Posted by: prithvi | 10/07/2012

ख़ुली छतों के दिये

मां के मरने और बाप के पागल होने के बाद 

ठेके पर शराब बेचता एक बच्‍चा

बहन के पीले हाथों, 
छोटे की पढाई की चिंता करता है
और त्रासदी के सारे जमूरों को हाइवे के तपते कोलतार पर
नंगे पांव खड़े कर देता है.

 

हाइवे के इस मोड़ पर रुकने का कोई कार्यक्रम नहीं था लेकिन तापमान के घोड़े जब 49 डिग्री के आसपास तक   उछलने लगे तो कुछ देर थमना ही अच्‍छा लगा. नहर में पानी था और कुछ बचे खुचे पेड़ भी. जेठ से तपते आषाढ की इन दपहरियों में जीवन किसी न किसी ओट में सुस्‍ताने लगता है और खेत खलिहानों में भतूळिए (भंवर) लहरिया करते हैं. लहराते हुए नाचते हैं. 

सड़क पार ठेके (शराब की दुकान) से निकल कर आये सिंकिया पहलवान से उस किशोर की उम्र 17 साल तो कहीं से नहीं लगी, लेकिन है तो है. मां बचपन में चल बसी, बाप का दिमाग हिल गया यानी पगला गए. जमीन ठेके पर दे दी और वह खुद इस ठेके पर सेल्‍समैनी करने लगा. बड़ी बहन को बुआ के यहां भेज दिया जहां वह सिलाई कढाई सिखती है. कुछ ही साल में उसके हाथ पीले करने हैं. छोटा (भाई) पढ रहा है. खाना ताऊ जी की बेटी बनाती है. कोई ऐब नहीं. थोड़ा बहुत पढ़ा है. मोबाइल से इंटरनेट इस्‍तेमाल करता है. फेसबुक पर एकाउंट है. 227 फ्रेंड थे, कुछ विदेशी भी, जिनको हटा दिया. वह रेडियो, टीवी, फिल्‍मों पर धड़ल्‍ले से बात करता है.

बातों से अगर कोई बात निकली तो बस इतनी सी थी. वह बात बता रहा था और अपन सामने हाइवे के तपते कोलतार को देख रहे थे. ऐसा लगा कि उसने त्रासदियों के जमूरों को इस कोलतार पर नंगे पांव दौड़ा दिया हो. अपने गांव का सामाजिक ढांचा कहीं न कहीं ऐसा रहा है कि वह अपनों को टूटकर बिखरने नहीं देता. बल्कि इतना संबल दे देता है कि वह खड़ा होकर हादसों के मुंह पर उसी की तर्ज पर तमाचा जड़ सके. 

हमारे पास उस किशोर को आफर करने के लिए सुझावों के कुछ बेस्‍वाद चनों  के अलावा कुछ नहीं था. चिल्‍ल होने या चिल्‍ल्‍ड जैसा कुछ लेने का कोई साधन नहीं. हनुमानगढ को सूरतगढ से जोड़ने वाले इस हाइवे पर धूप का राज था जबकि कुछ साल पहले इस सड़क पर पेड़ ही पेड़ हुआ करते थे. हाइवे बनाने के चक्‍कर में हजारों पेड़ निपटा दिए. विकास का यह उजाड़ू माडल इन दिनों खूब चला है. इतिहास में यही दर्ज है कि लोग सड़क बनाते थे तो पेड़ और प्‍याऊ का बंदोबस्‍त पहले करते थे. अब हाइवे बनते हैं तो पेड़ पहले काटे दिए जाते हैं. हाइवे शुरू होता है तो  सबसे पहले टोलटैक्‍स वाले आते हैं. आज ही खबर पढ़ी थी कि सरकार ने इस हाइवे में करोड़ों रुपये के घपले के आरोप में कई अभियंताओं को निलंबित कर दिया. 

धूप का सफर धूप के साथ ही तय करना था इसलिए हम निकल आए. वसीम बरेलवी ने लिखा है.. 

ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है
समन्दरों ही के लहजे में बात करता है,
ख़ुली छतों के दिये कब के बुझ गये होते
कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है.

(painting curtsy net- “In Search of Hope” by Chidi Okoye)

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Responses

  1. थोडा कडवा , क्योकि सत्य का स्वाद यही है
    “इतिहास में यही दर्ज है कि लोग सड़क बनाते थे तो पेड़ और प्‍याऊ का बंदोबस्‍त पहले करते थे. अब हाइवे बनते हैं तो पेड़ पहले काटे दिए जाते हैं.”

  2. bhai bahut chubhta lilhte ho bilkul umas bhare din ki dhoop ki trah, us kishore ko mera salaam..

  3. रेगिस्तान के जीवन के दृश्यों में भरे हुए मार्मिक और बेचैन कर देने वाले एलिमेंट्स को इस तरह पढ़ना… आपकी कलम जारी रहे. दुआ.

  4. विकास का उजाड़ मॉडल.बिलकुल सटीक कहा पृथ्वी जी.
    आपकी कलम हाइवे के हर मोड पर यूँ ही ठिठकती रहे.हर छोटे बदलाव को भी चौकन्नी हो दर्ज़ करती रहे.आमीन.

  5. ठेके पर शराब बेचता एक बच्‍चा..सवाल ही सवाल हैं आपकी पूरी कविता में जिनका जवाब को न दे अब सारे लोग आपकी नज़र से तो माहोल देखने से रहे उन्हें बंद कारों और ए सी कमरों में भला कहाँ फुर्सत धूप भूक प्यास नादारी के मंज़र देखने की.


कुछ तो कहिए..

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