Posted by: prithvi | 18/02/2011

जवां होते खेतों के दिन

माघ

जब सुबहें ओस की बूंदों सी कोमल होती हैं

दिन सरसों से महकते हैं

और बदन से लिपटी रहती हैं खनकती दुपहरें

गन्‍ने की मिठास छलकती है शामों में

तो उम्‍मीदों की अप्‍सराएं उतर आती हैं

खेतों में,

माघ की रातों में.

जवां बालियों के बोझ से झुकी सरसों

फागुन से ठीक पहले माघ या माह के महीने में घर-खेत में होना अल्‍हदा अनुभव है. गूंगे के गुड़ जैसा! यही वह मौसम है जब उम्‍मीदों की परियां खेतों में नाचती हैं और हवाओं में सपनीली हीर सुनाई देती है. उत्‍तर भारत विशेषकर थार में यह खेतों के जवां होने के दिन हैं. फसलों की मस्‍ती किसानों की आंखों में तिरती दिखती है. होली से पहले उड़ते गुलाल की खुश्‍बू सहज ही महसूस किया जा सकता है.

खेत इस समय एक साथ पकाव पर आती कई फसलों से भरे हैं, एक तरफ सरसों, बालियों के बोझ से दोहरी हुई जा रही हैं तो गेहूं (कणक) की फसल किशोरवय से जवानी की दहलीज पर कदम रखने वाली है. चने की कुट्टी के दिन थोड़े से हैं, फिर होळे होंगे. सरसों के पीले, सोगरे के सफेद तथा चने के गुलाबी से रंग वाले फूल आसपास ही बतियाते सुने जाते हैं. लहसुन, प्‍याज, गाजर, शकरकंद, मटर जैसी कितनी ही सब्जियां थाली का स्‍वाद और विविधता बढ़ाने को तैयार हैं. बहुत कम ही महीनों में खेतों में इतने रंग, इतनी विविधता नज़र आती है. इसीलिए इस समय को खेतों के जवां होने का महीना कहा जाता है.

चने के खिलखिलाते खेत

ऐसे में अगर मावठ हो जाये तो सोने पे सुहागा. जैसा कि थार के ज्‍यादातर इलाके में हाल ही में हुआ है. माघ माह में होने वाली बारिश को मावठ कहा जाता है और यह हाड़ी (रबी) की फसलों के लिए अमृत है. मावठ के बाद हल्‍की हल्‍की धुंध के बोसे गेहूं, सरसों के अनगढ़ सौंदर्य को नया आकार देते हैं. ऐसा होते हुए इन दिनों दिखा है.

खेतों की ज्‍यादातर प्रेम कहानियां इन्‍हीं दिनों गन्‍ने के खेतों में परवान चढ़कर सरसों के पुराने पत्‍तों की तरह अपना अस्तित्‍व खो देती हैं. वे प्रेम की अगली फसलों के लिए खाद का काम करती हैं. इस मौसम के मस्‍ताए ऊंट सी गंधाती तमन्‍नाओं से बचना मुश्किल है.

यही मौसम है जिसे किसान चौ‍बीसों घंटे जीता है पूरी शिद्दत के साथ! उसके जीवन में खाने पीने से लेकर, ओढ़ने सोने तक इस मौसम का असर है. किसान जीवन इससे पग गया है.

आजकल हर प्रार्थना में यही इल्तिजा रहती है कि इतने सपने दिये हैं तो अमली जामा भी पहना देना. किसान के लिए अगले दो महीने मेहनत भरी मद में जीने के होने होंगे.

(माघ, 2010- थार एक रपट)

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Responses

  1. अरे आप भी ना फागुनी मस्ती में आके पोस्ट लिख देते हैं..सरसों का पीलापन..और गेंहूँ की हरियाली…हल्का पीलापन सरसों के फूलों का अपने में समेटे हुवे..ये मस्ती जिन्दगी की मस्ती है…और आपने इतनी मस्ती में पोस्ट लिखी है..हम तो बस मस्त हैं मस्ती के सिवा कुछ कर ही नहीं सकते…

  2. पृथ्वी जी,खेतों की जवानी और वो भी आपकी ज़ुबानी…रघुवीर सहाय की पंक्तियां याद आ रही हैं….
    जैसे जैसे यह लिखता हूं, छन्द बदन में नाच रहा है
    मन जिस सुख को लिख आया है, फिर फिर उसको बांच रहा है ….

  3. great writeup sir ji

  4. बहुत बढ़िया लिखा है आपने. पढ़कर गांव के वो बीते हुए मस्ती भरे दिन याद आने लगे.

  5. वो गाँव के अल्हड मस्ती भरे दिन…अब कहाँ पड़े है ?अब तो गाँव भी तेज़ी से शहर में तब्दील हो रहे है ,पर फिर भी कुछ शांति कुछ सुकून अभी बाकि है….

  6. I am enjoying each word written here……..Its so refreshing 🙂


कुछ तो कहिए..

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