Posted by: prithvi | 28/12/2009

नया साल : प्रार्थना व विश्‍वास

हर प्रतिगामी लहर    

और सूनामी तूफान

के बाद भी

हम उठ खड़े होते हैं

सहयोग के दरवाजों

उम्मीद की खुली खिङकियों के साथ.


हम जानते हैं

ज्वार के साथ ऊफनता जल

भाटे के साथ बैठ जायेगा

और बची रहेगी

विश्वास हौसले की इतनी जमीं

कि हम खड़े हो सकें

नये आज के साथ .

(दिसंबर 2004 में सूनामी के बाद लिखी गई पंक्तियां)

नया साल शुरू हो रहा है. जश्‍न मनाने की तैयारियां हैं. यह नए तरह के त्‍योहार हैं जो हमारे जीवन में घुल मिल रहे हैं. दरअसल विकटताओं व निराशाओं के बीच उत्‍सव व उम्‍मीद के तिनके बीनना मानव स्‍वभाव है. उन्‍हीं तिनकों से कहीं कुछ सृजित होता है और जीवन चलता रहता है. उम्‍मीद मानव इतिहास का सबसे पुराना ईंधन माना जाता है. सदियों से सदियों तक, ‘होप अगेंस्‍ट होप’ की जीवटता किसी मेंडलस्‍टाम तक सीमित नहीं है बल्कि हम सभी में कहीं न कहीं मौजूद है; निराशाओं के समंदर में उम्‍मीद की कश्‍ती ढूंढना और इसके लिए मर मिटना, यह थोड़ा बहुत हर मानव में होता है. हर आदमी अपने स्‍तर पर ऐसा कुछ करता है जो उसे चलते रहने, कुछ करते रहने को प्रेरित करता है.

बीते साल की बात करें तो एक सवाल सहज ही उठता है क्‍या खास रहा. निसंदेह व्‍यक्तिगत या सार्वजनिक जीवन में हो सकता है कि कोई बड़ा सकारात्‍मक  बदलाव बीते 365 दिन में नहीं आया हो लेकिन सोचें तो हालात इतने निराशाजनक भी नहीं मिलेंगे. वो जो बेटी पिछले साल ढंग से बैठ भी नहीं पाती थी अब इतना दौड़ती है  कि उसको पकड़ते पकड़ते आप हांफ जाते हैं या कि बालकनी में लगा फूलदार पौधा, या नई ब्‍याई गाय का छोटा सा बछड़ा, बेटे का अच्‍छे स्‍कूल में एडमिशन,  आठ आने में एक मिनट बात, लंबे समय से अटके काम का पूरा होना … ऐसे छोटे छोटे अनेक उदाहरण बीते साल को यादगार बनाएंगे. यह अजीब नहीं है कि  दुखों के पहाड़ होते हैं जबकि खुशियां छोटी छोटी पौध के रूप में उगती हैं और कभी बाड़ी तो कभी बगीचा बन हमारे जीवन को सुंदर, खुशमय बना देती हैं.

पहले महीने की एक तारीख भले ही कलेंडर के पन्‍ने को बदलने  जैसा ही कुछ मामला है लेकिन इसे जीवन से जोड़कर, जीवन को अलग ढंग से देखा जा सकता है. कुछ वादे किए जा सकते हैं खुद से. कुछ कसमें खाई जा सकती हैं अपनो के लिए. कुछ मानस बनाया जा सकता है अपने माहौल, परिवेश, समाज के लिए. बस यहीं से शुरुआत होगी नए साल की.

मधुकर उपाध्‍याय की पंक्तियां हैं- उलझना हो तो इक दिन रंगों से उलझो, लकीरें खींचना अब जिंदगी को आजमाने का पुराना सा तरीका हो गया है.

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Responses

  1. उलझना हो तो इक दिन रंगों से उलझो,
    लकीरें खींचना अब जिंदगी को आजमाने का पुराना सा तरीका हो गया है.

    -बहुत उम्दा लगी यह पंक्तियाँ मधुकर जी की.

  2. अच्‍छा लगा नए साल को देखने का आपका नया नजरिया..

  3. yes your way is appealing


कुछ तो कहिए..

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