Posted by: prithvi | 04/08/2011

मैं हवा हूं कहां वतन मेरा


उत्‍तर भारत में सावण अबकी बार फिर अच्‍छा नहीं बरस रहा. इसी कारण कालीबंगा के करीब से बहती घग्‍घर के आसपास की जमीनों को ट्यूबवैल के पानी जरूरत है तो लूणकरणसर में सावणी आंधियां रास्‍ता रोकती हैं. थार के उत्‍तर पश्चिमी हिस्‍से के दिन सावण जैसे सुहाने बिल्‍कुल नहीं तो जोधपुर-बाड़मेर से आने वाले मेह के समाचार सूखे रुखे से हैं. अपनी सावणी (खरीफ) फसलों की उम्‍मीदें आंखों में लिए इक जमाने की दुपहरियां, उदास सी बातों में बिना काम कट रही हैं.

ऐसे ही निराश करने वाले समय में सपनों, प्रतिबद्धताओं की बातें विचलित करती हैं और अनेक बीते सावण दिल के दरवाजे की सांकळ बजाने लगते हैं. याद है कि सरकारी नौकरी छोड़कर दूसरों की जमीन पर अपनी जिद की खेतीबाड़ी करने निकले बाबा ने हमारे छोटे से परिवार को ढाणी से बेघर और फिर दर बदर कर दिया. हर साल खेत के साथ मकान भी बदल जाते और मा की हमेशा शिकायत रहती कि वह कब तक दूसरों के मकानों को लीपती पोतती रहेगी. खैर वह दौर था जब आपसी रिश्‍तों में बाज़ार इतना नहीं घुसा था और लोग खाली पड़े मकान को बिना किराये ही रहने के लिए दे दिया करते थे. अपने बचपन का एक बड़ा हिस्‍सा इस तरह के मकानों में गुजरा और कभी मकान मालिक जैसे प्राणी से वास्‍ता नहीं पड़ा. तो मा की उसी पीड़ा से हम भाइयों ने पहला बड़ा साझा सपना बड़े घर का देखा. और जब 2000 के आसपास सीमा क्षेत्र के खेतों से बेदखल कर दिए गए हमारे परिवार ने अपने पहले घर में कदम रखा तो अपन गांव से बहुत दूर निकल आए थे. अपने घर और उससे भी बड़े सपनों को अपनी पीठ पर लादे हुए.

इधर के दसेक साल राष्‍ट्रीय राजधानी में बिताने के बाद लगता है कि ‘अपनों’ के कतिपय सपनों को पूरा करने की जिद में घर छोड़ने वाली तो एक भरी पूरी पीढी है जो पेट काटकर उम्‍मीदों के चिराग जलाये रखती है. और उसके पीठ पर लदे सपनों के कर्ज की किस्‍तें फ्लोटिंग रेट वाले लोन की भांति ब्‍याज दरों के साथ साथ बढ़ती जाती हैं. उसके इन सपनों पर बिल्‍डरों, बिचौलियों ने इन दिनों अपने घर भरे हैं, खुद के सपनों को जमीनी धरातल पर साकार किया है. मीडिया तथा लोकतंत्र के अन्‍य खंभों के जिन भाई बंधुओं, मित्रों पर बचाने का जिम्‍मा था वे अपने घर बनाने के चक्‍कर में निपट गए. ये मित्र, बिल्‍डर बिचौलिए किसी एक क्षेत्र या धंधे से जुड़े नहीं हैं, इन्‍हें तो हर कहीं देखा जा सकता है. इन बिचौलियों ने हमारी ही जमीन और हस्‍ती की कीमत इतनी ऊंची कर दी है कि न तो हम बिक पाए हैं और न ही खरीददार हो पा रहे हैं. ऐसे दौर में हमारे जैसी इस पीढ़ी से समाज, समय, रिश्‍ते नातों के लिए किसी प्रतिबद्धता की उम्‍मीद करना उतनी ही बेमानी है जितनी अपने सुनार मित्र से शत प्रतिशत शुद्ध सोने की उम्‍मीद करना. क्‍योंकि वह उसके धंधे के उसूलों के खिलाफ होगा और यह हमारे सपनों के.

इन उदास, उमस भरी रातों में मुझे ‘मिलियन डालर बेबी’ की मार्गरेट फित्‍जगेराल्‍ड बहुत याद आती है. अपनों के सपनों को पूरा करने की जिद में एक रेस्‍त्रां में काम करती, लोगों के छोड़े हुए पित्‍जा, पेटीज से पेट भरती मार्गरेट बाक्सिंग के अखाड़े में उतरती है और निराशाओं की दीवारों पर इतने घूंसे बरसाती है कि शोहरत बरसती है. लेकिन एक बेइमान, बदतमीज घूंसा उसके करियर और जीवन का अंतिम प्रहसन लिख देता है. आसपास के कई युवक युवतियों के चेहरों, हाव भाव, क्रिया कलाप में मार्गरेट फित्‍जगेराल्‍ड दिखती है और मैं करवट बदलते बिस्‍तर से उठकर बालकनी में आ जाता हूं. मेरे पास इस पीढ़ी के लिए कोई सुझाव राय नहीं है, मैं तो बस उसके लिए प्रार्थना कर सकता हूं. लेकिन यह भी तय है कि सुबह जब इसी किराए की बालकनी में बैठकर बड़े मग में चाय पी रहा होउंगा तो निराशाओं के ये घनेरे बादल नहीं होंगे.

यह सारी बात जिस ग़ज़ल को सुनते हुए निकली उसे अपने हुसैन बंधुओं ने गाया है.

‘अब कहां हूं कहां नहीं हूं मैं, जिस जगह हूं वहां नहीं हूं मैं.. कौन आवाज दे रहा है मुझे, कोई कहदे यहां नहीं हूं मैं’

सुनिए तो.. 7S7-12LIPTs   

(इधर की लेखकीय प्रतिबद्धताओं पर गंभीर टिप्‍पणी किशोर चौधरी ने अपने ब्‍लाग हथकढ में की है; इसे यहां पढा जा सकता है.)

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Responses

  1. ‘ek ghar banane men khud se beghar hua jata hun..’.
    prithvi ji…ek aur badhiya post ke liye badhai…

  2. बहुत खूब पृथ्वी जी… आपका अंदाज निराला है..


कुछ तो कहिए..

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