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	<title>कांकड़</title>
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		<title>कांकड़</title>
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		<title>मैं, आपका कर्ण !</title>
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		<pubDate>Sat, 12 Dec 2009 21:26:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आज मैं कुछ कहना चाहता हूं. मेरी बात सुनकर कुछ लोग चौंकेंगे और शायद हंसेंगे भी कि महाभारत का कर्ण कैसे बोल रहा हैॽ सदियों पहले कुरूक्षेत्र के पास कुंवारी भूमि पर चिरानिद्रा में सो चुका कर्ण कैसे बोल सकता है. मुर्दे कब से बोलने लगेॽ लेकिन मित्रो, एक समय आता है जब सन्‍नाटे चीखने लगते हैं और आजीवन मौन का व्रत धारण किए लोगों को भी बोलना पड़ता है.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=721&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><blockquote><p><span style="color:#000000;"><strong>आज</strong></span><span style="color:#000000;"><strong> मैं कुछ कहना चाहता हूं. मेरी बात सुनकर कुछ लोग चौंकेंगे और शायद हंसेंगे भी कि महाभारत का कर्ण कैसे बोल रहा हैॽ सदियों पहले कुरूक्षेत्र के पास कुंवारी भूमि पर चिरानिद्रा में सो चुका कर्ण कैसे बोल सकता है. मुर्दे कब से बोलने लगेॽ लेकिन मित्रो, एक समय आता है जब सन्‍नाटे चीखने लगते हैं और आजीवन मौन का व्रत धारण किए लोगों को भी बोलना पड़ता है. क्‍योंकि, हाड़ मांस के जीवित पुतले जब जब मृतकों की तरह आचरण करते हैं तो समाधियां चिल्‍लाने लगती हैं</strong></span><a href="http://kankad.wordpress.com/2009/09/09/jaipur/"><span style="color:#000000;"><strong>!</strong></span></a><span style="color:#000000;"><strong> कोई ‘मरा हुआ’ उठता है और अंधेरे की काली भींत पर उजाले की गुलमेख ठोंकता है. रोशनी ही मानव जीवन की सचाई है, अंधेरा नहीं</strong></span><a href="http://kankad.wordpress.com/2009/09/09/jaipur/"><span style="color:#000000;"><strong>!</strong></span></a><span style="color:#000000;"><strong> वैसे भी मैं वह दानवीर कर्ण नहीं हूं. मैं तो आपके समय का कर्ण हूं, आपका कर्ण हूं. इक्‍कीसवीं सदी का कर्ण, जो आपसे कई बार मिला है, मिलता रहता है. बस दुनियादारी की व्‍यवस्‍तताएं ही ऐसी हैं कि न तो अपनी बात कह पाता हूं और न आप सुन पाते हैं. तो आज मैं अपने मन की बात कहने जा रहा हूं. कहते हैं कि कहने से मन हलका हो जाता है&#8230;.</strong></span></p></blockquote>
<p><span style="color:#000000;"> <span style="color:#000000;"><strong>हम्‍म.</strong>.. तो ग्रीनलाइट हो गई है</span><a href="http://kankad.wordpress.com/2009/09/09/jaipur/"><span style="color:#000000;">!</span></a><span style="color:#000000;"> चौराहे के उत्‍तर में ली मे‍रेडियन की ओर से वाहनों का काफिला चल निकला है. साइकिल, स्‍कूटर, आटो से लेकर लो फ्लोर बसें व बीएमडब्‍ल्‍यू जैसी बड़ी महंगी महंगी गाडि़यां&#8230; खूंटा तोड़कर भागे पशु की तरह मचलते वाहन.. </span><a href="http://kankad.wordpress.com/2009/09/09/jaipur/"><span style="color:#000000;">!</span></a><span style="color:#000000;"> सुबह से पैन के चार पांच पैकेट बेच चुका हूं. शाम तक दसे‍क बिक जाएंगे. फिर अपने घर नरेला चला जाउंगा. मैं अकेला नहीं हूं. जीवन के इस समर में सुबह से उतरने के लिए मेरा पूरा परिवार आता है.  अपनी तो यही जीवनचर्या है, दिनचर्या है. सात आठ साल.. जब से होश संभाला है इस चौराहे या लालबत्‍ती से अपना नाता है, मानों एक नाड़ यहीं बंधी है. बस दिशा बदलती रहती है और बदलते रहते हैं हाथ में पकड़े सामान .. कलम, टार्च, रूमाल, किताबें, पेपर तो कभी पानी की बोतल.. बाकी क्‍या बदलता हैॽ</span></span></p>
<p><span style="color:#000000;"><span style="color:#000000;"><strong>कई</strong> बार हंसी आती है. इतिहास के उस कर्ण से अपना कोई नाता नहीं है, अपना भाग्‍य प्रारब्‍ध कहीं भी उस कर्ण की लकीरों से मेल नहीं खाता. न ही हम गंगा मैया के किनारे की किसी रमणीय चंपानगरी में पैदा हुए. हां, इतना जरूर है कि अपन  जीवन भी है कि हालात की निर्दयी कंटीली झाडि़यों में उलझकर चीथड़े चीथडे़ सा होता रहता है.  यही लालबत्‍ती अपना खेल, स्‍कूल और मैदान है. कुछ सामान खरीद लेते हैं तो कुछ मुस्‍कुरा देते हैं.. इसी में दिन कट जाता है. लोग बात नहीं करते, ज्‍यादातर तो गाड़ी के सीसे ही नीचे नहीं करते. एक दो ने पूछा मेरा नाम और सुनकर बोले ‘कर्ण’</span><a href="http://kankad.wordpress.com/2009/09/09/jaipur/"><span style="color:#000000;">!</span></a><span style="color:#000000;"> जैसे मैं कर्ण हो ही नहीं सकता</span><a href="http://kankad.wordpress.com/2009/09/09/jaipur/"><span style="color:#000000;">!</span></a><span style="color:#000000;"> राष्‍ट्रीय राजधानी की चमचमाती पेवर रोड़ के एक व्‍यस्‍त चौराहे पर पेंसिल बेचने वाले लड़के का नाम कर्ण कैसे हो सकता हैॽ समय की चादर पर इतना बड़ा पैबंदॽ उनकी आंखों में हैरानी से मुझे कोफ्त होती है और मैं उनकी गाड़ी से दूर चला जाता हूं.</span></span></p>
<p><span style="color:#000000;"><strong>मैं</strong> .. मैं .. म्‍म्‍म्‍ा मैं .. इस समय से भी दूर जाना चाहता हूं. मैं हिमालय की चोटी पर जाकर चिल्‍लाना चाहता हूं – हां मेरा नाम कर्ण है. मैं कर्ण हूं. इक्‍कीसवीं सदी के भारत का कर्ण</span><a href="http://kankad.wordpress.com/2009/09/09/jaipur/"><span style="color:#000000;">!</span></a><span style="color:#000000;"> मैं चाहता हूं कि काल सेंटरों की औनी पौनी कमाई की बीयर में मदमस्‍त युवा पीढ़ी मेरी बात सुने, जीडीपी के आंकड़ों से खेलने वाले अर्थशास्‍त्री मेरा नाम जानें, देश को सुपरवार बनाने की चिंता में घुले जा रहे राजनेता मेरी तरफ देखें और पोर्न स्‍टार बनने का ख्‍वाब देखने वाला शाहरुख बताए कि उसके शहर के एक चौराहे के इस कर्ण का भविष्‍य क्‍या हैॽ मैं चाहता हूं कि यह कायनात, यह धरती, ये आसमां, ये ऊंची इमारतें, मेट्रो, गंगा मैया, हिंद महासागर, इंडिया गेट, लाल किला, कुरूक्षेत्र का मैदान, थार का रेगिस्‍तान, दक्‍खन का पठार, बंगाल की खाड़ी .. और आप सब, बताएं मेरा नाम कर्ण क्‍यों नहीं हो सकताॽ  अगर है तो क्‍यों विकास के कतिपय राजवस्‍त्रों से मुझे चीथड़ा समझकर अलग किया जा रहा हैॽ</span></p>
<div id="attachment_724" class="wp-caption aligncenter" style="width: 458px"><img class="size-full wp-image-724" title="DSCN2762" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/12/dscn27622.jpg?w=448&#038;h=336" alt="" width="448" height="336" /><p class="wp-caption-text">लूणकरणर, राजस्‍थान के बस अड्डे पर बसों में सामान बेचने वाले दो दोस्‍त.</p></div>
<p><span style="color:#000000;"><strong>कहते </strong>हैं कि दानवीर कर्ण का जीवन चीथड़े के समान था. लेकिन जीवन के झंझावतों से टकराते हुए अपने पत्‍ते टहनियां गंवा देने वाला पौधा, वातानुकूलित कमरे में लगे मनीप्‍लांट से कमतर कैसे हो सकता हैॽ भौतिक जीवन में आधुनिकीकरण, औद्योगिकीकरण, उदारीकरण, वैश्विकरण जैसे अनेक ‘करणों’ को अपनी सुख सुविधा के लिए अंगीकार करने वाला यह समाज हम जैसे कर्णों को क्‍यों हिकारत की नजर से देखता हैॽ आपके कथित ‘कर्णों’ (या कर्मों) ने चमचमाते राजमार्ग बनाए, लालबत्‍ती वाले चौराहे बनाए लेकिन वहां फुटकर सामान बेचने वाले कर्णों को भूल गएॽ शायद यही कारण कि जितनी ज्‍यादा लालबत्तियां उतने ज्‍यादा कर्ण.. दिल्‍ली से लेकर चेन्‍नई तक और पटियाला से लेकर लूणकरणसर तक.</span><a href="http://kankad.wordpress.com/2009/09/09/jaipur/"><span style="color:#000000;">!</span></a></p>
<p><span style="color:#000000;"> <span style="color:#000000;">अगर आप मेरी कहानी सुनकर यह सोच रहे हैं कि मैं भी बाल भिखारियों या बाल श्रमिकों की तरह की एक समस्‍या हूं तो भूल जाइये. भीख मांगना कर्ण की गति नहीं है. हो ही नहीं सकती</span><a href="http://kankad.wordpress.com/2009/09/09/jaipur/"><span style="color:#000000;">!</span></a><span style="color:#000000;"> जिस दिन कर्ण भीख मांगेगे उस दिन इतिहास का चक्र उल्‍टा घूमेगा और वक्‍त की महाभारत नए सिरे से लिखी जाएगी. क्‍योंकि कर्ण भीख मांगता तो वह कर्ण नहीं होता, सूर्य का बेटा नहीं होता, एक सारथी का लाडला नहीं होता, शोण का बड़ा भाई नहीं होता, राधा माता का वसु नहीं होता.. कर्ण नहीं होता तो महाभारत नहीं होती. एक इतिहास नहीं होता. इस देश का सबसे बड़ा महाकाव्‍य नहीं होता. और सच किसी की इच्‍छा से न तो चलता है और न बदलता है. सचाई यही है कि जब तक कर्ण होगा, महाभारत होगी और जीवन को कोई न कोई मैदान कुरूक्षेत्र में बदलेगा. हमारे इस चौराहे रूपी रणक्षेत्र से हस्तिनापुर की अधिक दूरी नहीं है. वक्‍त का फेर देखिए कि अर्जुन नाम का मेरा भानजा है जो भी इसी बत्‍ती पर सामान बेचता है. इस जमाने के धृतराष्‍ट्र, भीष्‍म, शकुनि, अश्‍वत्‍थामा, नकुल, सहदेव, दुर्याधन, भीम भी तो कहीं होंगे ही. संसद पश्चिम में मुश्किल 200 मीटर की दूरी पर है</span><a href="http://kankad.wordpress.com/2009/09/09/jaipur/"><span style="color:#000000;">!</span></a></span></p>
<p><span style="color:#000000;"><span style="color:#000000;"><strong> </strong></span></span></p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong></p>
<div id="attachment_725" class="wp-caption alignright" style="width: 245px"><img class="size-full wp-image-725" title="DSCN3946" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/12/dscn3946.jpg?w=235&#038;h=314" alt="" width="235" height="314" /><p class="wp-caption-text">दिल्‍ली में एक लालबत्‍ती पर कलम बेचता बच्‍चा. </p></div>
<p></strong></p>
<p><strong><span style="color:#000000;">समय,</span></strong><span style="color:#000000;"> अगर समय है तो यही समय है कि मेरे, उस हर कर्ण के .. जिसके हिस्‍से की रोशनी आधुनिकीकरण की चकाचौंध ने छीन ली है, को पहचान दी जाए. उसका आइडेंटिटी क्राइस मिटाया जाए. अगर आप राजमार्ग और पेवर रोड बनाना चाहते हैं तो बनाइए पर उनकी लालबत्तियों पर सामान बेचते कर्ण के भविष्‍य की भी सोचिए.. </span><a href="http://kankad.wordpress.com/2009/09/09/jaipur/"><span style="color:#000000;">!</span></a><span style="color:#000000;"> अभी बस इतना ही. लाल बत्‍ती हो गई है. बाकी कहानी बाद में.</span></p>
<p><span style="color:#000000;"><span style="color:#000000;">।। आपका कर्ण, राष्‍ट्रीय अभिलेखागार लालबत्‍ती, राजेंद्रप्रसाद रोड, संसद के पास, नयी दिल्‍ली।</span>।</span></p>
<p><span style="color:#000000;"> <span style="color:#0000ff;">(मेरी बात- कुछ बच्‍चे हैं जो हर शहर की किसी लाल बत्‍ती या बस अड्डे और स्‍टेशन पर सामान बेचते मिल जाएंगे. दिल्‍ली की लाल बत्‍ती पर वे किताबें, पत्रिकाएं बेचते हैं तो लूणकरणसर के बस अड्डे पर मौठ के पकोड़े व आइसक्रीम. ऐसे बच्‍चों से मिलना होता रहता है. कई बार सोचा कि इन पर कविता लिखूं, कई बार कहानी लिखने का मन बनाया. लेकिन जब कलम उठाई तो न दिल ने साथ दिया ने आंखों न. यह ऐसा मुद्दा है जिस पर हम नहीं लिखना चाहते क्‍योंकि जब इन बच्‍चों को कुछ पैसों के लिए जान जोखिम में डालकर गाडि़यों के पीछे भागते देखते हैं तो अपने दिल में हूक उठती है. आंखें बंद करने पर लगता है कि इस देश में लाल बत्तियों के जंगल उग आए हैं जहां हर ओर से आवाज आ रही है बाबूजी ये ले लो; बाबूजी वो ले लो. ऐसे में आजादी, संसद, लोकतंत्र, जीडीपी, परमाणु समझौता जैसे शब्‍द आपस में इतने गड्डमड हो जाते हैं कि सब बेमानी सा लगता है. ये भीख मांगने वाले बच्‍चे नहीं हैं. मेहनकश लोग हैं. दोस्‍तो, इनके लिए कुछ किया जाना चाहिए. अनिवार्य शिक्षा के लिए या बालश्रम के विरोध में बने काननू इनके लिए नहीं हैं. इनकी श्रेणी ही अलग है. ये ऐसे बच्‍चे हैं जो मेहनत करते हैं, करना चाहते हैं.  अपना मानना है कि इनके हुनर का लाभ उठाया जाए और इनका जीवन बेहतर बनाया जाए ताकि एक चौराहे पर साथ साथ सामान बेचने वाले कर्ण अर्जुन नाम के ये बच्‍चे आने वाले समय हमारे पूरे समाज के खिलाफ महाभारत का शंखनाद न कर दें. कर्ण नाम एक ऐसे ही बच्‍चे को केंद्र में रखकर ऊपर की बात लिखी है. कथावस्‍तु का शिल्‍प और शब्‍द शिवाजी सावंत लिखित महारथी कर्ण की जीवनी ‘मृत्‍युंजय’ से‍ साभार लिए गए हैं.)</span></span></p>
Posted in गांव- गुवाड़ Tagged: चूल्‍हा, दाल, दाल रोटी, पापी पेट, भात, भूख, रोटी, साग <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kankad.wordpress.com/721/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kankad.wordpress.com/721/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kankad.wordpress.com/721/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kankad.wordpress.com/721/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kankad.wordpress.com/721/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kankad.wordpress.com/721/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kankad.wordpress.com/721/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kankad.wordpress.com/721/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kankad.wordpress.com/721/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kankad.wordpress.com/721/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=721&subd=kankad&ref=&feed=1" /></div>]]></content:encoded>
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		<title>त्रिभुवन:  सुबह की कोंपलें</title>
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		<pubDate>Mon, 07 Dec 2009 05:46:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
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		<description><![CDATA[लंबे संघर्ष के बाद जयपुर और राष्‍ट्रीय राजधानी में धमक से पत्रकारिता कर चुके त्रिभुवन का कवि रूप उनके पहले कविता संग्रह ‘कुछ इस तरह आना’ से सामने आया है जो भाषा के प्रति उनकी अगाढ आस्‍था का प्रतिबिंब भी है.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=709&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><strong>कागज पर चित्र बनाता बच्‍चा</strong></p>
<p><strong>बार बार बनाता है</strong></p>
<p><strong>‘ईश्‍वर’</strong></p>
<p><strong>और हर बार</strong></p>
<p><strong>मिटा देता है रबर से.</strong></p>
<p>(त्रिभुवन की एक कविता)</p>
<p><span style="color:#000000;"><strong>पत्रकार</strong> मित्रों में त्रिभुवन को ‘व्‍याकरणाचार्य’ कहा जाता है क्‍योंकि संस्‍कृत, हिंदी पर उनकी पकड़ अद्भुत है और वे ही हैं जो किसी शब्‍द विशेष के इस्‍तेमाल या उसके सही-गलत होने पर बहस करने की कूव्‍वत रखते हैं. यह भाषा, शब्‍दों के सही इस्‍तेमाल के प्रति उनका आग्रह है. लंबे संघर्ष के बाद जयपुर और राष्‍ट्रीय राजधानी में धमक से पत्रकारिता कर चुके त्रिभुवन का कवि रूप उनके पहले कविता संग्रह ‘कुछ इस तरह आना’ से सामने आया है जो भाषा के प्रति उनकी अगाढ आस्‍था का प्रतिबिंब भी है. यह संग्रह शब्‍दों की आकाशगंगा में त्रिभुवन के प्रभावी दखल को ही रेखांकित नहीं करता बल्कि उनके सहारे छोटी छोटी बातों को रचनाशीलता के व्‍यापक कैनवास पर उकेरने की उनकी हतप्रभ कर देने वाली क्षमता को भी सामने लाता है. अंग्रेजीदां  होते इस समय में हम (विशेषकर नई पीढी के पत्रकार/युवा) जिन शब्‍दों को ‘आऊट डेटड, एक्‍सपायर्ड’ की श्रेणी में डाल चुके हैं उन्‍हें त्रिभुवन की कविताएं धम्‍म से हमारे सामने लाती हैं और हम आश्‍चर्यचकित होकर रह जाते हैं. </span></p>
<p><span style="color:#000000;"><img class="alignleft size-full wp-image-712" title="tri2" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/12/tri2.jpg?w=118&#038;h=160" alt="" width="118" height="160" />ठेठ ग्रामीण या आम भाषा के शब्‍दों को अपनी श्रेष्‍ठ कविताओं में लाना हर कवि के बस में नहीं होता क्‍योंकि इसके साथ वह अपनी रचनाओं को एक क्षेत्र (भाषा क्षेत्र) विशेष तक सीमित करने का जोखिम भी उठा रहा होता है. त्रिभुवन ने इस जोखिम को बड़े पैमाने पर तथा खुलकर उठाया है और यह उनकी कविताओं की एक खूबी बन गया है जो रड़कता नहीं, आषाढ़/सावन के पहले मेह सा महकता है. ‘कुछ इस तरह आना’ में त्रिभुवन ने मई मास की लू से लेकर देह की ऋतु पर बात की है. गलियों, खेतों में मंडराते भतूळिए व इनबाक्‍स में एसएमएस पर उनकी पंक्तियां हैं और वे ही चरखे, तंदूर और भैंस वाली जसमिंदर को सर्च इंजिन में तलाशने की बात करते हैं. </span></p>
<p><span style="color:#000000;">त्रिभुवन की कविताएं बिंबों, प्रतीकों की पगडंडियों पर चलती हुई संभावनाओं के नए क्षितिज टटोलती हैं. इन कविताओं में किसी क्रांति या बड़े सपने का कागजी आह्वान भले ही न हो वे सुबह की कोंपलों, आषाढ के अंधड़, चुलबुले बादलों, बीर बहूटी, सरकंडे, रूंख, अरड़ाते ऊंट, बच्‍चों की क्रिकेट क्रीज, जीवन में स्त्रियों, मां, दोस्‍तों आदि से बावस्‍ता आम आदमी के मनोभावों को सांगोपांग ढंग से सामने रखती हैं. जैसा प्रमुख कवि बद्रीनारायण कहते हैं कि त्रिभुवन की कविताएं ताजी हवा का झोंका है, जो अनुवादित या बोझिल एकसार तकनीकी कविताओं को पढकर बोर-व्‍यथित हो रहे पाठक के दिलो दिमाग पर प्रभावी दस्‍तक देती हैं. व्‍यक्तिगत जानकारी के आधार पर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि त्रिभुवन का यह संग्रह ‘पहल के लिए ही है’, इससे अच्‍छा और बहुत अच्‍छा तो अभी आना है.</span></p>
<p><span style="color:#000000;"><em>//इन कविताओं के भीतर हम एक ऐसे संवेदनशील व्‍यक्ति या औसत नागरिक को देख सकते हैं जो समय और समाज की विसंगतियों का जिम्‍मेदार साक्षात्‍कार करते हुए मनुष्‍यता के सभी रंगों और संवेदनाओं को बचा रखना चाहता है. – हेमंत शेष//</em></span></p>
<p>।।।।।।।</p>
<p><strong>कुछ भी नहीं बचेगा एक दिन </strong></p>
<p><strong><img class="alignright size-full wp-image-711" title="tri1" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/12/tri11.jpg?w=298&#038;h=448" alt="" width="298" height="448" /><br />
</strong></p>
<p><span style="color:#000000;"><strong>इस पृथिवी पर</strong></span></p>
<p><span style="color:#000000;"><strong>न वर्षा, न वसंत, न शरद, न शिशिर,</strong></span></p>
<p><span style="color:#000000;"><strong>न ग्रीष्‍म और न वसंत.</strong></span></p>
<p><span style="color:#000000;"><strong>कुछ बचना संभव ही नहीं घृणा और उदासी में.</strong></span></p>
<p><span style="color:#000000;"><strong>नहीं बचेगा बचना भी इस विक्षोभ में. </strong></span></p>
<p><span style="color:#000000;"><strong> &#8230;&#8230;&#8230;.</strong></span></p>
<p><span style="color:#000000;"><strong> </strong></span></p>
<p><span style="color:#000000;"><strong>जीवन में खिलने का अर्थ खिलने से नहीं,</strong></span></p>
<p><span style="color:#000000;"><strong>गिरने, तपने, सूखने, झरने और ठिठुरने से है.</strong></span></p>
<p><span style="color:#000000;"><strong>जीवन खिलने से है.</strong></span></p>
<p>।।।।।।</p>
<p>।।।।।।</p>
<p><span style="color:#000000;"><strong> ।।।।।।</strong></span></p>
<p><span style="color:#000000;"><strong><br />
</strong></span></p>
<blockquote><p><strong>हिंदी के नए कविताओं में एक ऊबाऊ नीरसता है. वह भाव की भी है, भाषा की भी है और विषयवस्‍तु की भी. समकालीन कविताएं एक खास तरह की कंडीशनिंग की शिकार हैं, जिसे गाहे – बगाहे आलोचकों और पत्र पत्रिकाओं के संपादकों ने बना दिया है. त्रिभुवन की कविताएं ताजी हवा के रूप में आती हुई महसूस होती हैं. इन कविताओं में इमेजिनेटिव फ्लाइट है और इनकी भाषा का अलग सौंदर्य है. विश्‍वास है कि इस संग्रह से आज के कविता जगत में फैली मोनोटोनी खत्‍म होगी. &#8211; बद्रीनारायण, प्रमुख कवि व समालोचक</strong></p></blockquote>
<p>त्रिभुवन, फिलहाल दैनिक भास्‍कर में स्‍टेट ब्‍यूरो के प्रमुख हैं. उनसे यहां संपर्क किया जा सकता है- <a href="mailto:tribhuvun@gmail.com">tribhuvun@gmail.com</a></p>
<p>किताब – कुछ इस तरह आना : त्रिभुवन</p>
<p>बोधि प्रकाशन 0141-2503989</p>
Posted in गांव- गुवाड़ Tagged: अनिरूद्ध उमट, कविता, चमकीला, प्रमोद शर्मा, मारवाड़, मेवाड़, वडाली बंधु, सर्दूल सिकंदर, सुरेंद्र छिंदा <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kankad.wordpress.com/709/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kankad.wordpress.com/709/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kankad.wordpress.com/709/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kankad.wordpress.com/709/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kankad.wordpress.com/709/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kankad.wordpress.com/709/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kankad.wordpress.com/709/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kankad.wordpress.com/709/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kankad.wordpress.com/709/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kankad.wordpress.com/709/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=709&subd=kankad&ref=&feed=1" /></div>]]></content:encoded>
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		<title>संकट में जैव‍ विविधता</title>
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		<pubDate>Thu, 26 Nov 2009 19:42:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
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		<description><![CDATA[इंटरनेशनल यूनियन फार कंजरवेशन आफ नेचर यानी आई यू सी एन हर चौथे साल पृथ्‍वी पर उन प्रजातियों की सूची प्रकाशित करती है जो संकट में हैं. इस सूची को ‘आईयूसीएन रेड लिस्‍ट आफ थ्रेटन्‍ड स्‍पेसीज’ कहा जाता है. यह रेड लिस्ट दुनिया भर में फैले हज़ारों वैज्ञानिकों की रिपोर्ट के आधार पर बनती है इसलिए दुनिया में जैव विविधता पर इसे सबसे प्रमाणिक और विश्‍वसनीय माना जाता है.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=703&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><blockquote><p><strong>धरा की जैव विविधता पर संकट के बादल लगातार गहराते जा रहे हैं. थार की पाटा गोह हो या फोग का पौधा, गंगा की डाल्फिन हो अथवा तंजानिया का किहांसी स्‍प्रे मेंढ़क.. सब का अस्तित्‍व संकट में है. वक्‍त आ गया है कि इस ओर गंभीरता से ध्‍यान दिया जाए और सक्रियता से कदम उठाए जाएं</strong>.</p></blockquote>
<div id="attachment_704" class="wp-caption alignnone" style="width: 458px"><img class="size-full wp-image-704" title="p1" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/11/p1.jpg?w=448&#038;h=336" alt="" width="448" height="336" /><p class="wp-caption-text">घटते आश्रय स्‍थल और बढते खतरों के कारण अनेक जीव संकट के दौर में हैं.</p></div>
<p><strong>संकट का संकेत</strong></p>
<p><span style="color:#000000;">थार के राष्‍ट्रीय मरू उद्यान की जैव विविधता खतरे में है. वनस्‍पति की विभिन्‍न प्रजातियों के साथ साथ रोही गादड़, रोही बिल्‍ली, पाटा गोह जैसे जंतुओं के अस्तित्‍व पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं. जीव विज्ञानियों का कहना है कि इस जैव विविधता को संरक्षित करने की तत्‍काल जरूरत है और अगर इस दिशा में सक्रिय व प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो अनेक और प्रजातियां निकट भविष्‍य में लुप्‍त हो जाएंगी. जैव विविधता पर मंडराते खतरे का यह एक संकेत भर है जिसका असर जैसलमेर या बीकानेर संभाग विशेष तक सीमित नहीं है. प्रदेश से लेकर देश और दुनिया भर में ले दे कर कमोबेश यही हालात हैं, चाहे वह वह थार का रेगिस्‍तान हो, गंगा  हो, हिमालय के ग्‍लेशियर या तंजानिया की कोई नदी. थार से लेकर तंजानिया तक जैव विविधता संकट में है कारण भले ही अलग अलग क्‍यों न हों लेकिन सचाई यही है कि विभिन्‍न तरह के पौधे बूटे बूटियों.. जंतु कीट पतंगों की संख्‍या लगातार कम होती जा रही है. भारत में कुछ दिन पहले तक गिद्धों के गायब होने पर चिंता जताई जाती थी. इन्‍हें बचाने के लिए अभियान चले. श्राद्ध के समय कौओं का नहीं आना अखरा तो अब चिड़ी गौरेया की घटती संख्‍या प्रकृति प्रेमियों की पेशानी पर चिंता की रेखाएं उकेर रही हैं.</span></p>
<p><strong>आईयूसीएन के आंकड़े</strong></p>
<p><span style="color:#000000;">अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर बात की जाए तो पशु पक्षियों के संरक्षण पर काम करनेवाली संस्था आईयूसीएन की नई रपट के अनुसार दुनिया में पाए जानेवाले जीवों में से एक तिहाई लुप्त होने की कगार पर है और ये ख़तरा हर दिन बढ़ता जा रहा है. आईयूसीएन की रेड लिस्‍ट के अनुसार 47,677 में से कुल मिलाकर 17,291 जीव प्रजातियां गंभीर ख़तरे में हैं. इनमें से 21 प्रतिशत स्तनधारी जीव हैं, 30 प्रतिशत मेढकों की प्रजातियां हैं, 70 प्रतिशत पौधे हैं और 35 प्रतिशत बिना रीढ़ की हड्डी वाले यानि सांप जैसे जीव हैं. भारत के बारे में रपट में कहा गया है कि पौधों तथा वन्‍यजीवों की कुल 687 प्रजातियां लुप्‍त होने की कगार पर हैं. इनमें 96 स्‍तनपायी, 67 पक्षी, 25 सरीसृप, 64 मछली व 217 पौध प्रजातियां शामिल हैं. आईयूसीएन की यह रपट जैव विविधता पर सबसे विश्‍वसनीय मानी जाती है क्‍योंकि इस रेड लिस्ट दुनिया भर में फैले हज़ारों वैज्ञानिकों की रिपोर्ट के आधार पर बनती है.</span></p>
<p><span style="color:#000000;">यह रपट जैव विविधता पर मंडराते खतरे की भयावहता का नमूना है. राजस्‍थान के बारे में ऐसा कोई आधिकारिक सर्वेक्षण तो नहीं आया है लेकिन पर्यावरण व प्राणी विद् कहते हैं कि जैसलमेर क्षेत्र के 3162 वर्ग किलोमीटर में फैले मरू उद्यान में लगभग 120 तरह के जीव- जंतु व कीट रहते हैं तथा सैकड़ों तरह के पेड़ पौधे जड़ी बूटिंयां उगती हैं. इन सब पर भारी संकट है. उत्‍तर-पश्चिमी राजस्‍थान में बीकानेर संभाग का एलएनपी (नहर) क्षेत्र को 10,000 से अधिक वन्‍य जीवों की शरणस्‍थली कहा जाता है और निजी भूमि पर जैव विविधता के लिहाज से यह एशिया के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में है, वहां भी हालात अच्‍छे नहीं हैं</span>.</p>
<div id="attachment_705" class="wp-caption alignnone" style="width: 458px"><img class="size-full wp-image-705" title="DSC03125" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/11/dsc03125.jpg?w=448&#038;h=275" alt="" width="448" height="275" /><p class="wp-caption-text">जैव‍ विविधता पर संकट जीवों से लेकर अनेक वनस्‍पतियों, पौधों तक व्‍यापक है. (छाया: पुष्‍पेंद्र)</p></div>
<p><strong>घटते आश्रय स्‍थल, बढता खतरा</strong></p>
<p><span style="color:#000000;">जैव विविधता पर इस मंडराते खतरे के कई कारण हैं. सबसे बड़ा कारण है उस भूमि या स्‍थान का कम होना जहां ये वनस्‍पतियां पलती फूलती हैं या ये जीव जंतु रहते हैं. जलवायु परिवर्तन निसंदेह रूप से एक और बड़ा कारण है. बढ़ती मानवीय हलचल, सिंचाई क्षेत्र के विस्‍तार, शिकारियों का कहर तथा पेयजल जैसी सुविधाओं का अभाव. जैव विविधता पर इस मंडराते खतरे को अनेक रूप में देखा जा सकता है. उदाहरण के लिए राजस्‍थान के बीकानेर संभाग में नहरी प्रणाली विशेषकर राजस्‍थान नहर के आने के बाद से बूर व फोग, खींप, सीणिया, पिल्‍लू, घंटील, लाणो, रींगणी, झींझण आदि पौधे, भुरट, प्‍याजी, गोखरू, कंटाला, कानकतूरा, हिरणखुरी आदि घास और रोहिड़ा, झड़बेरी, अरंड जैसे दरख्‍त तथा तूंबे की बैल जैसी अनेक वनस्‍पतियां लुप्‍त प्राय: हैं. इसी एलएनपी नहर क्षेत्र में पक्‍की नहरों में डूबने से अनेक हिरणों की मौत हो चुकी है. दरअसल ये हिरण पानी पीने या कुत्‍तों आदि से बचने के चक्‍कर में नहरों में गिर जाते हैं और वी आकार में पक्‍की बनी नहर उनके लिए काल साबित होती हैं. सितंबर 2006 में 23 हिरण एलएनपी नहर में डूबने से मरे. इन पशुओं के शिकारियों तथा वाहनों की चपेट में आना भी आम बात है. यहां तक कि जैतसर कृषि फार्म में मोरों व नीलगायों के शिकार या संदिग्‍ध परिस्थितियों में मौत अनेक बार चर्चा का विषय बन चुकी हैं. चिंकारा, खरगोश, लोमडी, सियार, काला तीतर,  पाटा गोह जैसे जीव जंतु भी धीरे धीरे कम होते जा रहे हैं. बिल्‍कुल ऐसी ही स्थिति जैसलमेर के मरू उद्यान की है. नहरी खेती के बाद बढ़ी मानवीय हलचल तथा तेल कंपनियों की गतिविधियों के चलते जैव विविधता खतरे में है.</span></p>
<p><span style="color:#000000;"> वहीं आईयूसीएन ने अपनी रपट में मेढकों की प्रजातियों का ख़ास तौर पर ज़िक्र है और इसमें कहा गया है इसकी 6,285 प्रजातियों में से 1,895 विलुप्त होने की कगार पर हैं. उदाहरण के लिए किहांसी स्प्रे टोड एक ऐसा मेढक है जो पहले ख़तरे में था और अब विलुप्त हो चुकी प्रजातियों की श्रेणी में आ गया है. तंज़ानिया का यह मेंढक इसलिए लुप्त हुआ क्योंकि जहां इसका बसेरा होता था वहां नदी के ऊपरी हिस्से पर बांध बना दिया गया और पानी के बहाव में 90 प्रतिशत की कमी आ गई. खेती बाड़ी में इस्‍तेमाल होने वाले कीटनाशकों ने जीवों की अनेक प्रजातियों को लुप्‍त होने के कगार पर पहुंचा दिया. अब इस तरह की बातें सामने आ रही हैं कि मोबाइल टावरों से निकलने वाली तरंगों के कारण विशेषकर चिडि़या चिडी जैसे छोटे पक्षी दूर भागते हैं.</span></p>
<p><strong>संरक्षण व सुरक्षा की जरूरत</strong></p>
<p><span style="color:#000000;">वैज्ञानिकों का कहना है कि जैव विविधता के लिए ज़िम्मेदार ख़तरों को कम करने के लिए कदम नहीं उठाए जा रहे हैं. ख़ासकर जो क्षेत्र जैव विविधता के लिए जाने जाते हैं या जहां इस तरह के जीव रहते हैं, पनपते हैं उनके संरक्षण के लिए अपेक्षित कदम नहीं उठा जा रहे. उनका कहना है,&#8220; हाल के विश्लेषणों से स्पष्ट है कि 2010 का जो लक्ष्य था इन ख़तरों को कम करने का वो पूरा नहीं हो पाएगा.’’ अखिल भारतीय जीव रक्षा बिश्‍नोई सभा के प्रदेश महामंत्री अनिल धारणियां कहते हैं कि जैव विविधता को बचाने के लिए आम लोगों को जागरुक करने के साथ साथ यह भी जरूरी है कि सरकारी स्‍तर पर गऊघाट बनाने तथा पर्याप्‍त संख्‍या में जीव रक्षकों की नियुक्ति जैसे बुनियादी कदम उठाए जाएं. पर्यावरण व प्रकृति प्रेमी मानते हैं कि सिर्फ बाघ या किसी अन्‍य प्रजाति विशेष को बचाने के लिए अभियान चलाने से अधिक कुछ हासिल नहीं होगा. इस संबंध में समाज व सरकार दोनों का मिलकर व्‍यापक प्रयास करना होगा. सबसे बड़ी बात लोगों को जागृ‍त करना है. प्रकृति का अपना एक चक्र है जिसमें जैव विविधता सबसे महत्‍वपूर्ण है और एक भी कड़ी टूटी तो उसका खामियाजा समूची मानव जाति को उठाना पड़ेगा. बेहतर यही है इस दिशा में अभी से पहल की जाए.</span></p>
<p><strong>रेड लिस्‍ट के मायने</strong></p>
<p><span style="color:#000000;">इंटरनेशनल यूनियन फार कंजरवेशन आफ नेचर यानी आई यू सी एन हर चौथे साल पृथ्‍वी पर उन प्रजातियों की सूची प्रकाशित करती है जो संकट में हैं. इस सूची को ‘आईयूसीएन रेड लिस्‍ट आफ थ्रेटन्‍ड स्‍पेसीज’ कहा जाता है. यह रेड लिस्ट दुनिया भर में फैले हज़ारों वैज्ञानिकों की रिपोर्ट के आधार पर बनती है इसलिए दुनिया में जैव विविधता पर इसे सबसे प्रमाणिक और विश्‍वसनीय माना जाता है. इस बार की रपट की नवीनतम आंकड़ों के अनुसार दुनिया भर की 47,677 प्रजातियों का विशलेषण किया गया जिनमें से 17,291 प्रजातियां संकट में हैं. भारत में 687 पौधों व जीवों की कुल 687 प्रजातियों पर संकट हैं और यह दुनिया के उन शीर्ष दस देशों में  शामिल हो गया है जहां सबसे अधिक प्रजातियों का अस्तित्‍व खतरे में है. भारत में उड़ने वाली गिलहरी, एशियाई सिंह, काले हिरण, गेंडे, गंगा डाल्फिन, बर्फीले तेंदुए सहित अनेक जीवों को संकटग्रस्‍त करार दिया गया है. रपट में इस बात पर चिंता जताई गई है कि जैव विविधता के लिए 2010 के तय लक्ष्‍यों को हासिल नहीं किया जा सकेगा. आईयूसीएन रेड लिस्‍ट इकाई के प्रबंधक क्रेग हिल्‍टन टेलर का कहना है कि विश्‍व समुदाय को जैव विविधता के संकट से निपटने के लिए इस रपट का बुद्धिमता से इस्‍तेमाल करना चाहिए.</span></p>
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		<title>अपनी पंचायत, अपना न्‍याय.</title>
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		<pubDate>Thu, 29 Oct 2009 19:43:50 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[डूंगरसिंहपुरा और गणेशगढ़ गांव बिलकुल अटे सटे या कि मिले हुए हैं. पुलिस की नज़र में डूंगरसिंहपुरा आदर्श गांव है तो गणेशगढ़ अतिसंवेदनशील श्रेणी में आता है. इस पंचायत के कार्यकाल में इस गांव में बडे पैमाने पर विकास कार्य हुए हैं. जनसहयोग से अनेक काम किए गए हैं.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=695&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><div id="attachment_697" class="wp-caption aligncenter" style="width: 458px"><img class="size-full wp-image-697" title="Picture 174" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/10/picture-174.jpg?w=448&#038;h=258" alt="Picture 174" width="448" height="258" /><p class="wp-caption-text">विस्‍थापित होकर आए लोगों ने एक गांव बसाया था डूंगरसिंह पुरा. आज यह गांव विकास  के मामले में कई गांवों को पीछे छोड़ चुका है. गांव के सरकारी विद्यालय का भवन.</p></div>
<p><strong>लगभग पांच हजार की आबादी, साढे चार साल और सिर्फ एक मुकदमा. सुनने पढ़ने में भले ही यह आंकड़ा सही नहीं लगे लेकिन एक गांव के लोगों के मिले जुले प्रयास ने यह संभव कर दिखाया है. यह गांव है गंगानगर जिले का डूंगरसिंहपुरा. इलाके के सबसे पुराने गांवों में से एक और दीनदयाल उपाध्‍याय आदर्श गांव में साढेक चार साल पहले सरपंच बनवारी सहारण तथा अन्‍य मौजिज लोगों ने विवादों को अपने स्‍तर पर ही निपटाने का फैसला किया था. इस छोटे से कदम ने धीरे धीरे एक यात्रा का रूप ले‍ लिया.</strong></p>
<p><strong>गांव की इस व्‍यवस्‍था को गुरुकुल न्‍याय सदन का नाम दिया गया है. गुवाड़ स्थित पीपल के पेड़ के नीचे चौक बनाया गया है और वहां एक थान (मंदिर का छोटा रूप) भी है. कोई भी विवाद होने पर दोनों पक्ष तथा सरपंच सहित अन्‍य मौजिज लोग वहां बैठते हैं. दोनों पक्षों की बात सुनी जाती है, उन्‍हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है और फिर मौजिज लोग जो फैसला करते हैं वह शिरोधार्य. फैसला थोपा नहीं जाता, सर्वमान्‍य होता है.</strong></p>
<p><strong>इस पहल का सबसे अधिक फायदा गरीब तबके को हुआ है और वे कोर्ट कचहरी के चक्‍करों से दूर है. मुकद्मेबाजी से होने वाली आपसी वैमनस्‍यता से भी यह गांव बच गया है. गांव के लोग भी इस व्‍यवस्‍था से प्रसन्‍न हैं. डूंगरसिंहपुरा में पंच परमेश्‍वर या पंचायत की यह व्‍यवस्था ऐसे समय में काम कर रही है जबकि आपसी सहमति या पंचों को मानने वाले लगातार कम होते जा रहे हैं.</strong></p>
<p><strong>सरपंच बनवारी सहारण बताते हैं कि पंचायत के पुराने रिकार्ड को पलटते समय उन्‍हें इसका विचार मिला. मौजिज व बड़े बुजुर्गों से मिलकर शुरुआत की गई और चल पड़ी. अब तक लगभग 25 मामलों का निपटारा न्‍याय सदन की चौकी पर हो चुका है. इनमें छोटे मोटे घरेलू विवादों से लेकर 15 बीघा जमीन (25-30 लाख रुपए मूल्‍य) का मामला शामिल है. बीते साढे चार साल में केवल एक मामला पुलिस के पास गया जो अजा जजा कानून का है. दरअसल गांव वालों ने तय किया है कि पंचायत में आए विवाद को वहीं निपटाया जाएगा और उसका फैसला मान्‍य होता है. अगर कोई व्‍यक्ति अपने स्‍तर पर या पंचायत के फैसले की अवज्ञा कर पुलिस में जाएगा तो गांव में कोई उसके साथ नहीं होगा.</strong></p>
<p><strong>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</strong></p>
<p><img class="alignleft size-full wp-image-696" title="banvari saharan" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/10/banvari-saharan.jpg?w=160&#038;h=153" alt="banvari saharan" width="160" height="153" /></p>
<p><strong>विवादों को मिल बैठ कर सुलझाने का सबसे अधिक फायदा गरीब तबके को हुआ है. लोग कोर्ट कचहरी के चक्‍कर काटने से बचे तथा समय  व धन, दोनों की  बचत हुई. लोगों के समर्थन व  सहयोग से गुरुकुल न्‍याय सदन की व्‍यवस्‍था प्रभावी हो गई यह समूचे गांव के लिए अच्‍छी  बात  है.सबसे बड़ी बात कि लोगों  को विवाद विशेष की सचाई पता होती है. फिर दोनों पक्ष आमने सामने बैठकर बात करते हैं और कुछ  आंखों की  शर्म भी होती है. विवाद विशेष्‍ा को निपटाने में दोनों पक्षों व पंचायत के पदाधिकारियों, बड़े बुजुर्ग के साथ साथ उस समाज विशेष  के मौजिज लोगों को भी बैठाया जाता है ताकि किसी भी तरह की चूक न हो. इसलिए यह प्रणाली अधिक  प्रभावी साबित हो रही है. लोग  सहयोग कर रहे हैं. अब तो गणेशगढ़ के लोग भी इसी न्‍याय  सदन चौक पर आने लगे हैं. – सरपंच बनवारी सहारण</strong></p>
<p><strong>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</strong></p>
<p><strong>उल्‍लेखनीय है कि डूंगरसिंहपुरा और गणेशगढ़ गांव बिलकुल अटे सटे या कि मिले हुए हैं. ये दोनों इस इलाके के सबसे पुराने और सबसे अधिक आबादी वाले गांव माने जाते हैं. गणेशगढ़ पुराना है जबकि डूंगरसिंह पुरा बाद में विस्‍थापित होकर आए लोगों ने तत्‍कालीन बीकानेर रियासत की मंजूरी से बसाया. पुलिस की नज़र में डूंगरसिंहपुरा आदर्श गांव है तो गणेशगढ़ अतिसंवेदनशील श्रेणी में आता है. इस पंचायत के कार्यकाल में इस गांव में बडे पैमाने पर विकास कार्य हुए हैं. जनसहयोग से अनेक काम किए गए हैं.</strong></p>
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		<title>रेत का समंदर, पानी की नदी!</title>
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		<pubDate>Sat, 24 Oct 2009 21:49:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
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		<description><![CDATA[तो एक सभ्‍यता थी जो सर ताल और जोहड़ों के किनारे बसी. एक समाज था जिसने जल के स्रोतों की कद्र की, इन्‍हें सहेजा और संवारा. फिर पिछली आधी सदी में एक पीढी आई जिसने एक समृद्ध और मजबूत व्‍यवस्‍था की अनदेखी की, उसे तबाह किया. <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=678&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><span style="color:#000000;"><strong>थार</strong> प्रदेश में पानी की संकट को देखते हुए 1600 टयूबवैल (नलकूप या बोरवेल) लगाए जा रहे हैं. राज्‍य सरकार प्रदेश के सभी सातों संभागों में इस परियोजना पर सवा सौ करोड़ रुपये खर्च करेगी. पूरे काम को इसी साल के अंत तक पूरा कराने की कोशिश है और ऐसे नलकूपों पर मोटर लगवाकर कनेक्‍शन भी दिया जाएगा.</span></p>
<p><span style="color:#000000;"> </span></p>
<div id="attachment_679" class="wp-caption aligncenter" style="width: 458px"><img class="size-full wp-image-679" title="well6" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/10/well6.jpg?w=448&#038;h=258" alt="रोजड़ी गांव में पुराना कुआं, जिसका कोई इस्‍तेमाल नहीं हो रहा." width="448" height="258" /><p class="wp-caption-text">रोजड़ी गांव में पुराना कुआं, जिसका कोई इस्‍तेमाल नहीं हो रहा.</p></div>
<p><span style="color:#000000;">सवाल है एक ऐसे प्रदेश में जहां पानी को घी की तरह बरता जाता है, ऐसा प्रदेश जिसका एक बड़ा हिस्‍सा एशिया की सबसे बड़ी नहर परियोजना इंदिरा गांधी नहर से जुड़ा है&#8230; वहां इस तरह की योजना की आवश्‍यकता क्‍यों आ पड़ी?  ये सवाल और इनके जवाब  कहीं न कहीं हमारी सोच, समाज और व्‍यवस्‍था से निकलते हैं.</span></p>
<p><span style="color:#000000;">राजस्‍थान के इतिहास पर गौर किया जाए तो एक रोचक तथ्‍य सामने आता है&#8230; जैसे प्राचीन सभ्‍यताएं किसी न किसी नदी के किनारें पनपी, पली फूली वैसे ही राजस्‍थान में छोटे छोटे गांवों से लेकर बड़े बड़े शहरों की बसावट भी जलस्रोतों के आपसपास ही हुई. गांव वहीं बसे जहां पानी का बंदोबस्‍त था. बडे़ शहर बसे तो वहां पानी के भंडारण व वितरण की समुचित व्‍यवस्‍था की गई. यही कारण है कि राजस्‍थान जोहड़ों, ताल तालाबों, कुंडों, सर सरोवरों, बावडियों, डिग्गियों, कुओं का प्रदेश है. बेहद कम मेह और जल के अन्‍य स्रोतों के बावजूद यहां के लोग जेठ की तपती दुपहरियों में अपनी जीजिविषा का दम खम दिखाते रहे हैं. ऐसा कोई पुराना गांव नहीं होगा जहां का कुआं, जोहड़ प्रसिद्ध नहीं हो. पुराने गांवों के नाम भी इसी तरह सर (तालाब), जोहड़ों व डिग्गियों पर हैं जैसे ततारसर, सोमासर, पक्‍की डिग्‍गी, फलां की जोहड़ी आदि.  क्षेत्रफल के हिसाब से देश के इस सबसे बड़े राज्‍य में कुओं, जलाशयों, जोहड़ों की संख्‍या भी कम नहीं है.</span></p>
<p><span style="color:#000000;"> पानी पणिहारी, इंडुणी, पळींडे, घड़े, हांडी जैसे शब्‍द और इनसे जुड़े संस्‍कारों का प्रदेश रहा है राजस्‍थान! नई दुल्‍हन जब पहली बार पानी लाती है तो आयोजन और नवप्रसूता पहली बार जल भरे तो समारोह! घरों में मटके रखने की जगह यानी पळींडे को मंदिर की तरह ही पवित्र मानने वाला प्रदेश आज बिना वजह पानी के संकट के मुआने पर है तो चिंता जायज है. दरअसल पिछले दो तीन दशकों में लोगों की सोच में जो बदलाव आया उसने एक बने बनाए सिस्‍टम का सत्‍यानाश कर दिया. कहते हैं कि राजस्‍थान में जल संरक्षण और भंडारण की सबसे बढिया प्रणाली है. आमेर के किले में जल प्रबंधन इसका अद्भुत उदाहरण है. लेकिन बदलती सोच, समय और व्‍यवस्‍था ने इस प्रणाली की अनदेखी ही नहीं कि बने बनाए स्रोतों को भी खराब कर दिया.</span></p>
<p><span style="color:#000000;">तो एक सभ्‍यता थी जो सर ताल और जोहड़ों के किनारे बसी. एक समाज था जिसने जल के स्रोतों की कद्र की, इन्‍हें सहेजा और संवारा. फिर पिछली आधी सदी में एक पीढी आई जिसने एक समृद्ध और मजबूत व्‍यवस्‍था की अनदेखी की, उसे तबाह किया. बीकानेर संभाग के नहरी क्षेत्र की ही बात करें सबसे अधिक दुर्गति जोहडों की हुई तो सबसे अधिक कब्‍जे भी जोहड़ पायतनों पर हुए. किसी भी गांव में चले जाएं पुराना कुआं मिला जाएगा, जिसे या तो पाट दिया गया या जो उपेक्षित पड़ा है. तो एक समृद्ध जल संरक्षण परंपरा को नहीं सहेज सकने वाला समाज नलकूपों का पानी पीकर कितने दिन चल पाएगा? वैसे भी नलकूप लगाने की यह योजना ऐसे समय में आई है जबकि एक चर्चित अध्‍ययन में कहा गया है कि राजस्‍थान सहित उत्‍तरी भारत  में अत्‍याधिक दोहन के कारण भूमिगत जलस्‍तर बहुत तेजी से गिरा है. गंगानगर जिले में नहरों के किनारे लगे अनाप शनाप टयूबवैल तथा कल्‍लर (नमकीन, बंजर) होती जमीन इसका सटीक नमूना है. </span></p>
<p><span style="color:#000000;">यहां एक घटना का जिक्र प्रासंगिक होगा.. पिछले दिनों हनुमानगढ़ जिले के एक गांव (शायद धांधूसर) में लोगों ने जल संकट को देखते हुए नकारा छोड़ दिए गए कुएं को जनसहयोग से फिर तैयार कर दिया. इसका पानी अब पशुओं के लिए 24 घंटे उपलब्‍ध रहता है. यह एक संकेत है जो हमारा ध्‍यान फिर पारंपरिक जल स्रोतों की ओर दिलाता है. बेहतर होगा कि उनकी सुध ली जाए. नलकूप लगाने की सोचने वाला समाज अगर अपनी विरासत के कुओं, जोहड़ों और बावडि़यों पर ध्‍यान दे तो शायद ज्‍यादा लंबा चल सकेगा!</span></p>
<p><span style="color:#000000;"><strong>पारंपरिक जलस्रोतों की अनदेखी के कुछ उदाहरण बीकानेर संभाग से..</strong></span></p>
<p><span style="color:#000000;"><strong> </strong></span></p>
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<div id="attachment_680" class="wp-caption aligncenter" style="width: 438px"><img class="size-full wp-image-680" title="well1" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/10/well1.jpg?w=428&#038;h=336" alt="नोहर स्थित एक प्राचीन कुआं. " width="428" height="336" /><p class="wp-caption-text">नोहर स्थित एक प्राचीन कुआं. </p></div>
<p><strong> </strong></p>
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<div id="attachment_681" class="wp-caption aligncenter" style="width: 305px"><img class="size-full wp-image-681" title="well2" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/10/well2.jpg?w=295&#038;h=448" alt="रघुनाथपुरा, सूरतगढ़ में प्राचीन कुएं पर बना ढांचा." width="295" height="448" /><p class="wp-caption-text">रघुनाथपुरा, सूरतगढ़ में प्राचीन कुएं पर बना ढांचा.</p></div>
<p><strong> </strong></p>
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<div id="attachment_682" class="wp-caption aligncenter" style="width: 306px"><img class="size-full wp-image-682" title="well3" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/10/well3.jpg?w=296&#038;h=448" alt="मोहल्‍लां, करणपुर का कुआं. " width="296" height="448" /><p class="wp-caption-text">मोहल्‍लां, करणपुर का कुआं. </p></div>
<p><strong> </strong></p>
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<div id="attachment_684" class="wp-caption aligncenter" style="width: 458px"><img class="size-full wp-image-684" title="well4" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/10/well4.jpg?w=448&#038;h=295" alt="गणेशगढ़ की चौपाल में पुरा भव्‍य कुआं. " width="448" height="295" /><p class="wp-caption-text">गणेशगढ़ की चौपाल में पुरा भव्‍य कुआं. </p></div>
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		<title>दीवाली : लोकजीवन का पर्व.</title>
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		<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 04:39:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
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		<description><![CDATA[किसान परिवार के लिए दीवाली के अलग मायने हैं. नरमे कपास की चुगाई व ग्‍वार बाजरे की की कटाई के काम के दिनों में घर की लिपाई पुताई तथा सफाई के लिए समय निकालना होता. यही दिन हैं जब‍ सूरज बाबा की गर्मी कुछ कुछ नम नरम हो रही होती है.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=670&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><strong><span style="color:#000000;"> </span></strong></p>
<div id="attachment_675" class="wp-caption alignright" style="width: 342px"><img class="size-full wp-image-675" title="mn2" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/10/mn22.jpg?w=332&#038;h=448" alt="घर के थान पर जागती जोत.. रोशनी रहे." width="332" height="448" /><p class="wp-caption-text">घर के थान पर जागती जोत.. रोशनी रहे.</p></div>
<p><strong>किसान</strong><span style="color:#000000;"> परिवार के लिए दीवाली के अलग मायने हैं. नरमे कपास की चुगाई व ग्‍वार बाजरे की की कटाई के काम के दिनों में घर की लिपाई पुताई तथा सफाई के लिए समय निकालना होता. यही दिन हैं जब‍ सूरज बाबा की गर्मी कुछ कुछ नम नरम हो रही होती है. </span></p>
<p><span style="color:#000000;">आमतौर पर दीवाली या उसके बाद घरों (साळों, कमरों के भीतर) में सोना शुरू किया जाता है. इसलिए पूरे घर की साफ सफाई की जाती है ताकि बारिश और उससे पहले के जीव जंतुओं कीटाणुओं की सफाई हो जाए. रही सही कसर दीवाली के दीयों की रोशनी कर देती है. यानी घर, आंगन के साथ साथ पूरे परिवेश की साफ सफाई&#8230; यही कारण है कि दीवाली के आसपास घरों गलियों में अलग तरह की जानी पहचानी खुशबू तैरती रहती है. नए सिरे से लिपे पुते घर आंखों को सुहाते हैं. जीवन को ऊर्जा देते हैं. </span></p>
<p><span style="color:#000000;"> </span></p>
<p>लोग सावणी या खरीफ की फसल को समेटने के लिए नए जोश के साथ तैयार हो रहे हैं. यही समय है जब रजाई गदरों को धो सुखाकर तैयार कर लिया जाता है और गुदडि़यां खेस समेट कर रख दिए जाते हैं. मूंगफली की फसल भी पककर तैयार है. अच्‍छी सरसों आ रही है. साग के लिए बथुआ तो है ही. टिंडसी, काचर, मतीरे, काकड़ी, अरहर, भिंडी और  ग्‍वारफली खाने के दिन. गन्‍ना पकने लगा है.</p>
<p>जैसे काणती दीवाली यानी छोटी दीवाली के बाद असली दीवाली होती है. इसी दिन पूजा होता है और रात में रोशनी की जाती है. रोशनी तो कई रात की जाती है लेकिन यह प्रमुख रात होती है. एक आध दिया तो हफ्ते तक घर की मुंडेर, पळींडे या डिग्‍गी पर रख दिया जाता है. दीवाली के अगले दिन रामरमी होती है. यानी मेल जोल का. गांवों में इस दिन का सबसे अधिक महत्‍व होता है. लोग एक दूसरे के घर जाते हैं और एक नए सिरे से संबंधों की शुरुआत राम राम, नमस्‍कार, प्रणाम करते हैं. मिल बैठकर खाते पीते हैं.</p>
<p>इस त्‍योहार से आम जीवन की जो नाड़ जुड़ी है वह किसी भी अन्‍य पर्व से अधिक है. यह समूचे परिवार या समाज समुदाय का त्‍योहार है. टाबर टोली से लेकर बड़े बजुर्गों की इसमें सक्रिय भागीदारी रहती है. इसलिए ही दीवाली सिर्फ दीये या पटाखों का नहीं एक समूचे लोकजीवन का त्‍योहार है.</p>
<p><strong>कुछ पंक्तियां&#8230; </strong></p>
<p><span style="color:#0000ff;"><strong>अमावस्‍या की काली रात में</strong></span><strong><br />
</strong><span style="color:#0000ff;"><strong>पानी की डिग्‍गी और</strong></span><strong><br />
</strong><span style="color:#0000ff;"><strong>चौराहे पर रखा दीया</strong></span><strong><br />
</strong><span style="color:#0000ff;"><strong>अंधेरे के खिलाफ रोशनी के संघर्ष</strong></span><strong><br />
</strong><span style="color:#0000ff;"><strong>का प्रतीक भर नहीं है.</strong></span><strong><br />
</strong><span style="color:#0000ff;"><strong>वह एक चिंगारी</strong></span><strong><br />
</strong><span style="color:#0000ff;"><strong>जो बहती है हमारी धमनियों से</strong></span><strong><br />
</strong><span style="color:#0000ff;"><strong>और चलती हैं</strong></span><strong><br />
</strong><span style="color:#0000ff;"><strong>उम्‍मीदों की च‍क्‍करियां. </strong></span><strong><br />
</strong><span style="color:#0000ff;"><strong><br />
</strong></span><span style="color:#0000ff;"><strong>कार्तिक की नम गरमी में</strong></span><strong><br />
</strong><span style="color:#0000ff;"><strong>नई पुती दीवारों</strong></span><strong><br />
</strong><span style="color:#0000ff;"><strong>गोबर लिपे आंगन में</strong></span><strong><br />
</strong><span style="color:#0000ff;"><strong>महकती है,</strong></span><strong><br />
</strong><span style="color:#0000ff;"><strong>धान की बालियों</strong></span><strong><br />
</strong><span style="color:#0000ff;"><strong>ग्‍वारफली टिंडी मतीरे</strong></span><strong><br />
</strong><span style="color:#0000ff;"><strong>व काचर में रस घोलती है</strong></span><strong><br />
</strong><span style="color:#0000ff;"><strong>दीवाली.</strong></span></p>
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		<title>हरीश भादाणी – रोटी नाम सत है.</title>
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		<pubDate>Sat, 03 Oct 2009 18:51:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
				<category><![CDATA[गांव- गुवाड़]]></category>
		<category><![CDATA[नंद किशोर आचार्य]]></category>
		<category><![CDATA[मायड़ भाषा]]></category>
		<category><![CDATA[राजस्‍थानी कवि]]></category>
		<category><![CDATA[राजस्‍थानी भाषा]]></category>
		<category><![CDATA[राजस्‍थानी लेखक]]></category>
		<category><![CDATA[राजस्‍थानी साहित्‍य]]></category>

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		<description><![CDATA[हरीश भादाणी नहीं रहे. सजीव रूप में भले ही अब वे हमारे बीच न हों लेकिन लेखन और कर्म की इतनी व्‍यापक विरासत छोड़ गए हैं कि आने वाली अनेक पीढियां बांचती रहेंगी. तीनेक महीने पहले बीकानेर गया तो उनसे मिलने का मन था. लेकिन कांकड़ के लिए इतना काम निकल गया कि शाम को उद्यान आभा एक्‍सप्रेस बड़ी मुश्किल से ही पकड़ पाया. भादाणी सा जनकवि थे जो कविता के साथ संघर्ष भी करते थे. वे सिर्फ कवि नहीं थे, कर्मयोगी भी थे. यह अनूठी बात थी उनकी जो उन्‍हें हरीश भादाणी की पहचान देती रही.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=661&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><strong><span style="color:#000000;">हरीश भादाणी नहीं रहे. सजीव रूप में भले ही अब वे हमारे बीच न हों लेकिन लेखन और कर्म की इतनी व्‍यापक विरासत छोड़ गए हैं कि आने वाली अनेक पीढियां बांचती रहेंगी. तीनेक महीने पहले बीकानेर गया तो उनसे मिलने का मन था. लेकिन कांकड़ के लिए इतना काम निकल गया कि शाम को उद्यान आभा एक्‍सप्रेस बड़ी मुश्किल से ही पकड़ पाया</span></strong>. भादाणी सा जनकवि थे जो कविता के साथ संघर्ष भी करते थे. वे सिर्फ कवि नहीं थे, कर्मयोगी भी थे. यह अनूठी बात थी उनकी जो उन्‍हें हरीश भादाणी की पहचान देती रही.</p>
<div id="attachment_662" class="wp-caption alignleft" style="width: 116px"><img class="size-full wp-image-662 " title="Harish Bhadani" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/10/harish-bhadani.jpg?w=106&#038;h=144" alt="हरीश भादाणी इस दुनिया में नहीं रहे. वे शायद स्‍वर्ग में नहीं जाएंगे क्‍योंकि जीते जी जो ईश्‍वर के नाम पर बनाए हर सिस्‍टम का विरोध करते रहे वे मरने के बाद भी संभव है अपनी इस कोशिश को जारी रखें. केवल इसी कारण नहीं बल्कि आम आदमी की तकलीफ और दर्द को अपने सस्‍वर काव्‍य में दिखाने वाले हरीशजी को उनके पाठकों ने ही जनकवि बना दिया. - सिद्धार्थ जोशी, दिमाग की हलचल में. http://imjoshig.blogspot.com/ " width="106" height="144" /><p class="wp-caption-text">भादाणी सा नहीं रहे. वे शायद स्‍वर्ग में नहीं जाएंगे क्‍योंकि जीते जी वे ईश्‍वर के नाम पर बनाए हर सिस्‍टम का विरोध करते रहे तो मरने के बाद भी संभव है अपनी कोशिश को जारी रखें. केवल इसी कारण नहीं बल्कि आम आदमी की तकलीफ और दर्द को अपने सस्‍वर काव्‍य में दिखाने वाले हरीशजी को उनके पाठकों ने ही जनकवि बना दिया. - सिद्धार्थ जोशी, ब्‍लाग &#39;दिमाग की हलचल&#39; में.</p></div>
<p><span style="color:#000000;">अरुं‍धति राय के शब्‍दों में कहें तो लेखक को सिर्फ दृष्‍टा नहीं होना चाहिए, जरूरत पड़ने पर हस्‍तक्षेप भी करना चाहिए. भादाणी सिर्फ कविताओं में क्रांति नहीं करते थे व हकीकत की पथरीली जमीन पर खम ठोक कर अपनी बात कहने और उसके लिए जूझने वाले व्‍यक्ति थे. कविताओं में भूख की बात करना और आम जीवन में किसी मैक्‍डानाल्‍ड में बैठक पिज्‍जा खाना बहुत आसान है. लेकिन भूख को महसूस करना, भूख की बात करना और जरूरत पड़ने पर उसे महसूस करने के लिए भूखा रहना.. यह जज्‍बा हर व्‍यक्ति में नहीं होता और न ही वैसा हर व्‍यक्ति कवि हो जाता है. जनवादी लेखक संघ के संस्‍थापकों में से भादाणी साहब ने स्‍थापित मान्‍यताओं, भ्रांतियों व परंपराओं को चुनौती दी और मनसा, वाचा, कर्मणा उसकी पैरोकारी की. बीकानेर के इस सपूत ने अपनी देह मेडिकल कालेज को दान कर दी.</span></p>
<p><span style="color:#000000;">सामंतवादी परिवार में रहने के बावजूद आम आदमी के दर्द को जाना तथा उसकी बात की. सात पुश्‍तैनी ह‍वे‍लियों को बेचकर आम घर में रहे. कोलकाता के साथ मुंबई को भी अस्‍थाई ठिकाना बनाया और गीत लिखे.</span></p>
<p><span style="color:#000000;">राजस्थानी को राजस्थान की पहली राजभाषा बनाने की मांग सबसे पहले भादाणी सा ने ही उठाई थी. बीकानेर के लोकमत कार्यालय में 1980 में राजस्थानी दूजी राजभाषा विषय पर वैचारिक गोष्टी के मुख्य अतिथि पद से बोलते हुए उन्होंने राजस्थानी को दूसरी नहीं पहली राजभाषा बनाने की पैरोकारी की. हरीश जी अपनी कविता ‘‘ये राज बोलता स्वराज बोलता’’ एवं ‘‘रोटी नाम संत हैं’’ दिल्ली के इंडिया गेट के आगे प्रस्तुत की थी। लोग इनकी कविताओं को गाते हैं, गुनगुनाते हैं।</span></p>
<p><span style="color:#000000;">बंगाल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डॉ. जगदीश्वर चतुर्वेदी हैं ने अपने भाषण में हरीश जी की कविताओं में स्थानीयता के पुट को नकारते हुए कहा कि ये उनको राष्ट्रीय स्तर पर जाने से रोकता है, परंतु भादाणी जी की हिन्दी और राजस्थानी की कविताओं की राष्ट्रीय पहचान पहले से प्राप्त हो चुकी है।</span></p>
<p><strong><span style="color:#000000;">जीवनवृत्‍त</span></strong><span style="color:#000000;">- 11 जून 1933 बीकानेर में (राजस्थान) में जन्म. प्राथमिक शिक्षा हिन्दी-महाजनी-संस्कृत घर में ही हुई. जीवन संघर्षमय रहा और सड़क से जेल तक की कई यात्राओं में आपको काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिले. रायवादियों-समाजवादियों के बीच आपने सारा जीवन गुजार दिया. कोलकाता में भी काफी समय रहे. पुत्री सरला माहेश्वरी ‘माकपा’ की तरफ से दो बार राज्यसभा की सांसद भी रह चुकी हैं। वे 1960 से 1974 तक वातायन (मासिक) के संपादक भी रहे. कोलकाता से प्रकाशित मार्क्सवादी पत्रिका ‘कलम’ (त्रैमासिक) से गहरा जुड़ाव. प्रौढ़शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा पर 20-25 पुस्तिकायें राजस्थानी में. राजस्थानी भाषा को आठवीं सूची में शामिल करने के लिए आन्दोलन में सक्रिय सहभागिता. ‘सयुजा सखाया’ प्रकाशित. राजस्थान साहित्य अकादमी से ‘मीरा’ प्रियदर्शिनी अकादमी व के.के.बिड़ला फाउंडेशन से ‘बिहारी’ सम्मान से सम्‍मान से सम्‍मानित किया जा चुका है.</span></p>
<p><span style="color:#000000;">भादाणी जी की कविता &#8216;रोटी नाम सत है&#8217;.</span></p>
<p><span style="color:#000000;">रोटी नाम सत है<br />
खाए से मुगत है<br />
ऐरावत पर इंदर बैठे<br />
बांट रहे टोपियां</span></p>
<p>झोलियां फैलाये लोग<br />
भूल रहे सोटियां<br />
वायदों की चूसणी से<br />
छाले पड़े जीभ पर<br />
रसोई में लाव-लाव भैरवी बजत है</p>
<p>रोटी नाम सत है<br />
खाए से मुगत है<br />
बोले खाली पेट की<br />
करोड़ क्रोड़ कूडियां<br />
खाकी वरदी वाले भोपे<br />
भरे हैं बंदूकियां<br />
पाखंड के राज को<br />
स्वाहा-स्वाहा होमदे<br />
राज के बिधाता सुण तेरे ही निमत्त है</p>
<p>रोटी नाम सत है<br />
खाए से मुगत है<br />
बाजरी के पिंड और<br />
दाल की बैतरणी<br />
थाली में परोसले<br />
हथाली में परोसले</p>
<p>दाता जी के हाथ<br />
मरोड़ कर परोसले<br />
भूख के धरम राज यही तेरा ब्रत है</p>
<p>रोटी नाम सत है<br />
खाए से मुगत है<br />
[रोटी नाम सत है]</p>
<p>| शब्‍द, जानकारी व कविता साभार- सिद्धार्थ जोशी <a href="http://imjoshig.blogspot.com/">http://imjoshig.blogspot.com/</a> व सत्‍यनारायण सोनी <a href="http://aapnibhasha.blogspot.com/2009/10/blog-post.html">http://aapnibhasha.blogspot.com/2009/10/blog-post.html</a> तथा प्रेम चंद गांधी <a href="http://prempoet.blogspot.com/">http://prempoet.blogspot.com/</a>|</p>
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	</item>
		<item>
		<title>कालीबंगा : जमींदोज सभ्‍यता के अवशेष.</title>
		<link>http://kankad.wordpress.com/2009/09/26/kalibangan/</link>
		<comments>http://kankad.wordpress.com/2009/09/26/kalibangan/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 25 Sep 2009 19:21:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
				<category><![CDATA[गांव- गुवाड़]]></category>
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		<category><![CDATA[pilibangan]]></category>

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		<description><![CDATA[एक जीता जागती सभ्‍यता अचानक कैसे लुप्‍त हो गई और बाद में किसने कालीबंगा को खोजा, इन दो सवालों के अलग अलग जवाब हैं. सरकारी भाषा में कहें तो 1922 में राखलदास बनर्जी व दयाराम साहनी के नेतृत्व में मोहनजोदड़ो व हड़प्पा (अब लरकाना, पाकिस्‍तान जिले में स्थित) में हड़प्पा या सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष खोजे गए जिनसे लगभग 4600 वर्ष पूर्व की प्राचीन सभ्यता का पता चला था.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=643&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><strong><span style="color:#000000;"> इक</span></strong><span style="color:#000000;"> सभ्‍यता थी जो दुनिया में सबसे पहले विकसित होने वाले समाज से बनी. इक बस्‍ती थी जहां दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्‍यताओं में से एक हड़प्‍पा व मुअन जोदड़ो ( मोहन जोदड़ो, मोहें जो दड़ो, मुअन जो दरो) अथवा सिंधु घाटी कालीन सभ्‍यता पली फूली और मानों अचानक लुप्‍त हो गई. उसी बस्‍ती के अवशेष कालीबंगा में मिले. राजस्‍थान के हरियाणा सीमा से लगे हनुमानगढ़ जिले में पीलीबंगा तहसील में आता है यह गांव. तहसील मुख्‍यालय से एक सक पूर्व की ओर जाती है. घग्‍घर नदी पर बना पुल और उसके बाद बायीं ओर एक गांव. पहले कालीबंगा संग्रहालय, फिर थेड़. सड़क के बायीं ओर एक टीले में दबा एक गांव का इतिहास और सामने दायीं ओर एक जीवंत गांव.</span></p>
<div id="attachment_644" class="wp-caption alignnone" style="width: 458px"><img class="size-full wp-image-644" title="dunes" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/09/dunes.jpg?w=448&#038;h=236" alt="कालीबंगा के एतिहासिक थेड़ जहां हडप्‍पाकालीन सभ्‍यता के अवशेष मिले." width="448" height="236" /><p class="wp-caption-text">कालीबंगा के थेड़ जहां ऐतिहासिक मानव सभ्‍यता के अवशेष मिले. </p></div>
<div class="mceTemp">
<dl class="wp-caption alignnone">
<dd class="wp-caption-dd"> </dd>
</dl>
</div>
<p>हड़प्पा मुअन जो दरो या सिंधु घाटी सभ्‍यता के लगभग 100 स्‍थलों का अब तक पता चला है उनमें कालीबंगा क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. मुअन जो दरो व हड़प्पा के बाद कालीबंगा, इस सभ्‍यता का तीसरा बड़ा नगर सिद्ध हुआ है. इसके एक टीले के उत्खनन में तांबे के औजार, हथियार व मूर्तियां मिलीं जो बताती हैं कि यह मानव प्रस्‍तर युग से ताम्रयुग में प्रवेश कर चुका था. यहां से सिंधु घाटी (हड़प्पा) सभ्यता की मिट्टी पर बनी मुहरें मिली हैं, जिन पर वृषभ व अन्य पशुओं के चित्र व र्तृधव लिपि में अंकित लेख है जिन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है. वह लिपि दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी. यहां मिली अधिकांश अवशेषों को राष्‍ट्रीय संग्रहालय, दिल्‍ली तथा अन्‍य जगह भेजा जा चुका है. एक संग्रहालय यहां भी है.</p>
<div id="attachment_645" class="wp-caption alignright" style="width: 134px"><img class="size-full wp-image-645" title="images" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/09/images.jpg?w=124&#038;h=59" alt="कालीबंगा में मिले अवशेष एक समृद्ध, विकसित सभ्‍यता के प्रमाण हैं. एक ऐसी सभ्‍यता जो प्राचीन विश्‍व की दूसरी सभ्‍यताओं से उच्‍चतर नहीं तो, उनके समकक्ष तो थी ही.  -डा दशरथ शर्मा, Rajasthan through the ages. " width="124" height="59" /><p class="wp-caption-text">कालीबंगा में मिले अवशेष एक समृद्ध, विकसित सभ्‍यता के प्रमाण हैं. एक ऐसी सभ्‍यता जो प्राचीन विश्‍व की दूसरी सभ्‍यताओं से उच्‍चतर नहीं तो, उनके समकक्ष तो थी ही.  -डा दशरथ शर्मा, Rajasthan through the ages. </p></div>
<p>वैसे कालीबंगा के थेड़ (टीले) को देखने का अब कोई सार नजर नहीं आता है क्‍योंकि जो उत्‍खनन स्‍थल या खेत वगैरह के अवशेष थे, उन्‍हें मोमजामा डालकर मिट्टी से पाट दिया गया है. कहने को तो यह इन साइटों को मेह, बारिश अंधड़ आदि से बचाने के लिए किया गया लेकिन अब सवाल रह जाता है कि वहां कोई शोधार्थी, जिज्ञासु क्‍या देखे. मिट्टी के टीले, इधर उधर फैले ठीकर ठीकरियां या झाड झंखाड़? सिंधु घाटी सभ्‍यता में इस क्षेत्र के महत्‍व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कालीबंगा या उससे पहले भद्रकाली से लेकर सुल्‍तान पीर, माणक थेड़ी, रंग महल, बड़ोपल, कालीबंगा व पीलीबंगा या उससे आगे तक अनेक ऐसे थेड़ हैं जहां सभ्‍यता के अवशेष मिले हैं, इनमें से सात आठ तो बाकायदा सरकारी रूप से एतिहासिक साइट घोषित हैं.</p>
<p>सरस्‍वती नदी का तट<span style="text-decoration:none;">! दरअसल यह सभ्‍यता एक नदी के किनारे विकसित हुई जिसे सरस्‍वती नदी माना जाता है. कालीबंगा के थेड़ से मिले अवशेषों के आधार पर कहा गया है कि लगभग 4600 वर्ष पूर्व यहाँ सरस्वती नदी के किनारे हड़प्पाकालीन सभ्यता फल-फूल रही थी. यह नदी अब घग्घर नदी के रुप में है। सतलज उत्तरी राजस्थान में सम्‍माहित होती थी. सूरतगढ़ के निकट नहर-भादरा क्षेत्र में सरस्वती व दृषद्वती का संगम स्थल था. स्वंय सिंधु नदी अपनी विशालता के कारण वर्षा ॠतु में समुद्र जैसा रुप धारण कर लेती थी जो उसके नामकरण से स्पष्ट है. हमारे देश भारत में &#8220;र्तृधर सभ्यता&#8221; का मूलत: उद्भव विकास एवं प्रसार &#8220;सप्तसिन्धव&#8221; प्रदेश में हुआ तथा सरस्वती उपत्यका का उसमें विशिष्ट योगदान है. सरस्वती उपत्यका (घाटी) सरस्वती एवं हृषद्वती के मध्य स्थित &#8220;ब्रह्मवर्त&#8221; का पवित्र प्रदेश था जो मनु के अनुसार &#8220;देवनिर्मित&#8221; था. धनधान्य से परिपूर्ण इस क्षेत्र में वैदिक ॠचाओं का उद्बोधन भी हुआ। सरस्वती (वर्तमान में घग्घर) नदियों में उत्तम थी तथा गिरि से समुद्र में प्रवेश करती थी. ॠग्वेद (सप्तम मण्डल, २/९५) में कहा गया है-&#8221;एकाचतत् सरस्वती नदी नाम शुचिर्यतौ। गिरभ्य: आसमुद्रात।।&#8221; सतलज उत्तरी राजस्थान में सरस्वती में समाहित होती थी</span><span style="text-decoration:none;">.</span></p>
<div id="attachment_646" class="wp-caption alignnone" style="width: 458px"><img class="size-full wp-image-646" title="ghaghar1" src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/09/ghaghar1.jpg?w=448&#038;h=259" alt="सूरतगढ केंद्रीय कृषि फार्म से बहती हुई घग्‍घर नदी का दृश्‍य्" width="448" height="259" /><p class="wp-caption-text">सूरतगढ केंद्रीय कृषि फार्म से बहती हुई घग्‍घर नदी का दृश्‍य्</p></div>
<p>सी.एफ. ओल्डन ( C.F. OLDEN ) ने ऐतिहासिक और भौगोलिक तथ्यों के आधार पर बताया कि घग्घर हकड़ा नदी के घाट पर ॠग्वेद में बहने वाली नदी सरस्वती &#8216;दृषद्वती&#8217; थी. तब सतलज व यमुना नदियाँ अपने वर्तमान पाटों में प्रवाहित न होकर घग्घर व हसरा के पाटों में बहती थीं. महाभारत काल तक सरस्वती लुप्त हो चुकी थी और 13वीं शती तक सतलज, व्यास में मिल गई थी. पानी की मात्र कम होने से सरस्वती रेतीले भाग में सूख गई थी. ओल्डन के अनुसार सतलज और यमुना के बीच कई छोटी-बड़ी नदियाँ निकलती हैं. इनमें चौतंग, मारकंडा, सरस्वती आदि थी. ये नदियाँ आज भी वर्षा ॠतु में प्रवाहित होती हैं. राजस्थान के निकट ये नदियाँ निकल कर एक बड़ी नदी घग्घर का रुप ले लेती हैं. आग चलकर यह नदी पाकिस्तान में हकड़ा, वाहिद, नारा नामों से जानी जाती है. ये नदियाँ अब सूख चुकी हैं &#8211; किन्तु इनका मार्ग राजस्थान से लेकर करांची और पूर्व कच्छ की खाड़ी तक देखा जा सकता है.</p>
<p><strong>कैसे लुप्‍त हो गई इक सभ्‍यता? </strong></p>
<p>एक जीता जागती सभ्‍यता अचानक कैसे लुप्‍त हो गई और बाद में किसने कालीबंगा को खोजा, इन दो सवालों के अलग अलग जवाब हैं. सरकारी भाषा में कहें तो 1922 में राखलदास बनर्जी व दयाराम साहनी के नेतृत्व में मोहनजोदड़ो व हड़प्पा (अब लरकाना, पाकिस्‍तान जिले में स्थित) में हड़प्पा या सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष खोजे गए जिनसे लगभग 4600 वर्ष पूर्व की प्राचीन सभ्यता का पता चला था. वहीं अन्‍य विशेषज्ञों का कहना है कि इस सिंधु घाटी नामक इस उन्नत सभ्यता की पहली खोज कालीबंगा में 1914 में इटली के एलपी तैस्सितोरी ने की थी. सिंध में मुअन जो दरो की खुदाई तो 1922 में हुई थी. एलपीतैस्सितोरी ने कालीबंगा सहित लगभग सौ जगह खुदाई कराई थी, जिसमें कोई एक हजार पुरा वस्तुएं जमा की थीं. उन्होंने ही सबसे पहले कालीबंगा और यहां की पुरा सम्पदा को प्रागैतिहासिक घोषित किया था. इस विचार के अनुसार यह राखलदास बनर्जी और अलेक्जण्डर कनिंघम से बहुत पहले की बात है यानी इन लोगों द्वारा हडप्पा के काल निर्धारण से पहले की. कालीबंगा, तत्‍कालीन बीकानेर रियासत का गांव है और तैस्सितोरी ने इसकी खोज बहुत पहले ही कर ली थी.<br />
उपलब्ध ऐतिहासिक, पुरातात्विक और वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर कहा जा सकता है कि कालीबंगा भूकम्प से नष्ट हुआ भारतीय इतिहास का पहला शहर है. साइंस एज (अक्टूबर, 1984, नेहरू सेन्टर, मुम्बई ) में डाबीबीलाल ने कालीबंगा के भूकम्प को अर्लीएस्ट डेटेबल अर्थक्वेक इन इण्डिया (Earliest datable earthquake in India) कहा है. भूकम्प के कारण धरती में पड़ी दरारों से सरस्वती का पानी नीचे भूमिगत जलधाराओं में जाकर लुप्त हो गया. कालान्तर में मौसमी बदलावों से अकाल &#8211; सूखा पड़ने लगा और भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण अरावली पर्वतमाला ऊपर उठने लगी, जिससे सरस्वती की सहायक नदियों के रास्ते बदल गये और सरस्वती के बहाव क्षेत्र में टीले आकर जमने लगे. और धीरे-धीरे रेगिस्तान बढ़ने लगा. इसी रेगिस्तान में कालीबंगा, पत्तन मुनारा जैसे नगर 2500-1500 ईपू में नष्ट होकर जमींदोज हो गये.</p>
<ul>
<li>संदर्भ साभार : <a href="http://www.rajasthan-tour-package.net/Kalibangan-largestprehistoricsiteRajasthan.htm">http://www.rajasthan-tour-package.net/Kalibangan-largestprehistoricsiteRajasthan.htm</a></li>
<li>ओम थानवी <a href="http://www.kalpana.it/hindi/lekhan/omthanvi/archive07.htm">http://www.kalpana.it/hindi/lekhan/omthanvi/archive07.htm</a></li>
<li>प्रेमचंद गांधी <a href="http://www.indradhanushindia.com/magazine/sep2007/13.htm" target="_blank">http://www.indradhanushindia.com/magazine/sep2007/13.htm</a>)</li>
</ul>
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		<title>बरलाग, एक क्रांति व कुछ सवाल.</title>
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		<pubDate>Mon, 21 Sep 2009 04:11:35 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[बरलाग ने हमेशा ही खेती में नवीनतम प्रौद्योगिकी पर जोर दिया. पद्मविभूषण पाने के बाद एक साक्षात्‍कार में उन्‍होंने कहा था,’ मैं भारतीय किसानों से कहूंगा कि नई प्रौद्योगिकी से डरें नहीं. नई जैव प्रौद्योगिकी, किस्‍मों में आनुवांशिक संक्रमण को लेकर काफी संशय है.. आप किसी फसल को बचाने के लिए 15 कीटनाशक छिडकें इससे बेहतर यही होगा आप एक ही चीज इस्‍तेमाल करें.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=638&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><div id="attachment_640" class="wp-caption alignnone" style="width: 458px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/09/pv-jpeg1.gif?w=448&#038;h=171" alt="बरलाग 25 मार्च 1914 को क्रेस्‍को, आयोवा में जन्‍मे. शुरुआती शिक्षा दीक्षा क्रेस्‍को में ही हुई. कालेज में वन विज्ञान का अध्‍ययन किया. पौध रोग‍ विज्ञान में स्‍नातकोत्‍तर हुए और डाक्‍टर की उपाधि भी पाई. कई जगह काम करने के बाद 1944 में मेक्सिको में सहकारी गेहूं अनुंसधान एवं उत्‍पादन कार्यक्रम से जुडे और यहीं से उनका जीवन लक्ष्‍य बदल गया. उन्‍होंने अधिक उत्‍पादन वाली किस्‍में विकसित करने का बीड़ा उठाया. नोबल पुरस्‍कार के साथ वे भारत के दूसरे सर्वोच्‍च नागरिक सम्‍मान पद्मविभूषण से सम्‍मानित हुए. कांग्रेसन गोल्‍ड मेडल व रोटरी अवार्ड सहित अनेक शीर्ष सम्‍मान उन्‍हें मिले." title="pv.jpeg" width="448" height="171" class="size-full wp-image-640" /><p class="wp-caption-text">बरलाग 25 मार्च 1914 को क्रेस्‍को, आयोवा में जन्‍मे. शुरुआती शिक्षा दीक्षा क्रेस्‍को में ही हुई. कालेज में वन विज्ञान का अध्‍ययन किया. पौध रोग‍ विज्ञान में स्‍नातकोत्‍तर हुए और डाक्‍टर की उपाधि भी पाई. कई जगह काम करने के बाद 1944 में मेक्सिको में सहकारी गेहूं अनुंसधान एवं उत्‍पादन कार्यक्रम से जुडे और यहीं से उनका जीवन लक्ष्‍य बदल गया. उन्‍होंने अधिक उत्‍पादन वाली किस्‍में विकसित करने का बीड़ा उठाया. नोबल पुरस्‍कार के साथ वे भारत के दूसरे सर्वोच्‍च नागरिक सम्‍मान पद्मविभूषण से सम्‍मानित हुए. कांग्रेसन गोल्‍ड मेडल व रोटरी अवार्ड सहित अनेक शीर्ष सम्‍मान उन्‍हें मिले.</p></div>
<p><strong>एक</strong> तथ्‍य यह है कि भारत खाद्यान्‍न के मामले में कुल मिलाकर आत्‍मनिर्भर है और एक चिंता उत्‍तर पश्चिम भारत में हर साल भूजल स्‍तर के चार सेंटीमीटर नीचे जाने की है. दोनों के सिरे कहीं न कहीं हरित क्रांति से जुडते हैं जिसके सूत्रधार वनस्‍पति विज्ञानी नार्मन अर्नेस्‍ट बरलाग का पिछले दिनों निधन हो गया. हरित क्रांति के विभिन्‍न पहलुओं की कतरब्‍योंत हो रही है. लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि इस क्रांति ने भुखमरी के मुहाने पर खडे भारत को सिर्फ पेटभर अनाज ही नहीं दिया, उसने हमें एक विश्‍वास भी दिया कि हम अपने सर पर आई किसी भी विपदा से जूझ सकते हैं, किसी भी आफत से टकराने की हमारी ताकत का अहसास आजादी के बाद अगर किसी आंदोलन ने कराया तो वह हरित क्रांति ही थी. आज दूसरी हरित क्रांति की बात की जा रही है लेकिन भूमि के अंधाधुंध दोहन से पंजाब हरियाणा में जमीन की जो गत हुई है या राजस्‍थान के उत्‍तर पश्चिमी इलाकों में पानी का जो संकट है, उसकी बात नहीं की जाती. वह भी तो कहीं न कहीं पहली हरित क्रांति का बाइप्राडक्‍ट है. यह अलग बात है कि बरलाग ने हमें कम लागत, समय में अधिक उपज देने वाले गेहूं के बीज दिए थे. हमने उसकी फसल ली और बाद में लालची होते चले गए. धीरे धीरे हालात हमारे हाथ से निकल गए. वो हमारी गलती थी. बरलाग को एक दूरदृष्‍टा और बीसवीं सदी के महान कृषि विज्ञानी के रूप में याद किया जाएगा, चाहिए. एक याद.. </p>
<p>बरलाग को बीसवीं सदी का ‘अन्‍नदाता’ कहा जाता है जिनकी गेहूं किस्‍मों ने दुनिया में लाखों लोगों को भुखमरी से बचाया. हरित क्रांति, भारत में जिसकी शुरुआत पंजाब से हुई और देखते ही देखते भारतीयों के मुरझाए चेहरों पर एक नया जोश फूंक दिया. आने वाले दशकों में भारत गेहूं के मामले में आत्‍मनिर्भर था और उसे इसके लिए किसी और देश के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं रही. कागज पर आंकडों नहीं वास्‍तवितकता के धरातल पर उगी परिणाम की फसल भुखमरी से जूझ रही दुनिया को भोजन देने में उनके अवदान की साक्षी है.</p>
<p>हरित क्रांति विशेष रूप से मेक्सिको, भारत व पाकिस्‍तान में खाद्यान्‍न उत्‍पादन में क्रांतिकारी बढोतरी से जुड़ी है. साठ के दशक में जब ये देश खाद्यान्‍न के गंभीर संकट से गुजर रहे थे. ऐसे में इन्‍होंने अधिक उत्‍पादकता वाली फसलें बोने का फैसला किया जिससे इनके खाद्यान्‍न विशेषकर गेहूं के उत्‍पादन कल्‍पनातीत रूप से बढ गया और कुछ ही साल में यह आत्‍मनिर्भर हो गए. कृषि विज्ञानी बरलाग को इस हरित क्रांति का पिता या अग्रदूत कहा जाता है. हालांकि इसे सफल बनाने में बड़ी संख्‍या में अन्‍य वैज्ञानिकों, किसानों और सरकारों का योगदान रहा. लेकिन मुख्‍य भूमिका बरलाग की विकसित की गई गेहूं की किस्‍मों का रही. हरित क्रांति अथवा ग्रीन रेवोल्‍यूशन शब्‍द का सबसे पहले इस्‍तेमाल यूएसएआईडी के निदेशक विलियम गाड ने 1968 में किया.</p>
<p>बरलाग ने हमेशा ही खेती में नवीनतम प्रौद्योगिकी पर जोर दिया. पद्मविभूषण पाने के बाद एक साक्षात्‍कार में उन्‍होंने कहा था,’ मैं भारतीय किसानों से कहूंगा कि नई प्रौद्योगिकी से डरें नहीं. नई जैव प्रौद्योगिकी, किस्‍मों में आनुवांशिक संक्रमण को लेकर काफी संशय है.. आप किसी फसल को बचाने के लिए 15 कीटनाशक छिडकें इससे बेहतर यही होगा आप एक ही चीज इस्‍तेमाल करें. यह अद्भुत है.’ बरलाग का तर्क रहा कि जनसंख्‍या जिस तेजी से बढ रही है, उसका पेट भरने के लिए हमें खाद्यान्‍न का उत्‍पादन भी उसी तेजी से बढाना होगा जो खेतीबाड़ी में प्रौद्योगिकी के इस्‍तेमाल के बिना संभव ही नहीं है. नई तकनीक और प्रौद्योगिकी के प्रति अपने लगाव के कारण भी बरलाग को अनेक बार आलोचनाओं का सामना करना पड़ा लेकिन वे अपने रुख पर कायम रहे. खासकर आनुवांशिक संवर्धित (जेनेटिक्‍ली मोडफाइड) फसलों के बारे में उनकी खूब आलोचना हुई इसके जवाब में उनका कहना था कि भूखे मरने से अच्‍छा है कि जीएम अन्‍न खाकर ही मरें.</p>
<p>भारत सरकार के साथ काम करते हुए बरलाग कई बार यहां आए और रहे. भारतीय खेतीबाड़ी व किसानों को जितना उन्‍होंने समझा उसके अनुसार वे कहते रहे कि किसानों को समय पर उर्वरक, फसलों का उचित मूल्‍य तथा सही दर पर रिण मिले. वे इसे भारतीय खेती और किसानों.. दोनों के लिए जरूरी मानते थे. एक बार उन्‍होंने कहा,’अगर मैं लोकसभा में होता तो बार बार चिल्‍लाता- ‘खाद, खाद.. सही मूल्‍य, सही मूल्‍य.. रिण रिण..’ उनका कहना था कि भारत को खेती में नई प्रौद्योगिकी, संकर बीजों, खाद, उपकरणों में निवेश करना चाहिए जिससे उत्‍पादकता और किसानों की आय बढे और वे अर्थव्‍यवस्था का महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा बन सकें. </p>
<p>भारत में बरलाग द्वारा विकसित गेहूं बीजों का आना इतना आसान नहीं था. राजनीतिक विरोध, लालफीताशाही तथा पर्यावर‍णविदों की तनी हुई भौंहें.. ऐसे में बरलाग को तीन लोगों को विशेष सहयोग मिला जिन्‍हें वे थ्री एस कहते थे जो तत्‍कालीन कृषि मंत्री सुब्रमण्‍यम, कृषि सचिव शिव रमण व कृषि विज्ञानी स्‍वामीनाथन हैं. बरलाग का मानना था कि भारतीय विज्ञानियों, नीति निर्धारकों तथा लाखों किसानों की मदद के बिना वे कुछ नहीं कर सकते थे. जब उन्‍हें पद्मविभूषण से सम्‍मानित करने की सूचना दी गई तो उन्‍होंने लिखा कि वे यह सम्‍मान इसे भारतीय विज्ञानियों, किसानों के नाम पर लेना चाहेंगे. </p>
<p>वैसे आज हरित क्रांति की सफलता और इसके इतर प्रभावों (साइड इफेक्‍ट) पर एक बडी बहस छिडी है. विशेषकर जैव प्रौद्योगिकी या जैव संवर्धित बीजों के इस्‍तेमाल को लेकर, जल, जमीन के अंधाधुंध दोहन और उसके बाद उसके बंजर होने के हालात को लेकर.. निसंदेह रूप से हर क्रांति के अपने दोष गुण होते हैं. हरित क्रांति के दुष्‍प्रभावों के लिए कहीं न कहीं हम यानी भारतीय किसान भी तो जिम्‍मेदार ठहराए जाने चाहिए.</p>
<p>|सामग्री विभिन्‍न स्रोतों पर आधारित|</p>
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		<title>सपनों का राजमंदिर !</title>
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		<pubDate>Mon, 14 Sep 2009 04:20:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
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		<description><![CDATA[राजमंदिर भारत के सबसे चर्चित सिनेमाघर भवनों में से एक है और इसकी तुलना हालीवुड, केलिफोर्निया के ग्राउमैनस चाइनीज थियेटर से की जाती है.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=619&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><blockquote><p><strong><br />
‘मैं जयपुर के राजमंदिर को देखकर हैरान रह गया. ऐसा कोई सिनेमाघर अमेरिका में नहीं है.’ </p>
<p>- पाल शरेडर (टेक्‍सी ड्राइवर सहित अनेक चर्चित हालीवुड फिल्‍मों के स्‍क्रीनप्‍ले लेखक जिन्‍होंने पिछले साल कहा कि सिनेमा मर चुका है.)<br />
</strong></p></blockquote>
<div id="attachment_622" class="wp-caption alignnone" style="width: 490px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/09/raj1.jpg?w=480&#038;h=311" alt="जयपुर - पर्यटकों के लिए पसंदीदा गंतव्‍य है राजमंदिर" title="raj" width="480" height="311" class="size-full wp-image-622" /><p class="wp-caption-text">जयपुर - पर्यटकों के लिए पसंदीदा गंतव्‍य है राजमंदिर</p></div>
<p>राजमंदिर जो हर राजस्‍थानी के दिल में सपना बनकर धड़कता है और जिसकी चर्चा के बिना जयुपर यात्रा का वर्णन पूरा हो ही नहीं सकता! थार की एक पीढ़ी है जो राजमंदिर को देखने या राजमंदिर में फिल्‍म देखने के सपने के साथ बड़ी हुई. एक पीढ़ी जिसकी कल्‍पनाओं में तरह तरह के राजमंदिर उकरते रहे हैं. हैरानी नहीं होगी कि किसी सर्वे में जयपुर के सबसे चर्चित और इच्छित गंतव्‍य स्‍थलों में राजमंदिर सिनेमा सामने आ जाए. </p>
<p>हो भी क्‍यों नहीं. 70 एमएम सिंगल स्‍क्रीन वाला राजमंदिर देश के उन चुनिंदा सिनेमाघरों में से हैं जो डीटी और मल्‍टीप्‍लेक्‍स के मौजूदा दौर में भी शानो शौकत के साथ चल रहे हैं. बदलते जमाने की धूल राजमंदिर की दीवारों पर नहीं जम सकी है. </p>
<p>भगवानदास रोड पर पांच बत्‍ती सर्किल के पास स्थित है राजमंदिर थियेटर या सिनेमाघर! </p>
<p>राजमंदिर की शुरुआत हुई एक जून 1976 को चरस फिल्‍म के साथ. इसके डिजाइन का श्रेय विख्‍यात वास्‍तुविद डब्‍ल्‍यू एम नमजोशी को जाता है. उन्‍होंने इस सिनेमाघर का भवन ‘ आर्ट माडर्ने’ तरीके में बनाने की योजना बनाई. इस भवन की आंतरिक साज सज्‍जा व बाहरी रूप दोनों ही अनूठे हैं. भवन के सामने का हिस्‍सा पत्तियों या पुष्‍प दल रूप में हैं. पोस्‍टर वाली लहर पर नौ सितारे या तारे बने हैं. ऊपर की दो दीवारी लहरों पर &#8216;The Showplace of the Nation &#8211; Experience the Excellence&#8217; अंकित है. रात में जब इसका आमुख रोशनी में नहाया होता है तो उसकी शोभा देखते ही बनती है.<br />
<div id="attachment_621" class="wp-caption alignnone" style="width: 490px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/09/rajmandir.jpg?w=480&#038;h=275" alt="रात में राजमंदिर - एक मनोहारी दृश्‍य. " title="Rajmandir" width="480" height="275" class="size-full wp-image-621" /><p class="wp-caption-text">रात में राजमंदिर - एक मनोहारी दृश्‍य. </p></div></p>
<p>भवन की आंतरिक साज सज्‍जा मनोहारी है. शायद देश के किसी भी सिनेमाघर में सबसे बड़ी लाबी.. और रोशनी व्‍यवस्‍था देख तो दर्शक दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं. प्‍लास्‍टर से बनी पत्तियों के पीछे से झांकती रो‍शनी जिसका रंग बदलता रहता है. बालकनी में जाने के लिए सीढियों के बजाए लंबा रैंप बना है. राजमंदिर भारत के सबसे चर्चित सिनेमाघर भवनों में से एक है और इसकी तुलना हालीवुड, केलिफोर्निया के ग्राउमैनस चाइनीज थियेटर से की जाती है. कहते हैं कि यह दुनिया का एक मात्र सिनेमाघर है जो पर्यटक केंद्र या टूरिस्‍ट प्‍लेस के रूप में पंजीबद्ध है.</p>
<p>Tags: Raj madir cinema, Rajmandir Theater history, M I Road, Rajasthani movies </p>
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		<title>जयपुर : अपना सा लगे!</title>
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		<pubDate>Wed, 09 Sep 2009 04:13:32 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[आमतौर पर अन्‍य शहरों की तुलना में सस्‍ता होने के बावजूद जयपुर महंगा है. शायद इसका एक कारण है यहां आने वाले हर यात्री को पर्यटक की नज़र से देखा जाना और वैसा ही व्‍यवहार करना. देश या इसी प्रदेश का नागरिक होने के बावजूद जब आपको पर्यटक के रूप में देखा जाता है तो बुरा भी लगता है. ऐसे में रिक्‍शेवालों से लेकर दुकानदारों तक से ‘लुटने’ का डर है. वैसे ये रिक्‍शेवाले और टैंपूवाले सभी जगह एक जैसे ही होते हैं.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=609&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p>थार का सबसे चर्चित और रंगीला शहर. राजमंदिर, हवामहल, पोलो विक्‍टरी, बिड़ला तारा मंडल, बड़ी और छोटी चौपड़&#8230; थार के अधिकांश बच्‍चों के लिए जयपुर का यही मतलब रहा है. अब शायद वक्‍त बदल रहा है तथा जयपुर के मायने भी. जयपुर के आसपास के इलाकों को छोड़ दें तो यह शहर हमेशा ही दूर की कौड़ी रहा है. वैसे भी थार के लोग कोलकाता, असम या विदेश चले जाएंगे, दिल्‍ली या जयपुर उन्‍हें बहुत दूर लगता है. बीते आठ दस साल में हालात भले ही बदले हों वरना किसी को कह देते कि दिल्‍ली रहते हैं तो सुनने वाले के दिल में धुक धुकी सी जरूर होती. ऐसा कोलकाता या गोहाटी सुनकर नहीं होता. विशेषकर शेखावटी व नोहर जैसे इलाकों से बडी संख्‍या में लोग कोलकाता, मद्रास, गुवाहाटी, अहमदाबाद, सूरत आदि में कारोबार काम करने गए और वहीं रच बस गए.</p>
<div id="attachment_616" class="wp-caption alignnone" style="width: 346px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/09/polo1.jpg?w=336&#038;h=448" alt="रात में पोलो विक्‍टरी सिनेमा. जयपुर आने वालों के लिए एक बड़ा मील." title="polo" width="336" height="448" class="size-full wp-image-616" /><p class="wp-caption-text">रात में पोलो विक्‍टरी सिनेमा. जयपुर आने वालों के लिए एक बड़ा मील.</p></div>
<p>तो यह जो जयपुर है वह दिल्‍ली या किसी भी अन्‍य बाहरी शहर की तुलना में अधिक अपनापन लिए हुए है. अनेक बार अनेक शहरों में जाना होता है लेकिन जयपुर में कभी ऐसा नहीं लगा कि किसी पराए शहर में है. हो सकता है कि ऐसा थार से बंधी अपनी नाळ के कारण हो. लेकिन है. जयपुर में भी अपन वैसी ही मस्‍ती और बेफिक्री से घूमते हैं जैसा कि दिल्‍ली या अपने घर में. </p>
<p>आमतौर पर अन्‍य शहरों की तुलना में सस्‍ता होने के बावजूद जयपुर महंगा है. पोलो विक्‍टरी के पास एक चर्चित दुकान पर अगर आप 100 रुपये में दो दाल बाटी खाते हैं तो इसका संकेत मिल जाता है. शायद इसका एक कारण है यहां आने वाले हर यात्री को पर्यटक की नज़र से देखा जाना और वैसा ही व्‍यवहार करना. देश या इसी प्रदेश का नागरिक होने के बावजूद जब आपको पर्यटक के रूप में देखा जाता है तो बुरा भी लगता है. ऐसे में रिक्‍शेवालों से लेकर दुकानदारों तक से ‘लुटने’ का डर है. वैसे ये रिक्‍शेवाले और टैंपूवाले सभी जगह एक जैसे ही होते हैं.</p>
<p>आमतौर पर हम लोग हर पर्यटक को ‘अंग्रेज’ ही मानते हैं भले ही वह पुर्तगाल से आया हो या फ्रांस से. थारवासी हर विदेशी को अंग्रेज ही कहते हैं. जयपुर, अजमेर, पुष्‍कर, जोधपुर, जैसलमेर व उदयपुर में तो इस तरह के पर्यटकों की भीड ही लगी रहती है. कहते हैं कि राजस्‍थान के ये स्‍थान विदेशी पर्यटकों के लिए पसंदीदा गंतव्‍यों में से एक हैं. अपनी लोकपरंपराओं के साथ साथ आधुनिक जीवनचर्या के लिए जाना जाने वाला जयपुर फैशन में भी पीछे नहीं है.<img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/09/hhhh.jpg?w=233&#038;h=330" alt="hhhh" title="hhhh" width="233" height="330" class="alignright size-full wp-image-611" /> वैसे इस बार भादो में वहां देखा कि लड़कियां, युवतियां व महिलाएं मुहं पर नकाब ‘दुपट्टे या बडे रूमाल से मुहं ढककर’ तथा हाथों बाहों में लंबे लंबे दस्‍ताने पहने हुए थीं. दुपहिया चलाने वाली हो या पैदल चलने वाली.. कई जगह तो लड़कों तक ने ऐसा कर रखा था. समझ में नहीं आया यह सनबर्न से खुद को बचाने की कवायद है या <strong>फैशन</strong>. तो यह जो जयपुर है वह थार के हर वाशिंदे के सपनों में बसता है और नसों में धडकता है.. कभी गुलाबीनगरी के रूप में तो कभी प्रदेश के सबसे हाइटेक व फैशनपरस्‍त शहर के रूप में!</p>
<p><strong>यह है जयपुर </strong>: चारों ओर से परकोटे और दीवारों से घिरे इस शहर में प्रवेश के लिए पहले सात दरवाजे थे जबकि बाद में एक नया दरवाजा न्‍यू गेट बना. जयपुर बसाया था महाराजा जयसिंह द्वितीय ने 1827 में जबकि इसे गुलाबी बनाया 1896 में सवाई मानसिंह ने. सवाई मानसिंह ने इंग्‍लैंड की महारानी एलिजाबेथ व वेल्‍स के राजकुमार अल्‍बर्ट के स्‍वागत में पूरे शहर को गुलाबी रंग से पुतवा दिया और यह गुलाबीनगर हो गया. तीन ओर से अरावली पवर्तमाला से घिरा जयपुर अपनी समृद्ध परंपरा, संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है. प्राचीन या मूल जयपुर देश के सबसे व्‍यवस्थित शहरों में गिना जाता है. इसके वास्‍तु के बारे में कहावत प्रसिद्ध है कि शहर को सूत से नाप लीजिये, नाप-जोख में एक  बाल के बराबर भी फ़र्क नही मिलेगा. बनवाने वालों ने इस शहर को सिर्फ वास्‍तु या ज्‍यामिति के हिसाब से ही नहीं सुरक्षा, सौंदर्य, जन सुविधा और रोजगार सृजन के लिहाज से भी बेहतर बनाने का प्रयास किया. </p>
<p><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/09/hawah-mahal.jpg?w=490&#038;h=373" alt="hawah-mahal" title="hawah-mahal" width="490" height="373" class="alignnone size-full wp-image-612" /></p>
<p><strong>स्‍थापत्‍य</strong> की बात की जाए तो जयपुर की एक खासियत यहां निर्माण कार्य में गुलाबी धौलपुरी पत्‍थरों का इस्‍तेमाल भी है. यहाँ के मुख्य उद्योगों में धातु,संगमरमर, वस्त्र-छपाई, हस्त-कला, रत्न व आभूषण का आयात-निर्यात तथा पर्यटन आदि शामिल हैं। दर्शनीय स्‍थलों में नाहरगढ़ दुर्ग, जयगढ़ दुर्ग, सिटी पैलेस, मोती डूंगरी, हवामहल, रामनिवास बाग, परकोटा, नाहरगढ का किला, जंतरमंतर या वैधशाला, गो‍विंददेव जी का मंदिर प्रमुख है. वैसे कहीं से भी जयपुर आने के लिए सड़क मार्ग बहुत अच्‍छा विकल्‍प है. वैसे भी सड़क परिवहन के लिहाज से राजस्‍थान कहीं बेहतर और अव्‍वल स्थिति में है. जयपुर में दिल्‍ली की तर्ज पर बीआरटी कारिडार का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है और मेट्रो के लिए भी पहल शुरू हो गई है. सेज जैसी परियोजनाओं के साथ अनेक बड़ी कंपनियां यहां दस्‍तक दे रही हैं. बदलते वक्‍त के साथ यह शहर भी बदल रहा है हालांकि इसका गुलाबीपन अब भी बना हुआ है.</p>
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		<title>बाजरा और ग्‍वार!</title>
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		<pubDate>Mon, 07 Sep 2009 02:33:52 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[इससे आगे खेतों में मूंगफली की फसल नजर आती है. थार का जो पहाड़ी इलाका है वहां बाजरा व ग्‍वार. सावणी की फसलें हैं. मतीरे, तरबूज, ककड़ी, काचरी, ग्‍वार फली, भिंडी, टिंडी या टिंडसी, लोइए की सब्‍जी के दिन हैं. दिन बदल रहे हैं..<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=604&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><strong>भादो के कुछ ही दिन हैं. दिल्‍ली सीकर बाइपास से गुजरते हुए सर तथा बिलोंची गांव के आसपास खूब ग्‍वार और बाजरा दिखता है. बाजरे के सिट्टे लंबे व बडे हैं. पकाव की ओर जाती फसल! नरम नरम हरियाली की चादर चारों ओर दिखती है. राजमार्ग के बीचों बीच लगे पौधों, आसपास की पहाडि़यों, घाटियों, खेतों, मेड़ों पर हरियाली के दस्‍तखत सांगोपांग नजर आते हैं. </strong></p>
<blockquote><div id="attachment_605" class="wp-caption alignnone" style="width: 480px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/09/bajra1.jpg?w=470&#038;h=360" alt="दिल्‍ली सीकर बाइपास के आसपास बाजरे के खेत." title="bajra1" width="470" height="360" class="size-full wp-image-605" /><p class="wp-caption-text">दिल्‍ली सीकर बाइपास के आसपास बाजरे के खेत.</p></div>
<p>थार की एक खास बात है. मेह यहां के जीवन को बहुत गहरे से भीगो देता है. चौमासे या बाद में बरसा मेह और उससे उपजी हरियाली जमीन से लेकर आसमान तक यानी पेड़ पौधों, पशुओं और इंसानों तक .. हर कहीं नजर आ जाती है. हरियाली को लेकर थार के जीव जंतुओं का अजीब सा क्रेजीनेस है. आकर्षण है. अगर मेह के बाद हरियाली है तो लोगों के चेहरों पर अलग रौनक होगी, पशुओं तक पर उसका असर होगा; प्रकृति को खैर रंगी ही होगी हरियाली में. </p>
<p>तो अकाळ से जूझ रहे थार के इस राजस्‍थान में इस तरह की हरियाली सचमुच सुकून देती है. उम्‍मीदों को हरा रखती है! </p>
<p>यही समय है जब घग्‍घर नदी की बेल्‍ट वाले इलाके में धान फल फूल रहा है. विशेषकर हनुमानगढ़ तथा गंगानगर जिलों के कुछ इलाकों में धान के खेतों में पसरी हरियाली और गीलापन दिखता है. बीकानेर की ओर बढें तो अकाळ नजर आने लगता है. विशेषकर राज कैनाल के इलाके में अबकी बार नरमा कपास तो नहीं के बराबर ही है. जो था वह पानी की कमी के कारण लगभग जल चुका है. मेह नहीं होने और नहरों में पानी की कमी के कारण यह इलाका एक बार फिर अकाळ की चपेट में है. </p>
<p>इससे आगे खेतों में मूंगफली की फसल नजर आती है. थार का जो पहाड़ी इलाका है वहां बाजरा व ग्‍वार. सावणी की फसलें हैं. मतीरे, तरबूज, ककड़ी, काचरी, ग्‍वार फली, भिंडी, टिंडी या टिंडसी, लोइए की सब्‍जी के दिन हैं. दिन बदल रहे हैं.. राते लंबी दिन छोटे होंगे व सर्दी बढेगी. यह अलग बात है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भादो के बावजूद अब भी जेठ आषाढ सी गर्मी है. मौसम के साथ वक्‍त भी शायद बदल गया है! अब लगता है कि सिर्फ उम्‍मीद रखने से कुछ नहीं होगा, वक्‍त आ गया है कि कुछ किया जाए ताकि आने वाली पीढियां भी मतीरे, तरबूज खा सकें!</p></blockquote>
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		<title>तैस्‍सीतोरी : थार का इतालवी साधक!</title>
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		<pubDate>Fri, 21 Aug 2009 20:08:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
				<category><![CDATA[गांव- गुवाड़]]></category>

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		<description><![CDATA[विख्‍यात भाषा विज्ञानी प्रोफेसर ग्रियर्सन की संतुति पर लंदन में भारत कार्यालय ने एशियाटिक सोसायटी कलकत्‍ता के लिए उन्‍हें आमंत्रित किया. आठ अप्रैल 1914 को तैस्‍सीतोरी ने बंबई में उतरे और उस देश पहुंचे जो उनके सपनों में रचा बसा था.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=594&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><blockquote><p><strong>भारतीय सभ्‍यता व संस्‍कृति में विशेष रुचि रखने वाले तैस्‍सीतोरी, वार्डिक एंड हिस्‍टोरिकल सर्वे आफ राजपूताना के अधीक्षक के रूप में राजपूताना आए थे. लेकिन बीकानेर में उनका मन ऐसा रमा कि वे यहीं के होकर रह गए</strong>. </p></blockquote>
<p><strong>उत्‍तर</strong> पश्चिमी राजस्‍थान विशेषकर बीकानेर रियासत में शिलालेख, सिक्‍के, मूर्तियां व अन्‍य ऐतिहासिक सामग्री एकत्रित करने में जिस विदेशी हस्‍ती ने सबसे महत्‍ती भूमिका निभाई वह है एल पी तैस्‍सीतोरी. इटली में जन्‍मे तैस्‍सीतोरी वार्डिक एंड हिस्‍टोरिकल सर्वे आफ राजपूताना के अधीक्षक के रूप में यहां आए पर बीकानेर में उनका मन ऐसा रमा कि वे यहीं के होकर रह गए. थार की विकट जलवायु के बावजूद तैस्‍सीतोरी का थार से ऐसा मोह लगा कि वे पुरा सामग्री जुटाने के लिए बीहडों, धोरों में घूमते रहे. थार की डोर उन्‍हें बार बार इटली से यहां खींचकर लाती रही.<br />
<div id="attachment_595" class="wp-caption alignnone" style="width: 490px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/08/tessi21.jpg?w=480&#038;h=622" alt="बीकानेर में तैस्‍सीतोरी की सम‍ाधि. " title="tessi21" width="480" height="622" class="size-full wp-image-595" /><p class="wp-caption-text">बीकानेर में तैस्‍सीतोरी की सम‍ाधि. </p></div></p>
<p>तैस्‍सीतोरी को राजस्‍थानी भाषा व उनकी लिपियों के विश्‍लेषण, भारतीय कला, संस्‍कृति तथा पुरातत्‍व में विशेष योगदान के लिए याद किया जाता है. डा तैस्‍सीतोरी को बीकानेर की सरकार ने राजस्‍थानी भाषा व उनकी लिपियों का विश्‍लेण करने के लिए आमंत्रित किया था. वे दिसंबर 1915 में बीकानेर आए. उन्‍होंने बीकानेर रियासत के सैकड़ों गांवों में घूमकर लगभग 729 पुरालेखों का संग्रह किया. इसी तरह उन्‍होंने लगभग 981 मूर्तियां तथा पुरातत्‍व महत्‍व की दूसरी चीजें खोजीं, इकट्टी की. कहते हैं कि बीकानेर का विख्‍यात संग्रहालय उन्‍हीं की देन है. </p>
<p>लुइज पियो तैस्‍सीतोरी (Luigi Pio Tessitori) का जन्‍म 13 दिसंबर 1887 को इटली के उदीने (Udine) शहर में हुआ. उन्‍होंने 24 साल की ही उम्र में राम‍चरित मानस पर पहले इतालवी शोधार्थी के रूप में शोध प्राप्‍त किया. विदेशी भाषाओं में उनकी स्‍वाभाविक रुचि थी और विश्‍वविद्यालय स्‍तर पर संस्‍कृत का अध्‍ययन करने के बाद वे फ्लोरेंस विश्‍वविद्यालय से संस्‍कृत स्‍नातक भी हुए. उन्‍होंने ‘रामचरित और रामायण’ विषय पर शोध किया और डाक्‍टरेट हुए. </p>
<div id="attachment_597" class="wp-caption alignnone" style="width: 490px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/08/tessi11.jpg?w=480&#038;h=437" alt="बीकानेर संग्रहालय में तैस्‍सीतोरी अभिलेख कक्ष का एक दृश्‍य. इस कक्ष की सामग्री हजारी बांठिया ने दी है. " title="tessi11" width="480" height="437" class="size-full wp-image-597" /><p class="wp-caption-text">बीकानेर संग्रहालय में तैस्‍सीतोरी अभिलेख कक्ष का एक दृश्‍य. इस कक्ष की सामग्री हजारी बांठिया ने दी है. </p></div>
<p>विख्‍यात भाषा विज्ञानी प्रोफेसर ग्रियर्सन की संतुति पर लंदन में भारत कार्यालय ने एशियाटिक सोसायटी कलकत्‍ता के लिए उन्‍हें आमंत्रित किया. आठ अप्रैल 1914 को तैस्‍सीतोरी ने बंबई में उतरे और उस देश पहुंचे जो उनके सपनों में रचा बसा था. वहां से कलकत्‍ता फिर जोधपुर और अंतत: अपनी नयी कर्मस्‍थली बीकानेर पहुंचे. भले ही शुरू में बीकानेर में उनका कार्यकाल नियत था लेकिन वे यहां की संस्‍कृति में ऐसे रचे बसे कि यहां के ही होकर रहे गए.</p>
<p>तैस्‍सीतोरी ने खुद को थार की विकट जलवायु के अनुसार ढाला और पुरातात्विक महत्‍व की सामग्री जुटाने में महत्‍ती भूमिका निभाई. थार के धोरों और बीहड़ों में घूमते हुए उन्‍होंने दुलर्भ सामग्री सामग्री जुटाई. उन्‍होंने हालकृत सतसई, नासकेतरी कथा व इंद्रिय पराजय शतकम तथा आजाद वक्‍त की कथा का इतालवी भाषा में अनुवाद किया. उनका निधन 32 साल की अल्‍पायु में ही 22 नवंबर 1919 को बीकानेर में हुआ.</p>
<p>बीकानेर में तैस्‍सीतोरी के कब्रिस्‍तान को स्‍मृतिस्‍थल के रूप में विकसित किया गया है. जहां राजपूत शैली की छतरी बनी हुई है. 1982 से सालाना तैस्‍सीतोरी स्‍मृति समारोह की शुरुआत हुई. बीकानेर के प्रसिद्ध अभिलेखागार में तैस्‍सीतोरी अभिलेख कक्ष बना हुआ है जिसमें तैस्‍सीतोरी से जुड़ी तमाम सामग्री का प्रदर्शन किया गया है. इस कक्ष की सामग्री हजारी लाल बांठिया ने उपलब्‍ध कराई हैं.<br />
&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<p>(सामग्री बीकानेर अभिलेखागार में तैस्‍सीतोरी कक्ष में उपलब्‍ध सामग्री पर साभार आधारित)<br />
टैग: डा. एल पी टैस्‍सीटोरी, मुरलीधर व्‍यास, Hazari Mull Banthia, Hazari lal Banthia, L. P. Tessitori (1887-1919), Luigi Pio Tessitori</p>
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		<title>पैसा या पढ़ाई!</title>
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		<pubDate>Mon, 17 Aug 2009 19:52:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
				<category><![CDATA[गांव- गुवाड़]]></category>

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		<description><![CDATA[वैसे देश दुनिया में धक्‍के खाने की परिपक्‍वता उसकी बातों से नजर आती है. हमने पूछा इतनी जगह रह हो भारत में, सबसे अच्‍छी कौनसी लगती है तो बोला,’ जहां पैसा मिले वही.. पैसा मिलना चाहिए, कमाई होनी चाहिए.. जगह चाहे कोई भी हो.’ वैसे उसकी नज़र में इंदौर औरों से बेहतर है. <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=585&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><strong><br />
<blockquote>‘..आज की दुनिया में दो ही चीजें चलती हैं पैसा या पढाई. आपके पास खूब पैसा है तो ठीक है नहीं तो आप पढाई में अव्‍वल होने चाहिएं. वरना किसी काम के नहीं. इसलिए हम चाहते हैं कि छोटे भाई  खूब पढ लें.’ </p></blockquote>
<p></strong></p>
<p>नारायण नाम ही बताया था उस 19..20 साल के यु‍वक ने. लूणकरणसर से बीकानेर जाते हुए बस में मुलाकात हो गई. वह गंगानगर से भीलवाड़ा जा रहा था और अपनी मंजिल बीकानेर तक ही थी. बात चल पड़ी तो बताया कि वह भीलवाड़ा के लुहारिया गांव का है. आइस‍क्रीम का काम है. देश भर में मेवाड़प्रेम और भोलेनाथ के नाम से जो रेहडियां लगी होती हैं उन पर अधिकांश लोग भीलावाड़ा या आसपास के ही होते हैं.</p>
<p>यह सावण के महीने की बात है. इलाके में कल ही बूंदाबांदी हुई है. नारायण की शादी छोटी उम्र में ही हो गई थी. मुकलावा (आणा) यानी गौना नहीं हुआ सात आठ साल से वह बाहर रह रहा है. अहमदाबाद से लेकर इंदौर, कोच्चि से लेकर चेन्‍नई और चंडीगढ़ से लेकर कोलकाता तक.. शायद ही ऐसा कोई बड़ा शहर हो जिसकी खाक उसने नहीं छानी हो. साल में आठ महीने बाहर रहते हैं, चार महीने घर पे. </p>
<p>पांच भाई और चार बहनों के परिवार वाला नारायण कहता है कि वैसे तो सबकुछ है. जमीन जायदाद, भेड़ें, दुकानें .. ठीकठाक जीवन कट रहा है. पैसे की कमी नहीं. फिर बाहर रहने की वजह पूछी तो किसी दार्शनिक के अंदाज में बोला, ‘धाप नहीं है ना, किसे धाप (संतोष) है पैसे से. जी नहीं भरता ना, इसीलिए लगे हैं.’ परिवार के ज्‍यादातर पुरूष इसी काम यानी आइसक्रीम बेचने में हैं.<br />
<img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/08/uuu2.jpg?w=235&#038;h=167" alt="uuu" title="uuu" width="235" height="167" class="alignright size-full wp-image-591" /><br />
नारायण कहता है कि छोटा भाई और एक बहन पढ रही है. वे पढना चाहते हैं और हम चाहते हैं कि जितना ज्‍यादा हो पढ ले ताकि हमारी तरह धक्‍के नहीं खाने पड़ें. टैम पैसे और पढाई का ही है. दोनों ही हर किसी के पास नहीं होते. कोशिश करनी चाहिए कि कम से कम एक तो हो.</p>
<p>वैसे देश दुनिया में धक्‍के खाने की परिपक्‍वता उसकी बातों से नजर आती है. हमने पूछा इतनी जगह रह हो भारत में, सबसे अच्‍छी कौनसी लगती है तो बोला,’ जहां पैसा मिले वही.. पैसा मिलना चाहिए, कमाई होनी चाहिए.. जगह चाहे कोई भी हो.’ वैसे उसकी नज़र में इंदौर औरों से बेहतर है. </p>
<p>जिंदगी के अनुभव और उम्र का कोई संबंध नहीं है. जीवन की ठोकरें कई बार पैरों के पंजों और अंगुलियों को समय से पहले ही कठोर बना देती हैं.</p>
<p>लूणकरणसर, जामसर और कस्‍तूरिया एक एक कर छोटे मोटे गांव निकलते रहे&#8230; अंधेरा घिरने लगा था. बीकानेर अब ज्‍यादा दूर नहीं था. मौसम में उमस थी.</p>
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			<media:title type="html">uuu</media:title>
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		<item>
		<title>बीकानेर अभिलेखागार : समृद्ध व सुव्‍यवस्थित</title>
		<link>http://kankad.wordpress.com/2009/08/14/arhives/</link>
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		<pubDate>Thu, 13 Aug 2009 20:08:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
				<category><![CDATA[गांव- गुवाड़]]></category>
		<category><![CDATA[Bikaner Museum]]></category>
		<category><![CDATA[Junagarh fort]]></category>
		<category><![CDATA[Rajasthan State Archives]]></category>
		<category><![CDATA[Rajasthan State Archives Bikaner Rajasthan]]></category>

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		<description><![CDATA[संस्कृति व सभ्यता की दृ‌ष्टि से खास पहचान रखने वाले बीकानेर के अभिलेखागार में हर वर्ष करीब 500 शोधार्थी विभिन्‍न विषयों पर शोध करने आते हैं. यहां शोध के लिए आने वाले शोधार्थियों में विदेशी छात्र भी शामिल हैं.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=567&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><strong>बीकानेर</strong> स्थित राजस्थान राज्य अभिलेखागार देश के सबसे अच्‍छे और विश्‍व के चर्चित अभिलेखागारों में से एक है. इस अभिलेखागार की स्‍थापना 1955 में हुई और यह अपनी अपार व अमूल्‍य अभिलेख निधि के लिए प्रतिष्ठित है. यहां संरक्षित दुर्लभ दस्‍तावेजों की सुव्‍यवस्थित व्‍यवस्‍था काबिलेतारीफ है. अपने समृद्ध इतिहास स्रोतों और उनके बेहतर प्रबंधन, रखरखाव के चलते ही शायद इसे देश का सबसे अच्‍छा अभिलेखागार माना जाता है. इस अभिलेखागार की तीन विशेषताएं हैं, एक तो यहां उपलब्‍ध सामग्री इस लिहाज से निसंदेह रूप से यह देश के सबसे समृद्ध अभिलेखागारों में से एक है. दूसरा उपलब्‍ध सामग्री को संरक्षित सुरक्षित रखने के तौर तरीके और तीसरा इसका प्रबंधन. इन सबका एक साथ मिलना अपने आप में बड़ी बात है. </p>
<div id="attachment_568" class="wp-caption alignnone" style="width: 460px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/08/archive4.jpg?w=450&#038;h=350" alt="बीकानेर अभिलेखागार की एक वीथिका. " title="archive4" width="450" height="350" class="size-full wp-image-568" /><p class="wp-caption-text">बीकानेर अभिलेखागार की एक वीथिका. </p></div>
<p><strong>दुर्लभ दस्‍तावेज और स्रोत.</strong><br />
आजादी से पूर्व रियासतकालीन तथा मुगलकालीन इतिहास स्रोतों के विविध स्‍वरूप यहां सुरक्षित तथा संरक्षित हैं. यही कारण है कि राजस्‍थान और भारतीय इतिहास पर काम करने वाले देशी विदेशी शोधार्थिओं और जिज्ञा‍सुओं का यहां निरंतर आना जाना बना रहता है. इस अभिलेखागार में विभिन्‍न स्‍वरूपों में संग्रहित मूल स्रोत सामग्री नयी पीढी के लिए सौगात से कम नहीं है. यहां मुगलकालीन फरमान, निशान, मंसूर, अर्जदास्‍त, ताम्रपत्र, रजत पत्र, सियाह हजूर, अखबारात, वकील रपटें, तोजियां बहियां, रूक्‍के, परवाने, पट्टे व दरबारी पत्र संग्रहीत तथा संरक्षित हैं. इस अभिलेखागार के संदर्भ पुस्‍तकालय की बात ही की जाए तो वहां 51 विषयों के अनुसार व्‍यवस्थित 50 हजार किताबें हैं. आजादी पूर्व की रियासतों के दुलर्भ प्रकाशन, विविध जनसंख्‍या रपटें, रिसर्च जर्नल तथा शोध पत्रिकाएं इसमें शामिल हैं. </p>
<p><strong>दस्‍तावेजों का कंप्‍यूटरीकरण</strong><br />
बदलते वक्‍त के साथ इस अभिलेखागार में उपलब्‍ध दुर्लभ दस्‍तावेजों के कंप्‍यूटरीकरण (डिजिटलीकरण) का काम भी शुरू हो गया है. अभिलेखागार के निदेशक डा. महेंद्र खड़गावत ने बताया कि यह देश का पहला अभिलेखागार है, जो पुरा दस्तावेजों को ऑनलाइन करने जा रहा है. प्रथम और द्वितीय चरण में करीब 50 लाख दस्तावेजों का डिजिटलीकरण करके इसी वर्ष नवंबर तक ऑनलाइन कर दिया जाएगा. तीसरे चरण में एक करोड़ से ज्यादा दस्तावेजों के डिजिटलीकरण करने का बड़ा काम होगा, जिसमें तीन साल लग जाएंगे.<br />
<div id="attachment_569" class="wp-caption alignright" style="width: 200px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/08/archive11.jpg?w=195&#038;h=250" alt="बदलते वक्‍त के साथ अभिलेखागार को अद्यतन करने की अनेक योजनाएं जारी हैं. इनमें दुर्लभ दस्‍तावेजों का डिजिटलीकरण या कंप्‍यूटरीकरण शामिल है. माइक्रोफिल्‍म बनाने का काम भी इस दिशा में उठाया गया कदम है ताकि दुर्लभ दस्‍तावेजों की आयु को और बढाया जा सके. इन्‍हें और बेहतर ढंग से संरक्षित किया जा सके. बीकानेर स्‍टेट के पट्टा रिकार्ड की प्रतिलिपि जारी करने के लिए एकल खिड़की योजना है तो स्‍वतंत्रता सेनानी चित्र गैलरी बनाने की दिशा में भी काम जारी है. इसी तरह एक महत्‍वाकांक्षी योजना यहां आर्काइवल म्‍यूजियम बनाने की है. - अभिलेखागार के निदेशक डा. महेंद्र खड़गावत " title="archive11" width="195" height="250" class="size-full wp-image-569" /><p class="wp-caption-text">बदलते वक्‍त के साथ अभिलेखागार को अद्यतन करने की अनेक योजनाएं जारी हैं. इनमें दुर्लभ दस्‍तावेजों का डिजिटलीकरण या कंप्‍यूटरीकरण शामिल है. माइक्रोफिल्‍म बनाने का काम भी इस दिशा में उठाया गया कदम है ताकि दुर्लभ दस्‍तावेजों की आयु को और बढाया जा सके. इन्‍हें और बेहतर ढंग से संरक्षित किया जा सके. बीकानेर स्‍टेट के पट्टा रिकार्ड की प्रतिलिपि जारी करने के लिए एकल खिड़की योजना है तो स्‍वतंत्रता सेनानी चित्र गैलरी बनाने की दिशा में भी काम जारी है. इसी तरह एक महत्‍वाकांक्षी योजना यहां आर्काइवल म्‍यूजियम बनाने की है. - अभिलेखागार के निदेशक डा. महेंद्र खड़गावत </p></div>इसी तरह सभी दस्तावेजों की माइक्रोफिल्म भी बनाई जा रही है. इससे दस्तावेज अगले 500 साल तक सुरक्षित रहेंगे. अभी बीकानेर संभाग के करीब डेढ़ लाख रियासतकालीन पट्टों का डिजिटलीकरण करने का काम पूरा हो चुका है. दूसरे चरण में 25 लाख पर काम चल रहा है. 16 लाख दस्तावेजों का डिजिटलीकरण हो चुका है. नवंबर तक इन्हें नेट पर डाल दिया जाएगा. राज्य सरकार की वेबसाइट पर अभिलेखागार की ‘डिपार्टमेंट ऑफ आर्काइव्ज’ पर ये दस्तावेज उपलब्‍ध हो सकेंगे.</p>
<p><strong>विदेशी शोधार्थी भी आते हैं.</strong><br />
संस्कृति व सभ्यता की दृ‌ष्टि से खास पहचान रखने वाले बीकानेर के अभिलेखागार में हर वर्ष करीब 500 शोधार्थी विभिन्‍न विषयों पर शोध करने आते हैं. यहां शोध के लिए आने वाले शोधार्थियों में विदेशी छात्र भी शामिल हैं. रियासतकालीन समय में कच्चे घरों पर की जाने वाली रंग-बिरंगी छपाई एवं पशु पक्षियों के शिकार की घटनाओं पर आज भी विदेशों से विद्यार्थी यहां आकर शोध करते हैं. निदेशक डॉ. खड़गावत ने बताया कि विदेशों से आने वाले शोधार्थी रियासतकाल में होने वाले आय-व्यय एवं उनके काम करने की प्रक्रिया पर ज्यादा शोध करते हैं.</p>
<p>डा. खड़गावत ने बताया कि वर्ष 2008-09 में बीकानेर के अभिलेखागार में 10 विदेशी विद्यार्थियों ने विभिन्‍न विषयों पर शोध कर पीएच.डी. की डिग्री हासिल की है। देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से विद्यार्थी यहां आते हैं जिसमें नई दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी, जामिया मिलिया, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, पंजाब की चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी, बनारस विश्वविद्यालय प्रमुख हैं।  वर्ष 2004 से पहले यहां आने वाले शोधार्थियों की संख्या बहुत कम थी लेकिन जैसे-जैसे यहां पर रियासतकालीन अभिलेखों को नया रूप दिया जा रहा है वैसे-वैसे शोधार्थियों की संख्या भी बढ़ रही है।</p>
<p>वैसे बीकानेर में पर्यटन की दृ‌ष्टि से कई संभावनाएं हैं जिसमें यहां का अभिलेखागार भी प्रमुख है. अगर आने वाले समय में इसे पर्यटकों के लिए खोल दिया जाए तो पर्यटकों की संख्या में तो इजाफा होगा ही, साथ ही सरकार को बड़ी मात्रा में राजस्व भी मिलेगा. यहां के दस्‍तावेजों का  का कम्प्यूटरीकरण होने तथा इंटरनेट पर इनका संग्रह बनाने से दुनिया भर में इसकी लोकपि्रयता बढ़ेगी। इस दिशा में भी कदम उठाए जा सकते हैं.</p>
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		<title>सत्‍य के लिए किसी से न डरो.</title>
		<link>http://kankad.wordpress.com/2009/08/10/banbhatt/</link>
		<comments>http://kankad.wordpress.com/2009/08/10/banbhatt/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 10 Aug 2009 01:47:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
				<category><![CDATA[गांव- गुवाड़]]></category>
		<category><![CDATA[अनामदास का पोथा]]></category>
		<category><![CDATA[चारूलेखा]]></category>
		<category><![CDATA[पुनर्नवा]]></category>

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		<description><![CDATA[बाणभट्ट की आत्मकथा उनका पहला उपन्‍यास है जो आत्मकथात्मक शैली में लिखी हुई एक विक्षण कृति है जिसमें इतिहास और कल्पना का ऐसा सुंदर समन्वय है कि वे दोनों एक-दूसरे के पूरक बन गये हैं. यह हर्षकालीन भारत (सातवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध) के परिवेश में लिखी गयी एक ऐतिहासिक रोमांच की सृष्टि है.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=557&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><blockquote><p>.. सत्‍य के लिए किसी से भी नहीं डरना, गुरू से भी नहीं, लोक से भी नहीं .. मंत्र से भी नहीं. </p></blockquote>
<p>इसी कथन को हजारी प्रसाद द्विवेदी के अद्भुत कालजयी उपन्‍यास ‘बाणभट्ट की आत्‍मकथा’ का सार कहा जाए तो अतिश्‍योक्ति नहीं होगी. </p>
<p>बाणभट्ट की आत्मकथा उनका पहला उपन्‍यास है जो आत्मकथात्मक शैली में लिखी हुई एक विक्षण कृति है जिसमें इतिहास और कल्पना का ऐसा सुंदर समन्वय है कि वे दोनों एक-दूसरे के पूरक बन गये हैं. यह हर्षकालीन भारत (सातवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध) के परिवेश में लिखी गयी एक ऐतिहासिक रोमांच की सृष्टि है.</p>
<p><div id="attachment_558" class="wp-caption alignleft" style="width: 160px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/08/71097109_banbhatt-ki-atmakatha.jpg?w=150&#038;h=243" alt="जिस पर विश्‍वास करना चाहिए, उस पर पूरा करना चाहिए, परिणाम जो हो. जिसे मानना चाहिए अंत तक मानना चाहिए. - बाणभट्ट की आत्‍मथा से एक वक्‍तव्‍य" title="Banbhatt ki Atmakatha" width="150" height="243" class="size-full wp-image-558" /><p class="wp-caption-text">जिस पर विश्‍वास करना चाहिए, उस पर पूरा करना चाहिए, परिणाम जो हो. जिसे मानना चाहिए अंत तक मानना चाहिए. - बाणभट्ट की आत्‍मथा से एक वक्‍तव्‍य</p></div> संस्‍कृतनिष्‍ठ और एक तरह से कलिष्‍ठ भाषा शैली का यह उपन्‍यास अपनी समस्त औपन्यासिक संरचना और भंगिमा में कथा-कृति होते हुए भी महाकाव्य की गरिमा से पूर्ण है. इसमें द्विवेदी जी ने प्राचीन कवि बाण के बिखरे जीवन-सूत्रों को बड़ी कलात्मकता से गूंथकर एक ऐसी कथा-भूमि निर्मित की है जो जीवन सत्यों से रसमय साक्षात्कार कराती है. इसमें वह वाणी मुखरित है जो सामगान के समान पवित्र और अर्थपूर्ण है: ‘सत्य के लिए किसी न डरना, गुरू से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’</p>
<p>इसमें प्रमुख पात्र तीन हैं- बाणभट्ट, भट्टिनी तथा निपुणिका; ये तीनों पात्र अंतर्मुखी और आत्मदान की भावना से युक्त हैं. इस उपन्यास की सभी घटनाओं में व्याप्त चरित्र अगर कोई है तो वह है-निपुणिका. बाण जिस विचार को लेकर स्थाणीश्वर आया था, उसमें परिवर्तन का मुख्य कारण निपुणिका से उसका मिलन ही था और आगे चलकर जो घटनाएँ घटित होती हैं उनमें भी निपुणिका ही का प्राधान्य रहता है. इस रूप में इस उपन्यास में निपुणिका महत्व वैसा ही है जैसा किसी नायिका को होता है. वैसे निपुणिका इस उपन्यास की नायिका नहीं है.<br />
&#8230;&#8230;&#8230;..<br />
<strong>.. भट्टिनी का मुख मंडल प्रभात कालीन नवमल्लिका की भांति खिल गया. स्‍मयमान मुख की कपोल पालि विकसित हो गई. नयनकोरकों में वंकिम आनंद रेखा विद्युत की भांति खेल गई. ललाटपट्ट की वलियां विलीन हो गईं और वह अष्‍टमी के चंद्रमा की तरह मनोहर हो गया..’<br />
(उपन्‍यास की सुंदर भाषा शैली का एक उदाहरण)</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<p>बाणभट्ट की आत्मकथा का कथानायक कोरा भावुक कवि नहीं वरन् कर्मनिरत और संघर्षशील जीवन-योद्धा है। उसके लिए ‘शरीर केवल भार नहीं, मिट्टी का एक ढेला नहीं, बल्कि ‘उससे बड़ा’ है और उसके मन में आर्यावर्त के उद्धार का निमित्त बनने की तीव्र बेचैनी है. ‘अपने को निशेष भाव से दे देने’ में जीवन की सार्थकता देखनेवाली निउनिया और ‘सबकुछ भूल जाने की साधना’ में लीन महादेवी भट्टिनी के प्रति उसका प्रेम जब उच्चता का वरण कर लेता है तो यही गूँज अंत में रह जाती है-‘‘वैराग्य क्या इतनी बड़ी चीज है कि प्रेम के देवता को उसकी नयनाग्नि में भस्म कराके ही कवि गौरव का अनुभव करे।</p>
<p>डॉ.शशिभूषण सिंहल इस उपन्यास के पात्रों के बारे में लिखते हैं- ‘उपन्यास की कथा मूल रूप से प्रेम-त्रिकोण की है, किन्तु उसमें प्रवृत्त पात्रों के संयम और समर्पण-भावना के कारण कथा में असाधारण गरिमा आ गई है। निपुणिका बाण की सरलता, स्निग्धता पर अनुरक्त है और बाण भट्टिनी के पावन व्यक्तित्व का भक्त है। भट्टिनी के ह्रृदय में भी भट्ट के प्रति कोमल भाव है। तीनों पात्र अपनी भावना को व्यक्त कर, उसकी गरिमा कम नहीं करते। वे आत्मलीन और स्थिर हैं। उनका कार्यजगत्, उनका भावविभोर अन्तरालय है।’<br />
निपुणिका जैसे एक उदास पात्र का चरित्र-चित्रण लेखक के कहीं घटनाओं के द्वारा तो तो कहीं अन्तरंग के पहलू पर अपनी ओर टिप्पणी देकर किया है। लेखक ने चरित्र की विशेषताओं को स्पष्ट करने के लिए पात्र के परंपरागत संस्कार, आदतें, काम-भावना आदि का सहारा लिया है। लेखक ने चरित्र पर प्रकाश डालने के लिए कुछ स्थलों पर मार्मिक घटनाओं का उल्लेख भी किया है। द्विवेदी जी के पात्र एक दूसरे के चेहरे को देखकर, मुख के भाव को पढ़कर ही एक दूसरे को समझ लेते हैं।</p>
<p>(राजकमल पैपरबैक्‍स, दिल्‍ली द्वारा प्रकाशित इस उपन्‍यास की उक्‍त समीक्षा के शब्‍द अलग अलग जगहों से साभार लिए गए हैं. इनके लिंक यहां दिए जा रहे हैं जहां पूरी समीक्षाएं पढ़ी जा सकती हैं.  </p>
<p>http://www.taptilok.com/pages/details.php?detail_sl_no=361&amp;cat_sl_no=8</p>
<p>http://aanchalik.blogspot.com/2008/06/blog-post_08.html</p>
<p>http://pustak.org/bs/home.php?bookid=7109)</p>
<p>(Tags: Banbhat ki atmkatha, Hajariprasad Divedi, Punarnwa, Anamdas ka potha)</p>
Posted in गांव- गुवाड़ Tagged: अनामदास का पोथा, चारूलेखा, पुनर्नवा <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kankad.wordpress.com/557/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kankad.wordpress.com/557/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kankad.wordpress.com/557/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kankad.wordpress.com/557/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kankad.wordpress.com/557/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kankad.wordpress.com/557/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kankad.wordpress.com/557/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kankad.wordpress.com/557/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kankad.wordpress.com/557/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kankad.wordpress.com/557/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=557&subd=kankad&ref=&feed=1" /></div>]]></content:encoded>
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		<title>चांद पर चरखा!</title>
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		<pubDate>Wed, 05 Aug 2009 20:03:41 +0000</pubDate>
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				<category><![CDATA[गांव- गुवाड़]]></category>

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		<description><![CDATA[सप्‍तऋषि मंडल, ध्रुव तारा और सभी बातें तो बहुत सुनी सुनाई हैं. बचपन में टूटते तारे को देख कुछ मांग लिया करते थे या मंदाकिनी का सिरे टटोलने की कोशिश करते थे. बस अड्डे से उतरकर ढाणी यानी घर जाते समय रास्‍ते में खेत में पीपल का बड़ा पेड़ था, अपने चांद के पेड़ की कल्‍पना उसी से थी.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=550&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><div id="attachment_551" class="wp-caption alignnone" style="width: 274px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/08/dscn2578.jpg?w=264&#038;h=640" alt="पूरा चांद : एक बिना साफ किए लैंस से." title="DSCN2578" width="264" height="640" class="size-full wp-image-551" /><p class="wp-caption-text">पूरा चांद : एक बिना साफ किए लैंस से.</p></div><strong>बस</strong> शायद रावतसर से आगे राष्‍ट्रीय राजमार्ग से मुड़ी थी. मोबाइल में देखा तड़के चार बज रहे हैं. रात ढल रही है. अपनी स्‍लीपर सीट बस में बायीं ओर है, बायीं ओर चांद चमक रहा है. पूरा चांद! उतरता आषाढ और चढ़ता सावण. आषाढ की आखिरी रात ढल रही है और सावण का पहला सवेरा होने वाला है!</p>
<p>बायीं ओर सिर्फ चांद है. अपनी पूरी मौज और अल्‍हड़ता के साथ चमकता हुआ. चांद के ऊपर दूर कहीं तीन तारे दिखाई दे रहे हों मानों किसी राजकुमारी की बांदियां खड़ी हों. चांद ही चांद का साम्राज्‍य है. दूर दूर तक छिटकी चांदनी में इस तरह चांद को निहारने के कम ही अवसर आजकल मिलते हैं! हवा में नमी आने लगी है. </p>
<p>चांद को काफी देर तक निहारता रहा तो बचपन में दादी की बातें याद आने लगी. वे कहती थीं कि चांद पर एक पेड़ है और उसके नीचे एक बुढिया बैठी है जो चरखा कात रही है. आज भी चांद को देखते समय दादी की वह बुढिया और उसके चरखे वाली कहानी याद आ जाती है. गौर से देखने पर सचमुच ऐसा लगता भी है. कि चांद चांद न होकर किसी घर का बाहरी आंगन है जहां एक पेड़ है, जिसके नीचे बैठी एक बुढिया बैठी चरखा कात रही है. </p>
<p>निकटता कभी कभी सुंदरता और आकर्षक को खा जाती है. जैसे चांद को अधिक देर तक निहारने पर वह उतना सुंदर नहीं लगता. मुक्तिबोध का ‘चांद का मुंह टेढा’ स्‍मरण हो आता है. </p>
<p>बचपने या उसके थोड़े दिन बाद तक रात में खेत में काम करते समय प्राय: समय का अनुमान हिरणां कीर्ति जैसे चमकते तारों से लगाया करते थे. तीन तारे हैं जो हर दिन पूर्व में उगते हैं और रात ढलते ढलते पश्चिम में छिप जाते हैं. आमतौर पर इनका कहीं जिक्र नहीं होता. कहानी सुनी थी एक राजा दो हिरणियों का शिकार करने निकला था और ये तीनों वही हैं. एक राजा दो हि‍रणियां.. ! इनसे आधी रात होने या रात ढलने में देरी के बारे में आसानी से अंदाजा हो जाता है. </p>
<p>सप्‍तऋषि मंडल, ध्रुव तारा और सभी बातें तो बहुत सुनी सुनाई हैं. बचपन में टूटते तारे को देख कुछ मांग लिया करते थे या मंदाकिनी का सिरे टटोलने की कोशिश करते थे. बस अड्डे से उतरकर ढाणी यानी घर जाते समय रास्‍ते में खेत में पीपल का बड़ा पेड़ था, अपने चांद के पेड़ की कल्‍पना उसी से थी. वह पेड़ बरसों पहले काट दिया गया. उसकी जगह लगे पेड़ को अपन चांद की बुढिया वाले पेड़ की जगह नहीं ले पाए. इसी लिए चांद का मुंह आजकल टेढा लगता है.</p>
<p><div id="attachment_553" class="wp-caption alignnone" style="width: 600px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/08/kan5.jpg?w=590&#038;h=439" alt="निकलता हुआ चांद, अलग सा ही‍ दिखता है." title="kan5" width="590" height="439" class="size-full wp-image-553" /><p class="wp-caption-text">निकलता हुआ चांद, अलग सा ही‍ दिखता है.</p></div>
<p>सप्‍तऋषि मंडल: फाल्गुन-चैत महिने से श्रावण-भाद्र महिने तक उत्तर आकाश में सात तारों का समूह दिखाई पड़ता है। इसमें से चार तारें चौकोर तथा तीन तिरछी लाइन में रहते हैं। इन तारों को काल्पनिक रेखाओं से मिलाने पर एक प्रश्न चिन्ह की तरह दिखाई पड़ते हैं। इन्हीं सात तारों को सप्तर्षि मंडल कहते हैं। इन तारों का नाम प्राचीन काल के सात ऋषियों के नाम पर रखा गया है। ये क्रमशः केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है। इसे अंग्रेजी में ग्रेट/ बिग बियर या उर्सा मेजर कहते हैं। यह कुछ पतंग की तरह लगते हैं जो कि आकाश में डोर के साथ उड़ रही हो। यदि आगे के दो तारों को जोड़ने वाली लाईन को सीधे उत्तर दिशा में बढ़ायें तो यह ध्रुव तारे पर पहुंचती है। ( शेष जानकारी विकिपेडिया से)</p>
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	</item>
		<item>
		<title>खिलाडियों, साहित्‍यकारों का बीकानेर.</title>
		<link>http://kankad.wordpress.com/2009/08/05/bikaner/</link>
		<comments>http://kankad.wordpress.com/2009/08/05/bikaner/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 05 Aug 2009 17:53:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
				<category><![CDATA[गांव- गुवाड़]]></category>

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		<description><![CDATA[बीकानेर शहर में अभी एक ही फ्लाईओवर है जिसपर गुजरती सड़क रानी बाजार की ओर निकल जाती है. रानीबाजार यहां का सबसे बड़ा ओर आधुनिक बाजार है जहां कई माल्‍स नजर आने लगे हैं. यहां दूसरा फ्लाईओवर गजनेर रोड पर बन रहा है<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=543&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><strong><br />
<blockquote>मांड गायन को नई ऊंचाइयां देने वाली अल्‍लाह जिलाई बाई, उस्‍ता कला के महारथी मोहम्‍मद हनीफ, साहित्‍यकार चिंतक नंदकिशोर आचार्य, हरीश भादानी व मालचंद तिवाड़ी, शूटर डा करणी सिंह, फुटबालर मगन सिंह राजवी, अर्थशास्‍त्री विजयशंकर व्‍यास, कार्टूनिस्‍ट सुधीर तैलंग &#8230;.. इन कुछ हस्तियों में एक समानता यह भी है कि ये सभी बीकानेर से हैं. पद्मश्री से लेकर अर्जुन अवार्डधारी.. अपने अपने क्षेत्र के महारथी&#8230; जिन्‍होंने ऐतिहासिक बीकानेर शहर को नित नई पहचान दी और अपनी विद्वता या प्रतिभा की कूची से इसके कैनवास पर नए रंग भरे.</p></blockquote>
<p></strong></p>
<div id="attachment_544" class="wp-caption alignnone" style="width: 490px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/08/bikaner12.jpg?w=480&#038;h=327" alt="बीकानेर. जूनागढ किला इतिहास का मूक साक्षी." title="bikaner12" width="480" height="327" class="size-full wp-image-544" /><p class="wp-caption-text">बीकानेर. जूनागढ किला इतिहास का मूक साक्षी.</p></div>
<p><strong>थार</strong> के सबसे पुराने, ऐतिहासिक और घूमने लायक शहरों में से एक शहर है बीकानेर. उत्‍तर पश्चिमी राजस्‍थान का आखिरी संभाग मुख्‍यालय और इस सिरे पर अंतिम प्रमुख रियासत का केंद्र भी. एक ऐसा जीवंत शहर जो आज भी रम्‍मत जैसी अपनी लोकरंजक परंपराओं के लिए जाना जाता है या जो अपनी पाटा संस्‍कृति के लिए चर्चित है. ऐतिहासिक धरोहर के रूप में जहां जूनागढ़ पैलेस जैसी आलीशान इमारत है तो देश के सबसे समृद्ध अभिलेखागारों में से एक अभिलेखागार भी.</p>
<p>लालगढ़ पैलेस जाने वाली रोड पर चलें या सिविल लाइंस क्षेत्र में सुबह सुबह घूमें तो लगता है कि वास्‍तव में किसी सुनियोजित ए‍ेतिहासिक शांत शहर की गलियों में घूम रहे हैं. हेरीटेज श्रेणी के दो होटल लक्ष्‍मीनिवास और लालगढ़ पैलेस साथ साथ ही हैं. इनके दालान में मोर घूमते दिखते हैं. यहां मोर की पीहू पीहू और नाळ हवाई अड्डे से उड़ान भरते लड़ाकू विमानों की घर्र घर्राहट एक साथ सुनी जा सकती है.</p>
<p>यहां सिविल लाइंस इलाके में बुजुर्गों के लिए विशेष पार्क है. इस बड़े से पार्क में खूब हरियाली, पेड़ पौधे हैं. बुजुर्गों के घूमने के लिए पैदल पथ भी बना हुआ है. बताते हैं कि सुबह शाम यहां खूब लोग जमा रहते हैं.</p>
<div id="attachment_546" class="wp-caption alignnone" style="width: 490px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/08/bikaner11.jpg?w=480&#038;h=270" alt="बीकानेर. लालगढ़ स्‍टेशन बीकानेर का नया और बड़ा रेलवे स्‍टेशन." title="bikaner11" width="480" height="270" class="size-full wp-image-546" /><p class="wp-caption-text">बीकानेर. लालगढ़ स्‍टेशन बीकानेर का नया और बड़ा रेलवे स्‍टेशन.</p></div>
<p>जूनागढ पैलेस में लैला मजनूं से लेकर श्रत्रिय तक अने‍क फिल्‍मों की शूटिंग हुई और यह किला अपने प्रोल यानी मुख्‍य द्वारों के लिए भी चर्चित है&#8230; कर्ण प्रोल, रतन प्रोल, सूरज प्रोल आदि. इसी तरह यहां वाड़े (या बाड़े अथवा इलाके?) हैं जैसे जोशीवाड़ा व तेलीवाड़ा. </p>
<p>इस शहर के इतिहास और यहां की हस्तियों पर तो अनेकानेक किताबें लिखी जा चुकी हैं पर एक पर्यटक और शोधार्थी के लिहाज से बात करें तो बेहतरीन जगह है बीकानेर. देखने घूमने के लिए जूनागढ पैलेस, थोड़ी दूर करणीमाता का मंदिर, शोध के लिए एक सराहनीय समृद्ध अभिलेखागार, ठहरने के लिए अच्‍छे होटल और धर्मशालाएं, यातायात के लिए रेल और बेहतरीन बस सेवाएं!</p>
<p>बीकानेर शहर में अभी एक ही फ्लाईओवर है जिसपर गुजरती सड़क रानी बाजार की ओर निकल जाती है. रानीबाजार यहां का सबसे बड़ा ओर आधुनिक बाजार है जहां कई माल्‍स नजर आने लगे हैं. यहां दूसरा फ्लाईओवर गजनेर रोड पर बन रहा है. चर्चित केईएम रोड है तो सब्‍जी और परचून का फड़ बाजार भी. शिक्षा, शोध, इतिहास, खेल .. बीकानेर ने खूब नाम कमाया है. मांड की विख्‍यात गायिका अल्लाह जिलाई बाई तो इस शहर के उस हिस्‍से की बात है जो पर्यटक और शोधार्थी के लिहाज से मायने रखता है. यहां के आमजीवन का शेष हिस्‍सा तो बहुत व्‍यापक और गहरा है.</p>
<p>(Tags: बीकाणा, बीकाणो, Bikaner, Bikaner State, Nal airport, Ranibazar, Lalgarh Station, Lalgarh Palace, Lakshminiwas Palace, Junagarh Palace, Junagarh Fort, Kotgate, Joshiwada, Teliwada, KEM Road, Fad bazaar, Rajasthan State Archives Bikaner, Shooter Karnisingh, Rajyashree, Nandkishor Acharya, Harish Bhadani, Magan Singh Rajvi, Allah Jilai Bai, Mand Music,)</p>
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		<title>सेम व धोरे!</title>
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		<pubDate>Sun, 02 Aug 2009 19:06:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
				<category><![CDATA[गांव- गुवाड़]]></category>

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		<description><![CDATA[एक विशालकाय सेमनाला भी है और अब नाम के बचे खेतों में बने छोटे छोटे सेमनाले भी.. दूर दूर तक पसरी सफेद जमीन, या दलदल यहां देखी जा सकती है. भैरोंसिंह शेखावत जब मुख्‍यमंत्री थे तो एक बार इस इलाके में आए थे. सेम के निराकरण की अनेक योजनाएं बनी लेकिन शायद कारगर एक भी नहीं हुई. कहते हैं कि इस इलाके में कुछ फीट नीचे जिप्‍सम की परत है. पानी वहां जाकर रूक जाता है और दलदल का रूप ले लेता है. <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=539&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p>सूरतगढ़ से बड़ोपल जाने को एक सड़क निकलती है. पूर्व की ओर! यह सड़क अनेक गांवों से होती हुई रावतसर पर नए बने राष्‍ट्रीय राजमार्ग या नेशनल हाईवे पर जा मिलती है. </p>
<p>सूरतगढ से रावतसर जाने को यह कोई मुख्‍य या अच्‍छी सड़क नहीं है. फिर भी दूरी अपेक्षाकृत कम होने के कारण लोग आजकल इसे इस्‍तेमाल करने लगे हैं. सूरतगढ़ से निकलने के बाद मानकथेड़ी, बड़ोपल, 18एसपीडी (रतीरामवाला), जाखड़ांवाली, चक सुथारांवाला, मोधूनगर, भैंरूसरी, भाखरांवाली और रावतसर&#8230; कमोबेश इसी क्रम में गांव या चक आते हैं.</p>
<p>सूरतगढ़ से निकलते वक्‍त धोरों की एक मेर है और उसके बाद दूर दूर तक पसरी सेम (जल रिसाव, जलभराव, वाटरलागिंग) और कल्‍लर यानी नमकीन चिकनी मिट्टी के कारण अनुपजाऊ हुई जमीन. पिछले कुछ दशकों में इस सेम के कारण हजारों एकड़ जमीन देखते ही देखते दलदल या बंजर में बदल गई. इस सड़क से जाते हुए विकास के इस विनाश को व्‍यापक रूप में देखा और महसूस किया जा सकता है. यह क्रम बड़ोपल से ठीक पहले से लेकर रावतसर के बाद तक जारी रहता है. क्रम धोरों या रेतीली जमीन से शुरू होता है और वहीं जाकर समाप्‍त हो जाता है..</p>
<div id="attachment_540" class="wp-caption alignnone" style="width: 458px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/08/sam4.jpg?w=448&#038;h=212" alt="बड़ोपल से लेकर रावतसर तक एक बडे़ इलाके में सेम या जलरिसाव ने जमीनों को दलदल में बदल दिया है." title="sam4" width="448" height="212" class="size-full wp-image-540" /><p class="wp-caption-text">बड़ोपल से लेकर रावतसर तक एक बडे़ इलाके में सेम या जलरिसाव ने जमीनों को दलदल में बदल दिया है.</p></div>
<p>एक विशालकाय सेमनाला भी है और अब नाम के बचे खेतों में बने छोटे छोटे सेमनाले भी.. दूर दूर तक पसरी सफेद जमीन, या दलदल यहां देखी जा सकती है. भैरोंसिंह शेखावत जब मुख्‍यमंत्री थे तो एक बार इस इलाके में आए थे. सेम के निराकरण की अनेक योजनाएं बनी लेकिन शायद कारगर एक भी नहीं हुई. कहते हैं कि इस इलाके में कुछ फीट नीचे जिप्‍सम की परत है. पानी वहां जाकर रूक जाता है और दलदल का रूप ले लेता है. विशेषकर थार की आधुनिक गंगा यानी राजकैनाल के आने के बाद तो हालात बदतर हो गए हैं. आंकड़े बताते हैं कि नहर प्रणालियों से जल रिसाव के कारण उपजी सेम से राजस्‍थान और पंजाब में लगभग 85,000 हेक्‍टेयर भूमि अनुपजाऊ हो गई है. कई गांव सेम की डूब में आकर उजड़ गए हैं या उजड़ने की कगार पर हैं. सेम या शेम!</p>
<blockquote><p>यही थार है जहां एक ओर बालुई रेत का समंदर धोरों या टीलों के रूप में पसरा है तो दूसरी ओर सेम जैसी समस्‍याएं दलदल के रूप में सामने आ रही हैं. </p></blockquote>
<p>रावतसर में नेशनल हाइवे के बाद थोड़ा मुड़कर इस सड़क पर बना रहा जा सकता है. रावतसर से यह सड़क नोहर भादरा की ओर जाती है. चाइया, थालड़का, टोपरियां, भगवान, देइदास, भूकरका, नोहर, रामगढ़, करणपुरा, सीकरोड़ी, भादरा, डोबी, पचारवाली, उत्‍तरादा बास और आगे &#8230; तक यह सड़क चली जाती है. इसी सड़क पर नाथ संप्रदाय का एक प्रमुख गढ़ और लोकदेवता गोगा जी का मंदिर गोगामेड़ी में है. मेड़ी यानी छोटा मंदिर. </p>
<p>वैसे गांवों की पहचान कुछ और कारणों से भी होने लगती है. जैसे किसी ने बताया कि रामगढ़ बलराम जाखड़ का ननिहाल है, भूकरका कभी फुटबाल के लिए विख्‍यात रहा है. नोहर एशिया में चने की सबसे बड़ी मंडी रहा है, परलीका राजस्‍थानी साहित्‍य का आधुनिक गढ़ है, मोधूनगर पीलीबंगा से मौजूदा विधायक का गांव है.. यह विश्‍लेषण लगभग हर गांव कस्‍बे या शहर के साथ जोड़कर देखा जा सकता है.</p>
<p>ग्रेफ की यह सड़क कुछ स्‍थानों पर काफी बुरी स्थिति में है फिर भी एक लंबे क्षेत्र को समेटती है!</p>
<p>(Tags: Parlika, Bhukrka village, Nohar, Pilibangan, Kalibangan, Ramgarh, Bhadra, Gogamadi, Utradabaas, Sikrodi, Pacharwali, Dobi village, Nath samprday, Badopal, 18SPD, Bhagwan, Daidas village, Manakthedi, Rangmahal village, Bhairunsari, Rawatsar, Rawla, Gharsana, Anup Garh, SuratGarh, Modhunagar, Chak Sutharanwala, Ratiram wala, water-logging in rajasthan )</p>
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		<title>किसान, जो कथाएं उगाता है!</title>
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		<comments>http://kankad.wordpress.com/2009/08/01/kisan/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 01 Aug 2009 05:55:22 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
				<category><![CDATA[गांव- गुवाड़]]></category>
		<category><![CDATA[Biju]]></category>
		<category><![CDATA[Maalchand Tiwari]]></category>
		<category><![CDATA[Rameshwar Dayal]]></category>
		<category><![CDATA[Ramswroop kisan]]></category>
		<category><![CDATA[Vijaydan Detha]]></category>

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		<description><![CDATA[रामस्वरूप किसान खेत में कड़ी मेहनत के बल पर जीवनयापन करने वाले राजस्थानी के अनूठे साहित्यकार हैं तथा वे राजस्थानी भाषा के मान्यता आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उन्हें साहित्य अकादेमी के अनुवाद पुरस्कार तथा राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर के मुरलीधर व्यास राजस्थानी पुरस्कार सहित कई महत्त्वपूर्ण पुरस्कार मिल चुके हैं.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=534&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><strong>परलीका (जिला हनुमानगढ, राजस्‍थान) गांव के किसान साहित्यकार रामस्वरूप किसान को केंद्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली की ओर से डेढ़ लाख रुपए की स्कॉलरशिप दी जाएगी। कांकड़ के लिए उसने उनसे बात करने के लिए घंटी मारी तो वे खेत से लौटे ही थे.. पुराने कागजों को पलट रहे थे. वे ठेठ बागड़ी में उसी सहजता और अपनत्‍व से बात करते हैं.. </strong></p>
<p>क्‍या हो रहा है किसान जी?<br />
अभी खेत से लौटा हूं और कागजों के बीच बैठा हूं. बिरखा तो हुई नहीं, ट्यूबवैल से जुगाड़ किया जा रहा है. अब देखते हैं कैसे क्‍या होगा.</p>
<p>स्‍कालरशिप के मायने?<br />
आर्थिक रूप से भी हैं और यह प्रेरक भी है. ज्‍यादातर लेखक भी किसानों की तरह आर्थिक रूप से पिछड़े ही हैं&#8230; आर्थिक संबल कुछ नया करने को प्रेरित तो करता ही है. यह स्‍कालरशिप कुछ नया करने को प्रेरित करेगी.</p>
<p>कोई योजना?<br />
सही बात तो यह है कि पिछले दो साल में कुछ नहीं लिखा सिर्फ दो चार कविताओं के सिवा. वरना पिछले दो दशक में ऐसा कोई साल नहीं रहा जब कम से कम एक किताब नहीं छपी हो. दो साल काफी कड़े रहे&#8230;. हालात कठिन थे. खैर, अंदर बहुत कुछ जमा है. जो अगले छह महीने में निकाल देंगे. कहानी संग्रह की योजना है.</p>
<p><strong>स्‍कालरशिप योजना :</strong> साहित्यकार रामस्वरूप किसान को केंद्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली की ओर से डेढ़ लाख रुपए की स्कॉलरशिप दी जाएगी। अकादेमी के पत्र के हवाले से किसान ने बताया कि राजस्थानी भाषा में सृजनात्मक लेखन के लिए अकादेमी ने अपनी नई योजना &#8216;राइटर्स इन रेजीडेंसी&#8217; के तहत उनका चयन किया है तथा अकादेमी आगामी 6 माह तक उन्हें 25 हजार रुपए मासिक के हिसाब से कुल डेढ़ लाख रुपए प्रदान करेगी। इस दौरान वे राजस्थानी कहानियों का सृजन करेंगे. राजस्‍थानी में किसान के अलावा यह अवार्ड मालचंद तिवाड़ी, विजयदान देथा, रामेश्‍वर दयाल, भगवती व्‍यास को दिया गया है. अकादमी की यह योजना इसी साल शुरू हुई है और लगभग 24 भाषाओं के पांच पांच रचनाकारों को इसके लिए चुना गया है.</p>
<p><strong>किसान :</strong> रामस्वरूप किसान खेत में कड़ी मेहनत के बल पर जीवनयापन करने वाले राजस्थानी के अनूठे साहित्यकार हैं तथा वे राजस्थानी भाषा के मान्यता आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उन्हें साहित्य अकादेमी के अनुवाद पुरस्कार तथा राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर के मुरलीधर व्यास राजस्थानी पुरस्कार सहित कई महत्त्वपूर्ण पुरस्कार मिल चुके हैं तथा इनकी रचनाएं अंग्रेजी, हिन्दी, पंजाबी, गुजराती, तेलुगु आदि भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। किसान की रचनाएं माध्यमिक शिक्षा बोर्ड तथा विश्वविद्यालयों के पाठयक्रम में भी शामिल हुई हैं।</p>
<p>______________</p>
<p><strong>मेरी ऑंखें जल्द लौटाना बाबा!</strong></p>
<p>मैं राजी-खुशी हूँ                                  <div id="attachment_536" class="wp-caption alignright" style="width: 117px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/08/kisan-ji11.jpg?w=107&#038;h=133" alt="रामस्‍वरूप किसान" title="Kisan ji1" width="107" height="133" class="size-full wp-image-536" /><p class="wp-caption-text">रामस्‍वरूप किसान</p></div><br />
मेरे बाबा!<br />
यह खत तो मैं<br />
एक जरूरी काम से लिख रही हूँ।</p>
<p>याद होगा आपको<br />
घर छोड़ते वक्त<br />
आपकी देहरी में ठोकर खाकर<br />
गिरने लगी थी जब मैं<br />
तो न जाने<br />
विदाई-गीत गाती<br />
औरतों के उस हुजूम को चीरते<br />
आपके हाथ<br />
मुझ तक कैसे पहुँचे थे बाबा!</p>
<p>हाँ बाबा,<br />
वे आपके ही हाथ थे<br />
कौन बेटी नहीं पहचान सकती<br />
बाप के हाथ?<br />
मैंने पहचान लिए थे आपके वे हाथ<br />
जो घर को ढहने से बचाने की मशक्कत में<br />
इतने अशक्त हो गए थे<br />
कि कांपते-कांपते<br />
पहुंच पाए थे मुझ तक।</p>
<p>लेकिन ऊपर का ऊपर<br />
सम्भाल लिया था<br />
उन अशक्त हाथों ने मुझे।<br />
आपके हाथों के कम्पन का स्पर्श<br />
मेरे बाजुओं के रास्ते<br />
मेरे कलेजे में पहुंचकर<br />
आपकी लड़खड़ाती सूखी काया का बिम्ब<br />
अभी भी बना रहा है बाबा!</p>
<p>शायद नहीं सोचा होगा आपने<br />
कि आपकी देहरी पर<br />
क्यों लगी थी ठोकर मुझे?</p>
<p>मैं अंधी थी बाबा!<br />
बिल्कुल अंधी।<br />
जब मैं विदाई के लिए तैयार की जा रही थी<br />
मेरी ऑंखें<br />
मेरे तन से जुदा होकर<br />
आपके पथराए चेहरे से चिपक गई थीं बाबा!<br />
फुरसत मिले तो<br />
मेरी ऑंखें जल्द लौटाना बाबा!</p>
<p>यहाँ जब-जब मुझे<br />
ठोकर लगती है,<br />
मेरी सास डांटती है-<br />
&#8216;देखकर नहीं चलती<br />
अंधी है क्या?&#8217;<br />
(कविता का हिन्दी अनुवाद तथा अन्‍य जानकारी उपलब्‍ध कराने के लिए सत्यनारायण सोनी का आभार, उनका ब्‍लाग http://satyanarayansoni.blogspot.com/)</p>
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			<media:title type="html">Kisan ji1</media:title>
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	</item>
		<item>
		<title>कुत्‍तालिकनी का ए माइनर होना.</title>
		<link>http://kankad.wordpress.com/2009/07/26/miner/</link>
		<comments>http://kankad.wordpress.com/2009/07/26/miner/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 26 Jul 2009 05:17:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
				<category><![CDATA[गांव- गुवाड़]]></category>
		<category><![CDATA[A Miner]]></category>
		<category><![CDATA[Dhandhusar]]></category>
		<category><![CDATA[Johar]]></category>
		<category><![CDATA[Kuttalikni]]></category>
		<category><![CDATA[Nahar]]></category>
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		<category><![CDATA[talab]]></category>

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		<description><![CDATA[ये घटनाएं कई संकेत देती हैं. नकल में मोमोज, बर्गर, सैंडविच खाये- अघाये समाज ने अपने जलस्रोतों और संसाधनों के साथ जो बदसलूकी की है उसका नमूना है ये घटनाएं! साथ ही ये सकारात्‍मक संकेत देती हैं कि अब भी आम आदमी में वो जज्‍बा है जो किसी कुत्‍ता लिकनी को फिर से ए माइनर कर सकता है. <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=529&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><blockquote><p>
प्राचीन सभ्‍यताओं का विकास नदियों के किनारे हुआ. आबादियां जोहड़ों, सरोवरों के किनारे बसीं. आधुनिक थार की विशेषता यह है कि यहां अनेक गांव-कस्‍बे, नगर नहरों के आसपास बसे. फर्क इतना है कि एक समाज था जिसने पानी और पानी स्रोतों की कद्र करनी सीखी थी और एक समाज है जिसने जीवन के इस एक अभिन्‍न तत्‍व को न तो बरतना ही सीखा और न ही इसकी कद्र करनी सीखी .<br />
_______________</p></blockquote>
<div id="attachment_530" class="wp-caption alignnone" style="width: 600px"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/07/a-miner.jpg?w=590&#038;h=453" alt="श्रीगंगानगर: सफाई के बाद कुछ दिखने लगी है ए माइनर." title="a miner" width="590" height="453" class="size-full wp-image-530" /><p class="wp-caption-text">श्रीगंगानगर: सफाई के बाद कुछ दिखने लगी है ए माइनर.</p></div>
<p><strong>राजस्‍थान</strong> के प्रमुख जिला मुख्‍यालयों में से एक गंगानगर की बीच में से एक छोटी सी नहर गुजरती है. तथ्‍यात्‍मक रूप से इसका नाम ए माइनर है लेकिन हमने बचपन से ही इसे कुत्‍ता लिकनी के नाम से सुना और जाना. कुत्‍ता लिकनी यानी जिसमें कुत्‍ते लिकते हों. पानी पीते रहते हों. एक बहती जलधारा को कुत्‍तालिकनी कहना शायद बुरा लगे लेकिन इसमें वास्‍तवितक रूप से इसमें कुछ गलत भी नहीं था.</p>
<p>वक्‍त के साथ आसपास के दुकानदारों, अन्‍य लोगों ने इस छोटी से नहर पर अवैध रूप से पुल बना दिए. अपने गंदे पानी यहां तक कि सीवर के मुहं भी इस नहर में खोल दिए जबकि इसका पानी आगे दर्जन भर गांवों के किसान पीते हैं. जल जैसे अमूल्‍य स्रोत की इससे बड़ी बेकद्री क्‍या होगी? </p>
<p>नहर से जुडे किसान सालों साल से मांग कर रहे थे कि इस नहर पर हुए अवैध कब्‍जों को हटाकर इसकी सफाई की जाए. लेकिन कई तरह की दिक्‍कतों के चलते कुछ नहीं हुआ. अंतत: किसान खुद ही आगे आए. उन्‍होंने सामूहिक मेहनत करते हुए इसकी सफाई करने का बीडा उठाया. शुरुआत हुई तो प्रशासन भी उनके साथ आ खड़ा हुआ. कब्‍जा‍ करने वालों तथा कुछ अन्‍य स्‍वार्थी तत्‍वों के शुरुआती विरोध के बावजूद यह हवन पूरा होने को है.</p>
<p>बरसों से बने अवैध पुल तोड़ दिए गए हैं. तीन तीन फीट जमा सिल्‍ट या कादा निकाला जा रहा है. अपनी दुकानों/घरों के मलमूत्र और अन्‍य गंदगी की नालियों का मुंह ए माइनर में करने वालों के खिलाफ मामले दर्ज करने की बात है. ग्रामीणों के इस सामूहिक आयोजन को यज्ञ से कम क्‍या कहा जाए? पत्रिका में धांधूसर गांव की एक कहानी छपी है. पानी की कमी से परेशान ग्रामीणों ने एकजुट होकर पुराने जलस्रोत को नये सिरे से तैयार किया है और वहां अब पशुओं के लिए चौबीसों घंटे पानी रहता है. </p>
<p>ये घटनाएं कई संकेत देती हैं. नकल में मोमोज, बर्गर, सैंडविच खाये- अघाये समाज ने अपने जलस्रोतों और संसाधनों के साथ जो बदसलूकी की है उसका नमूना है ये घटनाएं! साथ ही ये सकारात्‍मक संकेत देती हैं कि अब भी आम आदमी में वो जज्‍बा है जो किसी कुत्‍ता लिकनी को फिर से ए माइनर कर सकता है. थार और उत्‍तरी भारत में इस तरह की कुत्‍तालिकनी नहरों, नदियों और जोहड़ों की संख्‍या बहुत है. उम्‍मीद की जानी चाहिए कि ए माइनर की यह कथा एक शुरुआत भर है !</p>
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		<title>छूटते छूटते छूटता है..</title>
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		<pubDate>Wed, 22 Jul 2009 04:47:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
				<category><![CDATA[गांव- गुवाड़]]></category>
		<category><![CDATA[mohan alok]]></category>
		<category><![CDATA[rajasthani language]]></category>
		<category><![CDATA[rajasthin literature]]></category>
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		<description><![CDATA[मान्‍यता से बड़ा मुद्दा जनजुड़ाव का है. जनजुड़ाव नहीं होने पर मान्‍यता कोई मायने नहीं रखती. आम लोग भाषा के सवाल को नहीं मानते क्‍योंकि उन्‍हें लगता है कि काम चल रहा है. दरअसल लोगों को मान्‍यता नहीं मिलने से होने वाले नुकसान की जानकारी नहीं.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=518&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><blockquote><p>राजस्‍थानी के वरिष्‍ठतम लेखकों में से एक मोहन आलोक ने हाल ही में ज़फ़रनामा का सुंदर, सार्थक और सराहनीय अनुवाद किया है. ग-गीत, डांखळा, चित मारौ दुख नै, सौ सोनेट और वनदेवी जैसी कई उपलब्धिपरक किताबें लिख चुके मोहन जी ने पिछले दिनों थोड़ी सी जमीन खरीदी और उसमें दर्जनों पेड़ लगाए. उनका कहना है कि बात सिर्फ बातों से नहीं बनेगी कुछ करना भी होगा. उनसे मुलाकात होती रहती है. इस बार छूटते ही चार सवाल उनके सामने पेल दिए. वे श्रीगंगानगर में रहते हैं. </p></blockquote>
<p><a href="http://kankad.files.wordpress.com/2009/07/mohan-jee.jpg"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/07/mohan-jee.jpg?w=448&#038;h=325" alt="mohan jee" title="mohan jee" width="448" height="325" class="alignnone size-full wp-image-519" /></a></p>
<p><strong>क्‍या कर रहे हैं आजकल?</strong><br />
‘ छूटते छूटते छूटता है उनकी गली में जाना..’ , लिखने पढने वाला आदमी हूं, वही कर रहा हूं. राजस्‍थानी में नया प्रयोग रूबाइयों के रूप में किया है. 100 के करीब रूबाइयां लिखी हैं.. किताब का रूप दे रहा हूं.</p>
<p><strong>राजस्‍थानी साहित्‍य की मौजूदा स्थिति?</strong><br />
स्थिति संतोषजनक है.. साहित्‍यकार बलिदान कर रहे हैं&#8230; खून जलाकर लिखते हैं, पेट काटकर छपवाते हैं, फिर टिकटें लगाकर भिजवाते हैं. खरीद के कोई कोई पढ़ना नहीं चाहता. राजस्‍थानी का अपना कोई पाठक वर्ग नहीं, प्राय: सभी हिंदी से ही हैं. </p>
<p><strong>राजस्‍थानी साहित्‍य का भविष्‍य?</strong><br />
दिक्‍कत है कि राजस्‍थानी में पुरस्‍कार बहुत हैं. बड़े बड़े पुरस्‍कार हैं, अच्‍छी खासी नकदी वाले! यही कारण है कि हिंदी मूल के लेखक भी राजस्‍थानी की ओर रुख कर रहे हैं. तो हिंदी या अंग्रेजी में सोचकर लिखे राजस्‍थानी साहित्‍य में तंत नहीं होता. गहराई का सवाल ही नहीं! बड़ी चिंता यह कि स्‍थाई महत्‍व का नहीं लिखा जा रहा जिसको पढ़कर उम्‍मीद बंधे.. !</p>
<p><strong>राजस्‍थानी को मान्‍यता का सवाल..?</strong><br />
मान्‍यता से बड़ा मुद्दा जनजुड़ाव का है. जनजुड़ाव नहीं होने पर मान्‍यता कोई मायने नहीं रखती. आम लोग भाषा के सवाल को नहीं मानते क्‍योंकि उन्‍हें लगता है कि काम चल रहा है. दरअसल लोगों को मान्‍यता नहीं मिलने से होने वाले नुकसान की जानकारी नहीं. फिर शायद प्रशासनिक और राजनीतिक स्‍तर पर भी ज्‍यादा इच्‍छा नहीं है. शायद वहां एक सवाल यह भी है कि हिंदी बेल्‍ट से राजस्‍थान प्रदेश को निकाल दिया जाए तो बचेगा क्‍या?</p>
Posted in गांव- गुवाड़ Tagged: mohan alok, rajasthani language, rajasthin literature, Zafarnama <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kankad.wordpress.com/518/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kankad.wordpress.com/518/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kankad.wordpress.com/518/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kankad.wordpress.com/518/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kankad.wordpress.com/518/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kankad.wordpress.com/518/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kankad.wordpress.com/518/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kankad.wordpress.com/518/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kankad.wordpress.com/518/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kankad.wordpress.com/518/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=518&subd=kankad&ref=&feed=1" /></div>]]></content:encoded>
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		<item>
		<title>हम भी अंग्रेजों के जमाने के!</title>
		<link>http://kankad.wordpress.com/2009/07/19/pili/</link>
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		<pubDate>Sun, 19 Jul 2009 16:51:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
				<category><![CDATA[गांव- गुवाड़]]></category>
		<category><![CDATA[Bhakhra]]></category>
		<category><![CDATA[Gang Nahar]]></category>
		<category><![CDATA[Hanumangarh]]></category>
		<category><![CDATA[kalibangan]]></category>
		<category><![CDATA[pilibangan]]></category>
		<category><![CDATA[raj canal]]></category>

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		<description><![CDATA[पीलीबंगा तो बाद में ही बसा और फला फूला. भाखड़ा और उसके बाद आई राजकैनाल ने दुनिया पलट थी. धरती धान और सफेद सोना (नरमा कपास) उगलने लगी और देखते ही देखते पीलीबंगा बड़ी मंडी हो गई.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=513&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><strong>एक उम्र ड्राइवरी करते हुए गुजारने वाले पन्‍नालाल की नज़र में पीलीबंगा की कहानी.. </strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<div id="attachment_515" class="wp-caption alignnone" style="width: 610px"><a href="http://kankad.files.wordpress.com/2009/07/28631.jpg"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/07/28631.jpg?w=600&#038;h=453" alt="बहत्‍तर साल के पन्‍नालाल आज भी पीलीबंगा में जीप चलाते हैं.उनके पिताजी भी इसी लाईन में थे और बेटा भी ड्राइवर है." title="2863" width="600" height="453" class="size-full wp-image-515" /></a><p class="wp-caption-text">बहत्‍तर साल के पन्‍नालाल आज भी पीलीबंगा में जीप चलाते हैं.उनके पिताजी भी इसी लाईन में थे और बेटा भी ड्राइवर है.</p></div>
<p><strong>मैंने</strong> शुरुआती ड्राइवरी बीकानेर और हनुमानगढ़ में की और साठ की दशक की शुरुआत में पीलीबंगा आया. कुछ नहीं होता था यहां .. कुछ घर, झोंप‍डियां और झाड़ झंगाड़. सांडे और गोयरे! पहली बार पीलीबंगा पहुंचा और पनवाड़ी से कैप्‍सटन सिगरेट का पैकेट मांगा. वो कुछ देर तक तो मेरे मुहं की ओर देखता रहा फिर बोला .. साहब यहां तो केप्‍सटन की एक सिगरेट पीने वाले नहीं आप डब्‍बी मांग रहे हैं. मैंने मन ही मन कहा, ‘ बेटे हम भी अंग्रेजों के जमाने के ड्राइवर हैं’. </p>
<p>दरअसल मेरे पिताजी रियासतकालीन बीकानेर रेल में मोटर ट्राली फीटर थे. उनका काम रेलवे निरीक्षण पर आने वाले अंग्रेज अधिकारियों की ट्रालियों को चलाना था. उसके बाद मैं भी ड्राइवरी करने लगा. पहले रशियन और आर्मेनियन ट्रेक्‍टर चलाए फिर जीप! 84 माडल की यह जीप आज भी दमदार है. सीमेंट या यूरिया के 10-15 कट्टे डालकर ले जाते हैं कहीं जवाब नहीं देती.</p>
<p>तो पीलीबंगा .. शुरुआती दिनों में यहां खूब दूर दूर तक झाड़ हुआ करते थे. हिरणों का वास था. डार की डार हिरण होते. झाडियों में गोयरे और सांडे मिलते .. सांप बिच्‍छु की तो बात ही क्‍या. लक्‍खूवाली थी.. पीलीबंगा तो बाद में ही बसा और फला फूला. भाखड़ा और उसके बाद आई राजकैनाल ने दुनिया पलट थी. धरती धान और सफेद सोना (नरमा कपास) उगलने लगी और देखते ही देखते पीलीबंगा बड़ी मंडी हो गई.</p>
<p>शिक्षा के प्रति लोगों का नजरिया बदल गया. रहन सहन बदल गया. अमीर गरीबी का छजर बदल गया!</p>
<p>बहुत कुछ बदल गया, मेरा सिगरेट ब्रांड भी.. अब देसी सिगरेट पीता हूं या बीडी. हां कोई दोस्‍त मिल जाए तो कुछ और भी हो जाता है. </p>
<p>महंगी नयी गा‍डियां चलने लगी हैं. लेकिन जान पहचान और संबंधों के कारण काम निकलता रहता है. किसी की मोहताजी नहीं. जीवन के 72 साल हो गए हैं. बस आंखें जवाब दे रही हैं धीरे धीरे. फिर भी जब तक चलेगा गाडी चलाते रहेंगे!</p>
<p>&#8230;..<br />
पीलीबंगा से कालीबंगा तक के पांचेक किलोमीटर की यात्रा में पन्‍नालाल जी से हुई बातचीत पर आधारित. पीलीबंगा, उत्‍तर पश्चिमी राजस्‍थान का एक प्रमुख कस्‍बा है.</p>
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	</item>
		<item>
		<title>शरमाता- संकुचाता सावण !</title>
		<link>http://kankad.wordpress.com/2009/07/19/saavan/</link>
		<comments>http://kankad.wordpress.com/2009/07/19/saavan/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 19 Jul 2009 05:19:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
				<category><![CDATA[गांव- गुवाड़]]></category>

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		<description><![CDATA[एक बुजुर्ग कहते हैं कि वैसी बारिश होगी भी कैसे. यह तो शर्माता संकुचाता सावण है. .. इतनी देरी से आने पर मेह, सावण और इंद्र को भी तो कुछ शर्म, संकोच होता होगा. यही कारण है कि वह एकसार, मूसलाधार नहीं.. टुकड़ों टुकड़ों में, कभी दिन कभी रात में आ रहा है. समय पर आता तो झमाझम नहीं करता. <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=503&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><blockquote><p>देरी से आने पर सावण भी शर्माने लगा है. शायद यही कारण है कि वह थार में कभी एकसार या मूसलाधार नहीं बरस रहा ! मेह कभी रात में बरता है तो कभी दिन में बूंदाबांदी&#8230; जैसे दिल खोलकर नहीं बरस रहा हो. </p></blockquote>
<div id="attachment_504" class="wp-caption alignnone" style="width: 560px"><a href="http://kankad.files.wordpress.com/2009/07/sri.jpg"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/07/sri.jpg?w=550&#038;h=432" alt="गंगानगर में ढलता सावण का एक सूरज. बादल तो है पर बरसने वाले नहीं !" title="sri" width="550" height="432" class="size-full wp-image-504" /></a><p class="wp-caption-text">गंगानगर में ढलता सावण का एक सूरज. बादल तो है पर बरसने वाले नहीं !</p></div>
<p>जुलाई का पहला पखवाड़ा एक बार फिर थार में. दिल्‍ली से लेकर सूरतगढ़, सूरतगढ़ से नोहर-भादरा, श्रीगंगानगर,बीकानेर और अनूपगढ़ तथा कालीबंगा तक.. उत्‍तर पश्चिम के सारे थार में एक बार दोस्‍तों के साथ घूमे. भारतीय रेल, निजी गाड़ी, राजस्‍थान रोडवेज की बस.. बाइक अनेक तरह के वाहनों से. </p>
<p>जिस दिन थार की दहलीज पर पहुंचा, सावण (सावन, श्रावण) का पहला सूरज उग रहा है. पीलीबंगा से आगे शायद कहीं केंद्रीय कृषि फार्म के मीलों मील फैले खेतों से सूरज को देखा और प्रणाम किया. माहौल में हालांकि सावण जैसा कुछ नहीं है. उत्‍तरी भारत विशेषकर राजस्‍थान गर्मी से झुलस रहा है. 108 साल में सर्वाधिक गर्म दिन इसी दौरान रहा. </p>
<p>सावण के पहले हफ्ते में दो बार पारंपरिक राजस्‍थानी आंधी से सामना हुआ. राजस्‍थानी आंधी जिसमें पेड़ या कोई दरो दीवार नहीं टिक पाती. हर कहीं आंधी बालुई रेत के रूप में अपने हस्‍ताक्षर कर देती है. </p>
<p>हालांकि बाद में नोहर, श्रीकरणपुर, बीकानेर सहित अनेक इलाकों से छिटपुट मेह के समाचार आने लगे थे. नोहर में हाळी खेतों को जोतते दिखे तो महाजन के आगे खेतों में अच्‍छी हरियाली नजर आई. यह चौदह जुलाई है जब हम गंगानगर के गगनपथ पर एक दोस्‍त के पास बैठे हैं. कल की आंधी के बाद सुबह सुबह ही बूंदे गिर रही हैं. रूक रूक कर. लेकिन इन बूंदों में सावण वाली मस्‍ती और अल्‍हड़ता नहीं है. </p>
<p>एक बुजुर्ग कहते हैं कि वैसी बारिश होगी भी कैसे. यह तो शर्माता संकुचाता सावण है. .. इतनी देरी से आने पर मेह, सावण और इंद्र को भी तो कुछ शर्म, संकोच होता होगा. यही कारण है कि वह एकसार, मूसलाधार नहीं.. टुकड़ों टुकड़ों में, कभी दिन कभी रात में आ रहा है. समय पर आता तो झमाझम नहीं करता. </p>
<p>उनकी बात सही भी लगता है. एक मित्र कहते हैं कि शायद सालों साल बीत जाने के कारण समयचक्र भी बदल गया है. अब हमें यह मान लेना चाहिए कि बारिश सावण में नहीं अगले महीने में होगी.. यानी एक आध महीने का अंतर हमें अपने स्‍तर पर ही डाल लेना चाहिए ताकि ज्‍यादा दिक्‍कत नहीं हो. बात सही भी लगती है. कुछ तो है जो बदल गया है, प्रकृति या हम.. और कुछ बदलना भी होगा ताकि सावण में संकुचाता शर्माता सावण नहीं हो बल्कि झमाझम मेह मिले..</p>
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		<title>घुळगांठ : जो है!</title>
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		<pubDate>Tue, 07 Jul 2009 04:45:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>prithvi</dc:creator>
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		<description><![CDATA[राजस्‍थानी के साथ हिंदी में भी कविता कहानी करने वाले ओळा को 2002 में साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार मिला. उनके राजस्‍थानी कहानी संग्रह ‘ जीव री जात’ का पंजाबी में अनुवाद हो चुका है. <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=492&subd=kankad&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><a href="http://kankad.files.wordpress.com/2009/07/ola-cover.jpg"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/07/ola-cover.jpg?w=250&#038;h=400" alt="ola-cover" title="ola-cover" width="250" height="400" class="alignleft size-full wp-image-493" /></a><strong>घुळगांठ जो है!</strong> कोई गांठ जब गडमड होकर उलझ जाती है उसे घुळगांठ कहते हैं. यानी अनखुल ग्रंथि. मूल रूप से एक सस्‍ंकृत शब्‍द का तत्‍भव है जिसका हिंदी में समानार्थी ढूंढना मुश्किल ही है. भरत ओळा ने अपने इस शीर्षक के माध्‍यम से भारतीय समाज की एक नहीं खुलने वाली ग्रंथि या घुळगांठ को समेटा है जो जातीयता के रूप में न केवल गहरे और चिंताजनक रूप से विद्यमान है बल्कि निरंतर बढ़ रही है. </p>
<p><strong>एजेंडा : मनीसा मेघवाल!</strong> यह उपन्‍यास अलग अलग जाति के चार युवकों और तीन युवतियों के इर्द गिर्द घूमता है. इसमें भी केंद्र में मेघवाल जाति की एक लड़की मनीसा है यानी मनीसा मेघवाल. भरे बदन की एक सुंदर षोड्षी. एजेंडा यहीं से शुरू होता है कि इस लड़की का नाम क्‍या है, नाम है तो जाति क्‍या है, जाति मेघवाल! हो ही नहीं सकता है और अगर वह मेघवाल है तो इंडु चौधरी के शब्‍दों के ‘झट फाऊल’ यानी वर्ण संकर है. या कि पंडताई तो पंडतों के खून मे होती है. बहस यही है कि नीची जाति की लड़की सुंदर कैसे हो सकती है. इसका एक उत्‍तर उपन्‍यास में कहीं इस सवाल में भी निकलता है कि चौधरियों के सारे लड़के ‘मर्द’ जैसे क्‍यों नहीं होते!</p>
<p><strong>कथावस्‍तु: साहसिक और अनूठी.</strong> उपन्‍यास की कथावस्‍तु राजस्‍थान के एक सिरे के जिले हनुमानगढ़ तथा उसके दो कस्‍बों नोहर, भादरा में यहां वहां घूमती है. राजस्‍थान का इस इलाके की सीमा पंजाब के साथ साथ हरियाणा से लगती है और सांस्‍कृतिक लिहाज से इसे बहुभाषी भी कहा जा सकता है. दूसरी बात उस ग्रंथि की है जिस पर यह उपन्‍यास आधारित है. जातियों की घुळगांठ.. यह घुळगांठ थार से इतर पंजाब या हरियाणा ही नहीं एक तरह से समूचे भारतीय समाज की एक जटिलता व विकार है. सुपरियरिटी या इनफरियरिटी कांपलेक्‍स .. जाति विशेष को एक निम्‍नतम संबोधन से बुलाना भारतीय समाज की विशेषता रही है जिसका उदाहरण इस उपन्‍यास में जाट यानी खोता या खोतणा, बणिया यानी किराड़, ब्राहमण यानी गरड़ा और मेघवाल यानी रूंगा के रूप में है. </p>
<p><strong>भाषा शैली:बहुत सुंदर </strong>. अनुवादित और तकनीकी शब्‍दों वाली किताबें पढ़ते पढ़ते उब गए लोगों के लिए ताजी हवा का झोंका. सही मायने में बतरस का बेहतरीन नमूना क्‍योंकि सभी ने तो गूंग (मूर्खता) नहीं पहन रखी और कई लोगों की फूंक से भी घास जल जाती है! सीधे साधे जीवन की अनघड़ भाषा बोली इस उपन्‍यास को और भी पठनीय बना देती है. </p>
<p>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.<br />
<a href="http://kankad.files.wordpress.com/2009/07/bharat-ola.jpg"><img src="http://kankad.files.wordpress.com/2009/07/bharat-ola.jpg?w=109&#038;h=100" alt="bharat-ola" title="bharat-ola" width="109" height="100" class="alignleft size-full wp-image-495" /></a><br />
<blockquote> ऊपरी तौर पर लगता है कि शिक्षा और धन प्रवाह के बढ़ने के साथ जाति की बात ही खत्‍म हो गई. ऐसा नहीं है. राजस्‍थानी के सामंतवादी समाज में इसकी जड़ें आज भी बहुत गहरी हैं. यह कहना अति‍श्‍योक्ति नहीं होगा कि जातिवाद भयंकर रूप में मौजूद है. जातिवाद के इसी सामूहिक मनोविज्ञान पर केंद्रित है नया उपन्‍यास ‘घुळगांठ’.- भरत  </p></blockquote>
<p>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<p><strong>रूंगा झूंगा :</strong> आरक्षण पर एक अच्‍छी बहस, भगतसिंह, अंबेडकर, महात्‍मा गांधी और मनु का किन्‍हीं अच्‍छे व सारगर्भित संदर्भों में जिक्र. कथाओं के रूप में पंडतों की कमाई का धंधा, स्‍टेट्स के नाम पर शादी ब्‍याह पर किए जाने वाले अंधाधुंध खर्च जैसे मुद्दों पर बेबाक टिप्‍पणी. उपन्‍यास का एक उपन्‍यास न होकर अपने साथ या आसपास घटित होने वाला कोई घटनाक्रम लगना. जीवंत शब्‍दावली और आनंद देने वाली लोकोक्तियां व मुआवरे. अनघड़ लेकिन सुघड़ उपन्‍यास!</p>
<p><strong>कांकड़ की सलाह : खरीद के पढि़ए!</strong> थार ही नहीं तो कम से कम उत्‍तर भारतीय समाज के सामूहि‍क मनोविज्ञान या जातिगत आधारित कुंठाओं को जानने का एक बेहद सरल और अद्भुत उपन्‍यास. उपन्‍यास के अग्रलेख में माल‍चंद तिवाड़ी ने लिखा है कि यह उपन्‍यास सामूहिक मनोविज्ञान की गहरी झड़ों पर रोशनी डालता है. उपन्‍यास भारतीय समाज की उस घुळगांठ को सामने लाया है जो उसकी पूरी मनोरचना में समाई है. एक ऐसा विषय जिसे ज्‍यादा से ज्‍यादा ढंकने की कोशिश की जाती है या कमतर माना जाता है, उसे अपने उपन्‍यास का विषय बनाकर ओळा ने अपने लेखकीय साहस और व्‍यक्तिगत जीवतटता का परिचय दिया है. निसंदेह रूप से भरत ओळा ने मनीसा मेघवाल की इंडु चौधरी के साथ प्रेम कहानी नहीं लिखी है. न ही उन्‍होंने जातिव्‍यवस्‍था पर कोई शोध ग्रंथ देने का प्रयास किया है. वे उपन्‍यास में होकर भी गायब हैं और न होते हुए भी मौजूद हैं. उन्‍होंने वक्‍त के एक हिस्‍से को पन्‍नों पर उतार कर पाठक के हवाले कर दिया है. यही इसका सरलता और यही इसकी जटिलता है. कल्‍पना आधारित होकर भी यह उपन्‍यास हकीकत से कहीं अधिक कठोर तथा सपनों से अधिक मुलायम लगता है. हर पेज की कोई टिप्‍पणी या कोई बात पाठक यही सोचता है- यह तो हो रहा है, यह सही है.. अरे ये तो मेरे साथ भी हुआ है. घुळगांठ की किसी अन्‍य किताब से तुलना करना बेमानी और भरत ओळा के साथ अन्‍याय होगा क्‍योंकि यह उपन्‍यास अपने आप में एक प्रतिमान घड़ता है.</p>
<p><strong>सार-सार </strong><br />
भरत ओळा : राजस्‍थानी के साथ हिंदी में भी कविता कहानी करने वाले ओळा को 2002 में साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार मिला. उनके राजस्‍थानी कहानी संग्रह ‘ जीव री जात’ का पंजाबी में अनुवाद हो चुका है. एकता प्रकाशन, चुरू द्वारा प्रकाशित घुळगांठ का हिंदी और पंजाबी संस्‍करण प्रस्‍तावित है. ओळा का पता है- 37, सेक्‍टर नं. 5, नोहर, जिला- हनुमानगढ (राजस्‍थान).</p>
Posted in गांव- गुवाड़ Tagged: अनुवाद, जाट, जातियता, पंजाबी, भिरानी, भेदभाव, मालचंद तिवाड़ी, मेघवाल, विजयदान देथा, सामाजिक विरूपता <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kankad.wordpress.com/492/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kankad.wordpress.com/492/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kankad.wordpress.com/492/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kankad.wordpress.com/492/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kankad.wordpress.com/492/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kankad.wordpress.com/492/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kankad.wordpress.com/492/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kankad.wordpress.com/492/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kankad.wordpress.com/492/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kankad.wordpress.com/492/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kankad.wordpress.com&blog=6194804&post=492&subd=kankad&ref=&feed=1" /></div>]]></content:encoded>
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