थार का सबसे चर्चित और रंगीला शहर. राजमंदिर, हवामहल, पोलो विक्टरी, बिड़ला तारा मंडल, बड़ी और छोटी चौपड़… थार के अधिकांश बच्चों के लिए जयपुर का यही मतलब रहा है. अब शायद वक्त बदल रहा है तथा जयपुर के मायने भी. जयपुर के आसपास के इलाकों को छोड़ दें तो यह शहर हमेशा ही दूर की कौड़ी रहा है. वैसे भी थार के लोग कोलकाता, असम या विदेश चले जाएंगे, दिल्ली या जयपुर उन्हें बहुत दूर लगता है. बीते आठ दस साल में हालात भले ही बदले हों वरना किसी को कह देते कि दिल्ली रहते हैं तो सुनने वाले के दिल में धुक धुकी सी जरूर होती. ऐसा कोलकाता या गोहाटी सुनकर नहीं होता. विशेषकर शेखावटी व नोहर जैसे इलाकों से बडी संख्या में लोग कोलकाता, मद्रास, गुवाहाटी, अहमदाबाद, सूरत आदि में कारोबार काम करने गए और वहीं रच बस गए.

रात में पोलो विक्टरी सिनेमा. जयपुर आने वालों के लिए एक बड़ा मील.
तो यह जो जयपुर है वह दिल्ली या किसी भी अन्य बाहरी शहर की तुलना में अधिक अपनापन लिए हुए है. अनेक बार अनेक शहरों में जाना होता है लेकिन जयपुर में कभी ऐसा नहीं लगा कि किसी पराए शहर में है. हो सकता है कि ऐसा थार से बंधी अपनी नाळ के कारण हो. लेकिन है. जयपुर में भी अपन वैसी ही मस्ती और बेफिक्री से घूमते हैं जैसा कि दिल्ली या अपने घर में.
आमतौर पर अन्य शहरों की तुलना में सस्ता होने के बावजूद जयपुर महंगा है. पोलो विक्टरी के पास एक चर्चित दुकान पर अगर आप 100 रुपये में दो दाल बाटी खाते हैं तो इसका संकेत मिल जाता है. शायद इसका एक कारण है यहां आने वाले हर यात्री को पर्यटक की नज़र से देखा जाना और वैसा ही व्यवहार करना. देश या इसी प्रदेश का नागरिक होने के बावजूद जब आपको पर्यटक के रूप में देखा जाता है तो बुरा भी लगता है. ऐसे में रिक्शेवालों से लेकर दुकानदारों तक से ‘लुटने’ का डर है. वैसे ये रिक्शेवाले और टैंपूवाले सभी जगह एक जैसे ही होते हैं.
आमतौर पर हम लोग हर पर्यटक को ‘अंग्रेज’ ही मानते हैं भले ही वह पुर्तगाल से आया हो या फ्रांस से. थारवासी हर विदेशी को अंग्रेज ही कहते हैं. जयपुर, अजमेर, पुष्कर, जोधपुर, जैसलमेर व उदयपुर में तो इस तरह के पर्यटकों की भीड ही लगी रहती है. कहते हैं कि राजस्थान के ये स्थान विदेशी पर्यटकों के लिए पसंदीदा गंतव्यों में से एक हैं. अपनी लोकपरंपराओं के साथ साथ आधुनिक जीवनचर्या के लिए जाना जाने वाला जयपुर फैशन में भी पीछे नहीं है.
वैसे इस बार भादो में वहां देखा कि लड़कियां, युवतियां व महिलाएं मुहं पर नकाब ‘दुपट्टे या बडे रूमाल से मुहं ढककर’ तथा हाथों बाहों में लंबे लंबे दस्ताने पहने हुए थीं. दुपहिया चलाने वाली हो या पैदल चलने वाली.. कई जगह तो लड़कों तक ने ऐसा कर रखा था. समझ में नहीं आया यह सनबर्न से खुद को बचाने की कवायद है या फैशन. तो यह जो जयपुर है वह थार के हर वाशिंदे के सपनों में बसता है और नसों में धडकता है.. कभी गुलाबीनगरी के रूप में तो कभी प्रदेश के सबसे हाइटेक व फैशनपरस्त शहर के रूप में!
यह है जयपुर : चारों ओर से परकोटे और दीवारों से घिरे इस शहर में प्रवेश के लिए पहले सात दरवाजे थे जबकि बाद में एक नया दरवाजा न्यू गेट बना. जयपुर बसाया था महाराजा जयसिंह द्वितीय ने 1827 में जबकि इसे गुलाबी बनाया 1896 में सवाई मानसिंह ने. सवाई मानसिंह ने इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ व वेल्स के राजकुमार अल्बर्ट के स्वागत में पूरे शहर को गुलाबी रंग से पुतवा दिया और यह गुलाबीनगर हो गया. तीन ओर से अरावली पवर्तमाला से घिरा जयपुर अपनी समृद्ध परंपरा, संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है. प्राचीन या मूल जयपुर देश के सबसे व्यवस्थित शहरों में गिना जाता है. इसके वास्तु के बारे में कहावत प्रसिद्ध है कि शहर को सूत से नाप लीजिये, नाप-जोख में एक बाल के बराबर भी फ़र्क नही मिलेगा. बनवाने वालों ने इस शहर को सिर्फ वास्तु या ज्यामिति के हिसाब से ही नहीं सुरक्षा, सौंदर्य, जन सुविधा और रोजगार सृजन के लिहाज से भी बेहतर बनाने का प्रयास किया.

स्थापत्य की बात की जाए तो जयपुर की एक खासियत यहां निर्माण कार्य में गुलाबी धौलपुरी पत्थरों का इस्तेमाल भी है. यहाँ के मुख्य उद्योगों में धातु,संगमरमर, वस्त्र-छपाई, हस्त-कला, रत्न व आभूषण का आयात-निर्यात तथा पर्यटन आदि शामिल हैं। दर्शनीय स्थलों में नाहरगढ़ दुर्ग, जयगढ़ दुर्ग, सिटी पैलेस, मोती डूंगरी, हवामहल, रामनिवास बाग, परकोटा, नाहरगढ का किला, जंतरमंतर या वैधशाला, गोविंददेव जी का मंदिर प्रमुख है. वैसे कहीं से भी जयपुर आने के लिए सड़क मार्ग बहुत अच्छा विकल्प है. वैसे भी सड़क परिवहन के लिहाज से राजस्थान कहीं बेहतर और अव्वल स्थिति में है. जयपुर में दिल्ली की तर्ज पर बीआरटी कारिडार का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है और मेट्रो के लिए भी पहल शुरू हो गई है. सेज जैसी परियोजनाओं के साथ अनेक बड़ी कंपनियां यहां दस्तक दे रही हैं. बदलते वक्त के साथ यह शहर भी बदल रहा है हालांकि इसका गुलाबीपन अब भी बना हुआ है.


जयपुर की सैर करके मज़ा आया
By: विनय on September 9, 2009
at 1:16 pm
प्रिय पृथ्वी जी,
अपने शहर पर आपके बेबाक विचार अच्छे लगे ……सबसे अच्छी लगी , घर के नजदीक पोलोविक्ट्री की रात की तस्वीर ….दिल से शुक्रिया …..
- आपका प्रवीण
By: PRAVEEN DUTTA on September 11, 2009
at 10:55 am
जयपुर तो जयपुर है भाई, इसे जितना देखो कम है. प्रयास के लिए बधाई.
- विनोद, पीलीबंगा
By: vinod nokhwal on September 11, 2009
at 12:08 pm
जयपुर के बारे में आपके विचार अच्छे लगे…!युवक युवतियों ने चेहरे को बांधना. एक फेशन बना लिया है!ये अब सभी जगह होने लगा है!पोलो विक्ट्री एक ऐसी जगह है जो जयपुर पहली बार आने वाला सबसे पहले देखता है…!बहुत अच्छी पोस्ट….
By: rajnish parihar on September 11, 2009
at 1:12 pm
जयपुर शहर की सैर करके मज़ा आया आपके विचार अच्छे लगे
-Ashok Duhan Petwer
By: Ashok Duhan Petwer on September 11, 2009
at 3:51 pm
Dear friend (Prithvi),
Your article about “JAIPUR” is very good and knowledgeable.
Pratap Chauhan
By: pratap singh chauhan on September 24, 2009
at 1:50 pm