Posted by: prithvi | 14/10/2010

दिल्‍ली दर-बदर

उसके तपते डील को शायद खुली हवा में आराम मिल रहा था. इसलिए छत पे ले आया. रात ढल रही है.. ढाई बजे होंगे. आसोज की ढलती रात, हवा में ठंडक महसूस होती है. खेत में बाजरे, नरमे और धान की खेतों की खूश्‍बू आसपास महकने लगी. इन दिनों रात में धान में पानी लगाने और पकते बाजरे की रखवाली के लिए अधिकांश रातें खेत में ही गुजरती थीं. और आसोज में ज्‍यूं ज्‍यूं रात ढलती है, ठंडक भी बढती जाती है. इसलिए बहुत ध्‍यान रखना पड़ता है. यह आसोज या अश्विन माह का शुक्‍ल पक्ष है. चंद्रमा सुंदरता की अपनी सारी परियां लेकर बहुत विदा हो चुके हैं. दिल्‍ली के आसमान में गिने चुने दो चार तारे आसमान में आवारागर्दी करते घूम रहे हैं. वैसे भी दिल्‍ली में जमीनी चुंधियाहट इतनी है कि आसमानी तारों की चूनर कम ही दिखती है. आकाश गंगा तो बिल्‍कुल भी नहीं!

उतरते की ओर देखा तो जवाहर लाल नेहरू स्‍टेडियम नजर आ रहा है. चमकता हुआ. सारी लाइटें जल रही हैं और उसका नया बना पंखनुमा ढांचा कभी लाल तो कभी हरा हो रहा है. दो चार फ्लश लाइटें अंधकार की काली भींत पर रोशनी की चाद्दर टांगने की कोशिश कर रही हैं. शायद लोग राष्‍ट्रमंडल खेल के समापन समारोह की तय्यारी में लगे हैं. आज कृष्‍णा पूनिया, सीमा अंतील व हरवंत कौर को चक्‍का फेंक में पदक जीतते देखा तो अच्‍छा लगा. उन्‍हें अवार्ड देने के लिए कलमाड़ी नहीं किसी और को होना चाहिए था.

देश के सबसे आधुनिकतम शहरों में से एक दिल्‍ली, ऊंघ रहा है, रिंगरोड से गुजरते भारी वाहनों की चिल्‍लपौं के बावजूद. सामने वाली बिल्डिंग के ऊपरी कमरे से रोशनी झांक रही है जहां एक युवक युवती रहते हैं. अजब सा शहर है दिल्‍ली. लड़के लड़कियां, गांव घरों से पढ़ने, कुछ करने आते हैं और ज्‍यादातर यहां की चुंधियाहट में खो जाते हैं. आठ साल पहले ‘लीव इन रिलेशनशिप’ का प्रत्‍यक्षदर्शी बना तो हैरानी हुई. बाद में सब आम बात लगने लगा. तो युवा आते हैं और दिल्‍ली शहर के रचे जलसाघर में खो जाते हैं. ज्‍यादातर.. अपने परिवार की उम्‍मीदों की बोझ की गठरी उठाये साधारण से युवा काल सेंटर में कशिश को ‘खशिश’ और राहुल को ‘रेहुल’ बोलने का अभ्‍यास करते हैं ताकि ग्राहकों पर रौब जमाया जा सके कि बंदा अंग्रेजीदां है. और जब पैसे और स्‍टेट्स को ही जि़दगी में सफलता का पैमाना मान लिया जाता हो तो नैतिकता, विश्‍वास और रिश्‍ते जैसे शब्‍द बहुत बेमानी हो जाते हैं. एक मित्र ने पिछले दिनों ऐसे ही एक काल सेंटर में काम करने वाले लड़के लड़कियों से साक्षात्‍कार में  ‘फन’  या आनंद का मतलब पूछा तो अधिकतर का जवाब था-सेक्‍स.  राजेश भाई, सुधीर मिश्रा की फिल्‍म ‘दिल दर बदर’ में छोटी सी भूमिका में हैं. वे अभिनेत्री (चित्रांगदा) से भुजिया वगैरह खरीद कर उसे अपनी पैकेजिंग में बेचते हैं.. लेकिन अभिनेता को इसमें भी कोई चक्‍कर नजर आता है और वह इसी चक्करघिन्‍नी बन जाता है.

तो यह जो शहर है दिल्‍ली वो कुछ ऐसे ही भुजिए की तरह लगता है जिसे बनाया किसी ने, पैकेजिंग किसी की, मार्के‍टिंग कोई और करता है जबकि बेचने और मुनाफा कमाने वाले कोई और ही हैं. जहां ऐसे लोग बाजरे पर भाषण देते हैं जिन्‍हें उसकी खुश्‍बू पता नहीं और धान की खेती करते करते यहां चले आए भाई लोग पिज्‍जा बेचते हैं. यह शायद मौजूदा जमाने का फलसफा भी है.

पापा नीचे चलो ना.. वह कुनमुनाई. बुखार शायद कम हो गया है. नीचे उतरता हूं. मेज पर शशिप्रकाश का कविता संग्रह पड़ा है, उनकी एक‍ कविता है..

अपनी जड़ों को कोसता नहीं

उखड़ा हुआ चिनार का दरख्‍त.

सरू नहीं गाते शोकगीत.

अपने बलशाली होने का

दम नहीं भरता बलूत.

घर बैठने के बाद ही

क्रांतिकारी लिखते हैं

आत्‍मकथाएं

और आत्‍मा की पराजय के बाद

वे

बन जाते हैं राजनीतिक सलाहकार.

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Responses

  1. कविता अच्छी है. पढ़वाने के लिए आभार.

  2. दिल्ली का वर्णन ,वो भी ढलती रात का ….अच्छा लगा….

  3. seene main zalan , aankhon main tufaan sa kayon hai

  4. सुन्दर प्रस्तुति!

  5. दिल्ली के बहाने आपके मन के भावों को जानने का अवसर प्राप्त हुआ, आभार।

  6. यह जो शहर है दिल्‍ली वो कुछ ऐसे ही भुजिए की तरह लगता है जिसे बनाया किसी ने, पैकेजिंग किसी की, मार्के‍टिंग कोई और करता है जबकि बेचने और मुनाफा कमाने वाले कोई और ही हैं. जहां ऐसे लोग बाजरे पर भाषण देते हैं जिन्‍हें उसकी खुश्‍बू पता नहीं और धान की खेती करते करते यहां चले आए भाई लोग पिज्‍जा बेचते हैं. यह शायद मौजूदा जमाने का फलसफा भी है.
    – अपनी जड़ों से कटे लोग और कर भी क्या सकते हैं….लेख में दिल की बात निकली है सर शुक्रिया…जो हम हैं वों रहने नहीं दिया जाता…गर रहने की कोशिश करें तो पिछड जाने का खतरा…गर बदल जातें हैं तो जिंदगी कभी खुशनुमा नहीं रह जाती…पता नहीं किस ख़ुशी किस मकसद की तलाश में भटकते हैं लोग….पैसा कमा जरुर लेते हैं…मगर ये वों तलाश तो नहीं …जिसकी तलाश में गावं शहर और …वों गलियां छोड़ आए जो हमें माँ की तरह प्यार करती हैं….

  7. अच्छा, बहुत अच्छा पृथ्वी सा

  8. prithvi ji very nice

  9. ram ram sa… koi idhar criticise nahin karta kya bhai…


कुछ तो कहिए..

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