Posted by: prithvi | 31/01/2014

खोए हुए गुल

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दरअसल पुष्कर के एक स्वतंत्रता सेनानी ने हेमा मालिनी को बताया था कि हर महिला में एक एक्ट्रेस छुपी होती है और उन्होंने ही तत्कालीन प्रधानमंत्री ‘राजू’ को पत्र लिखकर मांग की थी कि क्रिकेट और समाज में गुगली के इस्ते्माल पर प्रतिबंध हो. एक लड़का जो बहुत देर तक सांस रोकने में माहिर था वह एक दिन हीलियम हो गया. जिंदगी जीना अगर राकेट साइंस होता तो हमारे स्कूलों में ई बराबर एमसीस्क्वेयर के भौतिकी नियम नहीं पढाए जाते और दुनिया का एक बड़ा हिस्सा राकेट की खेती कर रहा होता. कुहरे को कुहरा न कहकर जलवायु परिवर्तन के रूप में परिभाषित करने वाले इन दिनों में ओम दर बदर यह याद दिलाती है कि हमारे देश में बायोलाजी पढने वाले अब मेंढकी की तलाश में पुराने जोहड़ के किनारे नहीं मिलते. कि प्रयोगशालाओं के बड़े मर्तबानों में सुरक्षित रखे शरीरों का अपने चारों ओर फैले द्रव से इतना ही रिश्ता होता है कि वे दोनों कांच की ​एक ​मोटी दीवार में रहने को अभिशप्त हैं.
 
खैर,​ सर्दी की पहली बारिश में नहाया दिन बालकनी में बैठा है. ओस में भीगी रात सूखने डालकर दुपहरियां, सरसों से पीला रंग लेने चली गईं. माघ तो बचे तिलों और गजक के सहारे कट जाएगा.. फागुन के लिए रंग जो जमा करने हैं. एक शहर दिल्ली है जिसके बारे में ​टीवी पर दिखाया जा रहा है मानों वहां आग लगी हो. जबकि यहां तो मावठ की बारिश के बाद माघ की ठंडी हवा चल रही है. हमारे दफ्तर के पीछे वाली सड़क के पास केजरीवाल धरने पर बैठे हैं. टीवी पर हंगामा बरपा है तो घटनास्थल पर लोगों से ज्‍यादा टीवी वाले हैं, उनसे ज्‍यादा गाडियां हैं, उनसे भी ज्‍यादा पुलिस वाले हैं. चिल्‍लपौं है, बस होचपोच है! 
 
काल के इस खंड में अनाहूत आ गई क्रांति की बलाएं लेने वालों और कोसने वालों का जमावड़ा है. आधे सच की आग पर सिकी झूठ की रोटियां हैं. मीडिया के रचे जलसाघरों में, बरसते मेह में आग दिखाने और पढाने की कला यूं ही तो नहीं आ जाती!     
 
दोस्त संजय व्यास ने अपनी नयी और पहली किताब में लिखा है कि एक बस्‍ती के बाशिंदों के लिए हर तत्‍कालीन मौसम बुरा होता था और वे हर अगले मौसम की ही प्रतीक्षा करते रहते. सिर्फ मौसम ही नहीं बल्कि वे सुबह होती तो दुपहरी और दुपहरी में शाम का इंतजार करते. उनके जीवन के हर दिन का हर प्रहर प्रतीक्षा में ही लगा रहता था. शायद वे इसीलिए जीवन यात्रा में बने हुए थे कि उन्‍हें हर अगली बार में बेहतर होने उम्‍मीद थी. और इसी इंतजार में वे थोड़ा और जी जाते थे. हालांकि, संजय ने इस बस्ती का नाम नहीं लिखा है. न आपके गांव का, न मेरे शहर का.
 
अमेरिकी लोक गायन को नयी आवाज व पहचान देने वाले पीट सीगर नहीं रहे हैं. उनका एक गीत याद आ रहा है— Where Have All The Flowers Gone. खेत की डिग्गी में पूर्व की ओर खड़े शहतूत के सारे पत्ते पीले होकर गिर गए. बसंत आ रहा है!
संजय व्यास की पहली किताब 'टिम टिम रास्तों का अक्स' आई है.

संजय व्यास की पहली किताब ‘टिम टिम रास्तों का अक्स’ आई है.

[‘टिम टिम रास्तों का अक्स‘ के लिए यहां आर्डर किया जा सकता है. है. कमल स्वरूप के निर्देशन में फिल्म ओम दर बदर हाल ही में बड़े पर्दे रिलीज हुई.]

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Responses

  1. काश इस तरह का लेखन अखबार की तरह हर सुबह मिल पाता! पर थोडा जल्दी जल्दी तो आ ही सकता है कांकड़ का हर नया अंक। अख़बार की तरह पढ़कर बेमज़ा नहीं हुआ मन ये सब पढ़कर। शुक्रिया पृथ्वी भाई।

  2. संजय भाई.. जय हो. जब भी आप लोगों से प्रेरणा मिलती है तो टीप लेते हैं.


कुछ तो कहिए..

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