Posted by: prithvi | 02/07/2009

किताबों वाला संदूक!

books1 उस संदूक को कई दिनों से खोला नहीं था. आज सुबह सुबह पता नहीं क्‍यूं अचानक कैसे उसके पास पहुंच और कपड़ा वगैरह मारकर खोल दिया. किताबें और किताबें.. पूरा ठसाठस भरा हुआ. किस तरफ से शुरू करूं, दुबारा कैसे रखूंगा, आ पाएंगी या नहीं .. कई देर तक इसी उलझन में रहा. फिर एक कोने से उठानी शुरू कीं…

… अल बरूनी की भारत, बाशम की अद्भुत भारत, बिपन चंद्र की समकालीन भारत, अयोध्‍या सिंह की भारत का मुक्तिसंग्राम, ओशो की क्रांतिबीज, मनोहर श्‍याम जोशी की हमजाद, हजारी प्रसाद‍ द्विवेदी की पुनर्नवा, मैक्यिवली की द प्रिंस, पाउलो की अलकेमिस्‍ट, मोहन आलोक की सौ सानेट, गंगानगर के राकेश शरमा का श्रद्धांजलिस्‍वरूप छपा व्‍यंग्‍य संग्रह .. और और और ….. ढेर सारी किताबें और एक किताब पाश की.

अवतार सिंह पाश. दसेक साल पहले से यह किताब अपने पास है. कई बार पढ़ चुके हैं. एक बार कुछ और किताबों के साथ इसे बाहर रख लेता हूं. अपनी पसंदीदा किताबों में से एक जिनको पढने से हमेशा डरता हूं. फिर भी पढने से रोक नहीं पाता.. क्‍योंकि .. सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना ..

आज भले ही धन और सुंदरता को जीने का सबसे बड़ा औजार व उपलब्धि मान लिया हो लेकिन अपना मानना है जीने के लिए सिर्फ ऊपर की जेब में नोट ही नहीं, उसके ठीक नीचे दिल में सपने रूपी कुछ सिक्‍के भी होने चाहिएं. यही सिक्‍के हैं जो बाजार बनती जा रही इस जिंदगी में अंतत: काम आते हैं.

सपने नहीं मरने चाहिएं क्‍योंकि सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना.

दफ्तर जाते समय पाश की ‘समय ओ भाई समय’ साथ ले लेता हूं. किताब की पहली कविता ही है ‘सबसे खतरनाक’.

सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर और काम से लौटकर घर आना
सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना..

निजामुद्दीन, खान मार्केट, इंडिया गेट, अशोक रोड, शास्‍त्री भवन और संसद मार्ग… आठेक किलोमीटर व तीसेक मिनट के सफर में मुश्किल से एक कविता पढ़ पाता हूं.. एक लाइन पढता हूं .. आगे पढने की कोशिश करता हूं .. न तो आंखें साथ देती हैं न भर भर आ रहा गला. घबराकर बाहर देखते हुए लंबी सांस लेता हूं. संयत होने की कोशिश करता हूं. खुद से खुद की लड़ाई सी लगती है.

खान मार्केट चौराहे पर अरविंद अडिगा की व्‍हाइट टाइगर सहित अनेक अंग्रेजी किताबों के पाइरेटेड संस्‍करण बेचता किशोर, इंडिया गेट के आस पास चमचमाती और महंगी से महंगी गाडियों का झुंड, राजपथ पर मंडराती देशी विदेशी लड़कियां, अशोक रोड पर जामुन बेचती कुछ बच्चियां, राजेंद्रप्रसाद मार्ग-जनपथ चौराहे पर भिखारियों का एक टोला. और पाश की पंक्तियां.. सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना.

india-gateदस साल पहले पाश को जोश के साथ पढ़ते थे, आज डर से और शायद आगे वाले दस साल में पाश का पढने का हौसला भी न रहे. पाश जैसे अनेक लेखकों की किताबों को हमने संदूकों में बंद कर दिया है, बैड या दीवान में डाल दिया है या कार्टन बांध कर ऊपर लटाण पर रख दिया है. कई बार लगता है कि टीवी चैनलों, एफएम रेडियो, अखबारों और पत्र पत्रिकाओं ने जो कादा कीचड़ किया है वह बहुत अच्‍छा है. हमसे सबकुछ छीन लिया. आपसी गुरबत, मेल जोल और सोचने समझने की शक्ति हमारी किताबें.. पाश जैसे हमारे कवि लेखक.. इस कादे कीचड़ ने हमें क्रांतिकारी, विद्रोही या नेता होने से बचा लिया. हम वही बन कर रहे गए छोटी छोटी चीजों के भगवान, हर माह ईएमआई की चिंता में घुलता भारत का मध्‍यम वर्ग. जिससे क्रांति की उम्‍मीद न तो भगत सिंह को थी न वक्‍त के किसी क्षण को.

दफ्तर में किताब को मेज पर एक तरफ रख दिया. नहीं पढा पूरा दिन. शाम को एक बात थी मन में ..
सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
उससे भी खतरनाक होता है
अच्‍छी किताबों को संदूक में बंद कर देना.

| पाश की पंक्तियां उनकी किताब से साभार|

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Responses

  1. Excellent writing

  2. आज पहली बार ही पढ़ा है आपको ..इतना ही आया मन में ..अद्भुत…..

  3. Dear Prithvi Ji,

    Words inside us whether remembered from some book or else where come to the fore when ever we contemplate between reality and idealism. It is specially so when a reformist mind is at leisure of thinking the way it wants…so relax dreams will never die…books can never retire, yes the can be stashed away like thoughts kept at bay. But both peep unwarranted to remind us what we really are. Good Job , Keep It Up.
    Regards
    PRAVEEN DUTTA

  4. बहुत अच्छी तरह कलमबंद किया आज के समय के मध्यवर्गी युवा के अनिश्चय को। लेकिन संदूक में बंद किताबें भी, बंद ही हैं, सुरक्षित हैं, मर नहीं जातीं, यही दिलासा रहता है। कभी कोई उन्हें धूल झाड़ कर जरूर पढ़ेगा। कभी तो टीवी का शोर सचमुच शोर लगेगा, कानों और दिमागों को, और लोग शांति की तलाश में किताबें पढ़ना पिर शुरू करेंगे। आमीन!!

  5. वाकई टीवी ने कादा कीचड़ ही तो किया है ने मन को शांति देने वाले वो चैनल रेडियो स्‍टेशन कहीं नहीं मिलते व्‍यक्ति को मनोरंजन चाहिए लेकिन कैसा यह उसे भी पता नहीं क्‍योंकि ये सोचने के लिए उसके पास समय नहीं है। किसी से भी पूछो क्‍या करते हो तो कहेगा वेहला यानि खाली लेकिन यदि हम उसे कोई काम बता दें तो कहेगा टाईम नहीं है यार बिजी हूं शायद इसी वजह से पढ़ने के लिए अब समय नहीं है

  6. aaj ke halat pe bilkul sahi kaha hai aapne… main kitaben to padhta hun bachpan se magar aaj tak koi mujhe in kitobon pe bat karne wala dost nahi mila…
    सबसे खतरनाक होता है
    हमारे सपनों का मर जाना
    उससे भी खतरनाक होता है
    अच्‍छी किताबों को संदूक में बंद कर देना.

  7. Nice writing Prithvi.


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