Posted by: prithvi | 08/10/2010

इस मौसम में ‘बादल’

वक्‍त बदल गया- डा. बादल


राजस्‍थानी साहित्‍य में डा. मंगत बादल (बादळ) किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. मत बांधो आकाश से लेकर कैकेयी तक साहित्‍य की तमाम विधाओं में साधिकार लिख चुके हैं. पिछले दिनों मिले तो प्रकृति से मानव और मानव से मानव के दरकते संबंधों से चिंतित दिखे और उनका ‘आदमी से खतरनाक कुछ नहीं’ कहना, उनकी चिंता के स्‍तर और व्‍यापकता को इंगित करता है. डा बादल की एक बड़ी परियोजना महाभारत के युद्ध को मौजूदा परिवेश से जोड़ते हुए ‘गीतिकाव्‍य’ (या खंडकाव्‍य?) लिखने की है. बीते कुछ वर्षों में वे इसके कई ड्राफ्ट लिख चुके हैं और उम्‍मीद है कि यह जल्‍द ही अंतिम रूप में पाठकों के हाथ में आएगा. डा बादल का पहला निबंध संग्रह ‘सावण सुरंगो ओसरयो’ आया है. इसमें उन्‍होंने लोकजीवन के विभिन्‍न पहलुओं पर प्रकाश डाला है. डा किरण नाहटा ने इस संग्रह के आमुख में लिखा है कि डा बादल का यह संग्रह लोकजीवन की विविधताओं का सांगोपांग वर्णन करता है. उनसे इसी सि‍लसिले में मुलाकात हुई. वे कहते हैं..

वक्‍त बदल गया और चीजें भी. साथ ही उन्‍हें देखने तथा समझने का हमारा दृष्टिकोण भी. कुछ चीजें हमने ‘फोर ग्रांटेड’ ले ली हैं जिनमें प्रकृति और अन्‍य जीव जंतु शामिल हैं. लोक से हमारा रिश्‍ता दरका है और हमने उन चीजों की ओर ध्‍यान देना ही मानों बंद कर दिया जो मानव जीवन की सततता के लिए बहुत मायने रखती हैं. यही बड़ी चिंता है. हम अगर प्रकृति से खिलवाड़ करेंगे या दूसरे जीव जंतुओं का ख्‍याल नहीं करेंगे तो परिणाम तो भुगतने ही पड़ेंगे.

लोकजीवन की अच्‍छाइयों को लेकर चलना होगा. भले ही वे तीज त्‍योहार हों या हमें प्रकृति से जोड़े रखने वाले अन्‍य आयोजन, बहाने! जमीन से जुड़कर ही हम बने हैं, बने रह सकते हैं. हमें यह देखना होगा कि उस ‘लोकजीवन’ की किन खूबियों को हमें अपने साथ लेकर चलना होगा जो भविष्‍य में जन जमीन से जोड़े रखे और हमारे पैरों तले की जमीन को मजबूत करे.

साहित्‍य जोड़ता है पर साहित्‍यकार खुद नहीं जुड़ते. मिलने जुलने और बैठकर चर्चा करने की समृद्ध व उपयोगी परंपरा धीरे धीरे लुप्‍त होती जा रही है. यह दिक्‍कत नई पीढी के साथ अधिक है. वरिष्‍ठजनों से सीखना और खुद को परिपक्‍व करना बहुत मायने रखता है लेकिन नयी पीढी के शब्‍दकोष में ऐसा कोई पन्‍ना ही नहीं दिखता. वरिष्‍ठ लोगों की अपनी परेशानी है लेकिन गुरू शिष्‍य, संवाद या चर्चा परिचर्चा की परंपरा प्रतिभाओं को तराशने के लिए मायने रखती है. नयी पीढी को अधिक समर्पण दिखाने के साथ साथ ही अध्‍ययन पर भी ध्‍यान देना होगा.

साधनों से सुख नहीं आता. हमें इस बात को आज नहीं तो कल मानना ही होगा कि सुख साधनों से नहीं आता. मेरी एक कहानी है राजस्‍थानी जीवन पर. थार जैसा विकट जीवन तो शायद ही कहीं हो. साधन तो है ही नहीं फिर भी लोगों की जीवंतता देखते बनती है. क्‍यूं.. क्‍यूंकि सुख का अब तक तो साधन संपन्‍नता से कोई नाता रहा नहीं है.

राजस्‍थानी भाषा की पहुंच, व्‍यापकता की अनदेखी नहीं की जा सकती. उदाहरण के लिए इसमें ऊंट के लिए ही 100-150 पर्यायवाची है. ऐसी भाषा को आप कब तक नकराते रहेंगे?

// राजस्‍थान के एक सीमावर्ती कस्‍बे रायसिंहनगर में रह रहे डा बादल काव्‍य, महाकाव्‍य, प्रबंध काव्‍य, कविता, कहानी, व्‍यंग्‍य तथा संपादन सहित अनेक विधाओं में लिख चुके हैं. उनकी प्रमुख कृतियों में रेत री पुकार, दसमेस, मीरां, मत बांधो आकाश, शब्‍दों की संसद, इस मौसम में, हम मनके इक हार के, सीता, यह दिल युग है व कैकेयी है. सुधीर पुरस्‍कार व सूर्यमल्‍ल मीसण शिखर पुरस्‍कार सहित अनेक पुरस्‍कारों से सम्‍मानित हो चुके हैं. (बातचीत भावार्थ पर आधारित, डा बादल से 09414989707 पर बात की जा सकती है.)//


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Responses

  1. सुन्दर विवरण, डा० मंगत बादल के विषय में!

  2. बादल जी के सृजन को नमन.. और भाई पृथ्वी, आप भी बेहद प्यारा और भावपूर्ण लिखते हैं… बेहद पठनीय.. बधाई.. बने रहो…


कुछ तो कहिए..

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