Posted by: prithvi | 04/05/2010

एक लड़की का खत

निर्मल वर्मा ने कहीं लिखा था कि हम जिस सदी में जीते हैं, हम में से हर व्‍यक्ति उसका गवाह है और गवाह होने के नाते जवाबदेह भी. सार्त्र के शब्‍दों में तो जीने का मतलब ही जवाबदेही है. दो घटनाएं हैं- मिर्चपुर में दलित लड़की को जिंदा जलाने की और कोडरमा में युवा पत्रकार  नीरू की मौत की.  आरोप है कि विजातीय प्रेम संबंधों के चलते नीरू को उसके परिजनों ने ही मार दिया. यह इन दो लड़कियों की मौत या हत्‍या की बात नहीं है, बात हमारे दिमाग और समाज में पसरे अंधेरे की है. इन घटनाओं ने हमारे समाज, सामाजिक ढांचे और ‘हमारे’ मानसिक दिवालिएपन को नंगा कर दिया है. आजादी के छह दशक बाद हम अपनी बेटियों को तो समानता और अधिकार दे नहीं पाये दूसरी गौत्र या दलितों की बात कौन करे? दोनों घटनाओं पर एक लड़की इस समाज, देश, हमारे और आपके नाम एक खत लिखती है…

_____________________________________________

तुम्‍हारे जन्‍म से ही

कायम है दुनिया

पर पता नहीं क्‍यों

तुम्‍हारे होने पर सबको एतराज है

हमारा अपना बनाया ये समाज है.

(राजू आनंद की पंजाबी कविता का अनुवाद)

अगर यह तुम्‍हारा समाज है तो इसे मिटा दो. अगर ये तुम्‍हारी रचना है तो इसे आग लगा दो. उस आग की रोशनी चतुर्दिक फैले अंधकार की दीवारों तक पहुंच सके तो उस पर लिखे इस सवाल का जवाब देना कि क्‍यों मर गई वह, क्‍यों मार दिया गया उसे? बहुत बातें करते हो समानता की और शिक्षा के फैलते उजियारे की, बहुत हो ली तुम्‍हारी विकास की नौटकीं. मिर्चपुर में तुम दलित की बेटी जिंदा जलते हुए देखते हो तो कोडरमा में एक होनहार पत्रकार मर जाती है. ऐसे तो कोई नहीं मरता. लो बजाओ आजादी का झुनझुना और छेड़ो सामाजिक समरसता की तान. ले आये आर्थिक विकास का रथ तुम्‍हारी चौखट पर भारत को शक्तिशाली और महाशक्तिशाली बनाने के‍ लिए. करो सवारी और करो अश्‍वमेध का शंखनाद. तुम्‍हारी समिधा में लकडि़यां न हों तो लड़कियां तो हैं ना, लड़की चाहे दलित की हो या ब्राह्मण की, सगौत्र या विजातीय, क्‍या फर्क पड़ता है? उसे कोई हक नहीं, खेलने, जीने न प्‍यार करने का. उसे हक न तो तुमने दिया न तुम्‍हारी रचना में रचे बसे इस समाज और कानून ने. दलित दलित रहे और बेटी उससे भी गई गुजरी हो गई. उसके लिए कुंड कभी संसद से कुछ मीटर दूरी वाला अशोक होटल बनता है तो कभी मिर्चपुर और कोडरमा. तुम क्‍या समझते हो बेटियों को हत्‍यारा यह समाज जिंदा है?

शायद तुम भूल रहे हो. लो मैं याद दिलाती हूं.. तुम उसी गौरवशाली इतिहास के वंशज हो जो मोहनजोदड़ो से शुरू हुआ और जिस सभ्‍यता के अवशेषों में सबसे अधिक नारी की देवीनुमा मूर्तियां मिली. ऋग्‍वेद के पुरूष सूक्‍त में उल्‍लेखित वर्ण व्‍यवस्‍था तो तुम्‍हारा ब्रह्मवाक्‍य बन गया लेकिन यह भूल गए कि उसी ऋग्‍वेद में कहीं लोपामुद्रा, घोषा व सिकता .. कितनी ही विदुषियों का सादर‍ जिक्र है. तुम भूल गए ना? सातवाहनों ने अपने नाम ही मां पर रखे थे. कैसे भूल गए और कहां गया तुम्‍हारा वह ढोंगी वाक्‍य ‘ यत्र  पूज्‍यते नारी तत्र रमते देवता’? सावित्री तुम्‍हें यम के पंजों से छुड़ा लाती है और गांधारी तुम्‍हारे कारण अपने जीवन में अंधेरा भर लेती है. और तुम हो कि कभी रावण बन उसे पर्णकुटी से उठाते हो कभी राम बन अग्निपरीक्षा लेते हो. क्‍यों करते हो यह सब, किस मनु ने पढाया यह मंत्र और किस मुनि ने दी तुम्‍हें यह दीक्षा?

शायद तुम्‍हें तो याद भी ना होगा संविधान का भाग तीन. मूल अधिकार. हमारी भावना के साथ किया गया वादा और सभ्‍य विश्‍व के साथ की गई संधि (एस राधाकृष्‍णन). अधिकार जीने का, बोलने का, समानता का, खेलने खाने का व अधिकार रोने हंसने का. अधिकार के राजदंड के साथ गर्व से चलने वाले तुम क्‍या जानो दूसरे के अधिकारों को. मीडिया, फिल्‍मों व टीवी पर रचे जलसाघरों से दूर आम आदमी, दलित या एक बेटी की राहों में बिखेरे गए कांटें तुम्‍हें कहां से नज़र आएंगे. जीडीपी के आंकड़ों, फोर्ब्‍स की सूचियों, एफडीआई, चीयरलीडर, अमिताभ के ब्‍लाग, शाहरूख की छींक वाली खबरों के कुछ किलोमीटर के दायरे से बाहर मीलों मील तक एक समाज रूपी जंगल है जहां जात भांत, गौत्र धर्म के ठेकेदारों की आरियां नयी पीढी के पौधों पर चल रही हैं. इसका तो तुम्‍हें भान नहीं ना!

बताओ तो सही, सदियों सदियों का यह तुम्‍हारा पाप का घड़ा कब भरेगा. और जिस दिन भरेगा उस दिन क्‍या करोगे कभी सोचा है. कभी रोना आता है तो कभी हंसी. किस समतामूलक, बराबरी के अधिकार वाले समाज के भ्रम में हो. इक्‍कीसवीं सदी की मर्करी लाइटों की रोशनी में अंधेरा ढो रहे हो. कहां जी रहे हो, बेटियों को गर्भ में मार देने वाले समाज में, उन्‍हें जिंदा जला देने वाली मानसिकता में? मर क्‍यूं नहीं जाते. मिटा क्‍यूं नहीं देते तुम्‍हारे इस आगलगे समाज को और क्‍यूं नहीं जला देते अपनी कथित आर्थिक सामाजिक उपलब्धियों के पुलंदों को. तुम जो भी हो.. राम, रावण, धृतराष्‍ट्र, राष्‍ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्री या कोई और… मेरे सवाल का जवाब देना. क्‍यों मर गई वह… क्‍यों मार दिया गया उसे मिर्चपुर में और क्‍यूं मर गई वह कोडरमा में?

– एक लड़की (बेटी नहीं क्‍योंकि बेटी वाला समा‍ज तो तुम बना नहीं सके.)

Advertisements

Responses

  1. सब कुछ कह दिया गया है। इस के बाद भी न लगे तो इंसान की जूण बेकार है।

  2. bhai priyhvi,
    ram-ram!
    kai dino ke antral ke bad dhamakedar vapsi ! khar ! ye to aadat hai aapki. lekin liha khoob hai.Raju anand ki kavita se dhool hata kar bhi achha kiya-shayad yah uske fir sakriy ho likhne ki prerna bane.
    Apki wo pustak abhi tak mujhe nahin mili jiski charcha sab karte hain. shayad layki-nalayki ki jad me hai ye mamla.main layak nahin o raap nalayak nahin! khair!marji hai aapki-kitab jo hai aapki.

  3. सचमुच हाल फिलहाल कुछ घटनाएं तेजी से हुई हैं और ये सवाल विराट रूप ले कर हमारे सामने आए हैं। इन सवालों से फरार संभव नहीं है। उचित भी नहीं। हमें इन से रूबरू होना होगा, और इसकी शुरूआत किसी दूसरे के नहीं, खुद अपने गिरेबां में झांक कर करना होगा।

  4. ये सब कुछ अकेले न तो होता है न ही इसे अकेले दुरुस्त किया जा सकता है. एक तथाकथित सभ्य वर्ग इस के लिए ज़िम्मेदार है और शेष बचे सुधार-वादी सोये हुये हैं……आज के दौर में …… “लोग यहाँ हंसने से पहले काफ़ी कुछ सोचते हैं,मानो उन्हें अखाड़े में कोई दांव सा दिखाना है. सब संताने लगती हैं आलोचकों की, ये समाज इक पिछड़ा हुआ कुंठित ज़माना है.”

  5. जिस तेज़ी से हमारे समाज में लड़कियों को लेकर गिरावट आई है,उसे देख कर तो ये ख़त बिलकुल सही है!बेटे की चाह में भ्रूण हत्या करने वाले इन बेटों के लिए लड़कियां कहाँ से लायेंगे?लड़कियों रहित दुनिया की कल्पना करना ही गलत है..

  6. पृथ्वी जी,
    आपका आक्रोश और वेदना वाजिब है.पुरुष प्रधान मानसिकता वाले इस समाज में नारी के प्रति इस दृष्टिकोण ने हमारी प्रगतिशीलता के आगे प्रश्न-चिह्न लगा दिए हैं.

  7. बेहद संवेदनशील पोस्ट है आपकी..

  8. “हम इंसान जानवर बन जाते हैं,
    ठेठ रक्त पिपासु,
    सिर्फ़ तब, जब
    उस एक लड़की को अपनी बपौती मान लेते हैं.
    और उसकी उम्र को अपनी जागीर.
    तब बादल सी उडती लड़की,
    नदी सी बहती लड़की,
    चाँदनी सी बिछती लड़की,
    वक्ष से दूध पिला
    तुमको-हमको, जिंदगी देती लड़की,
    बरगद कि छाँव सी बनी रहती लड़की,
    तुम्हारे पंजों में अपनी साँसें
    गिरवी रखी हुई लड़की,
    तुम्हें नहीं दिखाई देती.
    तुम्हें बस अपने मजबूत काले हथियारों से
    किसी अँधेरे कोने में दुनिया से छिपा कर
    उसका सर कलम करना होता है.
    क्योंकि तुम्हारे तय किये हुए
    हदबंदी से पैर बाहर कर चुकी लड़की
    तुम्हारे लिए असहनीय हो चुकी होती है.”

  9. there has been pretty positive progress on gender empowerment front in recent times,yet a lot needs to be done..

  10. acha lagta hai jab purush pradhan samaj me koi purush kutharagat karta hai samaj ki in vidambnao par. Lekin lekhni se age bhi kuch karne ki jarurat hai. kadam badhaiye karva banta chala jayega.

  11. kuch chatakdar likho yaar… kaahe gyan de rahein hon…

  12. सही कहा आप ने…

  13. उस लड़की के नाम।

    इतनी मुद्दत बाद भी
    तुम्हारा नहीं होना
    क्यूं अखरता है
    बार-बार?
    तुम्हारे होने की कल्पना
    क्यूं इतनी अजीब है
    क्या ये अकारण या अनैतिक है?

    इतने अरसे बाद भी
    क्यूं ज़िन्दा है तुम्हारी याद?
    जबकि ज़िन्दा
    तुम्हे होना चाहिए था।

    क्यूं तुम्हें और तुम जैसी
    असंख्य लड़कियां
    बहा दी जाती हैं
    खून सनी जांघों पर वारकर।

    क्यूं छपते हैं?
    अख़बारों, पर्चों और दीवरों पर
    तुम्हारे क़त्ल से ज्यादा
    इन मान्यताप्राप्त
    वधशालाओं के विज्ञापन।

    तुम इतनी अबोध
    और मासूम हो
    कि-
    मेरी ये बातें
    तुम्हारी समझ से अभी
    बहुत दूर हैं।
    पर ये भी सच है मेरी जान
    कि इतनी मुद्दत बाद
    तुम्हारे होने की कल्पना
    अजीब तो है
    किन्तु अकारण या अनैतिक नहीं है।

  14. ek unutha pryas badhi savikar kare.

  15. Prithvi bhai,
    man vikal ho uthta hai jab aajkal apne apko khabron se updated rakhne ki koshish karten hai .
    kuch samay se to betiyon ki cheekh ke alawa kuch bhi nazar nahin aata. kuch panktiyan yaad aati hai-
    ab to tu khush hal larki
    kitna galat khyal larki
    viksit hai vigyan magar
    ab bhi tu halal hai larki
    bahut aage hum aa gaye kahte hain
    phir bhi tere wahi sawal hai larki

    such hi hai awaran badla hai hamara charitra nahin

  16. Very emotional and realistic.


कुछ तो कहिए..

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

श्रेणी

%d bloggers like this: