Posted by: prithvi | 11/04/2011

मुअनजोदड़ो : एक अनवरत कथा

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जेएनयू में पुस्‍तकालय के पास की किताबों की दुकान में हम देथा (विजयदान जी) का समग्र लेने गये थे. सुखद संयोग कि पुखराज (जांगिड़) को वहां मुअनजोदड़ो भी नज़र आ गई. दो ले लीं. अपने झोले में संवेद की कुछ प्रतियों के अलावा तीन किताबें आईं- विजयदान देथा समग्र, मुअनजोदड़ो और मेरा दागिस्‍तान (दो खंड). घर लौटते समय पहले पहले हाथ मुअनजोदड़ो पर ही गया. मेरा दागिस्‍तान बहुत साल पहले पढ़ चुके हैं और देथा समग्र आराम से समय लेकर पढ़ने वाला मामला है. इससे भी अलग, मुअनजोदड़ो के प्रति अपनी जिज्ञासा कुछ अलग ढंग की रही है. यह किताब जिस सिंधु सभ्‍यता की बात करती है उसकी एक नाड़ अपने घर-गांव से बंधी है. यानी घग्‍घर नदी का वह इलाका जहां कालीबंगा तथा रंगमहल जैसे ऐतिहासिक स्‍थल हैं. मुअनजोदड़ो जिस तरह का नगर है वैसे थेहड़ों, मृदभांडों से अपना बचपन का नाता रहा है. तो किताब शुरू की और पूरी की. कुछ ऐसी ही है यह किताब, गन्‍ने के रस से भरे गिलास सी, जिसे बस एक सांस भर में गटकने में ही आनंद आए. लगभग सवा सौ छोटे पन्‍नों में बिखरा यात्रा वृत्‍तांत जो मानव सभ्‍यता के एक प्राचीनतम नगर मुअनजोदड़ो के अवशेषों की सैर कराता है.

जैसा कि आमुख में मधुकर उपाध्‍याय ने कहा है- मुअनजोदड़ो में नये क़रीने से चीज़ें देखने का सलीक़ा है. सही तो है, वरना मुअनजोदड़ो, में नया क्‍या है. इतिहास के विद्यार्थी हैं तो फटाक से बता सकते हैं कि छह-सात हजार साल पहले एक सभ्‍यता सिंधु नदी के किनारे पली फूली थी. इस सभ्‍यता की खोज और इसके अचानक उजड़ जाने के  अबूझ सवालों से भी वास्‍ता रहा है. यह सामान्‍य ज्ञान का मामला है. ज्‍यादातर बातें और तथ्‍य पुराने हैं, सालों साल पुराने लेकिन उन्‍हें देखने और कहने का सलीक़ा नया है. यही इस किताब की खूबी है.

बाहर की यात्राओं के साथ अंदर के उन अबूझ कोनों तक भी पहुंचा जाता है जहां हम जाने से डरते हैं या बचते रहते हैं. तो इस सप्रायोजन यात्रा में जीवन, इतिहास, ऐतिहासिक दृष्टिकोण, समझ के बारे में जो बातें अनायास ही निकलीं, वही बन पड़ी हैं. चौथी -पांचवीं से लेकर कॉलेज तक जिस मोहनजोदड़ो का हमने पढ़ा, जाना और सोचा वह यहां आकर मुअनजोदड़ो यानी मृतकों का टीला हो गया है. और “मुअनजोदड़ो की खूबी यह है कि इस आदिम शहर की सड़कों और गलियों में आप आज भी घूम-फिर सकते हैं. यहाँ की सभ्यता और संस्कृति का सामान चाहे अजायबघरों की शोभा बढ़ा रहा हो, शहर जहां था, अब भी वहीं है. आप इसकी किसी भी दीवार पर पीठ टिका कर सुस्ता सकते हैं, वह कोई खंडहर क्यों न हो, किसी घर की देहरी पर पाँव रखकर सहसा सहम जा सकते हैं, जैसे भीतर अब भी कोई रहता हो. रसोई की खिड़की पर खड़े होकर उसकी गंध महसूस कर सकते हैं. शहर के किसी सुनसान मार्ग पर कान देकर उस बैलगाड़ी की रुन-झुन भी सुन सकते हैं जिसे आपने पुरातत्व की तस्वीरों में मिट्टी के रंग में देखा है. यह सच है कि किसी आँगन की टूटी-फूटी सीढियाँ अब आपको कहीं ले नहीं जातीं, वे आकाश की तरफ़ जाकर अधूरी ही रह जाती हैं. लेकिन उन अधूरे पायदानों पर खड़े होकर अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर खड़े हैं, वहां से आप इतिहास को नहीं, उसके पार झाँक रहे हैं.”

किताब का लोकार्पण करते हुए कवि कुंवर नारायण ने कहा कि इस पुस्‍तक में यात्रा वृत्तांत की शैली को कई स्‍तरों पर संभाला गया है। भौगोलिक स्‍तर पर, ऐतिहासिक स्‍तर पर, सूचनाओं-जानकारियों के स्‍तर पर। साथ ही यह पुस्‍तक साहित्‍य और इतिहास के बीच एक संवाद भी है। हिंदी की यह पहली किताब है, जिसमें ट्रैवेलॉग को एक ही नैरेटिव में साधा गया है। ये इधर की किताबों में बिल्‍कुल फर्क तरह की किताब है।  ओरहान पामुक ने इसी तरह से डिटेक्टिव टेक्‍नीक को अपने उपन्‍यासों में गंभीर मानवीय संवेदना स्‍टैब्लिश करने के लिए इस्‍तेमाल किया है।

इस किताब को कोई जर्नलिस्‍ट ही लिख सकता है, कोई पत्रकार लिख सकता है। कुछ सूचनाएं उन्‍होंने ऐसी दी हैं, जिन पर ध्‍यान दिया जाना चाहिए। जैसे ये तो सब जानते हैं कि अज्ञेय जी के वे शिष्‍य हैं, उसको कहते हैं, इसको स्‍वीकार करते हैं। मैंने भी काफी पढ़ा उनको इस बीच। खास तौर से जब एक काम सौंपा गया है – लेकिन अभी तक ये नहीं मालूम था – ये तो मालूम था कि कुशीनगर की खुदाई में उनके पिताजी हीरानंद शास्‍त्री रहे हैं सक्रिय – और वहीं कुशीनगर में अज्ञेय जी का जन्‍म भी हुआ – लेकिन इस किताब में पहली बार पता चलता है कि नहीं 1909 में, वो हीरानंद शास्‍त्री ही थे, जिन्‍होंने हड़प्‍पा में खुदाई का पहला जिम्‍मा और बड़ा जिम्‍मा लिया था। ये कहीं रिकॉर्डेड नहीं है, किसी आर्काइव में नहीं है। ये जो आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया है, उसमें भी नहीं है। तो उसकी ओर भी इन्‍होंने विनम्रता से संकेत करते हुए ध्‍यान दिलाया है।– उदयप्रकाश

|मुअनजोदड़ो (लेखक ओम थानवी) को वाणी प्रकाशन ने छापा है. विमोचन कार्यक्रम का ब्‍यौरा मोहल्‍ला पर पर यहां भी पढ़ा जा सकता है.|

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Responses

  1. bahut hee badiyaa prithvi bhai….

  2. bahut achhi post prithvi ji.pustak ke baare me kaafi jaankari de di h aapne..aur vo bhi bhavnatmak dhang se…sunder.

  3. बेहतर…

  4. बेहतरीन समीक्षा…

    इतिहास के साथ एक रिपोर्टर के कोण से ओम थानवीजी की कालीबंगा, तैस्‍सीतोरी, चे ग्‍वेवेरा के गांव में जैसे लेखों की शृंखलाएं पढ़ी हैं।

    मोहनजोदड़ों में भी वही रवानी मिलने की उम्‍मीद कर रहा हूं। बाजार जाकर पता करता हूं, शायद बीकानेर में आ गई होगी।

    पढ़कर फिर बताता हूं कैसी लगी…

  5. अब तो जरूर पढना चाहेंगे….


कुछ तो कहिए..

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