Posted by: prithvi | 24/11/2012

ये खु़शबू तो मिट्टी की है

खुशबू तो मिट्टी में होती है, बारिश तो बस उसकी याद दिलाती है. जिन लोगों की नाड़ मेह पानी और माटी से बंधी है उनके लिए ये पंक्तियां गहरे मानी रखती हैं. किशोर चौधरी की कहानियां ऐसी ही छोटी छोटी सी बातों से बुनी होती हैं जो आखिर तक बांधे रखती हैं. वे बिंब रचने के महारथी हैं, भाषा और भाव उनके सबसे मारक हथियार हैं. उनका पहला कहानी संग्रह ‘चौराहे पर सीढियां’ हाल में आया है. 

किशोर की बात की जाए तो वे किसी श्रेणी के रचनाकार नहीं हैं. उनकी अपनी श्रेणी है. अपनी बातें और कहने का अपना ढंग. उनके चरित्र हमारे पास के ही किसी चौराहे पर सीढियों से उतरते हैं और चित को बींध देते हैं. कई बात लगता है कि उनकी कहानी हमारे पास बैठकर अपनी बात कह रही है. हम उसे देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं. कहानी कहने के उनके लहजे, शैली के बाद हमें अपनी भाषा से प्रेम करने का मन होता है. ठेठ थार में रहकर हिंदी में इतनी मिठास से लिखना इस दौर की पीढी में हर किसी के बस का नहीं होता. 

वे अपनी कहानियों में छोटी छोटी बातों को इतने सरल ढंग से कह जाते हैं. जैसे- कौन किसको खराब करता है, सब आप डूबते हैं (कहानी-अंजलि तुम्‍हारी डायरी से), मी‍ठी जुबान वाले धोखेबाज ही हुआ करते हैं या कि सीढियों की उपयोगिता घर के मन पर है, उनका खुद का कोई अस्तित्‍व नहीं होता (कहानी-चौराहे पर सीढियां). बरसात में अवसर सबके लिए बराबर होते हैं मगर चरित्र की फसल की जगह मौज की खरपतवार ज्‍यादा फलती फूलती है (खुशबू बारिश की नहीं). भय और लालच से बुनी गयी इस दुनिया में बस एक इंतजार स्‍थायी है, जो आखिरी वक्‍त जब दुनिसा से थक हार जायेंगे तब भी बचा रहेगा (बताशे का सूखा पानी).

निसंदेह रूप से कोई कहानी या पूरी किताब पाठक को नहीं बांधती. उसका कुछ बातें या पंक्तियां ही दिल को छूती हैं. इस कहानी संग्रह में चौदह कहानियां हैं. भाषा, शिल्‍प और प्रवाह के लिहाज से वे कहीं न कहीं जरूर चौंकाती हैं. जैसे कि संजय व्‍यास ने अपने ब्‍लाग पर लिखा है कि परंपरा में मिली किस्सागोई, स्थानीय मुहावरे और परिवेश से ठेठ देसीपन को सुरक्षित रखते हुए किशोर की कहानियों का संसार विशिष्ट रूप से मौलिक है. वे जटिल मनोभावों और उनकी ऊहापोह के शिल्पी हैं. उनके यहाँ अमूर्त भाव भी छुए जा सकते हैं, वे कई रंगों में रंगे हैं, उन्हें कभी किसी कोने में तो कभी एकदम सामने देखा जा सकता है.लगता है जैसे वे टोकरी में पड़े फल हैं.

इस कहानी संग्रह से एक और महत्‍वपूर्ण पहल को समझना होगा. किशोर की ये कहानियां किसी कतिपय प्रतिष्ठित या गैर प्रतिष्ठित पत्रिका में नहीं छपीं. वे सबसे पहले अंतरजाल यानी ब्‍लॉग पर आईं और वहां से सीधे प्रिंट में. किताब ने आनलाइन प्रीबुकिंग के लिहाज से रिकार्ड प्रदर्शन किया है. इसे सोशल मीडिया की बढ़ती ताकत व पहुंच के रूप में देखना होगा. किशोर ब्‍लागिंग व सोशल नेट‍वर्किंग के जरिए पढे गए हैं. उसके बाद मित्रों के बार बार आग्रह से प्रकाशित हो रहे हैं. बीकानेर के सिद्धार्थ जोशी ने इसे सकारात्‍मक पहल मानते हुए लिखा है कि आने वाले दिनों में ऐसी और कई अच्‍छी और महत्‍वपूर्ण पुस्‍तकें ब्‍लाग अथवा अंतरजाल के माध्‍यमों में अच्‍छी खासी स्‍वीकृति पाने के बाद बाजार में आ सकती हैं. 

किशोर अपनी शीर्षक कहानी में कहते हैं कि जहां सीढियां खत्‍म होती हैं वहां रास्‍ते शुरू होते हैं. उनका यह कहानी संग्रह निश्चित रूप से एक नये रास्‍ते की शुरुआत है.

चौराहे पर सीढियां को आनलाइन यहां खरीदा जा सकता है.

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Responses

  1. अभी किताब के इंतज़ार में हूँ …… जो आखिरी वक्‍त जब दुनिया से थक हार जायेंगे तब भी बचा रहेगा 🙂

  2. किताब आती ही होगी, तब तक इंतजार का आनंद लिया जाए.

  3. nice review


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