂


कुछ तो कहिए..

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