Posted by: prithvi | 06/07/2013

इल्‍म से शायरी

ओशो कहते हैं कि मनरूपी कचरे के साथ होकर भी उससे अलग होना ध्याकन है. यानी मन से कोई तादात्मूय ही नहीं रखना है बस. कृष्णामूर्ति ने कहा कि ध्या न सचेतन नहीं है, अभ्यािसित नहीं है, सोचा समझा नहीं है तो मुझे लगता है कि वह वही बात कहते हैं. अनायास घटित होने की. खुली हथेलियों पर अचानक गिरती बूंदों की. उन्हेंु महसूस करने की.

ओशो कहते हैं कि मनरूपी कचरे के साथ होकर भी उससे अलग होना ध्याकन है. यानी मन से कोई तादात्मूय ही नहीं रखना है बस. कृष्णामूर्ति ने कहा कि ध्यान सचेतन नहीं है, अभ्यासित नहीं है, सोचा समझा नहीं है तो मुझे लगता है कि वह वही बात कहते हैं. अनायास घटित होने की. खुली हथेलियों पर अचानक गिरती बूंदों की. उन्हें महसूस करने की.

बेंगलूर के पास पंचगिरि की पहाडियों में हम पश्चिम की ओर मुंह करके ध्‍यान के लिए बैठे हैं और पूर्वाई चल रही है. यानी हवा पीठ की ओर से आती है. पीठ की ओर से, पूरे बदन को सहलाती हुई कानों के पास से सर सर बहती है. थार (रेगिस्‍तान) का आदमी जहां भी जाता है अपनी धूल भरी आंधियां ढूंढता है और जब सुबह सवेरे की नरम हवाएं उससे इस शिद्दत से लिपटती हैं तो वह यूं ही खो जाता है. यही हाल कमोबेश हमारा है. सुबह की शीतल हवाओं को जीने के इन दिनों बायीं ओर से मोटी मोटी बूंदें कब आसमान की ओर खुली हथेलियों पर गिरने लगीं, पता ही नहीं चलता.

जे कृष्‍णमूर्ति, ओशो रजनीश से लेकर गुरू रविशंकर तक को पढने, सुनने के बाद अपनी समझ में मोटा माटी यही आया कि ध्‍यान खुद के साथ होना है और खुद के साथ होकर भी अलग होना है. खुद को कहीं बिठाकर ‘लांग ड्राइव’ पर निकल जाना है. अगर हम अपने पास बहती हवा को सुन पायें, हथेलियों पर गिरती बूंदों को महसूस कर पायें यह देख पायें कि दक्षिण भारत में निमोळी हमारे उत्‍तर भारत से कितनी मोटी होती है तो बस यही ध्‍यान है! ओशो कहते हैं कि मनरूपी कचरे के साथ होकर भी उससे अलग होना ध्‍यान है. यानी मन से कोई तादात्‍मय ही नहीं रखना है बस! कृष्‍णमूर्ति ने कहा कि ध्‍यान सचेतन नहीं है, अभ्‍यासित नहीं है, सोचा समझा नहीं है तो मुझे लगता है कि वह वही बात कहते हैं. अनायास घटित होने की. खुली हथेलियों पर अचानक गिरती बूंदों की.

ध्‍यान की अपनी इसी विशिष्‍ट परिभाषा के साथ देखा कि कर्नाटक व अन्‍य दक्षिण भारतीय राज्‍यों में सफेद फूल कहीं अधिक होते हैं. हर आयोजन में सफेद फूलों की अधिकता रहती है. अपने थार में महिलाओं के कपड़ों में लाल चटक रंग अधिक होता है, ज्‍यों ज्‍यों हम नीचे दक्षिण की ओर जाते हैं यह रंग मैहरून होता जाता है. हमारे यहां महिलाएं चांदी के कड़े, पजेब, नथ पहनती हैं तो दक्षिण में सोना अधिक पहना जाता है. नीम की नीमोळी हो, पपीता या नारियल सब थोड़े भरवां (हेल्‍दी) होते हैं. नीम के पत्‍ते कितने हरे भरे होते हैं और नीमोळी तो हमारे यहां के बेर जितनी बड़ी. वहां माटी में लाली अधिक होती है तो हमारे यहां क्रीमी सी. शायद कहीं कहीं काली माटी भी होती होगी.

 ध्‍यान शिविर से बाहर आता हूं बादलों के झुंड आसमान में डेरा जमाए हैं. हाथ पकड़े पहाड़ी से उतरते हुए उसने पूछा इन बादलों को भी कोई नहलाता है क्‍या? कहीं पढा था कि मेहनत से मद भरी मौज और कोई नहीं होती. मेहनत करके खाने वाले ध्‍यान नहीं करते! हमें अभी कुछ दिन इन पहाड़ों में ध्‍यान करते हुए बिताने हैं, जहां की लाल चींटी के काटने पर तेज जलन होती है.

कुछ बातें दिल की हैं जैसा किसी ने कहा था-
इश्‍क को दो दिल में जगह
इल्‍म से शायरी नहीं आती.

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