Posted by: prithvi | 26/04/2012

उड़ते बाजों के पीछे

‘मौसमों की मंडी में बारदाने की ये कैसी कमी थी कि धूप की मेरी सारी फसलें बारिश में भीग गईं. सपने जो तुम्‍हारी आंखों में लिखे थे, धुल गए. वक्‍त का जमादार दूर पिड़ों (खलिहानों) में बैठा बेबसी की बीडियां फूंकता है और लाचारी सरकारी सिस्‍टम की तरां फिर से मेरे सर पर आ खड़ी हुई है. उतरते वैशाख के इन हादसों पर मेरे खेतों ने जो स्‍यापा किया उससे जेठ की जवान होती आंधियां भी घबराकर थम गईं. हां तो क्‍या कि मैं आज भी इस देश का एक किसान हूं. शायद इसीलिए उतरते वैशाख के ये हादसे महाजन के कर्ज की तरह मेरी बही में लिखे गए हैं?

तुम जानते हो कि अकाल हो या ओले सिर्फ खेतों में नहीं पड़ते. इनकी असली मार तो हमारे शरीर के 250-300 ग्राम वजनी उस हिस्‍से पर होती है जिसे विज्ञान दिल कहता है. कहर फसलों पर नहीं होता, किसी का दिमाग भी सुन्‍न हो जाता है. इन बेमौसमी बारिशों के बाद कुछ आंखों में बहुत दिन तक पानी बरसता है जिन्‍हें वह खोज़ (चोट) कह कह कर अपने पल्‍लू से पोंछती रहती है. खैर तुमने कभी लिखा था न कि हार मान लेना, जीवन की सारी हारों से बड़ी हार है, इसलिए यही कहूंगा कि सब ठीक है.’

… गांव से जुड़ने वाले सारे नेटवर्क को जब एक एक कर शट डाउन कर रहा हूं तो इक भुला दिए गये दोस्‍त का यह ख़त कैसे मेरी नींद वाले पते पर स्‍पैम की तरह आ पहुंचा, पता नहीं. बस, बेचैनियां को मौका मिल गया और वे दिल की गलियों में गधमचक्‍का करने लगीं. इसके बाद सोना कहां होता है? मौसम में ठंडक है इसलिए खेस उसके ऊपर कर बालकनी में आ जाता हूं. नीम में नये फूल आ रहे हैं और दिल्‍ली के लुटियन जोन में इतने नीम हैं कि जरा सी हवा चलते ही साफ सड़कों पर हल्‍की सफेद परत बिछ जाती है. हवा से नीम का कड़वापन सांसों में लगता है.

शहर अभी कच्‍ची मीठी नींद में है और गांव की गलियों में बेचैनियां पसरी पड़ी हैं, वैशाख की बेमौसमी बारिशों के बाद. शहर में रहकर गांव से जुड़े रहने का अपना दर्द है क्‍योंकि गांव में तो आज भी बात बात पर कलजुग आते रहते हैं और शहर 4जी के जरिए 21वीं सदी के सपनों को हाईस्‍पीड डाउनलोड करने की तैयारी कर रहा है. इसलिए तो कहा था कि रात का अंधेरा ढोने की सजा काटता मेरा दिन (के दिल) सूरज के घोड़ों को पकड़ने की कोशिश में सहरा में भटकता है. दुपहरियों के दिलासे और शाम की बाहों में सुकूं की उम्‍मीदें कहां रंग लाती हैं? ये वैशाख दिल की गलियों में कैसे वीराने लाता है, आपके घर के बाहर का सूना पेड़ बता देगा.

चाय पीने का मन होता है और उठकर किचन में आ जाता हूं. पाश की ये लाइनें पता नहीं क्‍यूं याद आ रही हैं.

उड़ गए हैं बाज चोंचों में लेकर

हमारी चैन से एक पल बिता सकने की खाहिश

दोस्‍तो, अब चला जाए

उड़ते बाजों के पीछे.

(photo curtsy net wid thanks to PP)

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Responses

  1. “… गांव से जुड़ने वाले सारे नेटवर्क को जब एक एक कर शट डाउन कर रहा हूं तो इक भुला दिए गये दोस्‍त का यह ख़त कैसे मेरी नींद वाले पते पर स्‍पैम की तरह आ पहुंचा, पता नहीं. बस, बेचैनियां को मौका मिल गया”
    बहुत बढ़िया सा

  2. bahut hee marmik vyaathaa hai ji ek kisaan kee ye……

  3. …रात का अंधेरा ढोने की सजा काटता मेरा दिन (के दिल) सूरज के घोड़ों को पकड़ने की कोशिश में सहरा में भटकता है. दुपहरियों के दिलासे और शाम की बाहों में सुकूं की उम्‍मीदें कहां रंग लाती हैं? ये वैशाख दिल की गलियों में कैसे वीराने लाता है, आपके घर के बाहर का सूना पेड़ बता देगा.
    खूब खूब बहुत खूब.

    कई दिन से दो पुराने मारवाड़ी गीत खोज रही हूँ अगर आप मदद कर सकें तो शायद कुछ खोज सार्थक हो

    १. ओ परदेसी ओ ले गेयो नीन्दड्लि… ८० के दशक में सुना था
    २. थारे न मारे राड नइओ रे झूरी अनबोल्‍यो मति जाए… This is different from the one in movie Veer Tejaji

    Peace,
    Desi Girl

  4. bahoot sundar rachana

  5. khoobsoorat : bahut sateek :

  6. bahut kasak wali imagery istemaal kar ke aapne dard ko ik aansoo ki tarah baha diya.

  7. शहर में रहकर गांव से जुड़े रहने का अपना दर्द है क्‍योंकि गांव में तो आज भी बात बात पर कलजुग आते रहते हैं और शहर 4जी के जरिए 21वीं सदी के सपनों को हाईस्‍पीड डाउनलोड करने की तैयारी कर रहा है…. beautifuly written 🙂

  8. कुछ स्मृतियाँ हमारे भीतर इतनी गहरी पैठ जाती है ति हम चाहकर भी उससे भुला नहीं सकते। तिस पर जिनसे आपका व्यक्तित्त्व निर्मित हुआ है, उसे भुलाना तो असंभव है। जिस गाँव-गुवाड़ में हम पले-बढे और जिसकी सामाजिकता में हमारा मानस तैयार हुआ है, शहरी परिवेश सबकुछ के बावजूद जब हम लोगों के भीतर पसरा अंधेरा और एकलखुरड़ापन देखते है तो अपणे अपणायत के हेताळुओं को याद करना जीने की एक एक अनिवार्य शर्त सी बन जाती है, जो हमें संकट में भी साहस देती है, ऊर्जा देता है… बहुत खूब पृथ्वी जी…
    आपका – पुखराज जाँगिड़


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