Posted by: prithvi | 05/06/2011

वक्‍त का यह बेस्‍वाद लम्‍हा

वक्‍त का एक लम्‍हा संसद मार्ग पर संसदीय सौंध के सामने खड़ा नीम की पत्तियां चबा रहा था. जेठ का महीने में नीम खारा, और अधिक रुखा सूखा हो जाता है दूसरे रुंखों की तरह. पर वक्‍त के इस लम्‍हे ने नीम की पत्तियों को कुछ यूं चबाया जैसे वह पास ही लाला के दुकान की कचौरियां खा रहा हो. उसे कुछ अजीब लगा तो उसने दीवार पर रखे जग के पानी से कुल्‍ला कर कुछ घूंट पीये. पानी में कैंटीन की चाय जैसा स्‍वाद था और जब उसने पनवाड़ी से मशीनी चाय लेकर पी तो उसमें रस्‍म जैसी खुश्‍बू आ रही थी. कहते हैं कि वक्‍त का लम्‍हा स्‍वाद के इस सारे घालमेल से इतना घबरा गया कि उसने अपने डाक्‍टर मित्र से जांच करवाई और मित्र ने मामले की नजाकत को समझते हुए उसे साइकेट्रिस्‍ट के पास भेज दिया. जिसकी सलाह थी कि वह स्‍वादों के चक्‍कर में पडे़ बिना आराम से रहे, खाये पीये. बताते हैं कि वक्‍त के लम्‍हे का इसके बाद हर अपने स्‍वाद पर से भरोसा उठा गया. उसे लगता है कि जीभ और स्‍वादों ने मिलकर उसे डराने के लिए यह सारा मजाक किया है. वह आजकल अपनी हैसियत की जेब से कुछ खनकते हुए सिक्‍के निकालता है और बाजार से इतालवी पित्‍जा, किसी रंगहीन पेय के साथ खाता है. वक्‍त के इस लम्‍हे को चाय, कचौरी, नीम की कसेली पत्तियों किसी के स्‍वाद पर भी विश्‍वास नहीं रहा. हमने सुना कि यह वक्‍त का लम्‍हा नहीं, हमारे ही किसी दौर की एक पीढ़ी रही जो अपने पीठ-झौलों में उम्‍मीदों, अपेक्षाओं के लैपटाप लादे, महानगरों में उतर आई.

कुछ लोग इसे बेस्‍वाद होता वक्‍त मानते हैं, कई इसे लम्‍हों की खता के रूप में देखते हैं.

बात  यहीं तक रहती तो ठीक थी. लेकिन जब वक्‍त का यही लम्‍हा कल अपने एक रुआंसे दोस्‍त के रूप में बगल में आकर बैठ गया तो डर लगने लगा. इक मां हैं जो घर से आई है. तमाम मसालों और स्‍वादों की पोटली के साथ. कई दिन से दोस्‍त से पूछ रही है- क्‍या खाओगे, बोलो क्‍या खाने का मन है. बस जो चाहे बना लो, के जवाब के साथ मेरा यह दोस्‍त लाला की दुकान पर खड़ा होकर कभी नीम की पत्तियां चबाता है तो कभी चाय में आते सांबर के स्‍वाद से चिड़चिड़ाता है. वह भूल गया कि उसे क्‍या पसंद है. वह अपने जीने का स्‍वाद भूल गया. इसलिए मां के इस यक्ष प्रश्‍न का उसके पास कोई जवाब नहीं कि उसे क्‍या पसंद है. बीते दसेक साल में उसने वही खाया है जो मिला या जो बाज़ार उसे खिलाता गया. उसका स्‍वाद कहां मायने रखता है?

तो अपना दोस्‍त, जो वक्‍त का एक लम्‍हा या एक पीढ़ी की नुमाइंदगी करता है; शुरू शुरू में जो मिला वह खाता गया और फिर उसने वह खाया जो बाज़ार ने उसे दिया. जैसे कि वह पित्‍जा खाता है तो इस गर्व के साथ घूंट के साथ बाइट लेता है कि वह पित्‍जा खा रहा है. बड़े सलीके से. वहां स्‍वाद वाला मामला नहीं होता. उसे इतने पित्‍जे खाने के बाद भी उसका स्‍वाद ठीक ठीक मालूम नहीं है. यह एक पीढी है जो खाने को गर्व के साथ खाती है, स्‍वाद के साथ नहीं. या कि एक पीढी है जो खाने को मजबूरी में खाती है, उसके पास स्‍वाद चुनने का विकल्‍प नहीं होता. हमें तो लगता है कि यह एक बेस्‍वाद होता समय है.

वक्‍त का बेस्‍वाद होता लम्‍हा जब इतना करीब आ गया तो अपन ने भी स्‍वादों की सूची बनानी शुरू की. जैसे कि नानी की सौंफ गुड़ वाली चाय, ताई के हाथ के गुड़ के चावल, बाबा का बनाया साग, भेनी की बनाई कढ़ी और चूल्‍हे की गरम गरम रोटियां. अपने एक चाचा हलवा बहुत अच्‍छा बनाते हैं. हारे (बड़े चूल्‍हे) में सारा दिन गर्माते दूध को रात में ठंडा कर पीना बहुत या जेठ आषाढ में चने की दाल वाले दलिये को दही, लस्‍सी के साथ खाना बहुत पसंद रहा. तो सुबह से शाम तक, बारिश से लेकर गर्मी… हर मौसम के स्‍वादों की सूची बनानी शुरू की तो रिश्‍ते उनमें यूं ही धनिए या देसी घी की तरह महकने लगे. वैसे, पहले पहला स्‍वाद जो याद आता है माटी का है. घुटनों के बल चलते हुए माटी या मिट्टी खाते थे. माटी के ढेले और फिर मां, बुआ की मार-झिड़क और दादी का लाड.. दादी तो दादी होने के बावजूद अपने झौले में चाक (चिकनी माटी) रखती. उस चाक की खुश्‍बू और स्‍वाद फिर याद आने लगा है.

भले ही इस दौर में, इन महानगरों में उतना अच्‍छा स्‍वाद और रिश्‍ते नहीं बचे हों पर यारो चाय को सांबर की खुश्‍बू या हलवे को पित्‍जा के स्‍वाद के साथ तो नहीं खाया जा सकता ना. चलिए अपने अपने स्‍वादों को याद करते हैं और मां के पूछने से पहले ही उसे बताएं कि आज हमारा यह खाने का मन है.

एक दोस्‍त ने कहा है कि आस्‍वादों और विचारों की भिन्‍नता हमारी संस्‍कृति सभ्‍यता की बड़ी खासियत रही है. तो हम अपने स्‍वाद, विचारों और जीवन को इतना बेस्‍वाद कैसे होने दे सकते हैं?

(photo curtsy)

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Responses

  1. सही कहा, जिस जीवन में स्‍वाद न हो, वह जीना भी कोई जीना है।


  2. ” एक दोस्‍त ने कहा है कि आस्‍वादों और विचारों की भिन्‍नता हमारी संस्‍कृति सभ्‍यता की बड़ी खासियत रही है. तो हम अपने स्‍वाद, विचारों और जीवन को इतना बेस्‍वाद कैसे होने दे सकते हैं ” बिलकुल ठीक परिहार सा.

  3. क्या खोल दिया पृथ्वी भाई.. स्वाद से चालू करके कहाँ ले आये..

    सच ज़िंदगी इतनी बेस्वाद भी नहीं होनी चाहिये!!!!

  4. स्वाद और असवाद के बीच की दुरी शायद हमारा और मेरे की बीच की दुरी जीतना ही पुराना है अगर स्वाद के लालच में यह दरी भी मिट जाये तो खाने का मजा अजाए!

  5. bahoot badhiya likha prithvi bhai

  6. आह…

    और क्‍या कहूं…

    ईश्‍वर मुझे बीकानेर छोड़ने नहीं दे रहा सो, रिश्‍तों का स्‍वाद ले रहा हूं। सही कहूं इतना लजीज टुकड़ा बहुत सालों बाद पढ़ा है। कुछ खाने का मन हो गया। रात की सूखी हुई रोटियों को अकरा कर दही में नमक मिर्च डालकर खाने का मन हो रहा है। या शाम के खाने में मोठ मोगर का साग और आमरस बनवाया जाए… बीकानेर में अभी हवाई सेवा शुरू नहीं हुई है। जब होगी तो किसी शाम आपको खाने का न्‍यौता दूंगा 🙂

  7. पृथ्वी जी…आपकी कलम दिनों दिन प्रभावी होती जा रही है..अपनी माटी से जुडी सौंधी यादों को अभिव्यक्त करने का आपका अंदाज़ भी अधिक स्पर्शी होता जा रहा है…बधाई आपको…

  8. क्या बात है !
    नीम की पत्तियों मे वक्त की बयार !
    पल-पल होता आदमी होशियार !
    रिश्तों की महक में लम्हों की मार !
    सब से ऊपर लेकिन मां का प्यार !
    उस से भी ऊपर
    आपकी लेखनी की धार !
    जय हो !

  9. bahut khoob Kankad ji- aapke shabd aur vichar dono mein ek naya swaad hai !

  10. Prithvi G,
    Waqt ka lamha mein aapne jis RASM ka jikr kiya hai in dinon Chennai mein uska swad le raha hoon.
    Kya khoob kaha aapne Yuva phidhi ko swad ka pata hi nahin raha lekin budhi rajniti ka swad bhi aajkal samajh mein aana band ho gaya hai. Kachre aur milawat ke is daur mein SWAD sirf MEDIA ke paas bacha hai swad chahe wo Rajniti ka ho, Khane ke khoji abhiyanon ka ho ya Bhasha ka ho.

  11. kya likha hai aapne. abhi to pahli hee post padhi hai. ab poora blog khangale bina chain nahi aane vala. lekha padhte hue maa ki banai hui kai svadisht vyanjan yaad aate rahe aur svaad man me utarta raha. aapko bahut badhai.

  12. बहुत अच्छा लिखा है


कुछ तो कहिए..

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