Posted by: prithvi | 22/10/2010

भूख – उस सदी, इस सदी में

उस रात जब

हम भाइयों को खाना खाए

बीत चुके थे कई दिन

और मां ने पड़ोसियों से उधार मांगकर

लाने/खाने से मना कर दिया था.


जब पानी पीने से

रात नहीं/ कलेजा कट रहा था

हर कोशिका के लाइसोसोम के

स्‍वभक्षी होने की अकुलाहट में,

हमने घुटनों को अपने ही पेट के चूल्‍हे में

लकड़ी बनाकर झोंक देना चाहा.


खैर,

चाहने भर से होता तो चांद बन जाता रोट मेरी थाली का

या सितारे खीर,

घर की छत के सरकंडे बन जाते सेवइयां

दीवारों की ईंटे

बर्फी केसरीसिंहपुर वाली,

या उस भूख का साक्षी रहा खेस ही बन जाता कुरकुरा पापड़.


तो दोस्‍त,

उस रात कुछ बच्‍चों ने बेलौस बचपने से कट्टी कर

बड़ों वाला यह ज्ञान पाया

कि जगत में भूख से बड़ी पीड़ा

और रोटी से बड़ा सच कुछ नहीं.

बाबा लौट आए थे ढलती रात में किसी ट्रेन से

मूंगफली भरे झोले के साथ

जिन्‍हें छीलकर खाने की भूख/ ताकत तक नहीं थी

हम भाइयों के डील में.

हमनें बस चूसी थीं एक दो फांके किन्‍नू की

नीम बेहोशी जैसी नींद में.


उस (अगली) अलसुबह

बाज़ार से डबलरोटी का पैकेट लाने निकला

मेरा कई दिनों का भूखा बचपन

गिर गया था कमजोरी के कारण रास्‍ते में.

वह अच्‍छा दिन रहा होगा

कि नहीं गिरा मैं,

घर- बाजार के बीच से गुजरती रेल पटरी पर

या गंगानगर जाने वाली बड़ी सड़क पर

जहां से आज भी गुजरते हैं बड़े बड़े ट्रक.


दोस्‍त, यह घटना मेरी-तेरी,

किसी वक्‍त, व्‍यक्ति या वर्ग विशेष की नहीं है.

यह तो ऐसा वाकया है जो होता रहता है

बड़े बड़े शहरों में छोटी छोटी घटनाओं की तरह

हमारे ही किन्‍हीं बच्‍चों के साथ.

उस रात और इस बात का सारांश यही है

कि बच गए हम भाई भूख से

जैसे फुटपाथ/चौराहे/सड़कों पर सोने वाले हजारों बच्‍चे

हर रात बच जाते हैं.


वैसे इस कहानी का दूसरा भाग उस वक्‍त लिखा गया

जब भारत जैसे उदीयमान देशों की सदी शुरू हो गई

जीडीपी, सेंसेक्‍स, निर्यात, ग्रोथ रेट, विलय अधिग्रहण जैसे शब्‍दों

से भरे रहते थे पीले पेज वाले अखबार

हमारे चित्रकारों की पेंटिंगें विदेशों में करोड़ों में बिकीं

चमचमा रही थी दिल्‍ली सत्‍तर हजार करोड़ रुपये में करवाए गए

राष्‍ट्रमंडल खेलों के बाद.

उस वक्‍त कुछ लोग जीरो साइज के लिए डाइटिंग कर रहे थे

और

आबादी के एक बड़े हिस्‍से के शरीर का मांस इस साइज के मानक से

अधिक नहीं होने को अभिशप्‍त था.

ऐसा समय जब कुछ लोगों की हड्डियों पर चर्बी को ही

समूचे देश की संपन्‍नता का इंडेक्‍स मान लिया गया था.

क्‍योंकि जिस दौर में समाज गरीब होता है

उस दौर में भरा बदन संपन्‍नता का प्रतीक बन जाता है. (द ब्‍यूटी मिथ)

और सरकार ने कह दिया कि

भूखों में फ्री नहीं बंट सकता गोदामों में सड़ता अनाज.


तो दोस्‍त, बात यहीं खत्‍म करते हैं

क्‍योंकि यह निकलने पर दूर तलक जाती है.

उनके लिए भूख/भूखों को मिटाने में ज्‍यादा फर्क नहीं है,

कुछ बच्‍चे आज भी

कई दिनों की भूख के बाद इस उम्‍मीद में सोते हैं कि

अगले दिन का सूरज, रोशनी नहीं रोटियां बरसाएगा

और भूख की उनकी सारी फसल पककर तृप्ति में बदल जाएगी.

(हालांकि अभी तक ऐसा कुछ हुआ नहीं.)


तुम भी इन पंक्तियों को गंभीरता से मत लेना

यह तो उस सदी से इस सदी तक पसरी भूख है

जो समय, सड़कों से उड़कर मेरे शब्‍दों में आ गई

इसे कविता समझकर भूल जाना मेरे दोस्‍त,

हमारे इस समय में भुखमरी भी शाश्‍वत सत्‍य बन गई है

भूख की तरह.

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Responses

  1. wah bhai prithvi dil ko chhoo gayee ye rachana to wakayee kadwa sach likh daala bhai….good

  2. गंभीरता से लेते भी क्या इस कविता को….फिर भी जबरदस्त है कविता सर………..बड़े बड़े सहरों में छोटी छोटी बातें होती रहती हैं ………ये बात (जीडीपी, सेंसेक्‍स, निर्यात, ग्रोथ रेट, विलय अधिग्रहण) वाली फिल्मों का नायक कह चूका है…पपुलार्ट जब मानक है तो …उसमें भूखे नंगे लोग किसे दीखते हैं.

  3. zordar h sa…
    ek sachhe aur sajag nagrik ki peeda to abhivyakt karti behtareen rachna..badhai..

  4. Wah Bhaiya… it’s awesome… u painted a heart touching scene & still saying that don’t take it seriously… hats off to this irony…..

    raman

  5. बढ़िया है… पर कविता में कम शब्दों का प्रयोग हो तो बात वजनी हो जाती है.. गद्य के हुनरमंद पृथ्वी भाई को पद्य में ऐसा रियाज़ करते देख ख़ुशी होती है.. भाई, आपकी चिंता जायज़ और प्रासंगिक है..

    किसान जी के दोहे स्मरण हो आते हैं…

    सुत छाती चिप सोंवतो, चिथड़ां सुबकै माय।
    बरतण मांजण छोडिय़ो, म्हूं होटल पर जाय॥

    बोल्यो भूखो बूढियो, मिंदर साम्हीं जाय।
    कुत्तो किणी रईस रो, क्यूं नीं दियो बणाय॥

  6. sirji bahut khoob………

  7. gaon ko n bhulne k liye thanx!
    LOVELY

  8. kya likha hai prithvi ji..dil ro pada….kya kahu, shabd nahi h bhaijaan.

  9. very
    good.


कुछ तो कहिए..

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