Posted by: prithvi | 06/03/2010

ढाणी की कहानी

रेत ही रेत, ऊंट, दुर्जेय दुर्ग और बड़े-बड़े महल.. राजस्‍थान की बात करते समय आमतौर पर यही पांच दस शब्‍द हैं जो प्राय: कहे या सुने जाते हैं. वहां के गांवों, चकों और ढाणियों की बात कोई नहीं करता. विशेषकर ढाणी की चर्चा तो शायद ही कभी सुनी हो. सुनने पढने में भले ही अटपटा लगे लेकिन यह सचाई है कि राजस्‍थान या समूचे थार के जीवन की चर्चा ढाणी के जिक्र के बिना पूरी हो ही नहीं सकती.

मानवीय बसावट की सबसे छोटी इकाई मानी जाने वाली ढाणी केवल राजस्‍थान नहीं, समूचे थार और आसपास के इलाके की अनूठी विशेषता है जिस और ध्‍यान नहीं दिया गया है. थार के जीवन में ऐतिहासिक, सांस्‍कृतिक लिहाज से ढाणी का अपना महत्‍व है.

ढाणी थार में मानवीय बसावट की सबसे छोटी इकाई है. सामान्‍य भाषा में इसे फार्म हाऊसों का एक रूप कहा जा सकता है. लेकिन ढाणी फार्महाऊस की तरह विलासिता का प्रतीक कतई नहीं है. यह आम जीवन का अंग है. लोग ढाणियों में रहते हैं. पीढियों से रहते आए हैं और इसने थार की मानसिकता और सामाजिकता को अलग रूप दिया है.

खेत में घर बनाकर रहना ढाणी है. ढाणी है तो थार का जीवन है. थार या राजस्‍थान की अधिसंख्‍य आबादी की नाड़ किसी न किसी रूप से ढाणी से बंधी है. आज भी यहां गांव कम ढाणियां अधिक हैं. सामाजिक जीवन की शरुआत की इस कड़ी की चर्चा ही पुस्‍तक ‘थार की ढाणी’ में की गई है.

आज भी इस रेगिस्‍तानी प्रदेश की अधिसंख्‍य आबादी का ढाणियों से कुछ न कुछ संबंध है. यहां आबादी गांवों में कम ढाणियों में अधिक रहती आई है. यह यहां की ऐसी विशेषता है जो देश में कहीं और दिखाई नहीं देती. ढाणी का जिक्र कर हम राजस्‍थान के समूचे लोकजीवन में झांक सकते हैं. ढाणी का शाब्दिक अर्थ तो है- खेत में घर बसाना . ढाणी का थोड़ा व्‍यवस्थित तथा बड़ा रूप चक है। फिर गांव आते हैं. चकबंदी नहरी प्रणाली के बाद हुई और गांव तो समाज की अपने आप में एक प्राचीन अवधारणा है.

थार में खाली पड़ी एक ढाणी, वाशिंदे शायद पानी चारे या मेहनत मजूरी करने कहीं चले गए.

यानी ढाणी से शुरू कर चक और चक से गांव .. एक तरह से समूचे ग्राम्‍य जीवन को इसमें शामिल किया जा सकता है. इस प्रक्रिया में ग्राम्‍य जीवन के अनेक रंग उघड़ते चले जाएंगे और थार के लोकजीवन की ऐसी-ऐसी विविधताएं सामनें आएंगी जो कभी देखी नहीं गईं.

तीन लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रफल में फैले थार रेगिस्‍तान का अधिकतर हिस्‍सा राजस्‍थान में है. वैसे यह बालू, पंजाब हरियाणा और पड़ोसी पाकिस्‍तान के कुछ सूबों तक फैली है. इस बालुई महासमंदर तथा इसके किनारों पर ढाणी एक संस्‍कृति की तरह पली फूली है.

भारत देश की अधिकतर आबादी आज भी गांवों में रहती है या गांवों से जुड़ी हुई है. गांव-गुवाड़ों की बात कुछ संदर्भ विशेष को छोड़कर, नहीं ही की जाती. की भी जाती है तो उसमें भाषा और आग्रह हमारे यानी शहर वालों के होते हैं. उसे गांव की बात न कहकर गांवों पर शहरों का नजरिया कहा जा सकता है. शायद यही कारण है कि गांव की बातें और कथाएं बहुत पीछे छूट गईं. ढाणियों-गांवों में समस्‍याएं या विसंगतियां ही नहीं होती, इस जीवन के ढे़र सारे और पहलू भी होते हैं जिस और ध्‍यान ही नहीं दिया जा रहा.

(पुस्‍तक ‘ थार की ढाणी’ के एक आलेख पर आधारित, पुस्‍तक के बारे में अधिक जानकारी के लिए कृपया यहां क्लिक करें)

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Responses

  1. आपको पढ़ा, अच्छा लगा.

    विगत कुछ दिनों से व्यस्तता के चलते सक्रियता में व्यवधान हुआ है, क्षमाप्रार्थी हूँ, जल्द ही सक्रियता पुनः हासिल करने का प्रयास है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

  2. आपकी पोस्‍टों में काफी निस्‍संगता नजर आती है जो कि विरल होने के साथ-साथ प्रशंसनीय भी है। आमतौर पर ब्‍लागों में मैं का महिमामंडन ही होता है। थोड़ा विस्‍तार से कभी इस बात की चर्चा करें कि राजस्‍थान की माटी में पितृसत्‍तात्‍मक समाज के ढेर सारे गुण आम जीवन में नजर आते हैं। कटारीदार मूंछे सिर्फ प्रतीकात्‍मक नहीं है ऐसा वहां रह और काम कर चुके साथियों ने मुझे बताया है।
    थोड़ा विस्‍तार से अपनी बात रखता हूं पर जरा ब्‍लाग पर कुछ देर और ठहरकर।

  3. बढ़िया जानकारी दी आपने ढाणी के बारे | कभी ढाणियों में सुविधाओं की कमी के चलते रहना आसान नहीं था पर अब यातायात और संचार के बढ़ते साधनों के चलते ढाणियों में भी रहना आराम दायक हो गया है |
    सीकर , नागौर , जोधपुर , बाड़मेर आदि जिलों की कई ढाणियों में जा चूका हूँ वहां समय बिताना बहुत सकून देता है |

  4. पुस्‍तक के लिए पुनः बधाई. विमोचन के दौरान कही एक बात याद आ रही है कि यह एक बेहतरीन किताब है और श्रृंखला को आपको जारी रखना है. इस विषय पर आपके क्रमिक लेखन और अगली किताब की प्रतीक्षा रहेगी. बहुत शुभकामनाएं.

  5. Dear Prithvi,
    Some where you are paying the debt of your motherland the land with specific location where you got birth, realy each and every words of “Dhani ki kahani” is seem from your heart, you are so simple, sincere, down to earth and sensitive to roots, keep it on it shows your originality.

    With best wishes

    R K Nain


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