Posted by: prithvi | 16/07/2011

हमारे हिस्‍से की ईमानदार रातें!

रात में शहर का हर मोड़ इक कहानी कहता है, हर रेडलाईट के पास एकाध किस्‍सा होता है तो बसस्‍टेंड भी कुछ न कुछ एक्‍सक्‍लूजिव लेकर बैठा रहता है कि कोई आये, सुने.

छोटा था तो मा डांटती कि जेठ महीने की किसी तपती दुपहरी में पैदा हुआ इसलिए दिन भर धोरों/ खेतों में भटकता रहता हूं, बावळों की तरह. आंधियों के पीछे, लू का हाथ थामे. तब मा को कभी नहीं कहा कि दिनों से ज्‍यादा प्‍यार तो मुझे रातों से है और जेठ आषाढ, आसोज काती की बहुत सी रातों की नींद चांदनी के साथ मुस्‍कुराते, मंदाकिनी से बतियाते खर्च की है. क्‍या रातें थीं कि चमकती बालू से लिपटे पड़े रहते थे और वादा करते कि बचपन की इस मुहब्‍बत को छोड़कर कहीं ना जाएंगे. उसी बालू से पहले सपने की बात की, उसी बालू की नरम हथेली पर अपनी पहली मुहब्‍बत का नाम लिखा. जब दुखी हुए तो उसी ने आंसुओं को समेटा और जब खुश हुए तो उसी बालू पर दीवानों की तरह दौड़े थे. वे रातें थीं जब कई दिन की भूख के बाद चौधरी के ढाबे की पिन्‍नी (आटे के लड्डू) चाय के साथ खाते हुए नेशनल हाइवे 15 पर चमकती हुई रोशनी को निहारा करते थे. और खुद से ही वादा करते थे कि हारेंगे नहीं, रोएंगे नहीं. वही रातें जब लोहे की दुकान पर काम करके थक गयी उम्‍मीदों को रामकुमार सूखी पाकी रोटी और हरी मिर्च के साथ नये सिरे से खड़ा कर देता… कई बार लगता है कि अपने पास दिनों से ज्‍यादा कहानियां तो रातों की हैं. और इन दिनों जब दफ्तर से निकलता हूं तो संसद भवन के ऊपर खुले आसमान से चांद सीधा नज़र आता है तो मां की बातें और पुरानी रातें याद आते ही मुस्‍कुरा पड़ता हूं, चांदनी के साथ.

तो रातों से अपनी पुरानी मुहब्‍बत है और रातें, दिनों से कहीं अधिक ईमानदार, बेबाक होती हैं. वे दिनों की तरह ढकती छुपाती बल्कि सब उघाड़ कर रख देती हैं. बड़ी बेशर्मी से. दिन जितने औपचारिक होते हैं, रातें उतनी ही अनौपचारिक, अपनी सी. बातें शेयर करने वाली. दिन कुछ बातें बड़े सलीके से छुपा जाता है रात उसे यूं ही बता देती है दोस्‍त की तरह ताली मारते हुए. इसलिए अगर किसी शहर को जानना है तो उसे रात में भी देखना चाहिए, किसी इंसान की फितरत समझनी है तो उसके साथ रा‍त बितानी चाहिए क्‍योंकि रातों की दुनिया, दिनों से अलग होती, बहुत अलग.

दिल्‍ली की रातों में बोट क्‍लब के कई खूबसूरत नजारों को अपन ने इन्‍हीं दिनों जिया तो राजपथ ने कई राज साझे किए. जामुन के पेड़ों ने बहुत से नये स्‍वादों से परिचित कराया तो अशोक से कई नयी खुश्‍बूओं के बारे में जाना. इसी खूबसूरती को जीने के लिए मेरी रातें इन दिनों भटकती हैं. 460 बस पकड़ती हैं और लगभग पूरी दक्षिणी दिल्‍ली का चक्‍कर लगाती हैं. यह अपना रूट नहीं है. लेकिन जब कहीं पहुंचने की जल्‍दी ना हो तो सफर का अपना ही मजा है. ऐसे में कनॉट पैलेस से लेकर सुखदेव विहार तक रात ढेरों बातें करती हैं और अनेक राज खोलती है. गुलाम अली ने बहुत सुंदर ग़ज़ल गाई है.. हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरहां, सिर्फ इक बार मुलाकात का मौका दे दे. मोबाइल में मेडोना के गानों के बीच से उसे ढूंढता हूं और प्‍ले कर देता हूं.

इन्‍हीं दिनों जाना कि दिल्‍ली शहर की रातें, दिनों से ज्‍यादा जागती हैं. दिन जब अपने घोड़ों को बेचकर सोता है तो रात अपनी मंडी लगा देती हैं. कालसेंटरों के पैसों पर धनवान होती पीढ़ी शापिंग माल्‍स और डिस्‍क में थकावट उतारने, इंज्‍वाय करने आती है और साऊथ, एम्बियांस मॉल जैसे इलाकों में बाज़ार ठाठें मारता है. हम गर्व कर सकते हैं कि एक ऐसा इंडिया इधर के वर्षों में बना है. ऐसी पीढी की रातें बहुत हसीं और जवां होती है. रंगबिरंगी होती है और इसकी कुछ गाडि़यां रात में इंडिया गेट जैसे बहुत से इलाकों में खड़ी दिखती हैं. कहते हैं कि दिल्‍ली ऐसा शहर है जहां लड़कियों से बहुत खूबसूरत लड़के और लड़कों से कहीं मजबूत लड़कियां टकरा जाती हैं. इसलिए बहुत सावधान रहो. अपने कई मित्रों के ऐसे अनेक किस्‍से हैं. तो रात में रोशनी में यह जो दिल्‍ली ऐसी मंडी लगती है जहां हिजड़ों, वेश्‍याओं, दलालों का बोलबाला है और जिसकी सड़कों पर ‘भूख’ तैरती है. दिल्‍ली का इतिहास ऐसे लोगों से भरा पड़ा है. सच में, इन दिनों चल रहा एक जुमला याद आता है ‘जिसको मौका नहीं मिला वो ईमानदार है.’ कुमार भाई इससे सहमत नहीं है और हम भी नहीं. क्‍योंकि यह कहकर इस देश की सवा अरब से अधिक आबादी के चरित्र पे सवालिया निशान लगाने का हक हमें किसी ने नहीं दिया. जिंदगी ने आपको, उनको, बहुत सों को ऐसे मौके दिए कि वे राजपथ पर चल सकते थे लेकिन उन्‍होंने अपने दिल को सुकूं देने वाली पगडंडियों को चुना. ऐसे कई उदाहरण है जो बेईमान होते दिनों में हौसले को डिगने नहीं देते और रातें, दिनों से कहीं अधिक सच्‍ची, अच्‍छी लगती हैं. 

क्‍या यह अच्‍छा नहीं है कि आश्रम चौक पर रात की पारी में किताबें, पत्रिकाएं बेचने वाले किशोर भी अच्‍छी कमाई कर लेते हैं. इक बात कहूं-  

दिन धुंध, धूल, गर्द के जालों में कैद है्. 

इस शहर की हर रात उजालों में कैद है.  

(शे’र रमेश सिद्धार्थ, फोटो साभार आरके नैण)

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Responses

  1. Prithvi…I am a fan of ur writings…splly the language and the similies u use…Keep it up .

  2. बहुत खूब …क्या लिखा है…
    पृथ्वी जी..आपके गद्य में ग़ज़ब की काव्यात्मकता है..
    ज़रूर कविताएँ लिखते होंगे..
    अगर नहीं तो लिखें..ज़ोरदार होंगी..

  3. क्या सर कहाँ कहाँ के किस्से ले आते हैं…यादों के इडियट बॉक्स से…सच में बहुत खूब लिखते हैं….दीवाना बना लिया है….आपने मुझे तो ….
    ख़ैर दिल्ली कि सड़कें जहां एक तरफ वैभव फर्राटे भरता है वही भूख भी घिसट घिसट कर अपना सफ़र तयं करती है…

  4. ऐसे कई उदाहरण है जो बेईमान होते दिनों में हौसले को डिगने नहीं देते और रातें, दिनों से कहीं अधिक सच्‍ची, अच्‍छी लगती हैं…

    बेहतर…

  5. वाह सा ,
    जय हो आपरी !
    आप भी ज़बर लिखो हो !
    सो कीं उथळ-पुथळ हो जावै आपरी कलम आगै !
    सै’र री संवेदना नै अंवेरतो आपरो ओ रिपोर्ताज ज़बर है !

  6. prithvi bhai jann bahut dinon baad aapki post padhi sachh rat ki baat he kuchh aur hai…. aur aapki abhivyakti laajawab……

  7. bahoot sunder dehli jaise sahar kabhi sote nahi..jo chain ganv ki fiza mai hai vo metro citi mai kanha

  8. nice

  9. पृथ्वी जी..बहुत खूब लिखा है…

  10. Dilli ki baat to nahi kar sakta, aapke likhne ke andaaz ki tarif jaroor karunga!!


कुछ तो कहिए..

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