Posted by: prithvi | 20/04/2014

पानी रंग मुहब्बत

मुहब्‍बत कहां मांगती है
चांदी का वर्क और सोने की बालियां
तुम्‍हारे बाजार की अफवाहें हैं ये सब.

सरकंडों से सपनों के महल
और नीम की तीलियों से कान सजा लेती है
वह तो,
पानी रंग मुहब्बत.

हाथों में रेत हो तो आंखों में पानी आ ही जाता है. बाबा ने कहा था कि हम जिस देस के हैं वहां हवाएं आंधियों की नाम पर रेत का कारोबार करती हैं. शायद इसीलिए हमारे यहां के सिक्के समंदर वाले देशों के बाजार में नहीं चलते. नहीं तो क्‍या हमारी आंखों से आंसुओं की ग्रंथियां ज्‍यादा जुड़ी हैं? बात इतनी सही है कि अपने यहां यादों की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती. जिंदगी के उन बचे खुचे कोनों या अंधेरों में जहां हम अकेले होना चाहते हैं, किसी की यादों की खुशूब सांसों में भरी रहती है या उनकी यादों का उजाला आंखों को रौशन किए रखता है.

ये आक का बीज अपने सफेद रोंयेदार पंखों के साथ कैसे चौथी मंजिल के हमारे कमरे में आ गया? तो (बेटी के साथ) हम दोनों ने बाद के कुछ मिनट उस बीज को पकड़ने, मुट्ठी में पकड़े रखने और फिर छोड़कर उसे उड़ते हुए देखने में बिताए. बचपन में, गांव में गर्मी की छुट्टियों में अपना एक पसंदीदा शगल होता था… आक के उड़ते हुए बीजों के पीछे भागना और कीकर की फली (पातड़ी) को सूल (शूल) में टांगकर पंखा चलाना. जीवन के खेतों में कुछ पौधों को खेती नहीं होती. वे हवा के साथ ही उड़कर कहीं से कहीं चले जाते हैं और उग आते हैं. सबके किए धरे पर. आक भी उनमें से एक है. 

मौसम कहीं बाहर थोड़े ही होता है. वह तो हमारे भीतर होता है; हमारे साथ ही जागता और सोता हुआ. आक के बीज को देखकर याद आता है कि साल के कैलेंडर से वैशाख झांक रहा है और इन्‍हीं दिनों जी गेंहू से भरे खेतों की महक के बाद हर मदभरी खुशबू को भूल जाता है. कि दिन मोटी बेडौल रोटी पर रखी गुड़ की डली हो गए हैं और चित इस मौसम की खूबसूरती से ही नहीं भरता. जाती हुई बारिशें शायद शुक्रिया कहने के लिए ढलती रात बालकनी में आती हैं. कि मुहब्बत पायताने पर रखा खेस है जो सिमटती रजाइयों को कहता है—गर्मी मुबारक!

या कि दिन मेरी गली में गर्मी के मटके बेचता है तो दुपहरियों के झोले में लाल सुर्ख मतीरे हैं. शामें खरबूजों से महकती हैं और रातों की बर्फ बस एक सपने भर में पिघल जाती है. तपते मौसम से अपनी इस मोहब्बत को जेठ, आषाढ की सारी आंधियों के बरक्स रखता हूं तो थार का तपता सहरा पगथलियों को समंदर बनकर छूने लगता है. कि मुहब्बत बालकनी में सुबह सवेरे चहचहाने वाली वह चिड़िया है जो कहती है- गर्मी मुबारक!

मेरे देस में बारिशें कई महीनों की लू और आंधियों को लांघकर आती हैं. तब तक तुम शायद अगले मौसमों का सामान बांध चुके होगे. इसलिए मैं इन यादगार मौसमों के लिए, यह शुक्रिया यहीं कहना चाहता हूं कि मेरे यहां बेर मीठे और तरबूज ठंडे हो रहे हैं.

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Responses

  1. Wah! bahut khoob kaha sa!!

  2. पिछले दो दिनों से दक्षिणी राजस्थान में लगातार बारिश हो रही है. मेरे कार्यक्षेत्र के एक गाँव मदारा की हमेरी बाई की आँखों में आंसू है. भीज गए गेंहू की वो कीमत अब नहीं मिल पायेगी… इस ख़राब गेंहू से बनी रोटी अच्छी फूलती नहीं… दाने की चमक भी ख़तम… यहाँ हवाओं के साथ पानी भी सौदा करने को उतारू है.

    हाथों में जब टूट चुकी उम्मीदें हो तो आँखों में पानी आ ही जाता है.. ऐसे में आपका यह ब्लॉग पढ़कर रेत की मानिंद फिसलती उम्मीदों के बीच हमेरी माऊ (दादी) याद आ रही है. मुझे उनसे पानी रंग मोहब्बत है…
    बहुत सुन्दर लेखनी…. प्रीत के तारों का गठजोड़ा….
    – आर्य मनु

  3. साब (आर्य मनु) यही मोहब्‍बत हमें जिंदा रखे है जो हम अपनी दादियों, दादों, पौधों, खेतों, माटी और गेहूं के दानों से करते आए हैं. वरना जीने के लिए इस दुनिया में है क्‍या. मुझे लगता है कि किसान जितना आशावादी (आप्टिमिस्‍ट) इस दुनिया में अौर कोई नहीं है. साल साल के खराबे और अकाल के बावजूद अगली बार उम्‍मीदों के नये दानों के साथ तैयार मिलता है. शुक्रिया.

  4. आह, कितनी सुंदर उपमायें हैं. बारिश की खूबसूरती तब ही महसूस होती है कि जब जानलेवा गर्मियाँ हों…कि जब बादल की जरा सी छाँव और उम्मीद पर ही मन में ठंढी हवा बहने लगे.

    आक के बीज, मटके का पानी और सपनों में पिघलती बर्फ. सब ठहरता है. इक लंबी गर्म दोपहर की तरह…और कितनी खूबसूरत बात है कि मौसम बाहर नहीं होता, मन के अंदर होता है.

  5. बिलकुल सा, मौसम बाहर नहीं होता, मन के अंदर होता है. बहुत आभार 🙂


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