Posted by: prithvi | 01/08/2009

किसान, जो कथाएं उगाता है!

परलीका (जिला हनुमानगढ, राजस्‍थान) गांव के किसान साहित्यकार रामस्वरूप किसान को केंद्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली की ओर से डेढ़ लाख रुपए की स्कॉलरशिप दी जाएगी। कांकड़ के लिए उसने उनसे बात करने के लिए घंटी मारी तो वे खेत से लौटे ही थे.. पुराने कागजों को पलट रहे थे. वे ठेठ बागड़ी में उसी सहजता और अपनत्‍व से बात करते हैं..

क्‍या हो रहा है किसान जी?
अभी खेत से लौटा हूं और कागजों के बीच बैठा हूं. बिरखा तो हुई नहीं, ट्यूबवैल से जुगाड़ किया जा रहा है. अब देखते हैं कैसे क्‍या होगा.

स्‍कालरशिप के मायने?
आर्थिक रूप से भी हैं और यह प्रेरक भी है. ज्‍यादातर लेखक भी किसानों की तरह आर्थिक रूप से पिछड़े ही हैं… आर्थिक संबल कुछ नया करने को प्रेरित तो करता ही है. यह स्‍कालरशिप कुछ नया करने को प्रेरित करेगी.

कोई योजना?
सही बात तो यह है कि पिछले दो साल में कुछ नहीं लिखा सिर्फ दो चार कविताओं के सिवा. वरना पिछले दो दशक में ऐसा कोई साल नहीं रहा जब कम से कम एक किताब नहीं छपी हो. दो साल काफी कड़े रहे…. हालात कठिन थे. खैर, अंदर बहुत कुछ जमा है. जो अगले छह महीने में निकाल देंगे. कहानी संग्रह की योजना है.

स्‍कालरशिप योजना : साहित्यकार रामस्वरूप किसान को केंद्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली की ओर से डेढ़ लाख रुपए की स्कॉलरशिप दी जाएगी। अकादेमी के पत्र के हवाले से किसान ने बताया कि राजस्थानी भाषा में सृजनात्मक लेखन के लिए अकादेमी ने अपनी नई योजना ‘राइटर्स इन रेजीडेंसी’ के तहत उनका चयन किया है तथा अकादेमी आगामी 6 माह तक उन्हें 25 हजार रुपए मासिक के हिसाब से कुल डेढ़ लाख रुपए प्रदान करेगी। इस दौरान वे राजस्थानी कहानियों का सृजन करेंगे. राजस्‍थानी में किसान के अलावा यह अवार्ड मालचंद तिवाड़ी, विजयदान देथा, रामेश्‍वर दयाल, भगवती व्‍यास को दिया गया है. अकादमी की यह योजना इसी साल शुरू हुई है और लगभग 24 भाषाओं के पांच पांच रचनाकारों को इसके लिए चुना गया है.

किसान : रामस्वरूप किसान खेत में कड़ी मेहनत के बल पर जीवनयापन करने वाले राजस्थानी के अनूठे साहित्यकार हैं तथा वे राजस्थानी भाषा के मान्यता आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उन्हें साहित्य अकादेमी के अनुवाद पुरस्कार तथा राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर के मुरलीधर व्यास राजस्थानी पुरस्कार सहित कई महत्त्वपूर्ण पुरस्कार मिल चुके हैं तथा इनकी रचनाएं अंग्रेजी, हिन्दी, पंजाबी, गुजराती, तेलुगु आदि भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। किसान की रचनाएं माध्यमिक शिक्षा बोर्ड तथा विश्वविद्यालयों के पाठयक्रम में भी शामिल हुई हैं।

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मेरी ऑंखें जल्द लौटाना बाबा!

मैं राजी-खुशी हूँ

रामस्‍वरूप किसान

रामस्‍वरूप किसान


मेरे बाबा!
यह खत तो मैं
एक जरूरी काम से लिख रही हूँ।

याद होगा आपको
घर छोड़ते वक्त
आपकी देहरी में ठोकर खाकर
गिरने लगी थी जब मैं
तो न जाने
विदाई-गीत गाती
औरतों के उस हुजूम को चीरते
आपके हाथ
मुझ तक कैसे पहुँचे थे बाबा!

हाँ बाबा,
वे आपके ही हाथ थे
कौन बेटी नहीं पहचान सकती
बाप के हाथ?
मैंने पहचान लिए थे आपके वे हाथ
जो घर को ढहने से बचाने की मशक्कत में
इतने अशक्त हो गए थे
कि कांपते-कांपते
पहुंच पाए थे मुझ तक।

लेकिन ऊपर का ऊपर
सम्भाल लिया था
उन अशक्त हाथों ने मुझे।
आपके हाथों के कम्पन का स्पर्श
मेरे बाजुओं के रास्ते
मेरे कलेजे में पहुंचकर
आपकी लड़खड़ाती सूखी काया का बिम्ब
अभी भी बना रहा है बाबा!

शायद नहीं सोचा होगा आपने
कि आपकी देहरी पर
क्यों लगी थी ठोकर मुझे?

मैं अंधी थी बाबा!
बिल्कुल अंधी।
जब मैं विदाई के लिए तैयार की जा रही थी
मेरी ऑंखें
मेरे तन से जुदा होकर
आपके पथराए चेहरे से चिपक गई थीं बाबा!
फुरसत मिले तो
मेरी ऑंखें जल्द लौटाना बाबा!

यहाँ जब-जब मुझे
ठोकर लगती है,
मेरी सास डांटती है-
‘देखकर नहीं चलती
अंधी है क्या?’
(कविता का हिन्दी अनुवाद तथा अन्‍य जानकारी उपलब्‍ध कराने के लिए सत्यनारायण सोनी का आभार, उनका ब्‍लाग http://satyanarayansoni.blogspot.com/)

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Responses

  1. सच में रामस्वरूप जी ऐसे ही किसान है जो कई वर्षों से कथाएँ उगा रहे है!दैनिक सीमा सन्देश द्वारा आयोजित लघु कथा प्रतियोगिता में उनसे भेंट हुई थी !उनका सादगी और प्रेम भरा व्यवहार आज भी याद है…


कुछ तो कहिए..

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