Posted by: prithvi | 28/06/2010

आषाढ़!

आषाढ़ यानी चौमासे की शुरूआत. वर्षा ऋतु की  चार महीने-आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन. यानी  चातुर्मास. जेठ की गर्मी से तपते थार में नम नरम बूंदों की अगवानी करता है आषाढ़. आषाढ़ आम जीवन से लेकर खेतों तक के जीवन में बदलाव का एक नई शुरुआत का प्रतीक है. विद्यालय से लेकर खेत तक आषाढ़ में खुलते हैं. प्रकृति के बदलते रंग को आषाढ़ से ही देखा जा सकता है जो सावन तक जाते जाते तो नम नरम गीला हो जाता है.

आषाढ़

पकी नीमोळी,

शहतूत की कोंपलों

(और) केर के

लाल चटक फूलों पर

तिरता है आषाढ़।


खेजड़ी की पातड़ी,

शहतूत की नरम हरी पत्तियों,

(और) आक की डोडियों पर

फिरता है आषाढ़।


जेठ की दुपहरी

चौमासे की रातों,

(और) दादी की बातों पर

बूंदों सा

गिरता है आषाढ़।


गांव की गुवाड़ गलियों

ढाणी की पगडंडियों

डांगरों के छप्‍पर में,

(और) घर की मुंडेरों पर

मिलता है आषाढ़।


बारानी बाजरी,

ककड़ी और मतीरों

दूध की हांडी,

(और) पळींडे के कोरे घड़े पर

खिलता है आषाढ़।


स्‍कूल जाते बच्‍चों

बीज बोते किसानों,

मां के सपनों

बाबा के अरमानों,

(और) कल की उम्‍मीदों को

सिलता है आषाढ़।

|>आषाढ़ की यह कविता ‘थार की ढाणी’ से साभार ली गई है. थार की ढाणी का प्रकाशन भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने किया है. थार की ढाणी राजस्‍थान के लोक जीवन व संस्‍क़ति की बात करती है. इसे समझने की कोशिश है. किताब मंगवाने के लिए दिल्‍ली में 011- 24367260 या 08010241881 पर संपर्क किया जा सकता है.<|

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Responses

  1. पृथ्‍वी परिहार जी प्रणाम ,

    बेहद खुबसुरत तरीके से आपने आषाढ का दर्शन कराया , एक बेहतरीन कविता , प्रकृति के सौन्दर्य से लबालब भरी हुई , पढने पे वही आनन्द की अनुभुति जो बारिस की पहली फुहार से होता है ।

    एक बेहतरीन अँदाज , आषाढ की महिमा और आषाढ के बारे मे शायद ही मैने कही ऐसे पढा हो ।

    अक्षरशः सत्य लिखा आपने , एक एक पंक्ति हमे कल्पनावो मे ले के चली जाती है जो हम बचपन मे खुस महसुस किये है ।

    खासकर आपकी अंतिम पंक्तिया बेजोड है लाजवाब है और बरबस दिल से वाह बहुत खुब लिखा आपने निकल रहा है ।

    राजु भईया का धन्यवाद , जिनके माध्यम से इस प्राकृतिक और अदभुत रचना से परिचय हुआ ।

    आपका

    नवीन भोजपुरिया

  2. बहुत अच्छी लगी रचना.

  3. Bahut Badiya janab……….

  4. भई पृथ्वी,
    जोरदार लिख्यो चौमासे माथै!चौमासे नै बरसाळो भी कथै।बरसाळै माथै राजस्थानी मेँ अणथाग साहित्य है।
    लाग्यो लाग्यो जेठ असाढ सावण तेजा रे…. इण परापर रै लोकदेवता रो लोकजस है।

  5. आषाढ़ को साकार कर दिया आपने पृथ्वी जी..
    बहुत खूब..

  6. सुंदर रचना, थार ही नहीं, आधा भारत आँखों में तिर गया।

  7. dhakad ooliya mandiyedi hai . padhr jee soro huve hai , badhai

  8. bhaarteeya sanskrit aur parmpara ko poshit karti yah post. thanks

  9. सुन्दर रचना…
    चन्द्रसिंह बिरकाळी की ‘बादळी’ से एक दूहा पेश है….
    जीवण नै सह तरसिया, बंजड़-झंखड़-वाढ.
    बरसे भोळी बादळी! आयो आज असाढ़.

  10. Rituon ka jo aanand gaon ke mahol main hai vah aur kahi kahan. Aashadh jaipur main bhi aata hi hoga par pata kahan chalta hai…kavita ke jariye mausam ka sukh anubhoot krane ke liye aabhar.

  11. bahut khub

  12. आषाढ़ पर बहुत अच्छा लिखा है !वैसे थार की ढाणी भी प्राप्त हो गयी है,काफी अच्छी बन पड़ी है!माटी की सौंधी महक लिए ज़मीन से जुडी पुस्तक है ये!!धन्यवाद!!!

  13. prithvi,
    ashad ka chitran bahut hi man ko chhoota hua hai aur shabd jaise moti me piroye atmsat hote jate hain kavi ki najaren ashad ke ek ek pal ko jaise sametati jati hain aur kavit man me utar jati hai .kankad me prakashit yah rachnayen rajasthn ki saundhi saundhi mahak ko ham tak pahunchati hain aur iske liye aapko sadhuwad deti hun

  14. Ke thha ke h ieN mheene meiN. s: cheezaN muskuran lage h. Ghar ke andar jee koni lage

  15. prithvi ji
    aashad ke bare mai kavita bahut achhi lagi. sadhuwad
    krishan chauhan sgnr


कुछ तो कहिए..

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