Posted by: prithvi | 06/04/2010

सत्‍य चुराता नज़रें हमसे

सत्‍य चुराता नज़रें हमसे

बनाम मिर्जा के मलिक होने तक!

क्‍या समाचार चैनल वालों के भेन बेटी नहीं होती या वे अपनी अक्‍ल और सोच बाजार की खूंटी पर टांग सिर्फ और सिर्फ टीआरपी के लिए भागते हैं?

सानिया मिर्जा व शोएब मलिक जब भारत के हैदराबाद शहर में समाचार चैनल वालों की भीड़ को सफाई दे रहे थे तो अपने मन में पहला और पहला सवाल यही उठा. अपना मानना है कि शादी विवाह किसी भी व्‍यक्ति व परिवार का व्‍यक्तिगत आयोजन/फैसला होता है और उसे तमाशा नहीं ही बनाया जाना चाहिए. चाहे व शादी सानिया की हो या किसी ओर की. किसी न्‍यूज चैनल वाले श्रीमत ने यह सोचा है कि कभी उसकी भेन बेटी की शादी में ऐसा तमाशा हो और उसे मीडिया के बेतुके/ बेहुदा सवालों का जवाब देने के लिए आना पड़े तो कैसा लगेगा?

दरअसल सानिया- शोएब के इस कतिपय घटनाक्रम के कवरेज ने न्‍यूज चैनलों की मानसिकता, दशा व दिशा पर बात करने का एक और मौका दे दिया है.

अपन न तो कभी सानिया के प्रशंसक रहे हैं और न ही शोएब हमें कभी उम्‍दा क्रिकेटर लगे. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. वे शादी कर रहे हैं या नहीं कर रहे हैं; सानिया का पहला प्‍यार और शोएब की दूसरी शादी.. क्‍या ये ऐसे सवाल हैं जिनकी पड़ताल में टीवी मीडिया हफ्ते भर से हलकान हुआ जा रहा है. आईपीएल है या सानिया है. रही सही महिमा बाबाओं और सनसनियों की है. बाकी तो कुछ है ही नहीं. इसे दर्शकों के मुहं पर तमाचा नहीं तो क्‍या कहिएगा. जो दिखाएंगे, वही देखोगे!

पाप्‍पराजी और पीत पत्रकारिता जैसे शब्‍दों से अपन तब परिचित हुए जब राजकुमारी डायना सड़क हादसे में मारी गईं. सेलेब्रटीज की व्‍यक्तिगत जिंदगी में ताकाझांकी करने वाली पत्रकारिता के लिए यह कलंक था. लेकिन न तो उससे पत्रकारिता करने वालों ने सीखा न पत्रकारों के प्रति क्रेजी लोगों ने. बात आई गई हो गई. बीत दसेक साल में भारत में न्‍यूज चैनलों की बाढ आई. शुरू में उम्‍मीद थी कि यह नया मीडिया है जो समय के साथ परिपक्‍व, संवेदनशील तथा जवाबदेह हो जाएगा. हुआ इसका ठीक उल्‍टा. ज्‍यों ज्‍यों चैनलों की संख्‍या व उम्र बढ़ी उनका कंटेंट उतना ही खराब या बदतर होता गया. इन बंधुओं ने हर ओर कादा कीचड़ कर दिया.

इस तरह के नासमझ मीडिया के मुहं पर पहला तमाचा कांशीराम ने मारा था. आज हालत यह है कि अमिताभ बच्‍चन, जया बच्‍चन हो या सानिया मिर्जा… सभी उसे उपदेश देने या आग्रह करते नज़र आ रहे हैं.

वैसे सानिया को फर्श से अर्श पर पहुंचाने बहुत बड़ा योगदान न्‍यूज चैनल वालों का भी है. तो अब उसे राजी खुशी विदा भी होने दो भाई. वो जहां भी रहे खुश रहे क्‍योंकि बेटी तो ससुराल में ही अच्‍छी. सवाल यही है कि इन चैनल वालों का भेन बे‍टी, रिश्‍ते नातों व सरोकारों से क्‍या लेना देना. टीआरपी ही इनका सबकुछ है. कुछ हजार की नौकरी और स्‍क्रीन पर चेहरा दिखने की ललक वाली एक भरी पूरी पीढी है जो माइक व कतिपय अस्‍त्रों के साथ पूरे सामाजिक ताने बाने पर पिली पड़ी है. अपन इसे युवाओं में आइडेंटिडी क्राइसेस का नमूना मानते हैं जिसका बाजार दोहन कर रहा है. न्‍यूज चैनलों पर चीखते चिल्‍लाते युवा और क्‍या हैं?

प्रभाष (जोशी) जी ने इस बारे में कई बार लिखा. शेखर गुप्‍ता ने इंडियन एक्‍सप्रेस में हाल ही में एक आलेख में इसी मुद्दे को उठाया है. बीते दस साल में न्‍यूज चैनलों पर सबसे अधिक पूछा गया सवाल क्‍या है- आप कैसा महसूस कर रहे है. मरण और या परण, यही सवाल सामने आ जाता है जो चैनल वालों में बौद्धिक अकाल का ही एक उदाहरण है. कांशीराम के थप्‍पड़ से बात देहरादून में बस चालकों द्वारा पत्रकारों को सरियों से पीटे जाने तक आ गई है. जो हमारे लिए चेतावनी है कि अब भी समय है-‘चैन से सोना है तो जाग जा‍इए’.

टेलीविजन का अविष्‍कार पश्चिम में बेयर्ड ने किया और इस पर पहली बार मानवीय चेहरा 1925 में दिखा. उसकी पश्चिम के विचारकों ने बहुत पहले ही टेलीविजन को ‘ड्रग इन प्‍लग’ यानी बटन दबाओ और नशा करो करार दिया. वहां के सामाजिक ताने बाने को टीवी ने चोट पहुंचाई है व किसी से छुपा नहीं. वैसे ही हालात भारत के होने वाले हैं. यानी टेलीविजन के रूप में छुपा बाज़ार का अश्‍वमेघी घोड़ा हमारी बैठकों से श्‍यनकक्षों और हमारे दिमाग में घुसता चला गया. ओशो ने कभी समाचार पत्रों – पत्रिकाओं के लिए सवाल उठाया था कि ‘वे समाज को देती क्‍या हैं जो उन्‍हें पढा जाए’ न्‍यूज चैनलों पर या टेलीविजन के लिए यह सवाल और बड़े ढंग से लागू होता है. अपन भी मानते हैं कि इसके लिए टेलीविजन वाले या उसके लिए काम करने वाले ही दोषी नहीं है यह तो बाज़ार का किया धरा है जिसके लिए भारत बहुत बड़ा बाजार है, जहां बिकने की अपना संभावनाएं हैं.

सानिया शोएब प्रकरण में न्‍यूज चैनलों ने फिर अपनी स्थिति और हालात बता दी है. अभी तो शादी में काफी दिन है अगर यही रवैया रहा तो मिर्जा (सानिया) के मलिक (शोएब) होने तक कलई और खुल जाएगी.  फिक्‍की केपीएमजी का सर्वे कहता है कि टेजीविजन उद्योग 2014 तक बढ़कर 521 अरब डालर का हो जाएगा. हम खुश हैं और बहुत खुश भी. खुश इसलिए टीवी मीडिया में नहीं है और बहुत खुश इसलिए कि घर में टीवी नहीं है!!!!

शेरजंग गर्ग की एक कविता (न्‍यूज चैनल वालों के लिए) है…

सत्‍य चुराता नज़रें हमसे इतने झूठे हैं हम लोग,

इसे साध लें उसे बांध लें, सचमुच खूंटें हैं हम लोग!

|बात निकली है तो दूर तलक जाएगी और इसे एक ही आलेख में समेटा नहीं जा सकता|

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Responses

  1. सार्थक चिंतन पृथ्‍वीजी, ढर्रा चल निकला है, पत्रकारिता में मूल्‍यों को बनाए रखना भी टेढ़ा काम है। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया में तो यह असंभव के करीब नजर आता है।

    वैसे महज दो सौ साल पुराने पत्रकारिता के पेशे में क्‍या खबर है और क्‍या खबर नहीं है इस पर एक अलग बहस होने की जरूरत है।

    सानिया और शोएब को मीडिया के सामने शुरू से ही आना ही नहीं चाहिए था। पहले उन्‍होंने इसकी आधिकारिक घोषणा की थी..

    युवा पत्रकारों की आइडेंटिटी क्राइसिस के साथ-साथ डूबते कॅरिअर की आखिरी लौ को चमकाने वाले इस कृत्‍य को क्‍या इन खिलाडि़यों की आइडेंटिटी क्राइसिस में काउंट नहीं करेंगे…

    यह मुझे तस्‍वीर का दूसरा पहलू लगता है…

  2. सत्य दर्शाती पोस्ट……..”
    amitraghat.blogspot.com

  3. Bhai Prithvi Ji……….News Channel Are Showing Own Responsbility. Thats Only Publicity. Agar Chote Ghar Ke Ye Sab Kaam Karte To Log Sham Hone Se Pahle Hi Maar dete

  4. दरअसल पत्रकारिता का उद्देश्य समाज को चैतन्य प्रदान करना है. इसके लिये परिपक्वा मानसिकता का होना अत्यंत आवश्यक है.यह विडंबना है कि आज पत्रकारिता अपरिपक्व लोगों के हाथ में है जो न समाज के मूल्यों के बारे में जानते हैं, न ही विषय-विशेष की प्रसंगिकता का भान है उन्हे. बात आई सत्य की तो सत्य सकारात्मक्ता की ओर जाने के लिये है. केवल भोंडापना प्रदर्शित करना सत्य का हेतु हो ही नहीं सकता.

  5. बेहतरीन आर्टिकल मीडिया को आइना दिखाया है आपने ………..शुक्रिया…

  6. satya h ,samvedanheen aur gair-zimmedar logon kii ek poori zamat janta ko budhhu box ke bithakar sunn ke injection lagaye ja rahi h aur hum aatmmugdh huye muddon se munh mode T.R.P. ka tamasha dekhne men mashgool h.

  7. सही कहा आपने लोगों ने बिना मतलब सानिया प्रकरण को बवाल बना दिया है जिसमें वास्तव में कोई बडी बात नही थी, आखिर किस हक से हमे उनके नीजि फैसलों में दखल देने का हक हैं.

  8. xcellent sir…

  9. सही कहा आपने लोगों ने बिना मतलब प्रकरण को बवाल बना दिया है जिसमें वास्तव में कोई बडी बात नही थी,
    किस हक से हमे उनके नीजि फैसलों में दखल देने का हक हैं.दरअसल पत्रकारिता का उद्देश्य समाज को चैतन्य प्रदान करना है.
    इसके लिये परिपक्वा मानसिकता का होना अत्यंत आवश्यक है.
    यह विडंबना है कि आज पत्रकारिता अपरिपक्व लोगों के हाथ में है जो न समाज के मूल्यों के बारे में जानते हैं, न ही

  10. मुझे तो कई बार तरस आता है इन चैनल वालो की मानसिकता पर !२४ घंटे लायक समाचार न होने की विवशता साफ़ दिखती है कई बार! सरकार को कुछ न कुछ तो कंट्रोल करना ही चाहिए! किस खबर को कितना महत्त्व देना है ये भी ये नहीं जानते!जिस दिन ममता बैनर्जी रेल बजट पेश कर रही थी ,उसी दिन चैनल वाले तेंदुलकर के २०० रन दिखा रहे थे..

  11. i don’t know what kind of role media should play. have you people ever think that every news in the electronic media is seen by lakhs of people in the country. yes it is also true that the relevance of the news matters in the end. but shoaib and saniya is very famous players. what do they do certainly is the matter of discussion and media is doing the same.

  12. bahut achaa likhaa. i think the same.

  13. लेख पर प्रदर्शित प्रतिक्रिया से एक विषय और आया – ‘निजी जीवन में झांकने का अधिकार’. जिस भी परिवेष में हम रहते हैं, उस परिवेष से हमारा लेन-देन चलता रहता है. जिसका अर्थ हुआ कि हम एकाकी (इन आइसोलेशन) न तो रहते हैं और न ही रह सकते हैं. हम ‘सेल्फ रिलायंट’ तो हो सकते हैं, ‘सेल्फ सफीसियेंट’ नही. अतः हमारी कोई भी क्रिया हमारे परिवेष पर असर डाले बिना नही रहती. उसी भांति, परिवेष में होने वाली कोई भी क्रिया हमारे उपर असर डाले बिना नही रहती. अतः यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि हम स्वयं की जिम्मेदारी को समझते हुये ही कुछ करे.

    रहा प्रश्न सानिया के शोयेब से विवाह का, तो इसमें इस्लाम धर्म के विषेशज्ञ व धर्म-पुरुष अपना निर्णय दे देंगे. अतः उस पर विशेष चिंतन की आवस्यकता नहीं है क्योंकि भारतीय कानून भी उसे ही मान्य करेगा. वैसे भी ऐसे विवाह तो होते ही रहते हैं. चूंकि वे सामान्य नागरिक के विवाह हैं, अतः मीडीया के सामने नहीं आते.

    हां, प्रश्न जब किसी भारतीय का ‘शत्रु’ देश के व्यक्ति से विवाह होने का हो, वह भी ऐसे भारतीय का जिसने भारत का अंतर्राष्ट्रीय मंच पर प्रतिनिधित्व किया हो, तब विषय जन-मानस के लिये विचारणीय है. यह तो सर्वज्ञात है कि प्रतिदिन हमारे वीर जवान देश की सीमा पर रक्त बहा रहे हैं. उनके लिये भी जो अब सरहद के पार के लिये विशेष संवेदना रखते हैं. मेरा मंत्वय उन उपरोक्त विशिष्ठ जनों के विवाह में व्यवधान का नही है. मेरी पीडा ही कि मेरे देश का जन-मानस अपने वीर सपूतों के रक्त का मूल्य कितना समझता है?

  14. आपने बिलकुल सही सवाल उठाया है कि सानिया कि शादी को लेकर इतना हंगामा क्यों बरपा है ?कहने में तो बुरा लगेगा लेकिन असली बात सुनहरी काया के प्रति युवाओं कि जो दिलचस्पी रहती है , उसी को भुनाने कि बात है .आजकल मीडिया में भी समाज के प्रति कोई सरोकार नहीं रहा .केवल व्यवसायिक दृष्टी कोण ही हावी है.

  15. aap thiik kahte hain ki logon ko doosre logon ke niji jeevan main jhankne se bachna chahiye. Sania aur Shoeb ki shaadi bhi ek niji mamla hai. Aur bahut se prasiddh logon ki shadiyan hui hai. hamne jana bhi naheen. News chennal ka jahan tak mamla hai ye sahi hai ki unko news chahiye. Unhe news khojni hai, banani hai aur dikhani hai. ye baat alag hai ki unki priority kya hain. Aaj priorities ka adhar hamari sahuliyat par nirbhar rah gaya hai. sansani ka zamana hai. lekin mauzooda mamla keval sania aur shoeb tak hi seemit naheen hai. Ek teesra aadmi bhi hai aur jiska naam hai Ayesha. shaadi ek prakar se mazak si ban gayee hai. Jo bhi ho haqiqat samne aani hi chahiye.

  16. Kuchh chijen hallat per chhor deni chahiyen. chintan ke liye ek vishay ki avsayakta hoti hai or bharat me vishay se jayada lakir jayada mahatavpuran hai.

  17. आपके सवाल और चिन्‍ता शत-प्रतिशत जायज है। पत्रकारिता को भेड़चाल में तब्‍दील करने में जुटे हैं चैनलवाले।

  18. बहुत खूब पृथ्वीजी, दरअसल अब मिडिया का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना ही रह गया है… रहीम के कहे की यह लोग बड़े ही मस्त अंदाज में वाट लगा रहें हैं.. कुछ इस तरह… ”रहिमन पैसा राखिए, बिन पैसा सब सून…” यत्र-तत्र-सर्वत्र यही कालाबजरी वाली मुंह-पुताई कि धंधई बड़े ही जोर-शोर से चल रही है… और कोई पूछने वाला नहीं… भारतेंदु के शब्दों में कहूँ तो ”टेक सेर भाजी, टेक सेर खाजा…” और सब बड़े ही शौक से इसमें शामिल भी हो रहें हैं, वैसे अब तो खुद को ही बुद्दधु बक्शे के सामने नंगा देखने का पश्चिमी शगल ही शुरू हो गया है…

  19. ओशो ने कभी समाचार पत्रों – पत्रिकाओं के लिए सवाल उठाया था कि ‘वे समाज को देती क्‍या हैं जो उन्‍हें पढा जाए’ न्‍यूज चैनलों पर या टेलीविजन के लिए यह सवाल और बड़े ढंग से लागू होता है.
    excellent

  20. आपके सवाल और चिन्‍ता शत-प्रतिशत जायज है। पत्रकारिता को भेड़चाल में तब्‍दील करने में जुटे हैं चैनलवाले।

  21. vivek ji ki baat sach hai aaj media jin haathon me hai un ki prathmikta patrkarita nahi hai. dikhne wale,likhne walon se bade nahi hote. main or aap agar is sach se parichit hain to ye sab ek ghtna se zyada kuchh nahi hai. han is waqt ek aise aandolan ki zaroorat hai jo moolyon ki punrsthpna kare, moolyon ki rajneeti to likhne walon ka ek varg kar hi rha hai.un se bacchna ati-aavashyak hai.

  22. AAJKAL TV DEKHTE WAQT SATARK RAHNA PARTA HAI KI KAHIN INDIA TV, LIVE INDIA, INDIA NEWS, NEWS 24 , AAJ TAK, STAR NEWS JAISE CHANNEL NA LAG JAYE KYONKI INHONE PATRKARITA KA JO AATANKI , GHRINASPAD AUR GHATIYA CHEHRA PRASTUT KIYA HAI USSE MAN GHABRANE LAGA HAI. GANDAGI KO BAR BAR DIKHANA GANDAGI FAILANA HI HAI AUR VARTMAN MEIN ELECTRONIC MEDIA KA ATANKWAD AUR BRASHTACHAR AAJ KI SABSE BARI BIMARI HAI.MEDIA KI BHOOMIKA KI BAAT KI JAAYE TO TO USKE VIKAS AUR VINASH KE PAHLU KA ANUPAT 30:70 HAI.


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