Posted by: prithvi | 21/02/2011

सफेद बालों वाली धूप

धूप इन दिनों अपने बालों में फागुन की मेहंदी लगाकर आसमान की छत पर बैठी रहती है. सहज स्मित के साथ. सफेद होती लटों के बारे में सोचकर मंद मंद मुस्‍कुराते, यादों के गन्‍ने चूसते हुए. यादें, जिनमें आज भी गुड़ की मिठास और धनिए की कुछ महक बाकी है.

यह थार की धूप है; जिसकी यादों में मावठ अब भी हौले-हौले बरसती है. सपने नम- नरम बालू को चूमते हुए उड़ते हैं. हौसले हर दसमी या पून्‍यू (पूर्णिमा) को पांच भजन पूरते हैं. आसमान के चौबारे पर खड़ी फागुन की यह धूप देखती है सरसों की पकती बालियों को, चने के किशोर खेतों को, गेहूं के संदली जिस्‍म को. किसान को, जिसके मेहनती बोसों, आलिंगनों, उच्‍छवासों ने खेतों को नख-शिख इतना सुंदर बना दिया है.

यह सोचते ही धूप खिलखिला पड़ती है और यूं ही मेहंदी के कुछ अनघड़ टुकड़े नीचे गिरते हैं और गेहूं के कई खेत मुस्‍कुराकर धानी हो जाते हैं. माघ-फागुन की धूप कुछ यूं ही, टुकड़ों टुकड़ों में खेतों को पकाती है.

धूप को पता है कि यही मौसम है जब प्रेम और मेहनत की कहानियां परवान चढ़नी हैं. प्रेम खेतों का फसलों से, प्रेम धरा का मेह से, प्रेम हवाओं का खुशबुओं से और मेहनत किसान की. मेहनत की कहानी खेत से शुरू होती है तो फसल, खलिहान और मंडी पर आकर समाप्‍त होती है. या यूं कहे कि नये रूप में शुरू हो जाती है. सपनों की कुछ किताबें झोले में आती हैं, नये जीवन की हल्‍दी हाथों पर रचती है और जीवन यूं ही चलता रहता है ज्‍यूं फागुन की धूप अपने मेहंदी लगे बालों को सुखाती है.

धूप के रेशमी बालों की कालस या घना काला रंग कोहरे, धुंध और बादलों की तरह उड़ता जा रहा है. दूर देस से आये पखेरूओं की तरहां; यही कोमल गेसू आने वाले महीनों में जेठ की आंधियों से उलझे और रुखे हो जाने हैं यह बात धूप को भी पता है पर फिलहाल तो वह जीवन के इस मोड़ का आनंद ले रही है, जब मौसम बहुत नरम, नम और हरा है. सफेद बालों वाली धूप, आजकल अपनी सांसों से लिपट गए मौसमों को जीती है.

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Responses

  1. धूप इन दिनों अपने बालों में फागुन की मेहंदी लगाकर आसमान की छत पर बैठी रहती है. सहज स्मित के साथ. सफेद होती लटों के बारे में सोचकर मंद मंद मुस्‍कुराते, यादों के गन्‍ने चूसते हुए. यादें, जिनमें आज भी गुड़ की मिठास और धनिए की कुछ महक बाकी है..
    ये कहानी सर सिर्फ थार की नहीं है हर जगह लगभग यही महसूस किया जाता है फागुनी मौसम में….शानदार इधर की तिन पोस्टें तो सच में फागुनी फुहारों से भीगी हुई हैं…शानदार सर…

  2. भाई पृथ्वी जी ,
    वन्दे !
    आप के लिखे पर यदि मै मन से कुछ लिखता हूं तो आप कह देते हैं कि अति हो गई !
    अब क्या करूं ? आप लिखते ही इतने कमाल का हैं कि उस पर कुछ लिखे बिना नहीं रहा जाता !
    अप जीवन के बिखरे सुक्षम संवेदन को ऐसे उकेर देते हैं कि पढ़ने वाला दंग रह जाता है ! अब आप ने धूप का जो चित्र खैंचा है उसका कोई सानी नहीं ! शहर ओर गांव की धूप का अंतर साफ़ समझ आता है ! धूप के संवेदन को ले कर गांव और शहर के चित्रो का जो सुक्षम अंतर है उसे भला महानगरीय लेखक क्या समझे ! मुबारक हो ्शहर में गांव की गुनगुनी धूप ! जय हो !

  3. बहुत खूबसूरती से लिखा है आपने-
    धूप इन दिनों अपने बालों में फागुन की मेहंदी लगाकर आसमान की छत पर बैठी रहती है. सहज स्मित के साथ. सफेद होती लटों के बारे में सोचकर मंद मंद मुस्‍कुराते, यादों के गन्‍ने चूसते हुए. यादें, जिनमें आज भी गुड़ की मिठास और धनिए की कुछ महक बाकी है.
    बधाई!

  4. बहुत ही बढ़िया पृथ्वी जी. धूप का pesonification अच्छा लगा.

    मनोज

  5. धूप की आपकी बातें, धूप से आपकी बातें अच्छी हैं.


कुछ तो कहिए..

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