Posted by: prithvi | 16/10/2011

काती, जो घर आया है

रेल भवन और दूर नार्थ ब्‍लॉक के बीच से वह एक बार फिर ओझल हुआ, कभी धूसर पीला तो फिर लाल पीला होता हुआ. उसे लेने के लिए बादळी-बच्‍चों की कोई टोली वहां नहीं थी, शायद इसी कारण उसका मुंह ज्‍यादा फूला था. वह मेरा दिन था जो धीरे धीरे मेरी आंखों की धरती से उतर गया और शाम मेरी ओर मुहं बाये खड़े मिली. गलत समय, गलत दरवाजे पर दस्‍तक दे चुके कूरियर वाले की तरह. दिन से बहस ही इसी बात की थी कि मुझे ये उकताई शाम मत दिया करो. ऐसा नहीं हो सकता कि दिन के बाद सीधे रात हो या बीच में कुछ ऐसा हो जो महानगर की इस थकी-मुरझाई शाम जैसा न हो. वह इन अगड़म बगड़म बातों से, मेरे दूसरे दोस्‍तों की तरह अकबकाया और उठकर चल दिया.

हम रेल भवन मेट्रो स्‍टेशन की छोटी भींत पर पाळथी मार कर बैठे थे. गेट नंबर तीन के सामने. मैं, मेरा दिन और आसोज. आसोज जिसे आप लोग अश्विन कहते हैं. आसोज को विदा करने के लिए काती (कार्तिक) आने वाला था. आसोज मेरे प्‍यारे दोस्‍त महीनों में इसलिए है कि उसके झोले में कुछ मनमौजी त्‍योहारों, लंबी रातों, नरम रजाइयों, खनकते खेतों, महकती फसलों, के खत होते हैं. उसे काती की बस का नंबर पता नहीं था और मुझे आज बस का इंतजार नहीं था. ऑटो पकड़ने की शहरी हड़बड़ी भी नहीं, ऐसा कभी कभार होता है कि आप सफर पर निकलें और कहीं पहुंचने की जल्‍दी न हो. ऐसा सफर बहुत बार मजेदार रहता है. हम तीनों भी सामने से गुजरती लाल, हरी लो फ्लोर बसों को देखते रहे. नीचे स्‍टेशन पर हर मेट्रो के साथ, हवा भी ठंडक को बदन से लपेटे भागती से चली आती. ठंडी हवा का झोंका, कुछ अच्‍छी सी खुश्‍बुओं के साथ और हम तीनों मुस्‍कुरा पड़ते. कि हवाओं की इन टोलियों का क्‍या इंडिया गेट घूमने की बेचैनी है?  

तो, जब दिन हमारी आंखो की क्षितिज से उतर गया तो चांद उचक उचक कर देखने लगा. उसे शायद हैरानी हुई कि आसोज मेरे साथ अब भी बैठा. गन्‍ने के खेतों में परवान चढी मीठी मुहब्‍बतों का साक्षी यह चांद जानता है कि धान के खेत बालियों का शृंगार करने लगे हैं और कपास तेरे, मेरे अरमानों की तरह खिलने लगी है. शफ्फाक सफेद… कि अचानक आसोज ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और चलने का इशारा किया. देखा, काती सामने से क्षितिज से उतर रहा है जहां से आसोज को उतर जाना है. काती ने हम दोनों को देख लिया और मुस्‍कुरा दिया. उसके पास आने वाले दिनों लिए कुछ कंबल और रात के नरम पैरों के लिए मौजे, मेरे लिए गजक की बातें, गुड़ का जिक्र जैसा बहुत कुछ रहता है. उसे पता है ये मेरी कमजोरी है. इसलिए देखते ही मुस्‍कुरा पड़ता है. उसका बैग भारी था, हम सामने ही चल पड़ते हैं. आसोज की कोरों से नमी को आपकी फसलों पर छिड़क दिया, सुबह देखिएगा ओस बनी मिलेगी.

बताते हैं कि चांद पर बूढी दादी इन दिनों सूत नहीं कातती, ऊन के स्‍वेटर बुनती है. चेहरे जो दिन में चमक रहे थे जाते आसोज-काती की इस रात में धुंधले होने लगे थे. तुम्‍हारी गोरी हथेली में रखे 17 रुपये की कसम, वहां से मेरे घर तक का किराया तो दस रुपये ही है.  (Painting: Ephraim Mojalefa Ngatane. Township Children)

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Responses

  1. prithvi ji aapki post padhte samay kahin bhi rukna gustakhi hai, miyan aap to baandh dete hain. kahan se laate hain itne bimb? badhai

  2. पृथ्वी जी, यहाँ लोकजीवन का एक अजब सम्मोहन है. रुतों के लिबास और मन का आँगन खिला खिला सा रहता है. इस घर से कोई खाली हाथ नहीं जाता है. कांकड मेरा प्रिय ब्लॉग है.


कुछ तो कहिए..

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