Posted by: prithvi | 15/12/2012

मोडी खेजड़ि‍यों पर टंगे खेदपत्र

Horizon of Hope - 48x96

स्‍याह अंधेरी रजाइयों में दुबके टीले सन्‍नाटों के जाले बुनते हैं और रेत का समंदर तूफानों के सपने देखता है. मिंगसर (मार्गशीर्ष) की ठंडाती, लंबी रातें दिनों की खुसर फुसर कर गहराती रहती हैं. हमारा एसयूवी राष्‍ट्रीय राजमार्ग संख्‍या 15 पर दौड़ रहा था. रेतीले थार में अंधेरे को चीरता हुआ. थार के राजमार्ग, जहां हर वाहन अपनी रोशनी खुद लेकर चलता है. अंधेर पख(वाड़ा) होने के कारण रात कुछ ज्‍यादा ही अंधेरी लगती है और शीशे के बाहर कुछ नहीं दिखता.

शायद मूंगफली के खेत रहे होंगे. या सरसों के. तारामीरा के. कुछ तो बोया ही होगा. छोले (चने) की चटनी शाम को ही भोजन में थी. अधखुली आंखों से देखता हूं, सज्‍जे हाथ की ओर बीकानेर पीछे छूट रहा है. थार के गांव कस्‍बे अब भी रात में तानकर सोते हैं और जेठ आषाढ में तो दुपहरियों में भी उंघते नजर आते हैं. यही रस्‍ता नोखा, नागौर होते हुए थार को पार कर अरावली पर्वतमाला तक पहुंचाता है.

अकेले होते ही अंधेरा शातिर हो जाता है. गहराने लगता है और ईमेल के इनबाक्‍स में पड़े खेदपत्र को जहन पटल पर रख देता है. आवेदन से खेदपत्र के बीच का दौर अद्भुत सपनों भरा होता है जब हम देखते हैं कि समंदर उठकर बादलों से पानी मांगने चला गया या कि पाताल ने आसमान को सर पर उठाकर जमीन पे पटक दिया. लेकिन खेदपत्र आने के बाद अचानक सारी चीजें फिर जमीन पर आ जाती हैं.

यह यात्राओं की खूबी है कि वे विफलताओं की धूल को उड़ाती रहती हैं और हम किसी अगले सफर की तैयारी में पिछली सारी विफलताओं पर शोक सभाओं को मुल‍तवी कर आगे बढते जाते हैं. इधर के सालों में अगर डिप्रेशन बढा है तो इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि हमने सफर करना छोड़ दिया. किसी ने कहा था कि यात्राएं हमें बाहर ही नहीं ले जाती, वे हमें अपने भीतर के उस स्‍पेस में भी ले जाती है जहां जाने से हम प्राय: कतराते रहते हैं. यात्राएं करनी चाहिएं.

देशनोक के आसपास रोशनी में खेतों में मोडी (काट छांट दी गई) खेजड़ियां दिखती हैं. सीधी और लंबी जड़ वाली खेजड़ी भी थार की अद्भुत देन है जिसकी जड़ से लेकर छोडे (छिलके), लकड़ी, पत्तियां और फळी तक काम आती है. इस मौसम में खेजड़ियों को कांट छांट दिया जाता है ताकि आने वाली गर्मियों से पहले वे फल फूलकर तैयार हो सकें. अपन भी आंखों की कोरों से निकालकर खेदपत्र के छींटों को मोडी खेजड़ियों की ओर उछाल देते हैं…. कि उम्‍मीदों की नयी कोंपले खिलेंगी.

सूरज बाबा के आने से पहले हम सूर्यनगरी में थे. एसयूवी से 500 किलोमीटर की दूरी सिर्फ चार घंटे में पूरी कर.

(Painting curtsy net- Horizon of hope by Laura Harris)

Advertisements

Responses

  1. “आंखों की कोरों से निकालकर खेदपत्र के छींटों को मोडी खेज‍ड़ियों की ओर उछाल देते हैं…. कि उम्‍मीदों की नयी कोंपले खिलेंगी.”
    आमीन !
    बहुत सुंदर लिखते हैं आप पृथ्‍वी सा ! पढ़ना शुरू किया तो डूबती ही चली गई !

  2. 500 किलोमीटर सिर्फ चार घंटे मैं। कैसे करते हैं आप ये

  3. बहुत सुंदर।

  4. लगभग चार घंटे में, एसयूवी से. यह भी एक सपने जैसा कुछ रहा था.

  5. brother thats awesome ….marvellous .. 🙂 😉

  6. bikaner aaye aur hamen yaad bhi nahin kiya , theek nahin kiya hamen pata chal jata hai , aapka man aapke control mein nahin hai aur aapki kalam ne kya gazab tarike se sab zaahir kar diya kyonki wo aapke man ki sunti hai aapki nahin.


कुछ तो कहिए..

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

श्रेणी

%d bloggers like this: