Posted by: prithvi | 15/02/2010

कागद, जो लिखते हैं

नीरज दइया के शब्‍दों में वे वक्‍त के साथ आगे बढ़ने वाले कवि हैं. वे चंद्र सिंह बिरकाळी के सबसे चहेते कवियों में रहे और तैस्‍सीतोरी के धोरे पर काव्‍य पाठ करने वाले कवियों में से एक हैं. कवि हैं और दिल से कवि हैं. ‘जागती जोत’ के संपादक रहे व राजस्‍थान क्रिकेट संघ की समिति के सदस्‍य भी. ओम पुरोहित कागद… जिनकी मानव मात्र में भी उतनी ही आस्‍था जितनी ज्‍योतिष विद्या में. उनका मानना है कि रचनाकार को जमीनी होना चाहिए क्‍योंकि वही उसकी थाती है. कागद जी के दो काव्‍य संग्रह पिछले दिनों आए और विशेषकर कालीबंगा पर लिखी उनकी कविताओं की खासी चर्चा है. लीक से हटकर और इस विषय पर लिखी अपने आप में अनूठी कविताएं. हनुमानगढ़ में रहने वाले कागद जी नई कविताओं पर हाल ही में चर्चा हुई..

कालीबंगा पर कविताएं कैसे ?

कुल 20 कविताएं हैं कालीबंगा पर.. इतिहास की सबसे प्राचीन नदियों में से एक सरस्‍वती हमारे क्षेत्र से बहती थी. लगभग 300 किलोमीटर के क्षेत्र में उस सभ्‍यता संस्‍कृति के अवशेष बिखरे हुए हैं. हड़प्‍पा मुअन जो दरो काल या उससे भी पहले की सभ्‍यता के अवशेष कालीबंगा में मिले. क्षेत्र में लगभग ऐसे थेहड़ हैं. इस सभ्‍यता, कालीबंगा से शुरू से ही जुड़ाव रहा, शुरुआत खुदाई वगैरह, वहां मिली चीजें, हालात को देखा तभी से मन में कुछ खदबदा रहा था जो इन कविताओं के रूप में बाहर आया है. क्षेत्र और कालीबंगा से भावनात्‍मक लगाव ने भी उद्वेलित किया.

इतिहास व ऐतिहासिक स्‍मारकों की अनदेखी ?

दरअसल हमारा इतिहास या अ‍तीत बहुत ही वैभवशाली रहा है. चप्‍पे चप्‍पे पर इतिहास का कोई ने कोई वरका किसी न किसी रूप में मिल जाता है. सभ्‍यताओं के अवशेष मिलते हैं, कहानियां मिलती हैं, लोककथाएं मिलती हैं, हमारे यहां हजारों बोलियां हैं जिनके अपने शब्‍द भंडार हैं. शायद इसी ‘अधिकता’ के कारण इतिहास और ऐतिहासिक धरोहर के प्रति भावुकता भरा जुड़ाव हमारे यहां देखने को नहीं मिलता. हो सकता है कि कालीबंगा के वाशिंदों को ही कालीबंगा के इतिहास से जुड़ाव नहीं हो लेकिन इससे सचाई झुठला नहीं जाती.

कालीबंगा पर कविताएं पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

राजस्‍थानी भाषा व मान्‍यता ? 

राजस्‍थानी समृद्ध भाषा है. 13 करोड़ लोग इसे बोलते हैं. भारत के अलावा पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश तक में इसे बोलने वाले हैं. रूस में तो एक पूरा गांव है  राजस्‍थानी बोलने वालों का. तो जो मान्‍यता की औपचारिकता बची है उसे जल्‍द पूरा होना चाहिए. इसका कोई विकल्‍प नहीं है. इससे कम बोली जाने  वाली भाषाओं को सरकारी मान्‍यता मिल गई है तो इसके क्‍यूं नहीं. सवाल कई स्‍तरों पर है जिसे जल्‍द निपटाया जाना चाहिए. राजस्‍थानी भाषा के लिए आंदोलन की दिशा ठीक, दशा खराब. दु:खद यही है कि यह आंदोलन राजनीतिक स्‍तर पर पैठ नहीं बना पाया.

राजस्‍थानी साहित्‍य ?

बहुत अच्‍छी स्थिति में और क्षेत्रीय भाषाओं में सबसे समृद्ध साहित्‍य में से एक. बहुत अच्‍छा व प्रभावी लिखा जा रहा है. सराहा भी जा रहा है, पहुंच भी  पढ़ी है बस पाठकों का थोड़ा टोटा है.. टोटा खरीदकर पढ़ने वालों के रूप में है. पढ़ने की संस्‍कृति व आदत तो डालनी ही होगी. खासकर हमारी पीढी में  कई प्रभावी रचनाकार सामने आए हैं.. जिनसे उम्‍मीदें बंधती हैं या जो उम्‍मीदों पर खरे उतरे हैं.

कुछ नाम?

अनेक हैं.. हमारी पीढ़ी में मालचंद तिवाड़ी से लेकर मंगत बादळ, उपेंद्र उम्‍मट, बुलाकी शर्मा, मिठेश निर्मोही, ज्‍योतिपुंज, मुकुट मणिराज, भरत ओळा, सत्‍यनारायण सोनी, रामस्‍वरूप किसान व विनोद स्‍वामी तक ने अच्‍छा काम किया है.. (कुछ नाम छूटें तो अन्‍यथा न लें) .. पहचान व प्रतिष्‍ठा पाई है. यह काम आगे बढता दिखता है.

राजस्‍थानी साहित्‍य की विशेषता?

थार का मानस विषमताओं में जीता है. अकाल, पानी की कमी, जेठ में तपती धरा तो पो माह में कड़कड़ाती ठंड… तो जीवन में यह जो द्वंद्व है वही राजस्‍थानी साहित्‍य में दिखता है और उसे वास्‍तविकता के धरातल से जोड़ता है. राजस्‍थान का साहित्‍य आम आदमी से लगता है, जमीन से जुड़ा है. यह सजावटी नहीं और न ही इसमें पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति से जुड़ने की अवांछित छटपटाहट दिखती है. वर्तमान अच्‍छा, भविष्‍य बेहतर लगता है.

क्षेत्रीय भाषा में लिखने की सीमाएं?

ऐसा तो नहीं लगता. ज्ञान के प्रवाह में भाषा बाधा नहीं बनती. राजस्‍थानी अपने आप में व्‍यापक व समृद्ध भाषा है.. फिर बदलते वक्‍त के साथ पहुंच के साधन भी बढे हैं. इंटरनेट हो या अनुवाद की बात.. चीजें काफी बदली हैं.

कागद : केसरीसिंहपुर में जन्‍में कागद राजस्‍थानी व हिंदी में समान रूप से प्रभावी दखल रखते हैं. राजस्‍थानी में अंतस री बळत, बात तो ही,  कुचरण्‍यां व पंचलड़ी तथा हिंदी में धूप क्‍यों छेड़ती है, आदमी नहीं है, थिरकती है तृष्‍णा (कविता संग्रह), मीठे बोलों की शब्‍दपरी व जंगल मत कोटा  आदि बाल साहित्‍य प्रकाशित. प्रदेश के प्रतिनिधि कवियों के संकलन ‘रेत पर नंगे पावं’ में कविताएं. इन्‍हें राजस्‍थानी साहित्‍य अकादमी उदयपुर से  ‘आदमी नहीं है’ के लिए सुधींद्र पुरस्‍कार तथा राजस्‍थानी भाषा व साहित्‍य अकादमी बीकानेर से गणेशी लाल व्‍यास पुरस्‍कार मिल चुका हैं. उनका  ब्‍लाग http://omkagad.blogspot.com है.

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Responses

  1. हड्डियाँ भी मौन हैं
    नहीं बताती
    अपना दीन-धर्म।…

    बेहतर…आभार!

  2. अपने इलाके और इलाकाई लोगों से अपनत्‍व करना तो कोई भाई पृथ्‍वी जी से सीखे। गजब विवेचन है ओम पुरोहित जी का, उनके काम का। वास्‍तव में जो काम अखबारों को करना चाहिए वह काम पृथ्‍वी जी अपने ब्‍लाग में कर दिखाते हैं।

  3. ‘कांकड़’ की टीम का आभार कि कागद जी को जानने का अवसर मिला…

  4. अच्‍छा साक्षात्‍कार. सीधी सीधी बात, बिना किसी किंतु परंतु के. मैं इन कविताओं का पहला पाठक हूं. और इन कविताओं पर चित्र भी बनाए.. प्रदर्शनी भी की. मुझे तो ये कविताएं चित्रों की भवभूमि नजर आईं.

  5. भाई पृथ्‍वी,
    दिल्ली जैसे महानगर के व्यस्त जीवन को भोगते हुए अपने भीतर जो आग बचा रखी है उसके लिए साधुवाद ! मुझ से अनौपचारिक बातचीत मेँ इतना कुछ अंवेर लिया ! विश्वास ही नहीँ होता । कालीबंगा मेरी कविताओँ मेँ कम आपके ज़हन मेँ ज्यादा थी जो आप से शब्द पा कर मुखरित हो गई ।

  6. कागद जी के बारे में तो काफी कुछ जानते थे पर राजस्थानी पर बहुत कुछ नया जानने को मिला!अब हम सब को इसकी मान्यता के बारे में कुछ ठोस करने की जरूरत है…….

  7. वाह! बहुत कागदजी से कांकड़ पर मुलाकात कर अच्छा लगा. पृथ्वी जी, आपकी जितनी सराहना की जाए वो कम है.. बहुत अच्छा काम कर रहे हो आप.

  8. manyavar
    aaj kagat jee ke baare ek baat kahoonga ki hanumangarh ki syan hai rajsthani bhashaa ko jinda kar rakha mai kagat jee ko bhahoot hee bhalee bhanti jantoo hoo aapki lekhani maine jagti jot mai khoob padi hai aap dil ke bhahoot hi achhe hai samaj me bhi pratishthaa hai or agar aap dungargarh jate hai to sri syam maharshee aour ramkishan uppadhaya se mulakat jaroor karna inke bare wo bhahoot batange

  9. Kesrising pur ri upjayu dherti m jenmye Om ji ki kavitye bhi bhut upjayu h.dhereti ki urberta ka Aapni kavita ko bhut hi sehej k rekha h.Serswati Nadi ka pichha kerte huye.kalibangan tek ja phuchye.kalibangan ka jo chitren om ji n kiya h.us s legta h.jindgi phir se sewener geyi h.kali bangan ka jo sonderye kavita m dhika us se m to bhit hi prbhavit hu.
    mane kalibangan ko bhit hi nazdik se dekha h.sirf khender k rup m.Lakin om ji n use bhut hi sunder rup diya h.OM JI JAISE Rachanakar ko is payre se kalibangan k liye dikl se payar.or sadhu-bad.
    NARESH MEHAN

  10. भाई पृथ्वी जी, आदरणीय “कागद” जी के कृतित्व व व्यक्तित्व से रु-ब-रु करवाकर आपने उलेखनीय काम किया है ।
    मैं उनके अद्यतन साहित्य का पाठक हूँ ।
    आपके ब्लॉग पर अलग अंदाज में उनके कृतित्व व व्यक्तित्व पाकर बहुत प्रसंता हुई।
    कालीबंगा पर उनकी कविताये लाजबाब है ।
    उनकी कविताओं में कालीबंगा जीवंत हो उठी ।
    शायद किसी कवी ने पहली बार कालीबंगा पर कवितायेँ लिखी हैं ।
    आपको साधुवाद व “कागद” जी को बधाई ।
    वीरेंद्र ढुंढाडा़, ब्यूरो चीफ, आज़ाद न्यूज़ चैनल, जयपुर

  11. कागज जी, इसीलिए तो हमारे गरू हैं.
    :- anil jandu president Raj. working jouranlist union, HANUMANGARH

  12. वाह! बहुत कागदजी से कांकड़ पर मुलाकात कर अच्छा लगा. पृथ्वी जी, आपकी जितनी सराहना की जाए वो कम है.. बहुत अच्छा काम कर रहे हो आप.

    ANIL JANDU
    BYURO CHIF SEEMA SANDESH HANUMANGARH

  13. भाई अनिल जांदू ने मुझे नाहक गुरु लिख दिया।ऐसा कुछ भी नहीँ है।गुरुता तो विलक्षणता है जो मुझ मेँ हरगिज नहीँ।उनके दिल मेँ मेरे प्रति जो प्यार और सम्मान है वही इस शब्द को लाया है।हम जब भी अतिसंवेदनशील हो जाते है तब अतिरंजित शब्दोँ का व्यवहार कर जाते है। अनिल जांदू बहुत सरल, अतिसंवेदनशील एवं भावुक व्यक्ति हैँ।बस भावना मेँ बहे हैँ।
    -ओम पुरोहित’कागद’

  14. kaalibanga ka jeewant chitran karne par kagad ji ko hardik badhaee. Apne apne blog me inka interview deiya, iske liye apko badhaee.
    -Deendayal Sharma, Lit. Editor (Hony.)
    Taabar Toli,
    Hanumangarh Jn. 335512, Rajasthan http://deendayalsharma.blopspot.com

  15. आदरणीय पृथ्वी जी
    आपके ब्लॉग पर कागद जी का साक्षात्कार पढ़ते हुए आनंद की अनुभूति हुई बहुत सी जानकारी के साथ साथ कालीबंगा पर अतीत को उकेरती कागद जी की कविताओं ने कालीबंगा को फिर से जीवित कर दिया मेरी नज़र में कालीबंगा पर किसी कवी ने पहली बार कवितांए लिखी हैं अपने वर्तमान और अतीत को रूपायित करती इन कविताओं के लिए साधुवाद.. इन कविताओं से शायद बिसरती हुई कालीबंगा को फिर से मान मिले शासन व् प्रशाशन यहाँ पर्यटन की संभावनाओ की तलाश कर सके और इस उपेक्षित पूरा सम्पदा की सुध ले सके हार्दिक बधाई …….पृथ्वी जी, ग्रामीण कला संस्कृति और संस्कार को अपने ब्लॉग पर जगह देने के लिए आप भी बधाई के पात्र हैं
    गुलाम नबी
    रिपोर्टर आज़ाद न्यूज़, हनुमानगढ़

  16. पृथ्वी जी
    वाह! क्या बात है ! आपके ब्लॉग पर कवितायेँ !! बधाई हो !!! आपका ब्लॉग ग्रामीण अंचल की विशेषताओं को आगे लाने के लिए विख्यात हैं लेकिन अब साहित्य के लिए भी जाना जायेगा I कागद जी ने कालीबंगा जैसे नीरस विषय पर भी उलेखनीय कवितायेँ लिख कर सराहनीय कार्य किया है इससे भी महान काम आपने उनका साक्षात्कार अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर किया है I कागद जी को बधाई और आपको साधुवाद !
    विश्वाश बठेजा, ब्यूरो चीफ
    पंजाब केसरी ,हनुमानगढ़

  17. kagad ji ki sabhi rachnayen…. dhoop kyun chhedti hai se lekar panchladi or aankh bhar citraam jisme ki kalibanga par kavitayen sammilit hain, un ka parichya de deti hain. prithvi ji ki mulaqat bahut achhi hai.. om ji ki achhi kavitaon par imaandaari se ki gayin pratikriyayen achhi lagi, par कागद जी ने कालीबंगा जैसे नीरस विषय पर भी उलेखनीय कवितायेँ लिख कर सराहनीय कार्य किया है ye baat vishvas ji kah di,karya to sarahniya hai lekin vishya neeras nahi hai, ye baat kagad ji ki kavita “madhr-madhri raag” padenge to aap ko bhi lage ga.

  18. कागद जी कि कविताऐ मन को छुने वाली है।

    छोटा भाई
    नंद लाल पुरोहित

  19. Aapki kavita man ko chhune vali h.


कुछ तो कहिए..

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