Posted by: prithvi | 18/03/2009

ढाणी, चक और गांव

ढाणी चक और गांव

रेत ही रेत, ऊंट, दुर्जेय दुर्ग और बड़े-बड़े महल.. राजस्‍थान की बात करते समय आमतौर पर यही पांच दस शब्‍द हैं जो प्राय: कहे या सुने जाते हैं. वहां के गांवों, चकों और ढाणियों की बात कोई नहीं करता. विशेषकर ढाणी की चर्चा तो शायद ही कभी सुनी हो. सुनने पढने में भले ही अटपटा लगे लेकिन यह सचाई है कि राजस्‍थान या समूचे थार के जीवन की चर्चा ढाणी के जिक्र के बिना पूरी हो ही नहीं सकती.

एक ढाणी, धोरों पर बसा एक घर. रेत के समंदर में टापू जैसा ही. कुछ कमरे, छप्‍पर, एकाध पेड़ और ढोर डंगर इसी से बस जाती है ढाणी,राजस्‍थान के जीवन का अभिन्‍न अंग

एक ढाणी, धोरों पर बसा एक घर. रेत के समंदर में टापू जैसा ही. कुछ कमरे, छप्‍पर, एकाध पेड़ और ढोर डंगर इसी से बस जाती है ढाणी, राजस्‍थान के जीवन का अभिन्‍न अंग

मानवीय बसावट की सबसे छोटी इकाई मानी जाने वाली ढाणी केवल राजस्‍थान नहीं, समूचे थार और आसपास के इलाके की अनूठी विशेषता है जिस और ध्‍यान नहीं दिया गया है. थार के जीवन में ऐतिहासिक, सांस्‍कृतिक लिहाज से ढाणी का अपना महत्‍व है.

ढाणी थार में मानवीय बसावट की सबसे छोटी इकाई है. सामान्‍य भाषा में इसे फार्म हाऊसों का एक रूप कहा जा सकता है. लेकिन ढाणी फार्महाऊस की तरह विलासिता का प्रतीक कतई नहीं है. यह आम जीवन का अंग है. लोग ढाणियों में रहते हैं. पीढियों से रहते आए हैं और इसने थार की मानसिकता और सामाजिकता को अलग रूप दिया है.

एक और ढाणी. पिछली गर्मियों में सूनी पड़ी मिली. अकाल पर अकाल .. शायद वाशिंदे किसी बेहतर विकल्‍प की तलाश में कहीं चले गए.

एक और ढाणी. पिछली गर्मियों में सूनी पड़ी मिली. अकाल पर अकाल .. शायद वाशिंदे किसी बेहतर विकल्‍प की तलाश में कहीं चले गए.


आज भी इस रेगिस्‍तानी प्रदेश की अधिसंख्‍य आबादी का ढाणियों से कुछ न कुछ संबंध है. यहां आबादी गांवों में कम ढाणियों में अधिक रहती आई है. यह यहां की ऐसी विशेषता है जो देश में कहीं और दिखाई नहीं देती. ढाणी का जिक्र कर हम राजस्‍थान के समूचे लोकजीवन में झांक सकते हैं. ढाणी का शाब्दिक अर्थ तो है- खेत में घर बसाना . ढाणी का थोड़ा व्‍यवस्थित तथा बड़ा रूप चक है। फिर गांव आते हैं. चकबंदी नहरी प्रणाली के बाद हुई और गांव तो समाज की अपने आप में एक प्राचीन अवधारणा है.

यानी ढाणी से शुरू कर चक और चक से गांव .. एक तरह से समूचे ग्राम्‍य जीवन को इसमें शामिल किया जा सकता है. इस प्रक्रिया में ग्राम्‍य जीवन के अनेक रंग उघड़ते चले जाएंगे और थार के लोकजीवन की ऐसी-ऐसी विविधताएं सामनें आएंगी जो कभी देखी नहीं गईं.

तीन लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रफल में फैले थार रेगिस्‍तान का अधिकतर हिस्‍सा राजस्‍थान में है. वैसे यह बालू, पंजाब हरियाणा और पड़ोसी पाकिस्‍तान के कुछ सूबों तक फैली है. इस बालुई महासमंदर तथा इसके किनारों पर ढाणी एक संस्‍कृति की तरह पली फूली है.

भारत देश की अधिकतर आबादी आज भी गांवों में रहती है या गांवों से जुड़ी हुई है. गांव-गुवाड़ों की बात कुछ संदर्भ विशेष को छोड़कर, नहीं ही की जाती. की भी जाती है तो उसमें भाषा और आग्रह हमारे यानी शहर वालों के होते हैं. उसे गांव की बात न कहकर गांवों पर शहरों का नजरिया कहा जा सकता है. शायद यही कारण है कि गांव की बातें और कथाएं बहुत पीछे छूट गईं. ढाणियों-गांवों में समस्‍याएं या विसंगतियां ही नहीं होती, इस जीवन के ढे़र सारे और पहलू भी होते हैं जिस और ध्‍यान ही नहीं दिया जा रहा. (पुस्‍तक ‘ थार की ढाणी’ के एक आलेख पर आधारित, साभार)

ढाणियां थार की एक खासियत हैं जिसके बिना यहां के जीवन की चर्चा पूरी नहीं हो सकती.

ढाणियां थार की एक खासियत हैं जिसके बिना यहां के जीवन की चर्चा पूरी नहीं हो सकती.

Advertisements

Responses

  1. rajasthan me abhi kitni dhania hongi. dhaniaon ke vashindon ki jeevan shailee ko lekar hamesh utshuk raha. asha hai aapki kitab pyas bujhayegi.

  2. chokho lagyo bhai. photuaan b bhot pyari h.

  3. Bahut khub gaon ki sondhi khusaboo


कुछ तो कहिए..

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

श्रेणी

%d bloggers like this: