Posted by: prithvi | August 6, 2009

चांद पर चरखा!

पूरा चांद : एक बिना साफ किए लैंस से.

पूरा चांद : एक बिना साफ किए लैंस से.

बस शायद रावतसर से आगे राष्‍ट्रीय राजमार्ग से मुड़ी थी. मोबाइल में देखा तड़के चार बज रहे हैं. रात ढल रही है. अपनी स्‍लीपर सीट बस में बायीं ओर है, बायीं ओर चांद चमक रहा है. पूरा चांद! उतरता आषाढ और चढ़ता सावण. आषाढ की आखिरी रात ढल रही है और सावण का पहला सवेरा होने वाला है!

बायीं ओर सिर्फ चांद है. अपनी पूरी मौज और अल्‍हड़ता के साथ चमकता हुआ. चांद के ऊपर दूर कहीं तीन तारे दिखाई दे रहे हों मानों किसी राजकुमारी की बांदियां खड़ी हों. चांद ही चांद का साम्राज्‍य है. दूर दूर तक छिटकी चांदनी में इस तरह चांद को निहारने के कम ही अवसर आजकल मिलते हैं! हवा में नमी आने लगी है.

चांद को काफी देर तक निहारता रहा तो बचपन में दादी की बातें याद आने लगी. वे कहती थीं कि चांद पर एक पेड़ है और उसके नीचे एक बुढिया बैठी है जो चरखा कात रही है. आज भी चांद को देखते समय दादी की वह बुढिया और उसके चरखे वाली कहानी याद आ जाती है. गौर से देखने पर सचमुच ऐसा लगता भी है. कि चांद चांद न होकर किसी घर का बाहरी आंगन है जहां एक पेड़ है, जिसके नीचे बैठी एक बुढिया बैठी चरखा कात रही है.

निकटता कभी कभी सुंदरता और आकर्षक को खा जाती है. जैसे चांद को अधिक देर तक निहारने पर वह उतना सुंदर नहीं लगता. मुक्तिबोध का ‘चांद का मुंह टेढा’ स्‍मरण हो आता है.

बचपने या उसके थोड़े दिन बाद तक रात में खेत में काम करते समय प्राय: समय का अनुमान हिरणां कीर्ति जैसे चमकते तारों से लगाया करते थे. तीन तारे हैं जो हर दिन पूर्व में उगते हैं और रात ढलते ढलते पश्चिम में छिप जाते हैं. आमतौर पर इनका कहीं जिक्र नहीं होता. कहानी सुनी थी एक राजा दो हिरणियों का शिकार करने निकला था और ये तीनों वही हैं. एक राजा दो हि‍रणियां.. ! इनसे आधी रात होने या रात ढलने में देरी के बारे में आसानी से अंदाजा हो जाता है.

सप्‍तऋषि मंडल, ध्रुव तारा और सभी बातें तो बहुत सुनी सुनाई हैं. बचपन में टूटते तारे को देख कुछ मांग लिया करते थे या मंदाकिनी का सिरे टटोलने की कोशिश करते थे. बस अड्डे से उतरकर ढाणी यानी घर जाते समय रास्‍ते में खेत में पीपल का बड़ा पेड़ था, अपने चांद के पेड़ की कल्‍पना उसी से थी. वह पेड़ बरसों पहले काट दिया गया. उसकी जगह लगे पेड़ को अपन चांद की बुढिया वाले पेड़ की जगह नहीं ले पाए. इसी लिए चांद का मुंह आजकल टेढा लगता है.

निकलता हुआ चांद, अलग सा ही‍ दिखता है.

निकलता हुआ चांद, अलग सा ही‍ दिखता है.

सप्‍तऋषि मंडल: फाल्गुन-चैत महिने से श्रावण-भाद्र महिने तक उत्तर आकाश में सात तारों का समूह दिखाई पड़ता है। इसमें से चार तारें चौकोर तथा तीन तिरछी लाइन में रहते हैं। इन तारों को काल्पनिक रेखाओं से मिलाने पर एक प्रश्न चिन्ह की तरह दिखाई पड़ते हैं। इन्हीं सात तारों को सप्तर्षि मंडल कहते हैं। इन तारों का नाम प्राचीन काल के सात ऋषियों के नाम पर रखा गया है। ये क्रमशः केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है। इसे अंग्रेजी में ग्रेट/ बिग बियर या उर्सा मेजर कहते हैं। यह कुछ पतंग की तरह लगते हैं जो कि आकाश में डोर के साथ उड़ रही हो। यदि आगे के दो तारों को जोड़ने वाली लाईन को सीधे उत्तर दिशा में बढ़ायें तो यह ध्रुव तारे पर पहुंचती है। ( शेष जानकारी विकिपेडिया से)


Responses

  1. हमें भी बचपन की याद आ गई. सप्‍त्ऋषि मंडल तो हम भी देखा करते थे मगर ऋषियों के नाम आप से जाने. बहुत बढिया पोस्‍ट है आभार..

  2. Bahut sundar.

  3. खुबसूरत पोस्ट …..बधाई

  4. बहुत अच्‍छा. मजा आ गया.

  5. लीक से हटकर है.. शब्‍दों का चयन सुंदर है और उन्‍हें सही जगह पर पिरोया गया है. इसे संयोग ही कहेंगे कि अभी कुछ दिन पहले मैं भी छत पर अपने छोटे बेटे के साथ चांद को निहार रहा था. बेटा मून मून मून बोल रहा था और मुझे उस बुढिया की याद आ रही थी जिसके बारे में हम बचपन में सुनते रहे हैं. क्‍या नई पीढी को वो बुढिया याद रहेगी. शायद मेरे बेटे के लिए चांद हमेशा मून रहेगा, बुढिया वाला चांद नहीं ..


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