Posted by: prithvi | 09/03/2012

मेरा क्रिकेट भी अब सन्‍यास लेता है राहुल!

एडिलेड में आस्‍ट्रेलिया के खिलाफ एतिहासिक जीत के शाट के बाद वाला द्रविड़ का फोटो डायरी में पड़ा है, ऐसे लग रहा है जैसे कि कल की ही बात हो.

बाहर ग‍ली रंग से नहाई है और दीवारें उसे उचक उचक कर देख रही हैं. तमाम वर्जनाओं, कुंठाओं को कुछ देर तजकर अपने असली रूप में आया शहर समाज वापस घरों को लौट गया है, सभ्‍य बनने के लिए.

चलो होली हो ली! गुजिया और चाय के साथ बालकनी में बैठा फागुनी आसमान को देखता हूं तो वह समंदर की तरह शांत दिखता है. द्रविड़ कल शायद सन्‍यास ले लेगा, मित्र ने यह खबर दी है. आस्‍ट्रेलिया में टीम की भद्द के बाद से ही लग रहा था कि राहुल अब सन्‍यास ले लेगा. लेकिन फिर भी अंदर से कुछ चटक गया है. ऐसा बहुत कम होता है. अब क्रिकेट देखते ही नहीं, खेलना तो सालों साल पहले छूट गया. पिछले साल द्रविड़ ने ब्रेडमैन स्‍मृति व्‍याख्‍यान दिया था. उसका वीडियो सिस्‍टम में पड़ा है जिसे दुबारा सुनता हूं तो दिल भारी होने लगता है. याद करने की कोशिश करता हूं कि क्रिकेट व द्रविड़ से नाता कैसे जुड़ा?

यादों की हार्डडिस्‍क का डेटा बताता है कि उस वक्‍त चक (छोटे गांव) में अखबार नहीं आते थे. गांव की तेज हवाएं, आंधियां कुछ फटे पुराने कागज ले आती थीं जो ढलती दुपहरी में चुग चुग कर पढते थे. खबरों में अगर क्रिकेट का समाचार मिल जाता तो क्‍या बात, कई बार पढा जाता. अपने से बड़े दोस्‍तों की कापियों पर चढी अखबारों की जिल्‍द को खोल खोलकर समाचार पढते और इसको लेकर कई बार लड़ाई हुई, पन्‍ने फटे.

गांव के दूसरे बास (मोहल्‍ले) में दोस्‍त के पास रेडियो होता था और वह बाहर गली में सोता तो सुबह ढाई तीन बजे जाकर कमेंट्री सुनते. उसमें भी उन पांच मिनट का इंतजार रहता जब हिंदी के कमेंटेटर की बारी होती. अंग्रेजी में फोर, सिक्‍स आउट के सिवा कुछ पल्‍ले नहीं पड़ता. समझ में पहली बार टीवी पर क्रिकेट देखा तो शायद दढियल चेतन शर्मा बेटिंग कर रहे थे. वर्ल्‍ड कप के समय किराये पर टीवी लाकर उद्घाटन समारोह देखे. गांव में पहला बैट लाये, सरसों के खेतों में क्रिकेट खेला और हमारे साथ साथ वह बैट और यह क्रिकेट कई गांवों में गया. बसा. फला- फूला. साल 2003 में जब दिल्‍ली आए तो हास्‍टल में केबल नहीं थी, पीछे से जाती केबल पर कुंडी डालकर जुगाड़ किया और मैच देखे. भारत-आस्‍ट्रेलिया के वे मैच देखे जिन्‍होंने टेस्‍ट क्रिकेट को नई दिशा दी. राहुल के साथ अपने रिश्‍ते का शायद यही बड़ा व मील का पत्‍थर था.

तो, बीते दसेक साल में क्रिकेट,क्रिकेटरों को बहुत करीब से देखा. इस दौरान जहां क्रिकेट से मोहभंग होता गया, द्रविड़ से लगाव बढ़ता गया. शायद द्रविड़ ही वह आखिरी डोर थी जिसने हम जैसे लोगों को क्रिकेट विशेषकर टेस्‍ट क्रिकेट से बांधे रखा. यह यूं ही नहीं कि उसकी बैटिंग देखने के लिए रातों को जागे हैं, दोस्‍तों को जगाया था. राहुल रन दर रन बनाता गया. यह अजीब ता नहीं कि राहुल अपन को कभी भी सचिन, लारा की तरह महान् नहीं लगा? अगर वह फंसे हुए मैच में शतक लगा देता तो भी, या शतक पूरा करने के पांच रनों के लिए 20-25 गेंद खेलकर पकाता तो भी. कई बार तो खुद ही सवाल उठाते कि यह सन्‍यास क्‍यूं नहीं ले लेता और अगले ही दिन वह (न्‍यूजीलैंड के खिलाफ) 21 गेंदों में 50 रन ठोक देता या आस्‍ट्रेलिया के खिलाफ 233 रन बनाकर पासा पलटने का मादा रखता. यही निकलता- अरे, द्रविड़ है ना! हमने उसे हमेशा फोर ग्रांटेट लिया. और खिलाड़ी जहां एक एक रन से हीरो हो गए, द्रविड़ शतक ठोककर भी हमारे जश्‍न का कारण नहीं बन पाया. सचिन व लारा जैसे बल्‍लेबाजों के लिए महान् होना प्रारब्‍ध था. वे उसी के लिए बने थे लेकिन द्रविड़ ने अपना भाग्‍य, अपना मुकद्दर खुद लिखा. ऐसे समय में जब अखबारों में सचिन, सौरव और बाद में धोनी जैसे क्रिकेटरों के स्‍तुतिगान छपने लगे द्रविड़ की खबरों को चुन चुन के पढ़ा. यह जानने का प्रयास किया कि क्रिकेट का यह आखिरी छात्र, आधुनिक क्रिकेट का यह संभवत: आखिरी क्‍लासिक बल्‍लेबाज इस खेल को कैसे देखता है. उसकी सोच क्‍या है.

क्रिकेट के कारण तो बहुत से क्रिकेटरों पर नाज किया जा सकता है लेकिन राहुल द्रविड़ ऐसे खिलाड़ी हैं जिन पर खुद क्रिकेट नाज करता है.

द्रविड़, टेस्‍ट क्रिकेट का वह बेटा रहा जिसने कभी कोई मांग नहीं की. जो मिला उसी में खुश होता गया. वह हमारे दौर या पूरे इतिहास में टेस्‍ट क्रिकेट का सबसे होनहार, मेहनती व अनडिमांडिंग बेटा रहा है.एकदिवसीय मैचों में उसकी काबिलियत देखने के लिए हमारे पास 1999 के विश्‍व कप की पारियां है. टेस्‍ट क्रिकेट में उसकी क्‍लासिक पारियां कोलकाता (180,2001), जार्ज टाउन (144,2002), लीड्स (148,2002), एडीलेड (233,2003) व रावलपिंडी (270,2004) तक बिखरी पड़ी हैं. ये मैदान भी आज इन पारियों की सोच सोच कर आनंदित होते होंगे. खेल के मूल रूप टेस्‍ट में द्रविड़ ने कई यादगार, श्रेष्‍ठ पारियां दीं हैं तो भारतीय क्रिकेट पर किसी क्रिकेटर का अब तक सबसे अच्‍छा व्‍याख्‍यान भी उसका ही है जो दिसंबर 2011 में उसने कैनबरा में दिया. यह भारतीय इतिहास, क्रिकेट पर उसकी जानकारी, गहराई को बताता है.

उसके बाद विशेषकर भारत में टेस्‍ट पर नाज करने या उसके लिए मेहनत करने वाले कितने रह जाएंगे? हमारे कप्‍तान धोनी तो टेस्‍ट खेलना ही नहीं चाहते. बाकी बच्‍चे लोगों को न तो टेस्‍ट की समझ है और न ही उनका टेस्‍ट वैसा है. वह उस पीढी से हैं टेस्‍ट के लिए मैदान पर पसीना बहाने के बजाय टी-20 से कमाई करने में ज्‍यादा विश्‍वास रखती है. ऐसे में राहुल के जाने से टेस्‍ट कितना अकेला हो जाएगा यह सोचते हुए ही गला भर आता है. राहुल तुम जा रहे हो तो हम टेस्‍ट में रहकर क्‍या करेंगे. यह टेस्‍ट (क्रिकेट) यहां रहकर क्‍या करेगा? तुम्‍हारे साथ हमारा क्रिकेट भी सन्‍यास लेता है! 
……

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Responses

  1. पृथ्वी भाई, क्या लिखा है आपने। भई कायल हो गए हम आपके।
    अजीव बात है, सबसे ज्यादा नफरत भी इसी क्रिकेट खेल से है लेकिन सबसे ज्यादा प्यार भी एक क्रिकेटर राहल द्रविड़ ही से है। जब सारे धुरंधर अपना बोरिया-बिस्तर बाँध निकल लेते थे तो राहुल ही भारतीय क्रिकेट को शर्मशार होने से हर बार बचाते रहे है। बड़े-बड़े नामों के बीच उन्होंने अपना जो मुकाम बनाया और जो सम्मान हासिल किया उससे हर कोई ईर्ष्या कर सकता है। वे एकमात्र ऐसे खिलाड़ी थे जिन्हें आउट करना आधा जीत होती थी क्योंकि टैस्ट में उनका विकेट पर खड़ा रहना ही विपक्षी टीम के छक्के छुड़ाने के लिए काफी होता था। राहुल क्रीज पर हो तो चाहे जो हो पर आप हार नहीं सकते। उन्होंने कई बार तो अप्रत्याशित जीतें क्रिकेट को दी है। लेकिन उससे भी ज्यादा उन्होंने अच्छा क्रिकेट दुनिया को दी। तकनीकी रूप से इतना समृद्ध खिलाड़ी दुनिया में शायद ही कोई ओर हो।
    जब से क्रिकेट को समझना शुरू किया है तब से टेस्ट मैच सिर्फ और सिर्फ राहुल द्रविड़ के लिए ही देखे। मेरे अधिकांश दोस्त हंसते थे जब राहुल के आउट होने पर मैं भी वहाँ से निकल लेता था। राहुल द्वविड़ के प्रभाव से विकेटकीपिंग भी शुरू की औरओपनिंग भी। बाद में इस खेल को ही अलविदा कह दिया पर राहुल द्रविड़ को फिर भी चोरी-छिपे देख दिया करता था। वनडे से राहुल के देश निकाले पर मैं बहुत रोया भी। वो क्रिकेट के एकमात्र खिलाड़ी है जिनके खेल ने आँखे नम कर दी। धैर्य, संयम और साहस क्या होता है, राहुल का खेल इसका जीवंत प्रमाण है। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 148 रन की पारी मुझे उनके जीवन की ही नहीं क्रिकेट इतिहास की सबसे नायाब पारी लगती है। जहाँ हमारे सारे कागजी शेऱ मैदान पर ढेर हो गए थे। बस, टिके रहे तो सिर्फ राहुल। उसी श्रृंखला के बाद की वनडे श्रृंखला में एलन डोनाल्ड की गेंद पर उनका छक्का जड़ना और डोनाल्ड की गाली-गलौच वाली आक्रामक मुद्रा के बावजूद शांत बने रहना आज भी दिल को बहुत सुकूंन देता है। जब भी कुछ अजीबोगरीब हादसा होता उनका बवाब उनके बल्ले से आता। वैसे खुश हूँ कि अब ऐसा कोई नहीं जो हमें क्रिकेट देखने के लिए मजबूर कर सके। अब क्रिकेट न भी देखा जाए तो भी गम नहीं(हो सकता है लक्ष्मण कभी उसे देखने के लिए आमंत्रित करें पर अब वो भी ऐसा कर पाएंगे, इसकी दूर-दूर तक मुझे कोई आशा नहीं दिखाई पड़ती)।

  2. Laajwab hai bhai…

  3. The technique of Dravid was well organised and his mind just as compose…..By Christopher Martin-Jenkins in his report in the telegraph on Rahul’s test debut innings. One of the greatest ever cricketer and a true gentleman . We all missed him.

  4. सर गला भर आया…
    मेरा क्रिकेट भी अब सन्‍यास लेता है राहुल!
    शायद ढेर सारे लोग भी इसके साथ सन्यास ले लें क्रिकेट से…

  5. Dear,Bahut achchha likha h. Darvid par. Vashtav m Mahan cricket player rahe h, Darvid….
    Wah. rajesh jangir, SriGangaNagar

  6. Vah Pukhraj ji aaapne bhi bahut achchhha likha h. thanks!
    -rajesh jangir

  7. Bhaiya bahut hi khubsurat likhai hai aapki!!!!

  8. sir aapne to etna sar garbhit lekh likha ki har bar padne ka man karta hai.

  9. 2012 ka post aaj padha ye 2017 mai… dravid ka kitna bda fan rha hu.. ishi baat se andaaza lga lo… ki jaha dravid ka naam dikhr.. ek baari jarur padhunga 🙂 jaha bhi dravid ke baare mai achha achha padhta hu..na jaan kyu garv mehsoos hota hai.. na mera wo koi rishta hai ussey fir bhi na jaane kyu.. uski tareefe sun ke mujhe bdi khushi milti hai aaj bhi. Jab mai 8 saal ka tha tab radio pe baith ke 233 run waali paari suni thi.. uss waqt BSNL shayad sponser hua krta tha commentary ka… “yd lga bsnl chawka” aaj bhi yaad hai wo din.

    Saalo ho gye dravid ko sanyaas liye…. aaj bhi wahi sneh aur lagaaw hai iss khilaadi ke liye.

  10. ji sa, bilkul jordar/lajbav insaan aur khiladi hain rahul drarvid.


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