Posted by: prithvi | 26/07/2009

कुत्‍तालिकनी का ए माइनर होना.

प्राचीन सभ्‍यताओं का विकास नदियों के किनारे हुआ. आबादियां जोहड़ों, सरोवरों के किनारे बसीं. आधुनिक थार की विशेषता यह है कि यहां अनेक गांव-कस्‍बे, नगर नहरों के आसपास बसे. फर्क इतना है कि एक समाज था जिसने पानी और पानी स्रोतों की कद्र करनी सीखी थी और एक समाज है जिसने जीवन के इस एक अभिन्‍न तत्‍व को न तो बरतना ही सीखा और न ही इसकी कद्र करनी सीखी .
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श्रीगंगानगर: सफाई के बाद कुछ दिखने लगी है ए माइनर.

श्रीगंगानगर: सफाई के बाद कुछ दिखने लगी है ए माइनर.

राजस्‍थान के प्रमुख जिला मुख्‍यालयों में से एक गंगानगर की बीच में से एक छोटी सी नहर गुजरती है. तथ्‍यात्‍मक रूप से इसका नाम ए माइनर है लेकिन हमने बचपन से ही इसे कुत्‍ता लिकनी के नाम से सुना और जाना. कुत्‍ता लिकनी यानी जिसमें कुत्‍ते लिकते हों. पानी पीते रहते हों. एक बहती जलधारा को कुत्‍तालिकनी कहना शायद बुरा लगे लेकिन इसमें वास्‍तवितक रूप से इसमें कुछ गलत भी नहीं था.

वक्‍त के साथ आसपास के दुकानदारों, अन्‍य लोगों ने इस छोटी से नहर पर अवैध रूप से पुल बना दिए. अपने गंदे पानी यहां तक कि सीवर के मुहं भी इस नहर में खोल दिए जबकि इसका पानी आगे दर्जन भर गांवों के किसान पीते हैं. जल जैसे अमूल्‍य स्रोत की इससे बड़ी बेकद्री क्‍या होगी?

नहर से जुडे किसान सालों साल से मांग कर रहे थे कि इस नहर पर हुए अवैध कब्‍जों को हटाकर इसकी सफाई की जाए. लेकिन कई तरह की दिक्‍कतों के चलते कुछ नहीं हुआ. अंतत: किसान खुद ही आगे आए. उन्‍होंने सामूहिक मेहनत करते हुए इसकी सफाई करने का बीडा उठाया. शुरुआत हुई तो प्रशासन भी उनके साथ आ खड़ा हुआ. कब्‍जा‍ करने वालों तथा कुछ अन्‍य स्‍वार्थी तत्‍वों के शुरुआती विरोध के बावजूद यह हवन पूरा होने को है.

बरसों से बने अवैध पुल तोड़ दिए गए हैं. तीन तीन फीट जमा सिल्‍ट या कादा निकाला जा रहा है. अपनी दुकानों/घरों के मलमूत्र और अन्‍य गंदगी की नालियों का मुंह ए माइनर में करने वालों के खिलाफ मामले दर्ज करने की बात है. ग्रामीणों के इस सामूहिक आयोजन को यज्ञ से कम क्‍या कहा जाए? पत्रिका में धांधूसर गांव की एक कहानी छपी है. पानी की कमी से परेशान ग्रामीणों ने एकजुट होकर पुराने जलस्रोत को नये सिरे से तैयार किया है और वहां अब पशुओं के लिए चौबीसों घंटे पानी रहता है.

ये घटनाएं कई संकेत देती हैं. नकल में मोमोज, बर्गर, सैंडविच खाये- अघाये समाज ने अपने जलस्रोतों और संसाधनों के साथ जो बदसलूकी की है उसका नमूना है ये घटनाएं! साथ ही ये सकारात्‍मक संकेत देती हैं कि अब भी आम आदमी में वो जज्‍बा है जो किसी कुत्‍ता लिकनी को फिर से ए माइनर कर सकता है. थार और उत्‍तरी भारत में इस तरह की कुत्‍तालिकनी नहरों, नदियों और जोहड़ों की संख्‍या बहुत है. उम्‍मीद की जानी चाहिए कि ए माइनर की यह कथा एक शुरुआत भर है !

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Responses

  1. दही चूरा खाकर खटिया पर पसरते हुए मौलिक प्रलाप करने या बौद्धिकता पेलने या अपना ज्ञान बघारने आदि-आदि चूतियापों के मुकाबले इस प्रकार के उपक्रमों को ब्‍लाग जैसे सशक्‍त माध्‍यम पर पेशकर जनता का आदमी होने का आपने जो सुबूत दिया है, वह बधाई योग्‍य है।
    साधुवाद।


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