Posted by: prithvi | 07/07/2009

घुळगांठ : जो है!

ola-coverघुळगांठ जो है! कोई गांठ जब गडमड होकर उलझ जाती है उसे घुळगांठ कहते हैं. यानी अनखुल ग्रंथि. मूल रूप से एक सस्‍ंकृत शब्‍द का तत्‍भव है जिसका हिंदी में समानार्थी ढूंढना मुश्किल ही है. भरत ओळा ने अपने इस शीर्षक के माध्‍यम से भारतीय समाज की एक नहीं खुलने वाली ग्रंथि या घुळगांठ को समेटा है जो जातीयता के रूप में न केवल गहरे और चिंताजनक रूप से विद्यमान है बल्कि निरंतर बढ़ रही है.

एजेंडा : मनीसा मेघवाल! यह उपन्‍यास अलग अलग जाति के चार युवकों और तीन युवतियों के इर्द गिर्द घूमता है. इसमें भी केंद्र में मेघवाल जाति की एक लड़की मनीसा है यानी मनीसा मेघवाल. भरे बदन की एक सुंदर षोड्षी. एजेंडा यहीं से शुरू होता है कि इस लड़की का नाम क्‍या है, नाम है तो जाति क्‍या है, जाति मेघवाल! हो ही नहीं सकता है और अगर वह मेघवाल है तो इंडु चौधरी के शब्‍दों के ‘झट फाऊल’ यानी वर्ण संकर है. या कि पंडताई तो पंडतों के खून मे होती है. बहस यही है कि नीची जाति की लड़की सुंदर कैसे हो सकती है. इसका एक उत्‍तर उपन्‍यास में कहीं इस सवाल में भी निकलता है कि चौधरियों के सारे लड़के ‘मर्द’ जैसे क्‍यों नहीं होते!

कथावस्‍तु: साहसिक और अनूठी. उपन्‍यास की कथावस्‍तु राजस्‍थान के एक सिरे के जिले हनुमानगढ़ तथा उसके दो कस्‍बों नोहर, भादरा में यहां वहां घूमती है. राजस्‍थान का इस इलाके की सीमा पंजाब के साथ साथ हरियाणा से लगती है और सांस्‍कृतिक लिहाज से इसे बहुभाषी भी कहा जा सकता है. दूसरी बात उस ग्रंथि की है जिस पर यह उपन्‍यास आधारित है. जातियों की घुळगांठ.. यह घुळगांठ थार से इतर पंजाब या हरियाणा ही नहीं एक तरह से समूचे भारतीय समाज की एक जटिलता व विकार है. सुपरियरिटी या इनफरियरिटी कांपलेक्‍स .. जाति विशेष को एक निम्‍नतम संबोधन से बुलाना भारतीय समाज की विशेषता रही है जिसका उदाहरण इस उपन्‍यास में जाट यानी खोता या खोतणा, बणिया यानी किराड़, ब्राहमण यानी गरड़ा और मेघवाल यानी रूंगा के रूप में है.

भाषा शैली:बहुत सुंदर . अनुवादित और तकनीकी शब्‍दों वाली किताबें पढ़ते पढ़ते उब गए लोगों के लिए ताजी हवा का झोंका. सही मायने में बतरस का बेहतरीन नमूना क्‍योंकि सभी ने तो गूंग (मूर्खता) नहीं पहन रखी और कई लोगों की फूंक से भी घास जल जाती है! सीधे साधे जीवन की अनघड़ भाषा बोली इस उपन्‍यास को और भी पठनीय बना देती है.

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bharat-ola

ऊपरी तौर पर लगता है कि शिक्षा और धन प्रवाह के बढ़ने के साथ जाति की बात ही खत्‍म हो गई. ऐसा नहीं है. राजस्‍थानी के सामंतवादी समाज में इसकी जड़ें आज भी बहुत गहरी हैं. यह कहना अति‍श्‍योक्ति नहीं होगा कि जातिवाद भयंकर रूप में मौजूद है. जातिवाद के इसी सामूहिक मनोविज्ञान पर केंद्रित है नया उपन्‍यास ‘घुळगांठ’.- भरत

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रूंगा झूंगा : आरक्षण पर एक अच्‍छी बहस, भगतसिंह, अंबेडकर, महात्‍मा गांधी और मनु का किन्‍हीं अच्‍छे व सारगर्भित संदर्भों में जिक्र. कथाओं के रूप में पंडतों की कमाई का धंधा, स्‍टेट्स के नाम पर शादी ब्‍याह पर किए जाने वाले अंधाधुंध खर्च जैसे मुद्दों पर बेबाक टिप्‍पणी. उपन्‍यास का एक उपन्‍यास न होकर अपने साथ या आसपास घटित होने वाला कोई घटनाक्रम लगना. जीवंत शब्‍दावली और आनंद देने वाली लोकोक्तियां व मुआवरे. अनघड़ लेकिन सुघड़ उपन्‍यास!

कांकड़ की सलाह : खरीद के पढि़ए! थार ही नहीं तो कम से कम उत्‍तर भारतीय समाज के सामूहि‍क मनोविज्ञान या जातिगत आधारित कुंठाओं को जानने का एक बेहद सरल और अद्भुत उपन्‍यास. उपन्‍यास के अग्रलेख में माल‍चंद तिवाड़ी ने लिखा है कि यह उपन्‍यास सामूहिक मनोविज्ञान की गहरी झड़ों पर रोशनी डालता है. उपन्‍यास भारतीय समाज की उस घुळगांठ को सामने लाया है जो उसकी पूरी मनोरचना में समाई है. एक ऐसा विषय जिसे ज्‍यादा से ज्‍यादा ढंकने की कोशिश की जाती है या कमतर माना जाता है, उसे अपने उपन्‍यास का विषय बनाकर ओळा ने अपने लेखकीय साहस और व्‍यक्तिगत जीवतटता का परिचय दिया है. निसंदेह रूप से भरत ओळा ने मनीसा मेघवाल की इंडु चौधरी के साथ प्रेम कहानी नहीं लिखी है. न ही उन्‍होंने जातिव्‍यवस्‍था पर कोई शोध ग्रंथ देने का प्रयास किया है. वे उपन्‍यास में होकर भी गायब हैं और न होते हुए भी मौजूद हैं. उन्‍होंने वक्‍त के एक हिस्‍से को पन्‍नों पर उतार कर पाठक के हवाले कर दिया है. यही इसका सरलता और यही इसकी जटिलता है. कल्‍पना आधारित होकर भी यह उपन्‍यास हकीकत से कहीं अधिक कठोर तथा सपनों से अधिक मुलायम लगता है. हर पेज की कोई टिप्‍पणी या कोई बात पाठक यही सोचता है- यह तो हो रहा है, यह सही है.. अरे ये तो मेरे साथ भी हुआ है. घुळगांठ की किसी अन्‍य किताब से तुलना करना बेमानी और भरत ओळा के साथ अन्‍याय होगा क्‍योंकि यह उपन्‍यास अपने आप में एक प्रतिमान घड़ता है.

सार-सार
भरत ओळा : राजस्‍थानी के साथ हिंदी में भी कविता कहानी करने वाले ओळा को 2002 में साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार मिला. उनके राजस्‍थानी कहानी संग्रह ‘ जीव री जात’ का पंजाबी में अनुवाद हो चुका है. एकता प्रकाशन, चुरू द्वारा प्रकाशित घुळगांठ का हिंदी और पंजाबी संस्‍करण प्रस्‍तावित है. ओळा का पता है- 37, सेक्‍टर नं. 5, नोहर, जिला- हनुमानगढ (राजस्‍थान).

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Responses

  1. खूब … धन्‍यवाद..

  2. घुळगांठ : जो है! इस समीक्षा को मैने काफी समय पूर्व अपने ब्लॉग पर साभार प्रकाशित किया था। भरत ओलाजी ने मेघवाल युवती को पात्र बना कर सामाजिक विद्रूपताओं की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया। वरना साहित्य से मेघवाल समाज गायब सा हैं। ओलाजी और कांकड़ ब्लॉग के पृथ्वीजी का आभार।


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