Posted by: prithvi | 04/03/2009

चिट्ठी मेरे गांव को…

चिट्ठी मेरे गांव को ..

पिछली यानी 2008 की गर्मियों में छत्‍तरगढ का बस स्‍टेंड. अनूपगढ से बीकानेर सडक मार्ग पर. बहुत छोटा सा बस अड्डा है. यहां मोठ के पकौडे अच्‍छे बनते हैं.

छत्‍तरगढ़ का बस स्‍टेंड. अनूपगढ से बीकानेर सडक मार्ग पर. बहुत छोटा सा बस अड्डा है. यहां मोठ के पकौडे अच्‍छे बनते हैं.

मुझे ए दोस्‍त जाकर शहर में अपना पता लिखना
ये तुमने गांव क्‍यों छोड़ा, हुई थी क्‍या खता लिखना.
ये पनघट खेत खलिहान, नहरें गांव का मंदिर
जो तुमको याद आ जाएं तो अपनी हर व्‍यथा लिखना.
वहां ऊंची इमारतें, कारखाने रोशनी धुआं
लगाकर जोड़ बाकी कुल हुआ कितना नफा लिखना.
वही चौपाल, हुक्‍का, हाट और ये गांव के मेले
यहां सबकुछ है वैसा ही वहां की तुम कथा लिखना.
वहीं बस जाओगे तुम या कि लौटोगे कभी वापस
मुझे ए दोस्‍त खत में एक दिन अपनी रजा लिखना.
वहां चोरी डकैती बेइमानी से जो बच जाओ
तो मेरे गांव को चिट्ठी यकीनन एक दफा लिखना.

कांकड़ में पहली बार कुछ पंक्तियों या गज़ल पर चर्चा कर रहे हैं. इसी तरह कुछ अक्षर जुड़कर शब्‍द और कुछ शब्द जुड़कर वाक्‍य, पंक्तियां और आलेख का रूप लेते हैं या किताबों के रूप में हमारे सामने होते हैं. हमारा ब्‍लाग रूपी यह प्रयास भी तो गांव गुवाड़ की चर्चा या गांव को एक चिट्ठी ही है जो हम टुरते फिरते लिख रहे हैं. वर्ष 1993 में यह रचना सुजस के एक अंक में प्रकाशित हुई थी और हमारी श्रेष्‍ठतम यादाश्‍त के अनुसार सुरेंद्र चतुर्वेदी की है. जैसा कि हमारे रजिस्‍टर में दर्ज है.

कहते हैं कि घर छोड़ने से हर कोई गौतम नहीं हो जाता. सही है गौतम तो सदियों में एक होता है बाकी तो यूं ही हम आपकी तरह भीड़ में खोकर रह जाते हैं. उम्‍मीदों के कथित लक्ष्‍य के पीछे बिना सिर पैर की भाग दौड़ में कट जाती है जिंदगी. आजादी के बाद एक पूरी पीढी इसी तरह घर से निकली और नए पनपते शहरों में खोकर रह गई. एक भी गौतम बनकर नहीं लौटा. मोटा माटी बात है. अजीब सी बात नहीं है कि एक पीढी सिनेमा के रचे जलसाघरों के चक्‍कर में फंसकर बांबे की ओर भागती रही, दूसरी कमाई करने विदेशों में. बाद की एक पीढी कालसेंटरों की बेतुकी नौकरी में मोक्ष ढूंढ रही है.

तो अपनी इस पीढी को आमतौर पर तो रोजी रोटी से फुरसत नहीं मिलती, उसका जुगाड़ हो जाता है तो धन कमाने की होड़ और उससे बच गए तो उसे खर्चने में उम्र कट जाती है. गांव छूट जाता है, गुवाड़ छूट जाता है. न हम गांव को चिट्टी लिखते हैं न गांव वालों को ईमेल करते हैं. यानी पहले तो शहर में मन नहीं लगता और लग जाता है तो भूल जाते हैं गांव की गलियों और खेत की पगडंडियों को. शहर को कोसते हैं, शहर में रहते हैं.

जिसकी नाड़ गांव से बंधी होती है उनको लगता है कि शहर में कुछ भी नहीं है. इसके बावजूद बीती और मौजूदा पीढी के लिए ऐसा लक्ष्‍य बने हैं जहां उसे करियर, पैसा, प्रगति और किसी अन्‍य रूप में मोक्ष मिलता दिखा है. गांव भी कोई वैसे ही नहीं रह गए हैं. और यह अच्‍छी बात भी है. बदलाव गांवों में भी आ रहा है. जोहड पायतनों पर कब्‍जे हो गए हैं तो डिग्गियां खाली हैं. गुवाड़ सिमट रही हैं. बहुत कुछ बदल गया है. अब गांव जाने पर वह बचपन वाला गांव नहीं लगता, जवान होता दिखता है. फिर भी उसकी किसी न किसी हरकत में गांवपना दिख झलक ही जाता है.

गांवों से निकलकर शहरों में रचे बसे या शहरों की ही पैदाइश कुछ मित्र गज़ल रूपी उक्‍त पंक्तियों को कोरी भावुकता कहते हैं. शायद वे सही हैं. लेकिन एक बात तो है कि गांव बदला या नहीं और शहर में रच बस गए गांव के बेटों की दशा पर संवाद नहीं होता. समग्र रूप से न गांव की बात होती है न शहर की. संवाद ही नहीं होता. गुरबत नहीं होती. तो शहर में आने के बाद, भावुक होकर ही सही, कम से कम एक बार तो हम गांव को चिट्ठी लिखें. बताएं कि भाई हम ऐसे हैं, शहर ऐसा है. अब तो गांव गांव में मोबाइल सेवा पहुंच गई है तो उसी भाषा में एक एसएमएस ही डाल सकते हैं. हो सकता है कि बदले में गांव भी कोई मेल डाल दे. पता तो चले कि हमारे गांव छोड़ने के बाद आखिर बदला क्‍या है. बात चलेगी, राफ्ता बनेगा और शायद गांव की गलियों और ‘हमारे शहर’ की चिकनी चुपड़ी सड़कों में दोस्‍ती की कोई नई राह निकल आएं. (गज़ल की पंक्तियां हमेशा ही कुछ लिखने को प्रेरित करती हैं और हमारा यह ब्‍लाग इसी खुरक का परिणाम है. लेखक का नाम जैसा नोट किया गया वैसा ही दिया जा रहा है. इसमें किसी तरह की गलती सर माथे पर.).

Advertisements

Responses

  1. हाँ, हमारे यहाँ भी मोबाइल सेवा है। सिगनल कम ही मिलता है। परन्तु नेट मजे में चल रहा है।
    गाँव बढ़िया हैं। गेहूँ की फसल(मेरे बगीचे के बगल की)कट गई है। कुछ दिन पहले तक रास्ते भर गेहूँ काटने वाली बड़ी बड़ी मशीने ट्रेक्टरों से जुड़ी हर टूटी सड़क पर रास्ता रोकती थीं। इस बार आमों पर बौर नहीं दिख रहे। शायद कम ही फसल हो।
    लीजिए मिल गई गाँव से आपको एक चिट्ठी!
    घुघूती बासूती

  2. भाई मैं इस बात से सहमत नहीं कि भारत पर लिखी गई सबसे प्रमाणिक किताबों में से अधिकतर के लेखक विदेशी हैं. हमारे विद्वानों की ग्रंथि को याद रखें कि वो अपने जैसे लोगों की लिखी किताब को कमतर मानते हैं और दूसरा इस तरह किसे अपने जैसे को महान बताना भी अपना अपमान मानते हैं..उदाहरण के लिए राजस्थान के इतिहास पर गोरीशंकर ओझा दशरथ शर्मा और गोपीनाथ शर्मा से ज्यादा आज भी कर्नल टाड को महान मानते हैं..इसी तरह मेक्स मुलर को पी वी काने से बड़ा मानते हैं ..
    (दुष्‍यंत भाई की टिप्‍पणी के मद्देनजर हम आलेख में से सम्‍बद्ध पंक्तियां हटा रहे हैं. हमारा मानना है कि शायद वह इस विषय से इतर का व्‍यापक मुद्दा है जिस पर अलग से लिखा जाना चाहिए. भारत, भारतीय संस्‍कृति पर लिखी किताबें, उनकी प्रामाणिकता तथा सोच.. यह बहुत गूढ व व्‍यापक विषय है, इसे कहीं ओर उठाएंगे.)

  3. RAT KE ANDERE MAIN NOHAR KO ETANI SHIDAT KE SATH MAHSUS KIYA HAI KI KYA KAHE ? LEKIN EK BAAT JARUR KAHANA CHAHUNGA KI VAKEI NOHAR KI DHAN MANDI MAIN GADHE JYADA NAHI BAHUT JAYADA HAI.AAPNE BAND HAVELIYON KA DARD BAHAR SE DEKHA HAI,KABHI PHIR AANA TO SHYAD BHITAR KI SISKIYAN BHI SUNAEE DENGI.OR HAN SURENDRA CHADURVEDI KI GAZAL AANKH NAM KAR GAYI ,SOCHATA HU, SHYAM KI AATH CHALIS KI TRAIN SE NOHAR CHALA jau

  4. सोचता हूँ कभी कभी
    किस चक्कर में पड़ कर
    छोडा था गावं
    वों कोंन से सपने हैं
    जिनकी चाह में
    डर बदर की ठोकरें खा
    रहा हूँ…
    इस भीड़ भरे जंगल में…
    सोचता हूँ क्या खास है
    इस शहर में जो.
    अपना गावं,अपना बड़ा सा घर
    छोड़
    इस मुर्गी के दबड़े जसे फ्लैट में पड़ा हूँ…
    कहाँ महुवे की महक,आम के भवरों की महक…
    और कहाँ …
    शहर की बजबजाती नालियां…
    घिन आता है कभी कभी…
    अपने आप पे …
    और सपनों पे भी…
    सोचता हूँ लोट लूँ गावं को…
    मगर दिमाग की हर शाख पे लटके सपने…
    सोच को आगे बढ़ने नहीं देते…
    जाने नहीं देते कभी गावं …
    पिने नहीं देते ताजे गन्ने का जूस…
    हर बार ये सोच …
    सोच ही बनी रहती है…
    कभी सच नहीं होती…
    सोचता हूँ कभी कभी….
    क्या ये कभी सच भी होगा….

  5. Bhuhat jandar gahzal hai bhai… Ganav chodkar kya nafa mila… batayen to dhool…dhuan…aur dhakke…

  6. जिसे आप गांव-गुवाउ कहते हैं,हमारे इधर गांव-गिरांव बोला जाता हे। गांव के करीबी बस ठिकाने पर मिलने वाले खाद्य बेशक अजब खासियत भरे होते हैं। आपने गांव की चर्चा कर बरबस यादें ताजा कर दी।

  7. ganv ab kahan rahe
    inhe bachane ki jiimedari ka khyal karane ki muheem chedani hogi
    kabhi humare blog baddimag
    par bhi aayen abahri rahenge


कुछ तो कहिए..

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

श्रेणी

%d bloggers like this: