भारतीय सभ्यता व संस्कृति में विशेष रुचि रखने वाले तैस्सीतोरी, वार्डिक एंड हिस्टोरिकल सर्वे आफ राजपूताना के अधीक्षक के रूप में राजपूताना आए थे. लेकिन बीकानेर में उनका मन ऐसा रमा कि वे यहीं के होकर रह गए.
उत्तर पश्चिमी राजस्थान विशेषकर बीकानेर रियासत में शिलालेख, सिक्के, मूर्तियां व अन्य ऐतिहासिक सामग्री एकत्रित करने में जिस विदेशी हस्ती ने सबसे महत्ती भूमिका निभाई वह है एल पी तैस्सीतोरी. इटली में जन्मे तैस्सीतोरी वार्डिक एंड हिस्टोरिकल सर्वे आफ राजपूताना के अधीक्षक के रूप में यहां आए पर बीकानेर में उनका मन ऐसा रमा कि वे यहीं के होकर रह गए. थार की विकट जलवायु के बावजूद तैस्सीतोरी का थार से ऐसा मोह लगा कि वे पुरा सामग्री जुटाने के लिए बीहडों, धोरों में घूमते रहे. थार की डोर उन्हें बार बार इटली से यहां खींचकर लाती रही.

बीकानेर में तैस्सीतोरी की समाधि.
तैस्सीतोरी को राजस्थानी भाषा व उनकी लिपियों के विश्लेषण, भारतीय कला, संस्कृति तथा पुरातत्व में विशेष योगदान के लिए याद किया जाता है. डा तैस्सीतोरी को बीकानेर की सरकार ने राजस्थानी भाषा व उनकी लिपियों का विश्लेण करने के लिए आमंत्रित किया था. वे दिसंबर 1915 में बीकानेर आए. उन्होंने बीकानेर रियासत के सैकड़ों गांवों में घूमकर लगभग 729 पुरालेखों का संग्रह किया. इसी तरह उन्होंने लगभग 981 मूर्तियां तथा पुरातत्व महत्व की दूसरी चीजें खोजीं, इकट्टी की. कहते हैं कि बीकानेर का विख्यात संग्रहालय उन्हीं की देन है.
लुइज पियो तैस्सीतोरी (Luigi Pio Tessitori) का जन्म 13 दिसंबर 1887 को इटली के उदीने (Udine) शहर में हुआ. उन्होंने 24 साल की ही उम्र में रामचरित मानस पर पहले इतालवी शोधार्थी के रूप में शोध प्राप्त किया. विदेशी भाषाओं में उनकी स्वाभाविक रुचि थी और विश्वविद्यालय स्तर पर संस्कृत का अध्ययन करने के बाद वे फ्लोरेंस विश्वविद्यालय से संस्कृत स्नातक भी हुए. उन्होंने ‘रामचरित और रामायण’ विषय पर शोध किया और डाक्टरेट हुए.

बीकानेर संग्रहालय में तैस्सीतोरी अभिलेख कक्ष का एक दृश्य. इस कक्ष की सामग्री हजारी बांठिया ने दी है.
विख्यात भाषा विज्ञानी प्रोफेसर ग्रियर्सन की संतुति पर लंदन में भारत कार्यालय ने एशियाटिक सोसायटी कलकत्ता के लिए उन्हें आमंत्रित किया. आठ अप्रैल 1914 को तैस्सीतोरी ने बंबई में उतरे और उस देश पहुंचे जो उनके सपनों में रचा बसा था. वहां से कलकत्ता फिर जोधपुर और अंतत: अपनी नयी कर्मस्थली बीकानेर पहुंचे. भले ही शुरू में बीकानेर में उनका कार्यकाल नियत था लेकिन वे यहां की संस्कृति में ऐसे रचे बसे कि यहां के ही होकर रहे गए.
तैस्सीतोरी ने खुद को थार की विकट जलवायु के अनुसार ढाला और पुरातात्विक महत्व की सामग्री जुटाने में महत्ती भूमिका निभाई. थार के धोरों और बीहड़ों में घूमते हुए उन्होंने दुलर्भ सामग्री सामग्री जुटाई. उन्होंने हालकृत सतसई, नासकेतरी कथा व इंद्रिय पराजय शतकम तथा आजाद वक्त की कथा का इतालवी भाषा में अनुवाद किया. उनका निधन 32 साल की अल्पायु में ही 22 नवंबर 1919 को बीकानेर में हुआ.
बीकानेर में तैस्सीतोरी के कब्रिस्तान को स्मृतिस्थल के रूप में विकसित किया गया है. जहां राजपूत शैली की छतरी बनी हुई है. 1982 से सालाना तैस्सीतोरी स्मृति समारोह की शुरुआत हुई. बीकानेर के प्रसिद्ध अभिलेखागार में तैस्सीतोरी अभिलेख कक्ष बना हुआ है जिसमें तैस्सीतोरी से जुड़ी तमाम सामग्री का प्रदर्शन किया गया है. इस कक्ष की सामग्री हजारी लाल बांठिया ने उपलब्ध कराई हैं.
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(सामग्री बीकानेर अभिलेखागार में तैस्सीतोरी कक्ष में उपलब्ध सामग्री पर साभार आधारित)
टैग: डा. एल पी टैस्सीटोरी, मुरलीधर व्यास, Hazari Mull Banthia, Hazari lal Banthia, L. P. Tessitori (1887-1919), Luigi Pio Tessitori


जिस विद्वान ने अपने देश से इतनी दूर एक अनजान देश में अनजान भाषा के लिए पूरा जीवन लगा दिया,उसकी समाधी की दुर्दशा उनके प्रति हमारी बेरुखी ही दिखाती है….
By: rajnish parihar on August 22, 2009
at 6:47 pm
समाधि की दुर्दशा तक तो पहुंच गए आपको शायद जानकारी मिली होगी कि बीकानेर के संभागीय आयुक्त का वर्तमान निवास स्थान भी तैस्सीतोरी का घर था। बजाय इसे पर्यटन के उद्देश्य से विकसित करने के एक सरकारी इमारत में तब्दील कर दिया गया। यह अधिक अफसोसजनक बात है। मैं आपको ओम थानवी जी के तीन लेख भी भेज रहा हूं मेल से।
By: सिद्धार्थ जोशी on August 22, 2009
at 9:42 pm
आपका यह बलॉग पढ़ कर अच्छा लगा । हिन्दी में लिखे अच्छे ब्लॉगों की मैं तलाश कर रहा था ।
अपनी सन्स्कृति के बारे में आप लिख रहे हैं यह बहुत ही प्रसन्नता की बात है, इस जारी रखें ।
By: Grey Rainbow - स्याह इंद्रधनुष on August 23, 2009
at 4:41 pm
I am requesting to all pravisiya bikaneri who all are living in out of rajasthan . please all keep responsbility about devlopment of our bikaner . we know our bikaner person who having good business out side from rajasthan . so we require its . we dont depend on only government we have also participate for dovelepment with government .
really your blog so nice bcz u have given to knowledge about hisotorical ….
Thanks & Regards to all
Rajesh Saraswat
Bikaneri
(Jai Trigun Swami )
By: Rajesh Saraswat on August 26, 2009
at 4:21 pm
RAJSTHAN KE MITTI KE MAHAK AB DELHI TALAK BIKHRI H.BHADHAE HO.
By: VINOD NOKHWAL on August 27, 2009
at 2:05 pm
nice one prithvi ji
By: dinesh gupta on September 8, 2009
at 1:58 pm