Posted by: prithvi | 22/01/2010

इब्‍न ए बतूता, किसका बतूता?

इब्‍ने बतूता .. एक छाया नेट से.

बात शुरू हुई थी इब्‍ने बतूता से! आश्रम से संसद मार्ग जाते हुए यह गाना पहली बार एफएम पर सुना और सुनते ही कान खड़े हो गए. इसके कई कारण हैं.. इतिहास में रुचि होने के कारण यह स्‍वत:स्‍फूर्त जिज्ञासा थी कि इब्‍ने बतूता शब्‍द से अगर गाना शुरू हुआ है तो इसका उस ऐतिहासिक इब्‍ने बतूता से क्‍या लेना देना, फिर इसे किसने लिखा है तो तीसरा संगीत व गायन? आगे बढ़ने से पहले एक बात स्‍पष्‍ट कर दें कि गाना जितना अच्‍छा लिखा गया है उससे अच्‍छा संगीतबद्ध किया गया है उससे भी अच्‍छा गाया गया है. सुखविंदर तो खैर लाजबाव हैं ही, मिक्‍का भी कम नहीं रहे. अपने को मिक्‍का से ऐसी उम्‍मीद नहीं थी और संगीतकार ने निसंदेह रूप से उन पे विश्‍वास कर बड़ा काम किया जिस पर वे खरे उतरे.

फिल्‍म ‘इश्किया’ के इस गाने से कई बातें निकलती चलीं गईं. बचपन में एक कविता पढ़ी थी ‘इब्‍ने बतूता पहन के जूता’ वो दिमाग की  टीएफटी पर तैरने लगी और उसके बाद गूगल से सर्वेश्‍वरदयाल सक्‍सेना सामने आ गए. सर्वेश्‍वर जी के साथ साथ दिनमान, पत्रकारिता, चर्चे  व चरखे जैसे कई शब्‍द पापआप की तरह हायतौबा मचाने लगे. यहीं से पता चला (जैसी कि उम्‍मीद थी) कि यह गाना गुलजार साब ने लिखा  है. गुलजार साब इन दिनों जयपुर साहित्‍य मेले में हैं जहां उन्‍होंने कहा है कि आज के गीत चलताऊ हैं और वही गीत लिखे जाते हैं जो युवाओं  को पसंद आते हैं. उन्‍होंने कहा कि अलग अलग भाषाओं के चंद बोलों को एक जगह शामिल कर उसे गीत का रूप दिया जा रहा है जो ठीक  नहीं. साथ ही उन्‍होंने कहा ‘हालांकि मुझ जैसे गीतकार को भी फिल्‍मोद्योग में टिके रहने के लिए ऐसा करना पड़ रहा है.’

तो बात इब्‍ने बतूता गीत से निकल कर मौजूदा गीतों, गीतकारों तथा 14वीं सदी के उस यात्री तक पहुंच गई जिसका नाम इब्‍ने बतूता था. हमें   गुलजार साब का गीत उतना ही पसंद आया जितनी कि सर्वेश्‍वर दयाल की कविता थी. लेकिन इन दोनों में इब्‍ने बतूता को घसीटना अपनी समझ से परे रहा. खैर गुलजार साब का गीत, सर्वेश्‍वर दयाल जी की कविता और इब्‍ने बतूता की बातें एक साथ रखें तो रोचक चीजें सामने आती हैं. वो कहते हैं ना कम लिखे को ज्‍यादा समझना! गुलजार साब अपने पसंदीदा ग़ज़लकार, गीतकार व फिल्‍मकार हैं.

र्वेश्‍वर जी: तीसरा सप्‍तक के कवियों में प्रमुख सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म बस्ती जिले के एक गांव में हुआ. उच्च शिक्षा काशी में हुई. पहले अध्यापन किया, फिर आकाशवाणी से जुडे। बाद में ‘दिनमान के सहायक सम्पादक बने. इनकी रचनाएं रूसी, जर्मन, पोलिश तथा चेक भाषाओं में अनूदित हैं. इनके मुख्य काव्य-संग्रह हैं : ‘काठ की घंटियां, ‘बांस का पुल, ‘गर्म हवाएं, ‘कुआनो नदी, ‘जंगल का दर्द, ‘एक सूनी नाव, ‘खूंटियों पर टंगे लोग तथा ‘कोई मेरे साथ चले. इन्होंने उपन्यास, कहानी, गीत-नाटिका तथा बाल-काव्य भी लिखे. साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित सक्‍सेना का कालम चर्चे व चरखे पाठकों को आज भी याद है.

इब्न-ए बतूता: मोरक्को के बतूता ने 14 वीं शताब्दी में मुसाफिर बन कर दुनिया की सैर की. बतूता का जन्म 24 फ़रवरी 1304 को हुआ था. पूरा नाम था मुहम्मद बिन अब्दुल्ला इब्न बत्तूता. उन्‍होंने लगभग 74,000 मील की यात्रा की थी और भारत भी आए. कहते हैं कि वे मोहम्मद बिन तुगलक के चहेते थे व तुगलक के दरवार में उन्‍हें काजी का ओहदा दिया गया. उस दौर के बारे में जानकारी लेने के लिए इब्न-ए-बतूता का लिखा इतिहास बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.

दिल्ली सल्तनत में हजरत अमीर खुसरो के बाद इब्न-ए-बतूता का लिखा इतिहास ही उस दौर की सही जानकारी देता है. मुहम्मद तुगलक ने बतूता को चीन के बादशाह के पास अपना राजदूत बनाकर भेजा, लेकिन दिल्ली से रवाना होने के कुछ दिन बाद ही वह बड़ी विपत्ति में पड़ गया और बड़ी कठिनाई से अपनी जान बचाकर अनेक आपत्तियाँ सहता वह कालीकट पहुँचा.ऐसी दशा में उसने समन्दर से चीन जाना उचित नहीं समझा और नीलगिरी की पहाड़ियों और हिमालय के रस्ते होता हुआ लंका, बंगाल आदि प्रदेशों में घूमता चीन जा पहुँचा.इसमें कोई शक नहीं है है बतूता एक बहादुर यात्री था.यात्री होने के साथ ही वो विद्धान् और लेखक भी था.

कविता बनाम गीत

गीत (सार)

इब्‍ने बतूता ता ता ता

इब्‍ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता

इब्‍ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता

पहने तो करता है चुर्रर

उड उड आवे आ आ, दाना चुगे आ आ

उड उड आवे आ आ, दाना चुगे आ आ

उड जावे चिडिया फुर्रर

इब्‍ने बतूता ता ता ता

इब्‍ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता

अगले मोड पे, मौत खड़ी है

अरे मरने की भी क्‍या जल्‍दी है

होर्न बजाके, आवत जनमें

हो दुर्घटना से देर भली है

चल उड जा उड जा फुर फुर

इब्‍ने बतूता ता ता ता

इब्‍ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता

(गुलजार, इश्किया फिल्‍म से)

……

इब्नबतूता

पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
थोड़ी घुस गई कान में
कभी नाक को
कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता
उड़ते उड़ते उनका जूता
पहुंच गया जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दूकान में
-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

।। गुलजार, सर्वेश्‍वर व इब्‍ने बतूता पर जानकारी विभिन्‍न स्रोतों से जुटाई गई है जिनमें  बुरा भला कविता कोष भी  हैं।।

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Responses

  1. बहुत ही आवश्‍यक जानकारी दी आपने… मैंने भी इनके बारे में सातवीं या आठवीं में पढ़ा था. जहां तक मेरी जानकारी है बतूता चीन पहुंचे तब तक या तो तुगलक गदी पर नहीं रहा या उसकी म़त्‍यु हो चुकी थी. क्‍या यह सही है.
    गीत व कविता लिखकर देने के लिए शुक्रिया. जय हिंद.

  2. बहुत उम्दा आलेख..आनन्द आ गया दोनों गीत पढ़कर..गुलज़ार सा. और सर्वेश्वर जी के क्या कहना!!

  3. बहुत काम की जानकारी दी है आपने
    आपका शुक्रिया

  4. आपने इब्न बतूता का ख़ूब पोस्टमॉर्टम किया है। हमने कुछ ऐसा ही इस फ़िल्म के दूसरे गीत के साथ करने की कोशिश की है।

  5. very unusual information, good

  6. बहुत खूब लिखा है जनाब, इब्ने बतूता के बारे में तो हमने सुना है पर उनके ऊपर कुछ काव्य भी लिखा जा सकता था ये हमारी कल्पना के परे की चीज़ हुई. तभी तो कहते हैं कि जहाँ ना पहुचे रवि, वहां पहुचे कवि. लिखते रहिये. हम भी पढ़ते रहेंगे.

  7. पृथ्वी जी, पहले तो मैं आपकी लेखन कला की प्रशंसा करना चाहुगां. आपके ब्लॉग की लेखन को देखकर लगता हैं कि आप एक अच्छे लेखक हैं. इसी तरह लिखते रहिए .आपने बिलकुल ठीक कहा कि गुलजार का कोई सानी नही हैं , उन्होने बडे ही रोचक तरीके से इन गानों को लिखा हैं . हां यहा हमें सर्वेश्‍वरदयाल सक्‍सेना जी को भी नही भूलना चाहिए.

  8. nice writing.

  9. यार आपने तो हद कर दी. गीत पहले से ही हिट हो रहा है. अब और लोग इसे सुनेंगे.

  10. बहुत अच्‍छी जानकारी दी आपने …!!

  11. सच में मुझे इतना कुछ पता नहीं था..आपने अच्छी जानकारी दी!गुलज़ार जी ने लिखा है तो कुच्छ तो ख़ास होगा ही…!बात निकली है तो दूर तक जाएगी,इब्नेतूता की भी यही कहानी है..

  12. amazing Prithvi Bhai. You are really supurb. Usually people listen a song, admire and forget that. But u reserached on it and given the so interesting information. So nice of you.
    Raman

  13. शब्दों का चयन रोचक है और बहुत अच्छी जानकारी दी गयी है . पाठक आखिर तक बंधे रहता है और एक लेखक की यह सबसे बड़ी उपलब्धि होती है.

  14. जैसा कि सभी ने लिखा है कि ये अपने आप में एक विशिष्‍ट रचना है. निसंदेह इस रचना के गर्भ में आपकी मेहनत व खोजपूर्ण व्‍यक्तित्‍व छुपा है. बधाई.

  15. कमाल का शोध किया है भाई पृथ्‍वी। बधाई।

  16. great, this information is priceless.

  17. सच में मुझे इतना कुछ पता नहीं था..आपने अच्छी जानकारी दी! गुलज़ार जी ने लिखा है तो कुच्छ तो ख़ास होगा ही…!बात निकली है तो दूर तक जाएगी, इब्नेतूता की भी यही कहानी है..

  18. ek achchhi jankari jise is geet ko gungunane walon ko bhi janana jruri hai.


कुछ तो कहिए..

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