Posted by: prithvi | 08/02/2011

नींद सी जागती रातें

नींद सी जागती रातें,
जूलिया राबर्टस और पागल टेरेंस मेलिक.

बारिश.. मेह पर जब प्‍यार आता है तो उसे बारिश कहता हूं और उससे अपना नाता नाड़ का है. अब तक कई बार ऐसा हुआ है कि घर के सबसे अंदर वाले कमरे में बेसुध सो रहा होता हूं कि अचानक आधी रात के बाद किसी खुश्‍बू से नींद खुल जाये और बारिश शब्‍द से आंखों की दीवारें नम होने लगें. बाहर जाकर देखूं तो सचमुच नाचती हुई बारिश मिले और हम दोनों लड़कपन के प्‍यार की तरह खि‍लखिला पड़ें. आज भी कुछ ऐसा ही हुआ. ढलती शाम को दफ्तर में अचानक ठंड सी लगने लगी तो स्‍वेटर डालकर वाशरूम में चला आया. वही जानी पहचानी खुश्‍बू छाने लगी और खिड़की से नीचे देखा तो इधर उधर बिखरे पानी की आंखों में शरारत नाच रही थी. ज्‍यों ही हाथ खिड़की से बाहर निकाला, महकती हुई बारिश मुझसे लिपट गई. उसने फागुन पहन रखा था. मैं सहज होने तक उसकी कोमलता, नरमी को जीता रहा और फ्री होकर आने का वादा कर खिड़की से चला आया. रिजर्व बैंक की बिल्डिंग के ऊपर से कुछ घटाएं मुस्‍कुरा रहीं थी.

अशोक रोड से घर लौटते वक्‍त देखा कि बारिश का जादू हर कहीं है. पेड़ पौधों से लेकर फुटपाथ और पिल्‍लरों तक; मानों मुझे चिढ़ा रहे हों.. ये कमबख्‍त बारिश भी हर किसी से इतनी मुहब्‍बत, इतनी शिद्दत से मिलती है?

इन दिनों अकेला हूं तो रातें नींद सी जागती हैं. घर में घुसते ही कंप्‍यूटर आन हो जाता है और टारेंट पर कुछ न कुछ डाउनलोड होने लगता है. कोई फिल्‍म या संगीत एलबम… 300 जीबी की हार्डडिस्‍क में डेढ सौ जीबी इसी तरह की फिल्‍मों और संगीत से भरी है. बीते दसके दिन में कितनी फिल्‍में देखी होंगी… अल पचिनो की सेंट आव ए वूमन, हीट, ब्रेड पिट की ट्राय, इनग्‍लोरियस बास्‍टर्डर्स, क्‍लेश आव द टाइटंस, द थिन रेड लाईन, वी वर सोल्‍जर, द पियानिस्‍ट, गोन बेबी गोन, गुड विल हंटिंग… नाम याद ही नहीं रहते. अपने साथ यह दिक्‍कत है कि फिल्‍मों, लेखक, किताबों के नाम ही याद नहीं रहते. बस कुछ सीन, लाइनें दिमाग की किसी फाइल में सेव हो जाती हैं. नाम और तारीखें याद रखना अपने लिए कोफ्त का काम रहा है, शायद यही कारण है कि इतिहास विषय रास नहीं आया और कई रिश्‍ते रिवाज अपन ढंग से निभा नहीं पाए. खूंटियों पर तारीखें टांगना और उसके हिसाब से बाजारू विश करना कभी अपने बस में नहीं रहा. ऐसी कई कमियां है जो इन व्‍यावहारिक होते दिनों में अखरती हैं. खासकर पूजा को.. फोन करते ही पूछेगी क्‍या कर रहे हो.. उसे हमेशा डर रहता है कि मैं अकेला हूं, मतलब या ता तो पागलों की तरह फिल्‍में देखता रहूंगा, या अगड़म बगड़म किताबें पढ़ता रहूंगा या पागलों की तरह सोया रहूंगा रातों को ओढ़कर, दिनों को अपने साथ लपेटे. दुनियादारी के सारे घोड़े बेचकर. मेरे इस पागलपन पर उसकी चिंता से मैं भी कई बार चिंतित होता हूं लेकिन .. एक के बाद दूसरी और दूसरी के बाद तीसरी फिल्‍म हार्डडिस्‍क से निकल कर 19 ईंच की स्‍क्रीन पर मचलने लगती है. अपना बस नहीं चलता!

जैसे आज क्‍लोजर फिल्‍म सामने पड़ी तो चला दी.. जूलिया राबटर्स. जूलिया .. तुम सच में खूबसूरत हो. शायद, अपनी बारिश जितनी ही…. लेकिन बारिश की तरह तुमसे तो डूबकर गले नहीं मिल सकता ना! हां, ये भी जरूरी नहीं है कि खूबसूरत लगने वाली हर चीज से गले मिला जाए. पर  कई बार लगता है कि इसमें छूट होनी चाहिए? जैसे एक दोस्‍त ने बताया कि (शायद) ब्राजील में अगर आपको कश की तलब हो तो आसपास सिगरेट पी रहे किसी भी सज्‍जन के पास जाएं और कहें- मे आई हेव ए पफ? वो खुशी से आपको कश लगाने देगा. ठीक वैसे ही अगर आपका किसी पर दिल आ जाये तो आप आराम से जाकर उसे कहें- मे आइ हग यू. और आराम से हग कर लें. वहां इसे बुरा नहीं मानते. फिल्‍म देखते हुए मैं सोचता हूं कि अगर कभी ऐसा मौका मिला तो क्‍या जूलिया से यह कहूंगा- मे आइ हग यू….. नहीं शायद नहीं क्‍योंकि मैं उससे प्‍यार नहीं करता. प्‍यार तो मैं बारिश से करता हूं. आपसे करता हूं. और अपने दोस्‍तों को गले लगाने के लिए पूछने की जरूरत थोड़े ना होती है?

फिल्‍म देखते देखते ही सोचता हूं कि दुनिया भर की अच्‍छी फिल्‍में, किताबें, दोस्‍तों को लेकर ढाणी चला जाऊंगा और मिलकर देखेंगे/ पढेंगे कि हमारे दौर के सबसे अच्‍छे दिमाग हमें क्‍या बताना चाहते थे. लेकिन सोचने भर से कुछ थोड़ा होता है इसके लिए पागलपन की जरूरत होती है. जैसे कि टेरेंस मेलिक. टेरेंस मेलिक ने बीस साल काम किया और एक फिल्‍म बनाई  द थिन रेड लाईन. जिसे अब तक की सबसे शानदार वार फिल्‍मों में एक माना जाता है. पागलपन तो इसके कहते हैं मेरी दोस्‍त.

राजेश भाई कल मुराद को पाश की कविता सुना रहे थे….

जीने का सलीका
और प्यार करना
उन्‍हें कभी नहीं आएगा
मेरी दोस्‍त
जिन्‍हें जिंदगी ने
बनिया बना दिया है.

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Responses

  1. बस ऐसा ही होना चाहिए आदमी. भीगे अहसासों को अनुगुलियों के पोरों से दिल तक आने दे. बेवक्त और बेहिसाब किया करे सब काम…

  2. बेहतरीन आलेख

  3. आपका यह पागलपन बरकरार रहे…………………

  4. अरे वाह क्या भीगा भीगा के आपने मारा है हमें बारिश से…सच में हर खुबशुरत चीज से गले मिलने का सौभाग्य मिल जाए बस… तो एक बात पक्की है … दुनिया अपनी मुक्कमल हो जाए..लेकिन हम उसे प्यार नहीं करते ना… एक ना भी है…
    बस बारिश है जिसे फागुन पहन के आया है…

  5. ———————————————————
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    bas itna hi

  6. phli bar padhne aayi hu,or itna acha lga ki pichli v kyi post padh gyi,acha likhte hai…badhai or subhkamnaye…

  7. आप बहुत अच्छा लिखत है।
    आपकी रचनाओ को पढ़कर बहुत अच्छा लगा।

    राजेन्द्र सिंह बिष्ट (नेगी)
    मेरठ (उत्तर प्रदेश)

  8. ख्याल अच्छा है कि जुलिया रोबर्ट्स से गले मिला जाए… अगर ऐसा कभी संभव हो (if at all its permitted).. फ़िलहाल होलीवुड की फिल्में और नींद का कोई रिश्ता नहीं.. आपको बारिश और रातें मुबारक.

    मनोज

  9. good…i like.

  10. बहुत खूब……चितेरा जब अपनी मोज में हो तो….. अल्फाज का संमदर सावन कि पींग झूलता हे पाठक को….जिओ….

  11. जय हो सा. हर चीज तभी रंग लाती है जब वह रंग में हो.


कुछ तो कहिए..

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