Posted by: prithvi | 14/03/2014

गोया, मुहब्बत सांगरी की सब्जी है

सपनों का रंग गुलाबी हो तो आ ही जाते हैं बाजार के रंगरेज,
वरना मुहब्बत तो सांगरी की सब्जी है.

24 x 30 Rainy Romance a

हवा जब अपनी सारी सखी सहेलियों के साथ बसंत ओढे चली आ रही थी, उसने 18 कदम भरने चाहे उस खिड़की तक जहां से वह नज़र आता था. लेकिन जुदाई के अस्थमा में उसे ‘ओवर एक्साइट’ होने की मनाही थी और आक्सीजन की कमी उसकी सांसों पर भारी पड़ गई. कहते हैं कि हम सब एक पुरानी बिल्डिंग में रखे उस पियानो को ढूंढते हैं जिसकी सीक्रेट धुन से हमारी नाड़ बंधी है. सीक्रेट? ताइवान में बनी इस फिल्म का नाम तो पियानो होना चाहिए था.

इसी फिल्म को देखने के बाद याद आता है कि एक दोस्त ने मुहब्बत पर कुछ लिखकर देने को कहा है. सिस्टम में मुहब्बत से जुड़े कितने गाने भरे हैं. इश्क, मुहब्बत और प्यार इन तीन शब्दों से सर्च करने पर 300 के करीब गाने सूची में आते हैं. इनमें कुछ गाने पार्टनर के पसंदीदा हैं जिन्हें वह यथाकदा हाइवोल्यूम में प्ले करती है. मेज के नीचे की रैक में इस बार पुस्तक मेले से लाई गई किताबें हैं. कविता संग्रहों को पलटता हूं तो अधिकांश कविताएं प्रेम पर हैं. गजब है, दोस्त लोग बुक्का फाड़ कर रोने वाले इस समय में भी कितने मनोयोग से प्रेम कविताएं लिख रहे हैं. छप रहे हैं, बिक रहे हैं. यह मुहब्बत आश्वस्त करती है?

जर्मन कवि रानिया माइनेर रिल्के का वह पत्र याद आता है जो उन्होंने मिलिटरी अकादमी में दीक्षारत एक युवक को लिखा था. इसमें उन्होंने सलाह दी— प्रेम कविताएं मत लिखो. उन सब कला रूपों से बचो जो सामान्य और सरल हैं. उन्हें साध पाना कठिनतम काम है. यह सब ​व्यक्तिगत विवरण जिनमें श्रेष्ठ और भव्य परंपराएं बहुलता से समाई हों, बहुत उंची और परिपक्व दर्ज की रचना क्षमता मांगती हैं, अत: अपने को इन सामान्य विषय वस्तुओं से बचाओ.

रिल्के ने कविताएं लिखने के इच्छुक एक युवा को यह राय क्यूं दीं? पाश याद आते हैं-
कि उस कविता में
महकते हुए धनिए का जिक्र होना था
ईख की सरसराहट का जिक्र होना था
उस कविता में वृक्षों से टपकती ओस
और बाल्टी में दुहे दूध पर गाती झाग का जिक्र होना था
और जो भी कुछ
मैंने तुम्हारे जिस्म में देखा
उस सब कुछ का जिक्र होना था.

खैर, वैलेंटाइंस डे गुजरा है. इनबाक्स में कुछ प्रोमोशनल मेल हैं जिनको चुन चुनकर स्पैम में डालता हूं. मुहब्बत की हरी-भरी कहानियां कब रुखी सूखी तारीखों को देखकर खिलीं? यह इतिहास में दर्ज है कि मोहब्बत की फसल औपचारिकताओं के बंजर मैदानों में नहीं होती वह तो रिश्तों की उस उपजाऊ जमीन पर फलती है जिसे सालों साल भरोसे से सींचा गया हो. आइंसटाइन के शब्दों में किसी की मुहब्बत में खिंचे चले जाने के लिए कोई गुरूत्वाकर्षण जिम्मेदार नहीं है. न ही यह किसी चुंबक का का चमत्कार है. यह तो अलग तरह का ही मसला है. भौतिकी और रसायन शास्त्र के सारे बंधे बंधाए नियमों से परे. इसे भींत पर टंगे कागजी कैलेंडर की तारीखों में कैसे बांधा जा सकता है. ठीक वैसे ही मुहब्बत मे पग जाना और उसे शब्दों का जामा पहनाना शायद हर किसी के बस की बात नहीं होता. यह तो पाश जैसा कोई क्रांतिकारी ही कर सकता है.

हफ्ते भर की बूंदाबांदी, बादलवाही के बाद सफेद बालों वाली धूप गेहूं की मेड़ पर उतरने लगी है. वक्त अपने घर के बाहर एक नोट छोड़ गया कि वैलेंटाइन के सपने देखने वाली एक पीढ़ी हमारे आंगन में बड़ी हो रही है और एक समाज है जो लिव इन रिलेशन के नफे नुकसान पर चर्चा कर रहा है. वर्जनाओं की विंडोज एक एक कर क्रप्ट होती जा रही हैं और नयी पीढी धड़ाधड़ सिस्टम को फारमेट करती है. मोबाइल, इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साइटों ने मुहब्बत का रूप व चेहरा तो बदल दिया लेकिन चरित्र कमोबेश वही है. शायद!

एक दोस्त के लिए लिखा था कि गोया, मुहब्बत सांगरी है. थार की लू और आंधियों के बावजूद जमीन से गहरे तक जुड़ी खेजड़ी की फळी जिसे अगले मौसमों के लिए सायास सहेजा गया हो. सांगरी, जिसमें बचपन की यादों का स्वाद हो, किसी के हाथों की खुशबू मसालों सी घुली हो. सांगरी, जिसे आप दोनों साथ बैठ मनभर खाएं और अगली रुतों के लिए भी ऐसी उम्मीद कर सकें. तो मुहब्बत सांगरी की सब्जी है क्योंकि एक दोस्त का कहना है कि वास्तव में प्रेम कुछ नहीं होता. प्रेम होता है दो घड़ी साथ सटकर बैठना.

[संदर्भ- रिल्के का फ्रांज जेवियर काप्पुस को पत्रोत्तर.  अवतार सिंह पाश की कविता अव विदा लेता हूं. चित्र कारेन टार्लटन का रैनी रोमांस, साभार नेट]

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Responses

  1. गोया का अर्थ देखती हुई आपकी इस पोस्ट तक पहुंची। रोचक लिखा है ,सांगरी की सब्जी तो हमने भी खाई है। .. मुहब्बत की तुलना सांगरी से करना मजेदार लगा , कृपया इस उर्दू शब्द का सही अर्थ बताएं ,क्या ‘ सचमुच ‘ या यूँ ‘ या फिर कुछ और, धन्यवाद

  2. कुछ दिन पहले राजस्थान गयी थी तो पहली बार सांगरी की सब्जी खायी थी. प्रेम की उपमायें जब बचपन की जड़ों से गहरी हों तो इसी तरह असर करती हैं. मेरे लिये इसी तरह महुआ, अमलतास या पलाश का पेड़ उगता है. गाहे बगाहे कांकड़ को पढ़ती रहती हूँ. कुछ अलग चीजें मिलती हैं यहाँ. प्यास, रेत, सांगरी और प्रेम जैसी.
    अच्छा लगता है यहाँ आना. खुद को किसी और शहर में अचानक मिल जाने जैसा.

  3. ब्‍लाग की दुनिया में जब वीरानों की आहट हो रही हो तो इस तरह की बातें सुकून देती हैं. कितना अच्‍छा हो कि हम सब यूं ही कभी इधर उधर घूमते रहें. 🙂


कुछ तो कहिए..

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