Posted by: prithvi | 16/09/2011

चाय के मग में बदतमीज बारिश

आसोज (आश्विन) महीने के शुरुआती दिन हैं. अदरक, लौंग, इलायची वाली चाय के बड़े मग के साथ मैं तीसरे माले की बालकनी में बैठा हूं. आसपास के घरों की दीवारों पर सावनी बारिश के कदमों के निशां बाकी हैं. नरमी या हरी काई के रूप में. कई साल बाद इस बार गांव में खूब मेह हुआ है. उम्‍मीदों के बचे खुचे बीजों से कुछ मुट्ठी दाने फिर निकाल लिए गए हैं. कितनी बड़ी शै है उम्‍मीद और थार में रहकर नाउम्‍मीदा तो हुआ ही नहीं जा सकता. अकाल दर अकाल झेलते हुए आकड़े की हरी डोडियों से सुकाल के संकेत पढ़ना और फसल के सबसे अच्‍छे दानों को बीज के रूप में सहेजे रखना. अगले कुछ साल की की उम्‍मीदों की फसल बोने के लिए.. ये दाने बीज रूप में जमीन, भोजन रूप में कमाऊ पूत के अलावा किसको मिलते हैं?

खैर, महानगर का दिन अभी शुरू होना है. बीते हफ्ते की बारिश में जो शहर चैनलों पर डूबते-डूबते बचा था, वह उमस से बेहाल है. हवाओं की दसों रानियां कोपभवन चली गई हैं तो बारिशों के देवता का रथ देश के किन्‍हीं और जंगलों में भटक गया है. बादलों के कुछ सिरफिरे टुकड़े, जुड़ जुड़कर उम्‍मीदों का कैनवास रचते हैं पर कुछ ही मिनटों में मामला आया-गया हो जाता है. इसी उमस से खीझकर उसने कहा, ‘बदतमीज बारिश, ढंग से बरस भी नहीं सकती’.

बदतमीज बारिश.. अपनी प्‍यारी बारिश के लिए यह नयी उपमा थी. कप की डंडी से गरमी अंगुलियों तक पहुंचने लगी तो चाय फिर मुख्‍य मुद्दा हो गई. इलायची की खूश्‍बू पीना, अदरक के स्‍वाद को महसूस करना और फिर उस चाय को अपने शरीर में कहीं विलीन होते हुए महसूस करना. किसी की मुहब्‍बत में डूबने या नफरत करने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता!

डूबकर मुहब्‍बत किए बिना, जमकर नफरत नहीं की जा सकती. मुहब्‍बत के बिना न तो क्रांति संभव है और न ही युद्ध. हमारी क्रांतियों का इतिहास इस बात इसका गवाह है कि क्रांतिकारियों की नसों में बहने वाले रक्‍त में प्रेम कणिकाओं की मात्रा अधिक ही थी. जो लोग क्रांतियों की मशाल थामे, युद्ध मैदानों में खेत रहे.. उनकी आंखों ने पकी फसलों से लहलाते खेतों, प्रेमिका के प्रेम पगे भात, बच्‍चों की निर्भय किलकारियों के .. यानी प्रेम के सपने देखे. प्रेम के गीत लिखे. प्रेम को जिया. यह सब सोचते हुए रिडले स्‍काट की ‘ग्‍लेडियटर’ की शुरुआत याद आ जाती है जब रोमन साम्राज्‍य का एक महान योद्धा मेक्सिमस अपने जीवन की बड़ी जंग से ठीक पहले गेहूं की लहलहाती बालियों को निहार रहा होता है. उसकी अंगुलियों की पोर मानों बालियों को छूकर उन्‍हें आने वाले प्‍यार भरे मौसमों आश्‍वासन देती हैं. अंगुलियों पर गिने जाने लायक फिल्‍मों को इतनी अद्भुत शुरुआत मिली है.

फिलहाल तो ‘बदतमीज बारिश’ मेरे चाय के मग में है और उसे सिप किया जा रहा है.

(photo-जेएनयू.. पार्थसारथी रॉक से उतरती रात, एक खराब लैंस वाले कैमरे से)

Advertisements

Responses

  1. बहुत बढ़िया लगा ….कौनसी विधा कहा जाए …शायद कोई नई विधा !!!!

  2. bahut khoob.

  3. shreshth koti ka gadya…adbhut bhav-vyanjana..badhai..

  4. ..मुहब्‍बत किए बिना, जमकर नफरत नहीं की जा सकती. मुहब्‍बत के बिना न तो क्रांति संभव है और न ही युद्ध….क्या बात है .श्रीमान आपकापूरा पोस्ट लिखा बहुत अच्छा लगा .आभार


कुछ तो कहिए..

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

श्रेणी

%d bloggers like this: