Posted by: prithvi | 30/01/2010

शहर में गांव की बेटी

गांव के बड़े से आंगन

उससे भी बड़ी बाखळ में


चिड़ी सी चहकती

हवाओं सी नाचती

महुए सी महकती

(और) सर्दी की धूप सी खिलती

हमारी बेटी


मेमने से खेलती

बिल्‍ली से झगड़ती

गाय से भागती

(और) ऊंट से डरती है.


दूध से बिदकने

दही पे मचलने

दळिए को गटकने

(और) हांडी को खुरचने वाली

हमारी बेटी


डिग्‍गी पे नाचती

चारपाई पे कूदती

रेत में गडमडाती

(और) कादे में मुस्‍कुराती है.


बाबा मा चाचू नाना बुआ

की लाडली

मासी मामा भैया दीदी

(और) बास के ढेर सारे बच्‍चों से लुका छिपी

खेलने वाली हमारी बेटी


दिल्‍ली में

तीसरे माले के दो कमरों के मकान में

गुमसुम व चिड़चिड़ी हो जाती है

रिश्‍तों, पौधों व सखियों का उसका वटवृक्ष

कढी पत्‍ते के गमले में सिमट जाता है

(और) आंखों में उग आते हैं सवालों के बीहड़.


सवाल कि

क्‍यूं हमने सीमेंट के जंगल उगाए,

और नहीं रखी किसी बगिया के लिए जगह

क्‍यूं छोड़ आए हम रिश्‍तों के पौधे

गांव मलकाना खुर्द या रामरख की ढाणी में

क्‍यूं गांव गांव ही रह गए, शहर कुछ ज्‍यादा ही शहर हो गए

जहां गाय का रंभाना ही बड़ी बात, गाय पालना तो कौड़ी है दूर की

स्‍नेह की नदियां और लगाव के सारे सोते सूख गए

क्‍यूं महानगरों में हैं लाड़ की खराब टोंटियां

और सूखती जीवन को सींचने वाली जड़ें.


इन सवालों के साथ

हमारे विकास व विनाश के बीच की रेखा को

मिटा देती है हमारी बेटी

जैसे कोई बच्‍चा,

कागज पर बने ईश्‍वर को मिटा देता है रबड़ से.

दिल्‍ली में हमारी बेटी

गांव जाने को मचलती है.

। बाखळ यानी आंगन के बाहर का हिस्‍सा. जहां गाय का रंभाना .. प‍ंक्ति साभार हेमंत शेष, कागज पर बने ईश्‍वर पंक्त्‍िा .. साभार त्रिभुवन, छाया नेट से।

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Responses

  1. वाह ! शुभकामनाएं !

  2. शुभकामनाएं !

    joshi

  3. hmmm बहुत खूब, दिल को छूने वाली पंक्तियां हैं आपकी …

  4. बहुत खूब, दिल को छूने वाली पंक्तियां हैं आपकी

  5. बहुत प्‍यारी कविता है गांव की बेटी.

  6. बहुत खूब, सचाई को दे‍ दिया शब्‍द-रूप.

  7. पृथ्वी जी, मान गए आपने कविता के माध्यम से नगरीए जीवन प्रणाली पर कमाल का कटाक्ष किया है, उम्मीद है आपके कुछेक और पोस्ट पढ़ने को मिलेंगे.

  8. बेटी की आंखों में जो सवाल हैं
    देख कर मेरे नैनों में भी बवाल है
    आगे आगे बस आगे इस दौड़ में
    ईश्‍वर का मन मरने को बेहाल है.

  9. पृथ्वी जी, जब गांवो के हालत खराब हो तब शहरों की तरफ रुख करना गलत नही है सिर्फ जरुरत है तो कुछ चीजों पर ध्यान देने की जैसे देखभाल , सही वातावरण और अच्छे संस्कार. शहरों में भी अगर चाहें तो गांवो का आंनद ले सकते है.

  10. एक कड़वा सच, सोचने को मजबूर करता हुआ।सुदंर कविता के लिए बधाई स्‍वीकारें पृथ्‍वी जी।

  11. आपके दोनों विषय ‘गाँव’ और ‘बेटी” अच्छे लगे…गाँव का प्यारा सा सीधा सादा जीवन शहर में नहीं मिल सकता ,इसी प्रकार बेटी की जो भावनाएं गाँव के निर्मल वातावरण में थी ,वो शहर के फ्लेट नुमा घर में अभिव्यक्त होनी मुश्किल है!पर बढ़ते शहरी करण के इस दौर में ये सब तो झेलना ही होगा..

  12. बहुत सुंदर अहसास भरा‍ लिखा है… दिल की सब बातें हैं बस.

  13. सर जी पढ़कर सच में आनंद आ गया..

  14. बहुत सुंदर अहसास

  15. gauv ki saundhi saundhi sugandh ko leell jate chamchamate bejan shahar ,bholi muskanon ko nigal jate hain ye biyaban shahar .par aap ne shabdon ka parv likh kar betiyon ki masoomiyat aur gauv ka chitran chule ki rakh aur na jane kitana hi apna sa katha kavita ka aboojh bhandar wah aap ko hardik shubhakamnayen

  16. तीसरे माले के दो कमरों के मकान में

    गुमसुम व चिड़चिड़ी हो जाती है

    Jyada ki chahat hame kaha khinch laai

    Is ghutan mai gumsum or chidchidi nahi ho to kya kare lugai


कुछ तो कहिए..

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