Posted by: prithvi | 27/03/2010

पानी के रंग, जीवन बदरंग

नहरी पानी की कमी के चलते राजस्‍थान के एक बड़े इलाके में पेयजल संकट के समाचार आ रहे हैं. चैत्र, वैशाख, ज्‍येष्‍ठ व आषाढ़ … हालात सच में विकट होने वाले हैं. विशेषकर उत्‍तर पश्चिमी राजस्‍थान में जहां कभी नहरी पानी इफरात में था. लोग अभी से चिंतित हैं.

वैसे भी थार में प्‍यास से किसी बंजारे या यात्री के दम तोड़ने की कहानियां बचपन में कहीं न कहीं सुनने को मिल जाती थीं. सुनते थे कि इनकी रूहें आज भी वहीं भटकती हैं और रात में पानी-पानी की आवाज आती है. अपने आसपास के ही कई धोरों या रास्‍तों पर इन घटनाओं के होने की बातें की जाती. यह बात अलग है कि धीरे धीरे इन कहानियों पर वक्‍त की परत जमा होती गई. हाल ही में खारबारा (छत्‍तरगढ़) के सरंपच ने महाजन इलाके में इसी तरह की घटना का जिक्र किया. किसी के प्‍यास से मरने का.

वैसे यह सही है कि थार का रेतीला समंदर कभी कभी बहुत भयानक व दुरूह हो जाता है. यहां जेठ आषाढ़ की गर्मियों में आंधी और पो मा की सर्दी जीवन को झिंझोड़ कर रख देती है. गर्मी को अधिक खतरनाक प्‍यास और आंधी में भटकने के डर के कारण माना जाता है. पानी की कमी और रेत की अधिकता। विकट थार, जो पता नहीं एक आंधी में क्‍या रूप ले ले। रूखे से पेड़ और मुरझाती सी कंटीली झाडियां। सीधे साधे शब्‍दों में मानवीय जिजीविषा की परीक्षा लेता है रेगिस्‍तान ! बात पानी की ही है. थार के बच्‍चे पानी और आदमी की कद्र करना शायद घूंटी के साथ ही सीख जाते हैं क्‍योंकि वहां पानी और आदमी दोनों की कमी रहती है.

राजस्‍थान के गंगानगर व हनुमानगढ़ जिले की हमारी पीढ़ी को ‘प्‍यास से मर जाना’ अटपटा सा लगता रहा है. लगे भी क्‍यों न, हमारे जिलों में विशेष रूप से आजादी से पहले ही नहरें आ गईं. दुनिया की सबसे बड़ी नहर परियोजनाओं में से एक इंदिरागांधी नहर परियोजना के साथ साथ दो और नहर परियोजनाएं यहां है. हमारी उम्र की पीढ़ी के लिए पानी इफरात में रहा और बचपन में कभी नहीं लगा कि प्‍यास से भी लोग मर सकते हैं.

लेकिन धीरे धीरे पता चलता है कि थार में रेत और पानी का कितना संबंध है. पानी के लिए थार में जीवन भटकता रहा है. पानी कभी यहां पलायन का मुख्‍य कारण रहा है तो मानवीय बसावट का भी. आबादियां वहीं बसीं जहां पानी था. पानी की कमी के कारण ही उसे घी की तरह बरतने का सहज भाव जीवन में आ गया. यह अलग बात है कि बदलते वक्‍त के साथ बहुत कुछ बदल गया. जैसे कि इन दो जिलों में. कभी पानी का संकट था, बाद में पानी की अधिकता परेशानी बन गई और सेम या वाटर लागिंग जैसी नयी परेशानियां सामने आईं. जैसे जैसे अधिक रकबा कमांड हुआ पानी कम होता गया. नहरों के वरीयता क्रम में गडबड़ी की बाते हुईं. तीनेक साल पहले सिंचाई पानी की मांग को लेकर घड़साना रावला क्षेत्र में किसानों का आंदोलन हुआ जिसमें आधा दर्जन भर किसान बेमौत मारे गए.

थार का सबसे उपजाऊ माना जाने वाला इलाका एक बार फिर पानी की कमी, असमान वितरण आदि के कारण संकट के मुहाने पर है. इतिहास का पहिया वहीं लेकर आ गया. प्‍यास से मरने, पानी की अधिकता से तबाह होने और फिर पानी की मांग को लेकर मरने तक. कई बार लगता है कि थार के समंदर में हमने वक्‍त के साथ तृष्‍णाओं के बीहड़ उगा लिए हैं. पानी कम हो रहा है, मांग बढ़ रही है और इसकी कद्र का जो भाव हमारे पास था वह गायब हो गया है.

थार के बच्‍चे पानी और आदमी की कद्र करना शायद बचपन से ही घूंटी के साथ सीख जाते हैं. कई घटनाएं होती हैं. याद है एक बार दादी के साथ घर लौट रहा था. बस से उतरने के बाद हमारी ढाणी कोई तीनेक किलोमीटर थी. जेठ की तपती दुपहरी रेगिस्‍तान में, जमीन मानों भट्टी बन जाती है. सफर करके आ रहे थे, प्‍यास लगी थी. बस अड्डे के पास नहर में थोड़ा पानी चल रहा था. दादी ने किसी तरह पी लिया लेकिन मैं कैसे पीता. उन्‍होंने अपने हाथ से पिलाने की कोशिश की. तीन चार साल के बच्‍चे के मुहं तक आते आते हथेली में कुछ नहीं रहता. दादी को कुछ नहीं सूझा तो उन्‍होंने अपनी एक जूती उतारी, पानी भरा और पिला दिया. बरसों बाद आज भी उस नहर पर से गुजरते हुए यह घटना याद आ जाती है. दादी ने कुछ नहीं कहा था लेकिन भाव कहीं से आ जाता है कि पानी की कद्र करनी चाहिए. वह जीवन के लिए जरूरी है.

थार, इसकी नई पीढ़ी को पानी और इंसान की कद्र करना शायद नए सिरे से सीखना होगा.

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Responses

  1. पानी की कमी के बावजूद राजस्थान के निवासियों ने आम राहगीरों के लिए पानी की व्यवस्था के लिए प्याऊ लगाये | आज भी ये प्याऊ राजस्थान के हर शहर में मिल जायेंगे पर जिन राज्यों में पानी की कोई कमी नहीं है वहां राहगीर पानी के लिए तरस जाते है |

    नहरों में पानी की कमी और गिरता भू जल स्तर वाकई चिंताजनक है

  2. पानी का संकट विकट समस्‍या बनता जा रहा है. जाने इंसान कब समझे, आपका विचार प्रशंसनीय है.

  3. बढ़ती गर्मी के साथ घटते जलस्रोतों पर देशव्यापी विचार करने की जरुरत है. अन्यथा एक दशक में थार क्या पुरा देश पीने के पानी के लिए त्राहि त्राहि करता नज़र आएगा.

  4. good

  5. दादी को कुछ नहीं सूझा तो उन्होंने अपनी एक जूती उतारी, पानी भरा और पिला दिया. ….वाकई पानी और रेगिस्‍तान में अटूट संबंध है. आपके आलेख में उस प्‍यास की गहराई शिद्दत से महसूस होती है.

  6. Prithvi, just read your postings, I really like your selection of issues and writing style. Congrats!

  7. पानी के महत्व के विषय में लिखना आज बहुत प्रासंगिक है. भारतीय संस्क्रिति में जल को देवता का स्थान दिया गया है. नदियों को पूज्य माना है. इस सबके पीछे हमारे पूर्वजों की समझ व दूर-दृष्टि का प्रमाण है.

  8. पृथ्‍वी जी, थार के नहरी इलाकों की हालत वाकई बहुत चिंताजनक हो चली है. कभी पानी में किलोल करने वाला यह इलाका आज पीने के पानी को तरस रहा है. लगता है समय का चक्‍कर घूम कर फिर वहीं आ गया. अनूपगढ, घड़साना, रावला, खाजूवाला जैसे इलाकों में स्थिति बहुत नाजुक है.

  9. nice

  10. बहुत खूब, सचाई को दे‍ दिया शब्‍द

  11. थार में इस तरह की परेशानी होना कोई नई बात नही है लेकिन इस बार लगता है मामला ज्यादा गंभीर है.


कुछ तो कहिए..

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